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बेला

साहित्य और संस्कृति की घड़ी

शनिवारेर चिट्ठी : वहाँ नहीं है अब कोई घर सुफ़ेद

 

स्मृति के घर अँधेरा स्मृति के घर अँधेरा बहुत है। सिर्फ़ आँखें काम नहीं करतीं। नाक भी लगता है काज पर। शून्य को सुनना पड़ता है कानों को। हाथों को हवा को टटोलना पड़ता है। विस्मृति ने कोई शोर भी तो नहीं क

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09 मई 2026

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