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निंदा पर उद्धरण

निंदा का संबंध दोषकथन,

जुगुप्सा, कुत्सा से है। कुल्लूक भट्ट ने विद्यमान दोष के अभिधान को ‘परीवाद’ और अविद्यमान दोष के अभिधान को ‘निंदा’ कहा है। प्रस्तुत चयन उन कविताओं से किया गया है, जहाँ निंदा एक प्रमुख संकेत-शब्द या और भाव की तरह इस्तेमाल किया गया है।

हिंदी में सबसे प्रचलित और लोकप्रिय पद्धति है—अपनों की प्रशंसा और परायों की निंदा।

हरिशंकर परसाई

किसी भी धर्म में हुए प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन चरित्र में दोष मालूम होने पर, उस पर ज़ोर देकर उस धर्म को कोसना निंदकों का तरीक़ा है, परंतु ऐसे दोष को दूसरों के लिए आचरण में लाने के नियम की भाँति पेश करना अधर्म हैं और उसका विरोध किया जा सकता है।

महात्मा गांधी

जीवन-पथ पर चलने में जो असमर्थ हैं, वे राह के किनारे खड़े हो दूसरों पर पत्थर ही फेंकने लगते हैं।

ओशो

जब किसी की निंदा का विचार मन में उठे तो जानना कि तुम भी उसी ज्वर से ग्रस्त हो रहे हो। स्वस्थ व्यक्ति कभी किसी की निंदा में संलग्न नहीं होता।

ओशो

किसी को ठीक-ठीक पहचानना है तो उसे दूसरों की बुराई करते सुनो। ध्यान से सुनो।

अज्ञेय

निर्मल चंद्रमा पर पड़ी पृथ्वी की छाया को लोग चंद्रमा का कलंक कहकर उसे बदनाम करते हैं।

कालिदास

राजन्! दूसरों की निंदा करना या चुग़ली खाना दुष्टों का स्वभाव ही होता है। श्रेष्ठ पुरुष तो सज्जनों के समीप दूसरों के गुणों का ही वर्णन करते हैं।

वेदव्यास

मनुष्य दूसरे के जिस कर्म की निंदा करे उसको स्वयं भी करे। जो दूसरे की निंदा करता है किंतु स्वयं उसी निद्य कर्म में लगा रहता है, वह उपहास का पात्र होता है।

वेदव्यास

जिस मनुष्य में हीनता की भावना होती है; वह दूसरे की निंदा करके, उसे हीन सिद्ध करके अपनी हीनता से छुटकारा पाने की कोशिश करता है।

हरिशंकर परसाई

नाई का स्वभाव होता है कि वह बातूनी होता है। वह जिस 'मालिक' की हज़ामत बना रहा होता है, उसकी तारीफ़ करता है और बाक़ी की निंदा।

हरिशंकर परसाई

जिस जिस उपाय से धर्म का आचरण हो सके, उसे करने में निंदा की बात नहीं है।

वेदव्यास

यदि कोई तुम्हारे समीप अन्य किसी साथी की निंदा करना चाहे, तो तुम उस ओर बिल्कुल ध्यान दो। इन बातों को सुनना भी महान् पाप है, उससे भविष्य में विवाद का सूत्रपात होगा।

स्वामी विवेकानन्द

परनिंदा करना ही है, दूसरे के दोष को बटोर कर स्वयं कलंकित होना और दूसरे की सुख्याति करने के अभ्यास से, अपना स्वभाव अज्ञात भाव से अच्छा हो जाता है।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

दूसरों के दोषों का ही जो बखान करता है, उसके दोषों की आलोचना दूसरे करेंगे, और वह निंदित होगा।

तिरुवल्लुवर

मूर्ख मनुष्य विद्वानों को गाली और निंदा से कष्ट पहुँचाते हैं। गाली देने वाला पाप का भागी होता है और क्षमा करने वाला पाप से मुक्त हो जाता है।

