साहित्य में सच्ची नागरिकता रचनाओं की ही होती है; और रचनाएँ अंततः सार्थक या निरर्थक होती है, न कि नई और पुरानी।
जब इंसान भूखा रहता है, जब मरता रहता है, तब संस्कृति और यहाँ तक कि ईश्वर के बारे में बात करना मूर्खता है।
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धर्म आस्तिक और आस्थावान व्यक्ति के लिए; जीवन संचालन के कतिपय आदर्शों, सिद्धांतों और मूल्यों का समच्चय है।
ऐसा कोई भी सिद्धांत नैतिक नियमों की व्याख्या नहीं कर सकता, जो मनुष्य को सामाजिक स्तर तक ही सीमित रखना चाहता हो।
दूसरे सभी क्षेत्रों में मनुष्य द्वारा किया जा रहा विकास; दुनिया को जिस तरफ़ ले जा रहा है, उसके लिए मनुष्य की नैतिक तैयारी अभी न के बराबर है।
सूरदास की सौंदर्य-चेतना और नैतिक चेतना में कोई अंतराल नहीं है। उनका काव्य, नैतिकता के उपदेश का काव्य नहीं है।
संस्कार की धरती के बिना मनुष्य; मनुष्य ही नहीं हो सकता—प्राणी भर रह जाता है।
मानव-स्वभाव की कुरूपताएँ तभी तक मर्यादा में रहती हैं, जब तक उनके सामने कोई सीमा-रेखा खिंची हो।
कोई भी तहज़ीब जो बुनियादी तौर पर ग़ैर-दुनियावी हो, हज़ारों साल तक अपने को क़ायम नहीं रख सकती।
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परंपरा समूह की होती है, उसका मर्म हमें किसी एक व्यक्ति में नहीं; किसी समूह-विशेष में ही मिल सकता है—किसी एक का आचरण परंपरा का प्रमाण नहीं होता।
मानवीय आचरण के आम उद्देश्य ही यह तय कर देते हैं कि कोई व्यक्ति या तो ग़लत कार्यक्षेत्र में आए ही नहीं, या उसमें ज़्यादा देर टिके नहीं।
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समान अधिकारों वाले व्यक्तियों को मिला कर बनाया गया समाज ही, सच्ची नैतिक भावनाओं की पाठशाला हो सकता है।
तमोगण से हमारा देश छाया हुआ है—जहाँ देखो वहीं तम; रजोगुण चाहिए, उसके बाद सत्व; वह तो अत्यंत दूर की बात है।
नैतिकता की असली कसौटी है, बुराई को निरुत्साहित करने की क्षमता।
धर्म, कर्म का स्वतंत्र पुरुषार्थ है तो नीति से भिन्न है—नीति उपाय-कौशल है, और कोई भी वस्तु, चाहे जड़ हो या चेतन, चाहे मनुष्य ही क्यों न हो, सभी उसके लिए उपाय बन सकते हैं। धर्म में पर को उपेय समझना चाहिए, उपाय नहीं।
जिसके संस्कार एक परंपरा में दीक्षित हों; उसके लिए दूसरी परंपरा में रसबोध के सामान्य तक पहुँचना—सहृदय-भाव की एक साधना बन जा सकती है।
संस्कार मनुष्य को समाज में रह कर ही मिलता है। संस्कार क्या दिए जाएँ—यह समष्टि के धर्म का प्रश्न है।
समाज के कर्म का औचित्य—लोकयात्रा का, लोक-व्यवहार का औचित्य—यह भी धर्म का ही प्रश्न है।
स्वर्ग तथा मर्त्य लोक में सर्वत्र, केवल पवित्रता ही सर्वश्रेष्ठ तथा दिव्यतम शक्ति है।
आपद्धर्म, मर्यादा-निर्मिति का धर्म नहीं—आगंतुक धर्म है।
सभी अस्तित्ववान अच्छी वस्तुएँ मौलिकता का फल है।
कोई भी नीतिशास्त्र तब तक नहीं टिक सकता, जब तक उसके नियमों का आधार अलौकिकता न हो, या जैसा मैं कहना अधिक ठीक समझता हूँ—जब तक उसके नियम अतींद्रिय ज्ञान पर आधारित न हो।
नीति जानने वाले चाहे निंदा करें, चाहे स्तुति और लक्ष्मी चाहे घर में बहुत सी आवे, चाहे चली जाए, प्राण चाहे अभी जाए, चाहे कल्पांत में, परंतु धीर लोग न्याय का मार्ग छोड़कर एक पग भी उससे बाहर नहीं चलते।
मौक़ा मिलने पर अत्यंत नीतिपरायण मनुष्य भी प्रतारक बन जाता है, यही संसार है।
मनुष्य का नैतिक पुनरुत्थान सही अर्थों में उसी दिन से शुरू होगा, जिस दिन सबसे ज़्यादा आधारभूत सामाजिक संबंध बराबरी के सिद्धांत पर आधारित होंगे, और मनुष्य अपने बराबर वालों के साथ मैत्रीपूर्वक रहना और विकास करना सीख लेगा।
ब्रह्मज्ञानी अपने सद्विचारों के कारण असाधारण कार्य करते हैं। वह सभी समय में भोगों की, धन की इच्छा निःस्पृह भाव से त्याग देते हैं।
संस्कार तो एक तरह से धर्म की पहल है। संस्कार की धरती पर खड़ा होने के बाद ही, मनुष्य स्वतंत्र हो कर पूछता है कि वह क्या करे? फिर इति-कर्त्तव्यता के दूसरे क्षेत्र स्वतः आगे आ जाते हैं।
