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बुरा पर उद्धरण

आचार्य शुक्ल जिसे मर्यादा कहते हैं, वह वास्तव में रूढ़ि है।

मैनेजर पांडेय

जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का ख़ून बिना छना पी जाते हैं।

हरिशंकर परसाई

आदमी जब बिगड़ता है तो स्वभाव से ही कुछ ऐसा है कि जब वह एक चीज़ में बिगड़ता है, तो पीछे सब चीज़ों में ही बिगड़ जाता है।

महात्मा गांधी

एक फ़ालतू विचार कोई विचार नहीं होता।

महात्मा गांधी

बंबई के सिनेमा वाले संगीत का सलाद तैयार करने में परम निपुण हैं।

श्रीलाल शुक्ल

बाहर से हमारे मन में सुंदर जिस मार्ग से आता है, असुंदर भी इसी मार्ग से आता रहता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

यह ‘मिसफिट्स’ का युग है भाई। जिसे जुआड़ख़ाना चलाना चाहिए, वह मंत्री है। जिसे डाकू होना चाहिए, वह पुलिस अफ़सर है। जिसे दलाल होना चाहिए, वह प्रोफ़ेसर है।जिसे जेल में होना चाहिए, वह मज़िस्ट्रेट है। जिसे कथावाचक होना चाहिए, वह उपकुलपति है। जिसे जहाँ नहीं होना चाहिए, वह ठीक वहीं है।

हरिशंकर परसाई

आपदग्रस्ता नारी के सम्मान की रक्षा में मिट जाने वालों की संख्या नगण्य ही है, परंतु अपनी कुचेष्टाओं से उसका अनादर करने वाले पग-पग पर मिलेंगे।

महादेवी वर्मा

महान सभ्यता जब बीच में आकर सड़ती है, तब उसमें अछूत-प्रथा, सती-प्रथा और दहेज-प्रथा की बीमारियाँ पैदा होती हैं।

हरिशंकर परसाई

बुराइयों को जाने बग़ैर, अच्छाइयों की पहचान और उनका पोषण संभव नहीं। कवि को गर्हित, निकृष्ट, वर्जित और निषिद्ध का भी पीछा करना चाहिए।

लीलाधर जगूड़ी

कोई इंजीनियर रद्दी माल लगाकर ग़ैर-ज़िम्मेदारी से कच्चे पुल का निर्माण करे; तो वह जिस अपराध का भागी होगा, उसी अपराध का भागी वह कवि भी होगा, जो राष्ट्रीयता की सच्ची भावना की अनुभूति के बिना रस्म-अदाई के लिए ओजहीन राष्ट्रीय-काव्य रचेगा।

हरिशंकर परसाई

रूढ़ियाँ केवल शास्त्र की ही नहीं होतीं, लोक की भी होती हैं।

मैनेजर पांडेय

प्रजातंत्र में सबसे बड़ा दोष है; तो यह कि इसमें योग्यता को मान्यता नहीं मिलती—लोकप्रियता को मिलती है। हाथ गिने जाते हैं, सिर नहीं तौले जाते।

हरिशंकर परसाई

मनुष्य को चाहिए कि वह जिस स्थिति में भी हो, मृत्यु की परवाह करके कर्तव्य का पालन करे। मृत्यु की अपेक्षा अधर्म से अधिक डरना चाहिए।

सुकरात

हमें बुरे स्वभाव की व्याख्या हीन भावना की निशानी के रूप में करनी चाहिए।

अल्फ़्रेड एडलर

बुरे विचार फूलगोभी में कीड़े की तरह होते हैं!

अमोस ओज़

चरित्रहीन राजनीति, भ्रष्ट समाज, विकृत अप-संस्कृति—सभी अपनी-अपनी तरह भाषा को प्रदूषित करते हैं।

कुँवर नारायण

नैतिकता की असली कसौटी है, बुराई को निरुत्साहित करने की क्षमता।

जॉन स्टुअर्ट मिल

जिस प्रकार मूषक वस्त्रों को काट कर; अतिगोपनीय गुप्तांगों को भी प्रकट कर देते हैं, उसी प्रकार दुर्जन भी सज्जनों के अतिगोपनीय दोषों को भी उजागर करने का प्रयास कर, उन्हें समाज में दूषित करने के लिए तत्पर होते हैं।