वेदव्यास

कुछ ऐसे क्षुद्र होते हैं कि उनके पास निंदा के सिवा कोई विषय नहीं होता।

हरिशंकर परसाई

किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए और उसे किसी प्रकार सुनना ही चाहिए। यदि कोई दूसरे की निंदा करता हो तो वहाँ अपने कान बंद कर ले अथवा वहाँ से उठकर अन्यत्र चला जाए।

वेदव्यास

आश्रित की दुर्बलता से आश्रय की निंदा होती है।

वेदव्यास

पुरुष जब बिस्तर में बेकार हो जाए, बेरोज़गार हो जाए, बीमार हो जाए तो पत्नी को सारे सच्चे-झूठे झगड़े याद आने लगते हैं। तब वह आततायी बन जाती है। उसके सर्पीले दाँत बाहर निकल आते हैं।

स्वदेश दीपक

बंधु की कुत्सा फैलाओ, या किसी भी तरह दूसरे के निकट निंदा करो। किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि उसके निकट उसकी किसी बुराई को प्रश्रय दो।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

शरीर से बीमार ही नहीं, मन से बीमार भी दया के पात्र हैं।

ओशो

निंदा निंदक की आत्मशक्ति का नाश करती जाती है।

हरिशंकर परसाई

प्रत्येक व्यक्ति की बात सुनो परंतु किसी से भी कुछ मत कहो। प्रत्येक व्यक्ति द्वारा निंदा सुन लो पर अपना निर्णय सुरक्षित रखो।

विलियम शेक्सपियर

यदि थोड़ी-सी लोकनिंदा, उपहास, स्वजनानुरक्ति, स्वार्थहानि, अनादर, आत्म या परगज्जना; तुम्हें अपने प्रेमास्पद से दूर रख सके, तो तुम्हारा प्रेम कितना क्षीण है—क्या ऐसी बात नहीं?

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

जो उदासीन रहने के कारण त्रिगुणों से चंचल नहीं होता और गुण ही अपना कार्य करते हैं, ऐसा मानकर ही जो स्वस्थ रहता है तथा कंपायमान नहीं होता, जो सुख-दुःख को समान मानता है, जो अपने में ही आनंदित रहता है, जो मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण को समान मानता है, जो प्रिय अथवा अप्रिय की प्राप्ति होने पर सम अवस्था में रहता है, जो धैर्यवान है, जिसको अपनी निंदा और स्तुति समान प्रिय होती है, जिसको अपने मान और अपमान समान लगते हैं, जो मित्र और शत्रु के साथ समभाव से व्यवहार करता है तथा जो सब कार्यारंभों को त्याग देता है, वही त्रिगुणातीत कहा जाता है।

वेदव्यास

हे मन! यदि तुझे क्रोध ही करना है तो क्रोध पर कर। निंदा ही करनी है तो अपनी देह की कर। द्रोह ही करना है तो अधर्म से कर, और स्नेह ही करना है तो भगवान से कर।

दयाराम

मुझसे पहले की पीढ़ी में जो अक़्लमंद थे, वे गूँगे थे। जो वाचाल थे, वे अक़्लमंद नहीं थे।

विजय देव नारायण साही

सुंदर औरत नादिरशाही होती है। एक-एक करके सब कुछ लूटती है।

स्वदेश दीपक

स्त्री उन पुरुषों के साथ फ़्लर्ट करती है, जो उससे विवाह नहीं करते और उस पुरुष के साथ विवाह करती है, जो उसके साथ फ़्लर्ट नहीं करता।

भुवनेश्वर

मुक्तस्वार्थ होकर; आदर्श में दोष देखने पर उसका अनुसरण मत करो, करने से आत्मोन्नयन नहीं होगा।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

मैं माता पिता की तुलना में निंदक का अधिक स्नेह मानता हूँ। विचार करके देखिए—माता पिता तो हमारे मलमूत्र को हाथ से धोते हैं, किंतु निंदक तो जीभ से हमारे मलमूत्र को धोते हैं।

