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संघर्ष पर उद्धरण

हमारे आलस्य में भी एक छिपी हुई, जानी-पहचानी योजना रहती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

असंभव कहकर किसी काम को करने से पहले, कर्मक्षेत्र में काँपकर लड़खड़ाओ मत।

जयशंकर प्रसाद

पुरुष का जीवन संघर्ष से आरंभ होता है और स्त्री का आत्मसमर्पण से।

महादेवी वर्मा

अपनी व्यक्तिगत सत्ता की अलग भावना से हटाकर; निज के योगक्षेम के संबंध से मुक्त करके, जगत् के वास्तविक दृश्यों और जीवन की वास्तविक दशाओं में जो हृदय समय-समय पर रमता रहता है, वही सच्चा कविहृदय है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

पाखंडी लोग कितनी आसानी से इस जगत् को धोखे में डाल देते हैं। सभ्यता के प्राथमिक विकास-काल से लेकर भोली-भाली मानव-जाति पर, जाने कितना छल-कपट किया जा चुका है।

स्वामी विवेकानन्द

बिना आत्मशुद्धि के प्राणिमात्र के साथ एकता का अनुभव नहीं किया जा सकता है और आत्मशुद्धि के अभाव से अहिंसा धर्म का पालन करना भी हर तरह नामुमकिन है।

महात्मा गांधी

अभिव्यक्ति का अभ्यास कलाकार का एक मुख्य कर्त्तव्य है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

सक्षम सुंदर अभिव्यक्ति तो अविरत साधना और श्रम के फलस्वरूप उत्पन्न होती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

हमारे पूर्वजों ने अधिकारों के लिए संघर्ष किया, आज की पीढ़ी को कर्तव्य के लिए संघर्ष करना है।

सैमुअल स्माइल्स

जब कोई परिक्षीण अर्थात् दरिद्री होता है, तब एक पसर यव की इच्छा करता है और वही मनुष्य जब सर्वसंपन्न अर्थात् धनिक अवस्था में हो जाता है, तब पृथ्वी को तृण के समान गिनता है, इस कारण यही दोनों चंचल अवस्थाएँ; पुरुष को गुरु और लघु बनाती हैं, वस्तुओं को भी फैलाती और समेटती हैं।

भर्तृहरि

विलगाव की स्थिति में, आधुनिक जीवन की अधिकाधिक यांत्रिक और जनसंकुल परिस्थितियों में, मानव समुदायों के आस्तित्विक और सांस्कृक्तिक लयभंग के मानसोपचार की ज़रूरत के तकाज़े से ही; प्रकृति के साथ मानवीय चेतना के संबंधों की खोज, जीवन की औपन्यासिक पुनर्रचना में और भी गहरे और भी सूक्ष्मतम घरातलों पर अनिवार्य उठती है।

रमेशचंद्र शाह

यह जगत् आशावादी है, निराशावादी—वह दोनों का मिश्रण है और अंत में हम देखेंगे कि सभी दोष प्रकृति के कंधों से हटाकर, हमारे अपने ऊपर रख दिया जाता है।

स्वामी विवेकानन्द

आम स्त्रियों में पाई जाने वाली विशिष्ट प्रवृत्तियाँ और चारित्रिक दुरूहताएँ उन हालात का परिणाम होती हैं, जिनमें उनका पालन-पोषण होता है—ये प्राकृतिक क़तई नहीं होतीं।

जॉन स्टुअर्ट मिल

असंख्य युगों से असंख्य संस्कार और असंख्य भावनाओं ने भारतीय स्त्री की नारी-मूर्ति में जिस देवत्व की प्राण-प्रतिष्ठा की थी, उसका कोई अंश बिना खोए हुए वह इस यंत्रयुग की मानवी बन सकेगी, ऐसी संभावना कम है।

महादेवी वर्मा

दूसरे सभी क्षेत्रों में मनुष्य द्वारा किया जा रहा विकास; दुनिया को जिस तरफ़ ले जा रहा है, उसके लिए मनुष्य की नैतिक तैयारी अभी के बराबर है।

जॉन स्टुअर्ट मिल

संसार से तटस्थ रहकर; शांति-सुखपूर्वक लोक-व्यवहार-संबंधी उपदेश देनेवालों का उतना अधिक महत्त्व हमारे हिंदू-धर्म में नहीं है, जितना संसार के भीतर घुसकर उसके व्यवहारों के बीच सात्विक सौंदर्य की ज्योति जगानेवालों का है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

