आत्म पर कविताएँ

आत्म का संबंध आत्मा

या मन से है और यह ‘निज’ का बोध कराता है। कवि कई बातें ‘मैं’ के अवलंब से कहने की इच्छा रखता है जो कविता को आत्मीय बनाती है। कविता का आत्म कवि को कविता का कर्ता और विषय—दोनों बनाने की इच्छा रखता है। आधुनिक युग में मनुष्य की निजता के विस्तार के साथ कविता में आत्मपरकता की वृद्धि की बात भी स्वीकार की जाती है।

दर्द

सारुल बागला

एक संपूर्णता के लिए

पंकज चतुर्वेदी

आवश्यक सूचनाएँ

आदित्य शुक्ल

संतुलन

सौरभ राय

कुछ बिखरी बातें

अखिलेश सिंह

दुनिया का कोण

नवीन रांगियाल

हुनर

सारुल बागला

मुझसे पूछेंगे

रवि प्रकाश

मेरा समय

त्रिभुवन

सीखना

गार्गी मिश्र

अकथ

प्रकाश

अकेले ही नहीं

कृष्णमोहन झा

मैं वही हूँ

ज्याेति शोभा

मोहम्मद अली

देवी प्रसाद मिश्र

अपने को देखना चाहता हूँ

चंद्रकांत देवताले

अतिशयोक्तिपूर्ण

उस्मान ख़ान

न होना हो

प्रकाश

मेरे पास छिपाने को कुछ नहीं

चंद्रकांत देवताले

समकालीन

परमेंद्र सिंह

रचना

मलयज

यात्रा

मनोज कुमार झा

कविता

महेश आलोक

देखनेवाला मैं

नवीन सागर

कुछ नहीं होऊँगा

अखिलेश सिंह

बहने का जन्मजात हुनर

गीत चतुर्वेदी

एकालाप

अरुण कमल

सॉनेट का पथ

त्रिलोचन

मैं

सौरभ अनंत

अब तो उड़ती हुई रेत है

चंद्रकांत देवताले

बच गया मैं

शलभ श्रीराम सिंह