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व्यवहार पर उद्धरण

आदमी जब बिगड़ता है तो स्वभाव से ही कुछ ऐसा है कि जब वह एक चीज़ में बिगड़ता है, तो पीछे सब चीज़ों में ही बिगड़ जाता है।

महात्मा गांधी

बड़ाई, पंडिताई, विवेकता और कुलीनता—ये सब मनुष्य के देह में तभी तक रहती हैं, जबतक शरीर में कामागिन नहीं प्रज्वलित होती। जब तक आदमी कामपीड़ित नहीं होता, तभी तक उसे अपने गौरव, विद्वत्ता, उच्च कुल की उत्पत्ति और सदाचार का ज्ञान रहता है।

भर्तृहरि

हम ईश्वर को देख नहीं सकते। यदि हम ईश्वर को देखने का प्रयत्न करते हैं, तो हम ईश्वर की एक विकृत और भयानक आकृति बना डालते हैं।

स्वामी विवेकानन्द

मानवीय चरित्र की सभी कुरूपताओं के दर्शन करने हो, तो वरिष्ठ पदाधिकारियों का अपने अधीनस्थों के साथ व्यवहार देख लेना चाहिए।

जॉन स्टुअर्ट मिल

जब कोई परिक्षीण अर्थात् दरिद्री होता है, तब एक पसर यव की इच्छा करता है और वही मनुष्य जब सर्वसंपन्न अर्थात् धनिक अवस्था में हो जाता है, तब पृथ्वी को तृण के समान गिनता है, इस कारण यही दोनों चंचल अवस्थाएँ; पुरुष को गुरु और लघु बनाती हैं, वस्तुओं को भी फैलाती और समेटती हैं।

भर्तृहरि

हर एक मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे मनुष्य को इसी तरह, अर्थात् ईश्वर समझकर सोचे और उससे उसी तरह अर्थात् ईश्वर-दृष्टि से बर्ताव करे; उसे घृणा करे, उसे कलंकित करे और उसकी निंदा ही करे। किसी भी तरह से उसे हानि पहुँचाने की चेष्टा भी करे। यह केवल संन्यासी का ही नहीं, वरन् सभी नर-नारियों का कर्त्तव्य है।

स्वामी विवेकानन्द

मनुष्य का लक्षण ही अगर धर्मशील होना है—जैसा कि हमारे यहाँ चिंतन में गहराई से उभर कर आता है—तो मनुष्य धर्म-निरपेक्ष हो ही नहीं सकता, हाँ, वह धर्म के अनैक्य की; भिन्न क्षेत्रों की बात कर सकता है, जैसी कि की गई है। ‘सेक्यूलर’ शब्द कर्म के किसी ऐसे क्षेत्र की ओर संकेत नहीं करता, जो उस कोटि से बाहर हो, जिसे मनुष्य के लक्षण के रूप में ‘धर्म’ कहा गया है।

मुकुंद लाठ

हमें उन पुरुषों की भावनाओं का सुराग़ भी मिल जाता है, जो स्त्रियों की समान स्वतंत्रता के नाम से चिढ़ते हैं। मेरे ख़्याल में उन्हें डर लगता है, इस बात से नहीं कि स्त्रियाँ विवाह से इन्कार कर देंगी—क्योंकि मुझे नहीं लगता कोई सचमुच ऐसा सोचेगा, बल्कि इस बात से कि वे चाहेंगी कि विवाह बराबरी की शर्तों पर तय हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल

मानव-स्वभाव की कुरूपताएँ तभी तक मर्यादा में रहती हैं, जब तक उनके सामने कोई सीमा-रेखा खिंची हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल

मानसिक श्रेष्ठता, आम मामलों में या किन्हीं ख़ास मामलों में और चरित्र की दृढ़ता—हमेशा अपना डंका बजवाकर रहेंगी।

जॉन स्टुअर्ट मिल

पुरुष अगर अपनी पूरी सत्ता का इस्तेमाल करता है तो स्त्री निसंदेह कुचली जाती है, पर अगर वह भरपूर लाड़-प्यार में सत्ता स्त्री के हाथों में सौंप देता है, तो स्त्री द्वारा अधिकारों की अतिक्रमण की कोई सीमा नहीं रहती।

जॉन स्टुअर्ट मिल

समाज में एक बड़ी संख्या अभी भी उन व्यक्तियों की है, जो अपने मूल पशुत्व और स्वार्थ पर सभ्यता का सिर्फ़ मुलम्मा चढ़ाए हुए हैं—एक दिखावटी आवरण।

जॉन स्टुअर्ट मिल

हम पुरुषों की वर्गीय तहों के जितना नीचे जाएँगे, उतना ही पुरुषों का 'पुरुष होने का घमंड' बढ़ता दिखेगा। और यह सबसे ज्यादा उन पुरुषों में मिलेगा, जिनमें पत्नी और बच्चों को छोड़कर और किसी पर राज करने की तो हिम्मत है, योग्यता।