लोक में फैली दुःख की छाया को हटाने में; ब्रह्म की आनंदकला जो शक्तिमय रूप धारण करती है, उसकी भीषणता में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता, प्रचंडता में भी गहरी आर्द्रता साथ लगी रहती है। विरुद्धों का यही सामंजस् कर्मक्षेत्र का सौंदर्य है, जिसकी ओर आकर्षित हुए बिना मनुष्य का हृदय नहीं रह सकता।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

संसार-बंधन के दुःखों की रचना को विध्वंस करने हेतु; प्रलयाग्नि के सदृश ब्रह्मानंद पद में प्रवेश के उद्योग के बिना ,और बाक़ी सब वणिग्व्यापार है। प्रयोजनवाली बात केवल ब्रह्म का चिंतन है।

भर्तृहरि

अगर हम अपने समय की सबसे बड़ी चुनौतियों—जलवायु के संकट से लेकर एक-दूसरे के प्रति हमारे उत्तरोत्तर बढ़ते जा रहे आविश्वास तक—से निपटना चाहते हैं, तो मुझे लगता है कि इसकी शुरुआत हमें मनुष्य के स्वभाव के बारे में, अपने दृष्टिकोण को बदलने के साथ करने की ज़रूरत है।

रुत्ख़ेर ब्रेख़्मान

साधारणतः लोग कहते हैं कि वेदांत, दर्शन और धर्म, इस जगत् और उसके सारे सुखों एवं संघर्षों को छोड़कर इसके बाहर जाने का उपदेश देते हैं। पर यह धारणा एकदम ग़लत है। केवल ऐसे अज्ञानी व्यक्ति ही; जो प्राच्य चिंतन के विषय में कुछ नहीं जानते और जिसमें उसकी यथार्थ शिक्षा समझने योग्य बुद्धि ही नहीं है, इस प्रकार की बातें कहते हैं।

स्वामी विवेकानन्द

स्त्री के लिए एक दुर्वह बंधन घर में है और उससे असह्य दूसरा बाहर—यह मानना असत्य ही नहीं, अपने प्रति तथा समाज के प्रति अन्याय भी होगा।

महादेवी वर्मा

भक्त कवियों ने प्रेममार्ग की जिन बाधाओं का वर्णन किया है, वे भी लोकजीवन में प्रेम की अनुभूति की बाधाएँ हैं।

मैनेजर पांडेय

जिन स्त्रियों की पाप-गाथाओं से समाज का जीवन काला है; जिनकी लज्जाहीनता से जीवन लज्जित है, उनमें भी अधिकांश की दुर्दशा का कारण अर्थ की विषमता ही मिलेगी।

महादेवी वर्मा

हमारा संघर्ष भी भूलने के ख़िलाफ़ स्मृति का संघर्ष है।

बेल हुक्स

कोई भी क़ानून तब तक हमारे जीवन का हिस्सा नहीं हो सकता, जब तक कि वह हमारी सोच और हमारी भावनाओं का हिस्सा हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल

अतीत की मुश्किलों, सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक धारणाओं को छोड़ दें। आप ही इकलौते व्यक्ति हैं; जो उस जीवन का निर्माण कर सकते हैं, जिसके आप हक़दार हैं।

रॉन्डा बर्न

उत्पीड़ितों के लिए निहायत ज़रूरी है कि वे अपनी मुक्ति की सभी अवस्थाओं में, स्वयं को पूर्णतर मनुष्य बनने के सत्तामूलक तथा ऐतिहासिक कार्य में संलग्न मनुष्यों के रूप में देखें।

पॉलो फ़्रेरा

पक्षी अंडे से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करता है। अंडा ही दुनिया है। जो जन्म लेना चाहता है उसे एक दुनिया को नष्ट करना होगा।

हरमन हेस

आदर्श का उपासक; निराशाओं के प्रति उपेक्षा की दृष्टि से देखता है, उसका जीवन युद्धमय है। समझौते का उपासक; व्यावहारिक कठिनता की दुर्दमनीयता का विकराल रूप देखकर घबराता है, वह अपने को चतुर और नीतिकुशल के नाम से पुकारता है—वह मरना नहीं जानता।

गणेश शंकर विद्यार्थी

जो पहले से मन में पूर्ण हो, उस प्रवाह को बह जाने से रोकने के लिए संघर्ष करो।

जैक केरुआक

किसी ने एक संघर्ष, एक दर्द, एक मौत सही।

हरमन हेस

प्रत्येक स्त्री के समय और विचारों पर व्यावहारिक होने का बहुत ज़्यादा दबाव होता है।

जॉन स्टुअर्ट मिल

उत्पीड़ित लोग स्वयं पर भरोसा करना तभी शुरू करते हैं, जब वे उत्पीड़क को खोज लेते हैं और अपनी मुक्ति के लिए संगठित संघर्ष करने लगते हैं।

