Font by Mehr Nastaliq Web

नैतिकता पर उद्धरण

साहित्य में सच्ची नागरिकता रचनाओं की ही होती है; और रचनाएँ अंततः सार्थक या निरर्थक होती है, कि नई और पुरानी।

मैनेजर पांडेय

जब इंसान भूखा रहता है, जब मरता रहता है, तब संस्कृति और यहाँ तक कि ईश्वर के बारे में बात करना मूर्खता है।

जवाहरलाल नेहरू

राम में सौंदर्य, शक्ति और शील, तीनों की चरम अभिव्यक्ति एक साथ समन्वित होकर; मनुष्य के संपूर्ण हृदय को—उसके किसी एक ही अंश को नहीं—आकर्षित कर लेती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

संस्कार की धरती के बिना मनुष्य; मनुष्य ही नहीं हो सकता—प्राणी भर रह जाता है।

मुकुंद लाठ

धर्म आस्तिक और आस्थावान व्यक्ति के लिए; जीवन संचालन के कतिपय आदर्शों, सिद्धांतों और मूल्यों का समच्चय है।

मैनेजर पांडेय

मानव-स्वभाव की कुरूपताएँ तभी तक मर्यादा में रहती हैं, जब तक उनके सामने कोई सीमा-रेखा खिंची हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल

गाँधीवाद, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता की जो बात की जाती है, वह ख़ास अर्थ नहीं रखती। मूल है, जो भी हाथ पड़ जाए, सत्ता पा लेना।

हरिशंकर परसाई

संसार से तटस्थ रहकर; शांति-सुखपूर्वक लोक-व्यवहार-संबंधी उपदेश देनेवालों का उतना अधिक महत्त्व हमारे हिंदू-धर्म में नहीं है, जितना संसार के भीतर घुसकर उसके व्यवहारों के बीच सात्विक सौंदर्य की ज्योति जगानेवालों का है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

मानवीय मूल्य मनुष्य के जैविक आत्म में उपजता है।

आशीष नंदी

ऐसा कोई भी सिद्धांत नैतिक नियमों की व्याख्या नहीं कर सकता, जो मनुष्य को सामाजिक स्तर तक ही सीमित रखना चाहता हो।

स्वामी विवेकानन्द

दूसरे सभी क्षेत्रों में मनुष्य द्वारा किया जा रहा विकास; दुनिया को जिस तरफ़ ले जा रहा है, उसके लिए मनुष्य की नैतिक तैयारी अभी के बराबर है।

जॉन स्टुअर्ट मिल

सूरदास की सौंदर्य-चेतना और नैतिक चेतना में कोई अंतराल नहीं है। उनका काव्य, नैतिकता के उपदेश का काव्य नहीं है।

मैनेजर पांडेय

कोई भी तहज़ीब जो बुनियादी तौर पर ग़ैर-दुनियावी हो, हज़ारों साल तक अपने को क़ायम नहीं रख सकती।

जवाहरलाल नेहरू

कोई स्थायी तरक़्क़ी तब तक संभव नहीं है, जब तक हम ख़ुद शुद्धिकरण की त्रि-स्तरीय प्रक्रिया से नहीं गुज़रेंगे। हमें अपने आचरण का सामान्य स्वर सुधारना होगा, अपने उच्चारण को साधना होगा और अपने विचारों को पुनर्जीवित करना होगा।

भीमराव आंबेडकर

परंपरा समूह की होती है, उसका मर्म हमें किसी एक व्यक्ति में नहीं; किसी समूह-विशेष में ही मिल सकता है—किसी एक का आचरण परंपरा का प्रमाण नहीं होता।

मुकुंद लाठ

जो शिक्षा हमें प्राचीन संस्थाओं तथा प्राचीन विचारों में ही फाँसे रखती हो, वह शिक्षा अर्वाचीन समय में शिक्षा कहलाने के योग्य नहीं है।