जॉन स्टुअर्ट मिल

मनुष्य-स्वभाव की एक और विशेषता यह है कि वह अपने को प्रकट किए बिना नहीं रह सकता। असभ्य से असभ्य जंगली लोगों से लेकर, संसार के अत्यंत सभ्य लोगों तक में—अपने विचारों और मनोभावों को प्रकट करने की प्रबल इच्छा प्रस्तुत रहती है।

श्यामसुंदर दास

यदि आपका दृष्टिकोण अच्छा है, तो प्रतिक्रिया भी अच्छी मिलेगी। अगर दृष्टिकोण ग़लत है, तो प्रतिक्रिया भी ग़लत ही मिलेगी।

जवाहरलाल नेहरू

सत्य बोलना और सत्य के अनुसार आचरण करना स्वभाव होना चाहिए।

महात्मा गांधी
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वैज्ञानिक ढंग या स्वभाव जीवन का ढंग है, या कम-से-कम उसे ऐसा होना चाहिए।

जवाहरलाल नेहरू

मानवीय आचरण के आम उद्देश्य ही यह तय कर देते हैं कि कोई व्यक्ति या तो ग़लत कार्यक्षेत्र में आए ही नहीं, या उसमें ज़्यादा देर टिके नहीं।

जॉन स्टुअर्ट मिल

स्वभाव से ही मनुष्य का मन बाहर की ओर प्रवृत्त होता है, मानो वह इंद्रियों के द्वारा शरीर के बाहर झाँकना चाहता हो।

स्वामी विवेकानन्द

रोग भोगते वक्त व्यथा के अंदर एक नाजुक सत्य छुपा होता है—परम नम्रता का सत्य—जो आर्त्त के भक्तिभाव में रहता है, कृष्ण द्वारा उल्लिखित है।

दुर्गा भागवत

कोई दो सपने एक से नहीं होते। कुछ क्षणिक होते हैं, कुछ दीर्घकालिक। देखने वाले के लिए सपने बहुत व्यक्तिगत होते हैं। विज्ञापन सपने नहीं गढ़ते; वह हममें से हर एक को जो कुछ बताते हैं, वह यह कि अभी हम ईर्ष्या के पात्र नहीं हैं, लेकिन हो सकते हैं।

जॉन बर्जर

नवीन यौवन को देखकर विरला ही कोई महात्मा होगा, जिसको काम विकार होगा।

भर्तृहरि

ग्रहों और नक्षत्रों का नियंत्रण करने वाले नियमों को जान लेना बहुत अच्छा और गरिमामय है, परंतु उससे अनंत गुना अच्छा और भव्य है; उन नियमों को जानना, जिनसे मनुष्य के मनोवेग, भावनाएँ और इच्छाएँ नियंत्रित होती है।

स्वामी विवेकानन्द

इतिहास दिखाता है कि मनुष्य का स्वभाव बाहरी प्रभावों के कितने ज़्यादा नियंत्रण में है; और ठोस-से-ठोस समझा जाने वाला सामाजिक सत्य भी मौक़ा आने पर कैसे एक बिल्कुल दूसरा रंग अख़्तियार कर लेता है, पर इतिहास में भी यात्रा की तरह मनुष्य वही देखता है, जो वह देखना चाहता है। बहुत कम लोग इतिहास से सबक़ लेते हैं।

जॉन स्टुअर्ट मिल

भारत में तीन मनुष्य एक साथ मिलकर, पाँच मिनट के लिए भी कोई काम नहीं कर सकते। हर एक मनुष्य अधिकार प्राप्त करने के लिए प्रयास करता है और अंत में संगठन की दुरवस्था हो जाती है।

स्वामी विवेकानन्द

जलती हुई आग से सुवर्ण की पहचान होती है, सदाचार से सत्य पुरुष की, व्यवहार से श्रेष्ठ पुरुष की, भय प्राप्त पर शूर की, आर्थिक कठिनाई में धीर की और कठिन आपत्ति में शत्रु एवं मित्र की परीक्षा होती है।

वेदव्यास

इतिहास और अनुभव गवाह हैं कि बहुत संवेदनशील व्यक्ति, कर्तव्यपालन के मामले में बहुत दृढ़ होते हैं।

जॉन स्टुअर्ट मिल

हमारी जाति का रोग ईर्ष्या ही है।

स्वामी विवेकानन्द

जैसे फल लगने से वृक्ष नम्र हो जाते हैं; जैसे नवीन जल भरने से मेघ भूमि पर झुक जाते है, वैसे ही सत्पुरुष भी संपत्ति प्राप्त कर के उद्धत नहीं होते, किंतु नम्र हो जाते हैं।