पॉलो फ़्रेरा

किसी किसी तरह की तपस्या का ख़याल; हिंदुस्तानी विचारधारा का एक अंग है और ऐसा ख़याल सिर्फ़ चोटी के विचारकों के यहाँ है, बल्कि साधारण अनपढ़ जनता में फैला हुआ है।

जवाहरलाल नेहरू

आज हम मनुष्यों में स्वार्थ, आत्म-केंद्रिता और अन्यायपूर्ण पक्षपात के जो दोष देखते हैं, उनकी जड़ में असमान स्त्री-पुरुष संबंध ही हैं।

जॉन स्टुअर्ट मिल

प्रकृति के बुनियादी जीवन-मरण के अलावा एक अप्राकृतिक जीवित मृत्यु भी होती है, जिसमें जीवन को पूर्णता प्राप्त करने से वंचित कर दिया जाता है।

पॉलो फ़्रेरा

उस एक आत्मा को ही जानो और सब बातों को छोड़ दो। इस संसार में ठोकरें खाने से इस एक ज्ञान की ही हमें प्राप्ति होती है।

स्वामी विवेकानन्द

वर्तमान सभ्यता जेबकटी की सभ्यता है। हर आदमी दूसरे की जेब काट रहा है। इस सभ्यता में अपनी जेब बचाने का तरीक़ा यह है कि दूसरे की जेब काटो। सिर्फ़ उसकी जेब सुरक्षित है, जो दूसरे की जेब पर नज़र रखता है।

हरिशंकर परसाई

यह संसार बेरहम है। इसमें जब हम मोल लिए हुए दासों की तरह रह सकेंगे; तभी लोग हमारे प्रति सहानुभूति दिखाएँगे, अन्यथा नहीं।

स्वामी विवेकानन्द

संजीवता दुःख निवृत्ति के लिए छटपटाने ही का नाम है, पड़े-पड़े आनंद के चषक लेने का नहीं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

मानव-चरित्र रचने के लिए मानव को देखना पड़ता है, मानव को समझना पड़ता है, उसके सुख-दु:ख, आशा, आकांक्षा, द्वंद्व, कुँठा सबको देखना होता है। जन-जीवन का बारीक अवलोकन करना होता है और साथ ही संवेदनात्मक दृष्टि रखनी पड़ती है।

हरिशंकर परसाई

महान् उद्यम, महान् साहस, महावीर्य और सबसे पहले आज्ञा-पालन—ये सब गुण व्यक्तिगत या जातिगत उन्नति के लिए एकमात्र उपाय हैं।

स्वामी विवेकानन्द

प्राचीनता की पूजा बुरी नहीं, उसकी दृढ़ नींव पर नवीनता की भित्ति खड़ी करना भी श्रेयस्कर है, परंतु उसकी दुहाई देकर जीवन को संकीर्णतम बनाते जाना और विकास के मार्ग को चारों ओर से रुद्ध कर लेना—किसी जीवित व्यक्ति पर समाधि बना देने से भी अधिक क्रूर और विचारहीन कार्य है।

महादेवी वर्मा

राजनीति से लेखक को दूर रखने की बात वही करते हैं, जिनके निहित स्वार्थ हैं—जो डरते हैं कि कहीं लोग हमें समझ जाएँ।

हरिशंकर परसाई

अपना संघर्ष ख़ुद चुनो।

मार्क मैंसन

बिना कष्टसहन तथा स्वार्थत्याग के, संसार का कोई भी महान कार्य सिद्ध नहीं हो सकता।

गणेश शंकर विद्यार्थी

स्थिति के अनुसार रूप में परिवर्तन करना पड़ता है, जिनमें परिस्थिति के अनुसार बनने का गुण नहीं रहा, वे बिगड़ गए।

गणेश शंकर विद्यार्थी

व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है—विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखँड़ों का परदाफ़ाश करता है।

हरिशंकर परसाई

वीर और अभय बनो, मार्ग साफ़ हो जाएगा।

स्वामी विवेकानन्द

जो योगी अखंड ध्यान द्वारा अपनी चेतना को परम चैतन्य में विलीन कर देता है, वह प्रकाश (प्राणशक्ति स्पंदन) को सृष्टि के आधार तत्त्व के रूप में देखता है। उसके लिए फिर पानी बन कर सामने आने वाली प्रकाश किरणों में, और ज़मीन बनकर सामने आने वाली प्रकाश किरणों में कोई अंतर नहीं होता।

परमहंस योगानंद