पण्डितराज जगन्नाथ

लोगों के जीवन में जब बदहाली होती है, असुरक्षा होती है, तब गोडसे के बग़ैर भी गोडसे पैदा हो जाते हैं।

ललित कार्तिकेय

वानरों की सभा में वृक्षों की शाखाएँ कोमल आसन होती हैं, चीत्कार सुभाषित होता है, एवं दाँतों और नखों से फाड़ना स्वागत सत्कार होता है—यह ठीक ही है।

पण्डितराज जगन्नाथ

अर्थ परिमित होता है; किंतु अनर्थ यदि एक बार प्रारंभ हो जाए, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उसका अंत कहाँ जाकर होगा।

वात्स्यायन

यदि चलताऊ क़िस्म के साहित्य की माँग और प्रचार अधिक है, तो उससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि दूसरे क़िस्म का साहित्य असामाजिक और ऐकांतिक है, बल्कि यह कि जनसाधारण का स्तर प्रौढ़ता का स्तर नहीं। ऐसी दशा में साधारणीकरण या शायद निम्नस्तरीकरण पर अधिक ज़ोर देना, प्रौढ़ एवं गंभीर साहित्य की संभावनाओं को कुंठित करना होगा।

कुँवर नारायण

यह जगत् सदा ही भले और बुरे का मिश्रण है। जहाँ भलाई देखो, समझ लो कि उसके पीछे बुराई भी छिपी है।

स्वामी विवेकानन्द

इस देश में फ़िल्म सस्ते मनोरंजन का सबसे घटिया साधन बन गई है। इसलिए मैं इस देश में फ़िल्मों के भविष्य को लेकर काफ़ी चिंतित हूँ।

ऋत्विक घटक

विदेशी लोग हमारे समाज के विषय में; अन्य देशों में भ्रमपूर्ण बातें फैलाकर हमें असभ्य, जंगली बतलाते रहे हैं, और हमारा उनके प्रति रोष भी सर्वथा उचित ही रहा है। पर एक बात में तो हम पूर्व ऐतिहासिक काल के उस जंगली को भी मात करते हैं और आज के अफ़्रीक़ा के वनभाग के हब्शी को भी मात करते हैं—और वह बात यह है कि हममें अभी भी मनुष्य का क्रय-विक्रय होता है और वह कानूनी भी माना जाता है।

हरिशंकर परसाई

अपना दोष जानकर भी यदि तुम उसे त्याग नहीं सकते, तो किसी भी तरह उसका समर्थन कर दूसरे का सर्वनाश करो।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

जंगली फल आदि के द्वारा जीवन व्यतीत करना सफल है, परंतु खल के साथ निवास अच्छा नहीं।

भर्तृहरि

जब आप ख़ुद के बारे में बुरा महसूस करते हैं, तो आप प्रेम के रास्ते में बाधा खड़ी कर लेते हैं और ऐसी स्थितियों तथा लोगों को आकर्षित करते हैं, जो आपको बुरा महसूस कराएँगे।

रॉन्डा बर्न

बुराई के प्रति भलाई का व्यवहार करो।

लाओत्से

भारत-भूमि कुछ ऐसी उपजाऊ है कि बाहर से आई हुई चीज़ यहाँ ख़ूब फलती-फूलती है। विदेश से आई हुई प्लेग हमारे गाँव-गाँव में पहुँच गई, और प्लेग की तरह आई अँग्रेज़ जाति भी ख़ूब फली-फूली।

हरिशंकर परसाई

हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृतिवाली जाति भी, पाँच हज़ार सालों से मनुष्य का मांस खा रही है—सिर्फ़ मनु महाराज के नियम देख लीजिए।

हरिशंकर परसाई

हम अपने हृदय को साफ़ करें, गंदी चीज़ को पसंद करें। गंदी चीज़ को पढ़ना छोड़ दें। अगर ऐसा करेंगे तो अख़बार अपना सच्चा धर्म पालन करेंगे।

