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बेला

साहित्य और संस्कृति की घड़ी

कहानी : मैं किसी के लिए कुछ नहीं हूँ

 

“अब भी क्या गले न मिलोगी? अभी तक वही हिचक... मिल लो यार, क्या पता अगली मुलाक़ात हो न हो।” उसकी पसीजी हुई हथेलियाँ छूट रही थीं मुझसे। वो गले लगने या लगाने को बेताब था। विदा की बेला में ये बातें मेरे

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17 मार्च 2026

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