दयाराम

लज्जावान् पुरुष को शिथिल, व्रतधारी को दंभी, पवित्र को पाखंडी, शूर को निर्दयी, सीधे स्वभाव वाले को मूर्ख, प्रिय बोलने वाले को दीन, तेजस्वी को गर्वीला, वक्ता को बकवादी और स्थिरचित्तवाले को आलसी कहते हैं। इससे यह जान पड़ता है कि गुणियों में कौन सा ऐसा गुण है, जिसे दुर्जनों ने कलंक नहीं लगाया।

भर्तृहरि

कुबुद्धि मनुष्य के अंदर मरासणि भाव डोमनी है। हिंसा कसाइन है। परनिंदा अंदर की भगिन है, और क्रोध चांडाल है जिसने जीव के शांत स्वभाव को ठग रखा है। यदि ये चारों भीतर ही बैठी हों, तो बाहर चौका स्वच्छ रखने के लिए लकीरें खींचने का क्या लाभ?

गुरु नानक

महफ़िल में पीना दूसरे दर्जे का पीना है, महफ़िल के लिए लिखना दूसरे दर्जे का लिखना।

कृष्ण बलदेव वैद

जिनको परमार्थ अर्थात् मोक्षपर्यंत का साधन प्राप्त है; ऐसे पंडितों का अपमान मत करो, क्योंकि तुम्हारी तृण के समान तुच्छ लक्ष्मी उनको रोक सकेगी। जैसे नवीन मद की धारा से शोभित श्याम मस्तक वाले हाथी को, कमल के डंठल का सूत नहीं रोक सकता।

भर्तृहरि

निंदा का उद्गम ही हीनता और कमज़ोरी से होता है।

हरिशंकर परसाई

लोकापवाद बलवान होता है।

कालिदास

जो महापुरुषों की निंदा करता है, वही नहीं, अपितु जो उस निंदा को सुनता है, वह भी पाप का भागी होता है।

कालिदास

कानों पर सूतक है, निंदा और चुग़ली।

गुरु नानक

जो जीवन में कुछ भी नहीं कर पाते वे अक्सर आलोचक बन जाते है।

ओशो

आश्रित की निंदा से जो आश्रय को कुत्सित विवेचना करते हैं—विश्वासघातकता उनका पीछा करती है।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

तुम बर्फ़ के समान विशुद्ध रहो और हिम के समान पवित्र, तो भी लोकनिंदा से नहीं बचोगे।

विलियम शेक्सपियर

तीन दिन के वासना-प्रवाह में स्त्री बह जाती है और तीन वर्ष के एकांगी प्रेम पर वह एकांत में हँसती है।

भुवनेश्वर

हमें किसी की चुगली नहीं करनी चाहिए, चाहे वह कितनी भी छोटी क्यों हो। हम जो चुगली करते हैं, वह हमारे आस-पास ही होती है और ग़ायब नहीं होती, और समय आने पर हमें उसका सामना करना पड़ता है।

शम्स तबरेज़ी

लोकनिंदा भी कभी राजदंड से दबती है? दबाने पर तो ज्वालामुखी की तरह उसका विस्फोट होता है।

लक्ष्मीनारायण मिश्र

सज्जनों की निंदा करने में दुष्ट सब ओर से आँख, कान, सिर मुख वाला होता है और सर्वत्र व्याप्त भी होता है।

क्षेमेंद्र

प्रशंसा का अधिकांश भाप बनकर उड़ जाने के लिए ही बना होता है।

सिद्धेश्वर सिंह

औरत एक छोटा-सा सुख तो देती है, लेकिन दुख बहुत लंबा देती है। प्रभुजी का बनाया विनाशकारी जीव। उसका घातक सौंदर्य पहले हमें बाँध लेता है, फिर सर्वनाश कर देता है।

स्वदेश दीपक

इस लज्जित और पराजित युग में कहीं से ले आओ वह दिमाग़ जो ख़ुशामद आदतन नहीं करता।

रघुवीर सहाय

ख़राब किया जा रहा मनुष्य आज जगह-जगह दिखाई देता है।

मंगलेश डबराल