महात्मा गांधी

अच्छे कुल में उत्पन्न; गुणवान् होने पर भी मनुष्य सत्संग के कारण पूजित होता है, क्योंकि अच्छे बाँस से निर्मित तथा तंत्रमुक्त होने पर भी, तुंबीफल से रहित वीणा-दंड महत्त्व को नहीं प्राप्त करता अर्थात् संगीत ध्वनि को नहीं उत्पन्न कर सकता।

पण्डितराज जगन्नाथ

संसार में अधिकांश दुष्कर्म, व्यक्तिगत आसाक्ति के कारण ही किए गए हैं।

स्वामी विवेकानन्द

जाम की अराजकता की संस्कृति से हर्षद मेहता पैदा होते हैं, चंद्रास्वामी पैदा होते हैं, सुशील शर्मा पैदा होते हैं। अंततः वह हत्यारों, लुटेरों, डकैतों, उचक्कों, लंपटों की संस्कृति होती है।

ललित कार्तिकेय

जो अनुतप्त होकर भी पुनः उसी प्रकार के दुष्कर्म में रत होता है, समझना कि वह शीघ्र ही अत्यंत दुर्गति में पतित होगा।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

जो भक्त होना चाहता है; वह दुष्ट प्रकृति के मनुष्यों के साथ भोजन करे, क्योंकि उनकी दुष्टता का भाव भोजन द्वारा फैलता है।

स्वामी विवेकानन्द

जिस समाज में इतनी अधिक संख्या में व्यक्ति आत्म-हनन के लिए विवश किए जाते हों, अपने स्वस्थ और सुंदर शरीर को व्याधिग्रस्त कुरूप तथा निर्दोष मन को दूषित बनाने के लिए बाध्य किए जाते हों, उस समाज की स्थिति कभी स्पृहणीय नहीं कही जा सकती।

महादेवी वर्मा

संदेह को प्रश्रय देने से यह घूण की तरह मन पर आक्रमण करता है, अंत में अविश्वासरूपी जीर्णला की चरम मलिन दशा को प्राप्त होता है।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

लोग कहते हैं—दुष्ट के सारे ही काम अपराध होते हैं। दुष्ट कहता है— मैं भला आदमी हो जाता किंतु लोगों के अन्याय ने मुझे दुष्ट बना दिया है।

बंकिम चंद्र चटर्जी

राजन्! दूसरों की निंदा करना या चुग़ली खाना दुष्टों का स्वभाव ही होता है। श्रेष्ठ पुरुष तो सज्जनों के समीप दूसरों के गुणों का ही वर्णन करते हैं।

वेदव्यास

यश रूपी सुगंध के लिए लशुन की भाँति, शांति रूपी शीतलता के लिए अग्नि-सदृश तथा दया रूप पुष्प के लिए आकाश सदृश, दुर्जन हमेशा सज्जनों को दुःख देता है।

पण्डितराज जगन्नाथ

बाल-विवाह का समर्थन किसी भी शास्त्र में नहीं है।

स्वामी विवेकानन्द

साहित्यिक वह होगा, जो अच्छे को जोड़ेगा और ख़राब को छोड़ेगा।

विनोबा भावे

हिटलर या गोडसे जिन परिस्थितियों की कोख से पैदा होते हैं, यदि आप उन परिस्थितियों को बना रहे हैं या बनने दे रहे हैं, तो फिर प्रतिबंधों भर के बूते गोडसे का गौरवान्विकरण नहीं रोका जा सकता। तब तो गोडसे के गीत गाए ही जाएँगे!

ललित कार्तिकेय

अप्रिय सत्य का श्रोता और वक्ता दुर्लभ है। नीति-वाणी है, पर अब अप्रिय काव्य के वक्ता बढ़ गए हैं। मैं भाग्य को सराहता हूँ कि जल्दी ही कविता करना बंद कर दिया, वरना इस गिरे ज़माने में श्रोता ढूँढ़ता कहाँ फिरता?

हरिशंकर परसाई

दुनिया का इतिहास इस बात का साक्षी है कि शुभ के समान अशुभ भी क्रमशः बढ़ ही रहा है।

स्वामी विवेकानन्द

कुसंस्कारों की जड़ें बड़ी गहरी होती हैं।

हरिशंकर परसाई

कवि के पास अच्छे लोगों के अलावा, बुरे लोगों के बीच रहने के भी अच्छे-खासे अनुभव होने चाहिए।

लीलाधर जगूड़ी