आगे बढ़ो और याद रखो—धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म।
संस्कार मनुष्य को व्यवहार-योग्य मनुष्य बनाता है।
साहसी तथा शक्तिशाली व्यक्ति सदा ही नीतिपरायण होते हैं।
वास्तव में हमारे देश के सभी राजनीतिक आंदोलनों में, जिन्होंने हमारे आधुनिक इतिहास में कोई महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई है—उस आदर्श की कमी रही है, जिसकी प्राप्ति उसका लक्ष्य था।
आचरण में लोभ और दंभ का अभाव और आत्मवान होने का भाव, सचमुच न हो तो आचरण ही झूठा कहलाएगा।
कर्माशय का अर्थ है, समस्त संस्कारों की समष्टि। हम जो भी कार्य करते हैं, वह चित्तरूपी सरोवर में एक लहर उठा देता है। हम सोचते हैं कि इस काम के समाप्त होते ही वह लहर भी चली जाएगी, पर वास्तव में वैसा नहीं होता। वह तो बस सूक्ष्म आकार भर धारण कर लेती है, पर रहती वहीं है।
काव्य के सौंदर्यपरक मूल्यों से ही नैतिक मूल्य पनपते हैं।
अगर आपके दिल में रोशनी है, तो आपको अपने घर का रास्ता मिल जाएगा।
मेरे देश के महान नेता महात्मा गांधी, जिनकी प्रेरणा और देखरेख में मैं बड़ा हुआ, उन्होंने हमेशा नैतिक मूल्यों पर ज़ोर दिया और हमें आगाह किया कि साध्य के फेर में कभी भी साधन को कमतर न किया जाए।
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मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि आध्यात्मिक चीज़ों और नैतिक मूल्य अंततः—अन्य चीज़ों से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। लेकिन एक इंसान का यह कहकर बचना कि अध्यात्म उत्कृष्ट है, उसका सीधा मतलब यह है कि वह भौतिक और वास्तविक चीज़ों में कमतर है—यह अचंभित करता है। वह किसी भी तरीक़े को अपनाता नहीं है। यह अधोगति के कारणों का सामना करने से बचना है।
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प्रेम, सत्य और निस्वार्थता; मात्र नैतिक अलंकारिक शब्द नहीं हैं, बल्कि ये हमारे सर्वोच्च आदर्श हैं, क्योंकि इनमें शक्ति का ऐसा प्रकटीकरण निहित है।
नैतिक गिरावट स्वयं एक लक्षण है, जो अन्य घटना-क्रमों या अन्य मानसिक विकार-दृश्यों का कारण हो सकती है।
भले ही हमारा उद्देश्य सही हो लेकिन अगर हमारे साधन ग़लत हैं, तो वो हमारे उद्देश्य को भ्रष्ट कर देंगे या फिर ग़लत दिशा में मोड़ देंगे। साध्य और साधन आपस में एक-दूसरे से बहुत सघन व यौगिक रूप से जुड़े हुए हैं, और उन्हें अलग नहीं किया जा सकता।
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राज्य के दायरे में नागरिकों को नियमित और संचालित करने के लिए भारत के पास कोई समग्र सामाजिक नैतिकता न आज है, न पहले कभी रही। लेकिन गाँव और जाति और कुनबे के दायरे में, हर आदमी की हर साँस को नियमित करने वाली नैतिकता सदियों से हमारे साथ है—उसे राजा भी मानते रहे और दीवान भी।
केवल भारत दुनिया में ऐसा देश है जो अपनी हिंदू नैतिकता क्रमशः खो रहा है, लेकिन जो राज्य-संचालन के लिए ज़रूरी नई नैतिकता नहीं अपना पाया है।
सारा नीतिशास्त्र, मनुष्य के सारे काम, मनुष्य के सारे विचार इस नि:स्वार्थता-रूप एकमात्र नींव पर आधारित हैं।
एकमात्र सुधार का सिद्धांत ही मानवीय प्रगति के लिए आवश्यक और अनिवार्य है।
यह संसार एक भव्य नैतिक व्यायामशाला है; जहाँ हम सभी को अभ्यास करना चाहिए, ताकि हम आध्यात्मिक रूप से अधिकाधिक सशक्त हो सकें।
ग़ैर-वाजिब तरीक़ों से मिला साध्य, सही हो ही नहीं सकता।
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अनैतिक का नैतिक के प्रति विद्रोह, नैतिकता की उन्नति और उसके परिष्कर का कारण है।
जो मूल्य सत्य है, वो हमेशा सच रहता है और इस बात को हमेशा अपनी निगाह में रखना होता है।
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ग़लत लक्ष्य वाले व्यक्ति का चुना जाना; ज़्यादा बेहतर है बजाए उस व्यक्ति के, जिसका लक्ष्य भले अच्छा हो लेकिन वो संदिग्ध तरीक़ों से जीतना चाहे।
नैतिकता आपके काम आती रहती है, जब आपके पास अपनी ज़रूरत की हर चीज़ है और आप उसे बस अपने लिए रखना चाहते हैं।
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