गणेश शंकर विद्यार्थी

तमोगण से हमारा देश छाया हुआ है—जहाँ देखो वहीं तम; रजोगुण चाहिए, उसके बाद सत्व; वह तो अत्यंत दूर की बात है।

स्वामी विवेकानन्द

नैतिकता की असली कसौटी है, बुराई को निरुत्साहित करने की क्षमता।

जॉन स्टुअर्ट मिल

सत्य छूटे; स्पष्टवादिता में कमी होने पावे, कार्य छोड़ा जाए, परंतु सत्यकथन में शिष्टता, सभ्यता और औचित्य को तिलांजलि दी जाए।

गणेश शंकर विद्यार्थी

मानवीय आचरण के आम उद्देश्य ही यह तय कर देते हैं कि कोई व्यक्ति या तो ग़लत कार्यक्षेत्र में आए ही नहीं, या उसमें ज़्यादा देर टिके नहीं।

जॉन स्टुअर्ट मिल

समान अधिकारों वाले व्यक्तियों को मिला कर बनाया गया समाज ही, सच्ची नैतिक भावनाओं की पाठशाला हो सकता है।

जॉन स्टुअर्ट मिल

धर्म, कर्म का स्वतंत्र पुरुषार्थ है तो नीति से भिन्न है—नीति उपाय-कौशल है, और कोई भी वस्तु, चाहे जड़ हो या चेतन, चाहे मनुष्य ही क्यों हो, सभी उसके लिए उपाय बन सकते हैं। धर्म में पर को उपेय समझना चाहिए, उपाय नहीं।

मुकुंद लाठ

संस्कार मनुष्य को समाज में रह कर ही मिलता है। संस्कार क्या दिए जाएँ—यह समष्टि के धर्म का प्रश्न है।

मुकुंद लाठ

जिसके संस्कार एक परंपरा में दीक्षित हों; उसके लिए दूसरी परंपरा में रसबोध के सामान्य तक पहुँचना—सहृदय-भाव की एक साधना बन जा सकती है।

मुकुंद लाठ

समाज के कर्म का औचित्य—लोकयात्रा का, लोक-व्यवहार का औचित्य—यह भी धर्म का ही प्रश्न है।

मुकुंद लाठ

स्वर्ग तथा मर्त्य लोक में सर्वत्र, केवल पवित्रता ही सर्वश्रेष्ठ तथा दिव्यतम शक्ति है।

स्वामी विवेकानन्द

आपद्धर्म, मर्यादा-निर्मिति का धर्म नहीं—आगंतुक धर्म है।

मुकुंद लाठ

करुणा और सात्विकता का संबंध इस बात से और भी सिद्ध होता है कि किसी पुरुष को दूसरे पर करुणा करते देख, तीसरे को करुणा करनेवाले पर श्रद्धा उत्पन्न होती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

हमारी नैतिक, सामाजिक आदि व्यवस्थाओं से संबंध रखने वाली अनेक दुरवस्थाओं के मूल में, शिक्षा का विकृत रूप भी है—यह कहना अतिशयोक्ति होगी।

महादेवी वर्मा

सभी अस्तित्ववान अच्छी वस्तुएँ मौलिकता का फल है।

जॉन स्टुअर्ट मिल

हम केवल यही चाहते हैं कि अपनी दशा भूलें, मृगतृष्णा हमें पथ से भ्रष्ट करे और हममें न्याय और अन्याय; साधु और असाधु के अंतर का ज्ञान, इसलिए जाग्रत रहे कि हम धोखा खाकर जातीय चरित्र और उन्नति का नाश करते रहें।

गणेश शंकर विद्यार्थी

सत्योपदेश के बिना अन्य कोई भी मनुष्य जाति की उन्नति का कारण नहीं है।

दयानंद सरस्वती

नीति जानने वाले चाहे निंदा करें, चाहे स्तुति और लक्ष्मी चाहे घर में बहुत सी आवे, चाहे चली जाए, प्राण चाहे अभी जाए, चाहे कल्पांत में, परंतु धीर लोग न्याय का मार्ग छोड़कर एक पग भी उससे बाहर नहीं चलते।