भर्तृहरि

धर्म विश्वास की अपेक्षा व्यवहार अधिक है।

सर्वेपल्लि राधाकृष्णन

संसार में जो लोग बड़े काम करने आते हैं, उनका व्यवहार हमारे समान साधारण लोगों के साथ यदि अक्षर-अक्षर मिले, तो उन्हें दोष देना असंगत है, यहाँ तक कि अन्याय है।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

मनुष्य जाने-अनजाने भी प्राय: अतिशयोक्ति करता है अथवा जो कहने योग्य है, उसे छिपाता है, या दूसरे ढंग से कहता है। ऐसे संकटों से बचने के लिए भी मितभाषी होना आवश्यक है।

महात्मा गांधी

यदि तुम्हारा शरीर किसी विशेष अवस्था में हो, तो उसकी प्रवृत्ति दूसरों में भी वही अवस्था उत्पन्न करने की होगी।

स्वामी विवेकानन्द

युद्ध में मनुष्य का काले से काला और सुंदर से सुंदर स्वरूप प्रकट होता है।

दुर्गा भागवत

मार्ग में चलते हुए इस प्रकार चल कि लोग तुझे सलाम कर सकें और उनसे ऐसा व्यवहार कर कि वे तुझे देख कर उठ खड़े हों। यदि मस्जिद में जाता है तो इस प्रकार जा कि लोग तुझे इमाम बना लें।

उमर ख़य्याम

इतिहास मानव-स्वभाव का एक क्रूर अनुभव पेश करता है।

जॉन स्टुअर्ट मिल

स्वयं कुछ करना नहीं और यदि दूसरा कोई कुछ करना चाहे तो उसका मख़ौल उड़ाना, हमारी जाति का एक महान् दोष है और इसी से हमारी जाति का सर्वनाश हुआ है।

स्वामी विवेकानन्द

संकल्प शुद्ध हो, राग, द्वेष, मोह, स्वार्थ से ऊपर उठा हुआ हो, तो कर्म सम्यक् ही होगा।

मुकुंद लाठ

मनुष्य के अन्य कर्मों की तरह चिंतन भी परंपरा-कर्म है, परंपरा-साध्य है।

मुकुंद लाठ

ब्राह्म-व्यवहार में जो परिवर्तन होता है, उसका प्रभाव बाहर तक ही सीमित नहीं रहता—अंतःप्रकृति में भी वह काम करता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

रति, मानव के भावलोक का सर्वाधिक व्यापक एवं तीव्र भाव है।

मैनेजर पांडेय

जिन लोगों के शब्दों की आप सराहना करते हैं और प्यार करते हैं; उन्हें आप निगल नहीं सकते, बिना प्रश्नचिह्न लगाए उन्हें ग्रहण नहीं कर सकते।

पॉलो फ़्रेरा

चारों ओर सब प्रकार के अस्थायी अनुभवों से घिरे रहकर हम सोचते हैं कि हमारा प्यार ही एकमात्र स्थायी प्यार है। यह कैसे हो सकता है? प्यार भी स्वार्थ से भरा है।

स्वामी विवेकानन्द

मैं ऐसे किसी समय की कल्पना नहीं कर सकता जब पृथ्वी पर व्यवहार में एक ही धर्म होगा।

महात्मा गांधी

तुच्छता मनष्य को निर्लज्ज बना देती है।

भर्तृहरि

समस्त अज्ञान का आधार यही है कि हम अविनाशी, नित्य शुद्ध पूर्ण आत्मा होते हुए भी सोचते हैं कि हम छोटे-छोटे मन हैं; हम छोटी-छोटी देह मात्र हैं— यही समस्त स्वार्थपरता की जड़ है।

स्वामी विवेकानन्द

मनुष्य का व्यावर्तक स्वरूप-स्वभाव ही धर्म को कहा गया है। धर्म मनुष्य को मनुष्य बनाता है, ‘परिभाषित’ करता है।

मुकुंद लाठ

नम्र व्यवहार सबके लिए अच्छा है, पर उस में भी धनवानों के लिए तो अमूल्य धन के समान होता है।

तिरुवल्लुवर
  • संबंधित विषय : धन

व्यवहार में जो काम दे, वह धर्म कैसे हो सकता है

महात्मा गांधी

विज्ञापन किसी सेवा या वस्तु को बेचने के लिए सेक्सुअलिटी का उग्र इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यह सेक्सुअलिटी अपने आप में आज़ाद नहीं है, बल्कि यह अपने से बड़ी किसी चीज़ का प्रतीक है—वह जीवन जिसमें आप वह सब ख़रीद सकते हैं, जो आप चाहते हों।

जॉन बर्जर