भर्तृहरि

हमारे संस्कारों में जीवन के लिए आवश्यक सिद्धांत ऐसे सूत्र रूप में समा जाते हैं, जो प्रयोग रूपी टीका के बिना स्पष्ट हो पाते हैं और उपयोगी।

महादेवी वर्मा

मौक़ा मिलने पर अत्यंत नीतिपरायण मनुष्य भी प्रतारक बन जाता है, यही संसार है।

स्वामी विवेकानन्द

सदाचारी के प्रति यदि हम श्रद्धा नहीं रखते, तो समाज के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं करते।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

कोई भी नीतिशास्त्र तब तक नहीं टिक सकता, जब तक उसके नियमों का आधार अलौकिकता हो, या जैसा मैं कहना अधिक ठीक समझता हूँ—जब तक उसके नियम अतींद्रिय ज्ञान पर आधारित हो।

स्वामी विवेकानन्द

संस्कार तो एक तरह से धर्म की पहल है। संस्कार की धरती पर खड़ा होने के बाद ही, मनुष्य स्वतंत्र हो कर पूछता है कि वह क्या करे? फिर इति-कर्त्तव्यता के दूसरे क्षेत्र स्वतः आगे जाते हैं।

मुकुंद लाठ

आगे बढ़ो और याद रखो—धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म।

स्वामी विवेकानन्द

ब्रह्मज्ञानी अपने सद्विचारों के कारण असाधारण कार्य करते हैं। वह सभी समय में भोगों की, धन की इच्छा निःस्पृह भाव से त्याग देते हैं।

भर्तृहरि

मनुष्य का नैतिक पुनरुत्थान सही अर्थों में उसी दिन से शुरू होगा, जिस दिन सबसे ज़्यादा आधारभूत सामाजिक संबंध बराबरी के सिद्धांत पर आधारित होंगे, और मनुष्य अपने बराबर वालों के साथ मैत्रीपूर्वक रहना और विकास करना सीख लेगा।

जॉन स्टुअर्ट मिल

संस्कार मनुष्य को व्यवहार-योग्य मनुष्य बनाता है।

मुकुंद लाठ

संस्कार के बिना स्मृति और स्मृति के बिना साक्षात् अनुभव नहीं होता।

दयानंद सरस्वती

वास्तव में हमारे देश के सभी राजनीतिक आंदोलनों में, जिन्होंने हमारे आधुनिक इतिहास में कोई महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई है—उस आदर्श की कमी रही है, जिसकी प्राप्ति उसका लक्ष्य था।

भगत सिंह

शुद्धाचरण और सदाचार ही धर्म के स्पष्ट चिह्न हैं।

गणेश शंकर विद्यार्थी

कर्माशय का अर्थ है, समस्त संस्कारों की समष्टि। हम जो भी कार्य करते हैं, वह चित्तरूपी सरोवर में एक लहर उठा देता है। हम सोचते हैं कि इस काम के समाप्त होते ही वह लहर भी चली जाएगी, पर वास्तव में वैसा नहीं होता। वह तो बस सूक्ष्म आकार भर धारण कर लेती है, पर रहती वहीं है।

स्वामी विवेकानन्द

साहसी तथा शक्तिशाली व्यक्ति सदा ही नीतिपरायण होते हैं।

स्वामी विवेकानन्द

काव्य के सौंदर्यपरक मूल्यों से ही नैतिक मूल्य पनपते हैं।

मैनेजर पांडेय

मनोवेग-वर्जित सदाचार दंभ या झूठी कवायद है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
  • संबंधित विषय : झूठ

आचरण में लोभ और दंभ का अभाव और आत्मवान होने का भाव, सचमुच हो तो आचरण ही झूठा कहलाएगा।

मुकुंद लाठ