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देश पर उद्धरण

देश और देश-प्रेम कवियों

का प्रिय विषय रहा है। स्वंतत्रता-संग्राम से लेकर देश के स्वतंत्र होने के बाद भी आज तक देश और गणतंत्र को विषय बनाती हुई कविताएँ रचने का सिलसिला जारी है।

अन्य देश मनुष्यों की जन्मभूमि है, लेकिन भारत मानवता की जन्मभूमि है।

जयशंकर प्रसाद

नेता और अफ़सर और इनके चुने हुए विशेषज्ञ मिलकर तय करते है कि अब और कहाँ धरती का उत्पीड़न करना है ताकि कोई पैसा बनाए, कोई मौज करने आए, कोई कूड़ा बीनने, कोई सड़क बनाने।

कृष्ण कुमार

स्वदेशाभिमान का अर्थ मैं देश का हित समझता हूँ।

महात्मा गांधी

मध्य युग के यूरोप को काफ़ी स्थिरता सामंतवाद ने दी। सैकड़ों सालों तक सामंतों के ख़ानदान चला करते थे, और राजा प्रायः उन्हें छू नहीं सकता था। राज्य राजा के भरोसे नहीं, बल्कि सामंतों के भरोसे चलता था। लेकिन भारत में ऐसा सामंतवाद कभी रहा ही नहीं। हमारे यहाँ सिद्धांत यह था कि राज्य की सारी ज़मीन का स्वामी राजा है। सामंत की कोई ज़मीन नहीं है। जो है, वह राजा का प्रसाद है। अतः राजा जब चाहे, तब सामंत या रियाया को ज़मीन से बेदख़ल कर सकता है। फिर घटनाएँ प्रायः राजा को भी बेदख़ल कर देती थीं। ऐसे सतत गड़बड़झाले के बीच कोई टिकाऊ राज्य कैसे क़ायम हो सकता था?

राजेंद्र माथुर

पीड़ा जिस वजह से होती है वह एक दिन या एक वर्ष में नहीं बनती। देह हो या देश, उसकी पीड़ा पैदा होने और पकने में लंबा समय लेती है। पीड़ा एक सिलसिले का नाम है।

कृष्ण कुमार

महलों में रहने वाला आदमी राज्य नहीं चला सकता।

महात्मा गांधी

जिस देश में आपने जन्म लिया है, उसके प्रति कर्त्तव्य पालन करने से बढ़कर संसार में कोई दूसरा काम है ही नहीं।

महात्मा गांधी

सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक कल्याण की एक ही नींव है, और वह यह जानना कि ‘मैं और मेरा भाई एक हैं।’ यह सब देशों और सब जातियों के लिए सत्य है।

स्वामी विवेकानन्द

देश-विशेष, समाज-विशेष तथा संस्कृति-विशेष के अनुसार, किसी के मानसिक विकास के साधन और सुविधाएँ उपस्थित करते हुए, उसे विस्तृत संसार का ऐसा ज्ञान करा देना ही शिक्षा है, जिससे वह अपने जीवन में सामंजस्य का अनुभव कर सके और उसे अपने क्षेत्र विशेष के साथ ही बाहर भी उपयोगी बना सके।

महादेवी वर्मा

इस देश में कोई युवक नहीं जानता कि उसका आख़िर होगा क्या? वह यह भी जानता है बी. ए. करने से कुछ होता नहीं है। जब तक फेल होता जाता है, विद्यार्थी कहलाता है—जब पास हो जाएगा तब बेकार कहलाएगा।

हरिशंकर परसाई

दया और क्षमा भी मानव के धर्म हैं, तो शक्तिवान होना और उपयुक्त समय पर देश और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का प्रयोग करना भी धर्म है।

हरिकृष्ण प्रेमी

अपने देश के प्रति मेरा जो प्रेम है, उसके कुछ अंश में मैं अपने जन्म के गाँव को प्यार करता हूँ। और मैं अपने देश को प्यार करता हूँ पृथ्वी— जो सारी की सारी मेरा देश है—के प्रति अपने प्रेम के एक अंश में। और मैं पृथ्वी को प्यार करता हूँ अपने सर्वस्व से, क्योंकि वह मानवता का, ईश्वर का, प्रत्यक्ष आत्मा का निवास-स्थान है।

ख़लील जिब्रान

जब देश में कोई विशेष नियम प्रतिष्ठित होता है, तब वह एक ही दिन में नहीं, बल्कि बहुत धीरे-धीरे संपन्न हुआ करता है। उस समय वे लोग पिता नहीं होते, भाई नहीं होते, पति नहीं होते-होते हैं केवल पुरुष। जिन लोगों के संबंध में वे नियम बनाए जाते है, वे भी आत्मीया नहीं होती, बल्कि होती हैं केवल नारियाँ।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

स्त्री का हृदय सर्वत्र एक है; क्या पूर्व क्या पश्चिम, क्या देश क्या विदेश |

लक्ष्मीनारायण मिश्र

भ्रष्टाचार की बात अब करना वैसा ही है, जैसे सत्यवादी हरिश्चंद्र की कथा सुनाना। 'सत्यवादी' हरिश्चंद्र की कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही पुरानी है इस देश के भ्रष्टाचार की कथा।

हरिशंकर परसाई

हम अपने देश का ‘पुनर्निर्माण’ बिना उसकी भाषा के पुनर्निर्माण के नहीं कर सकते। लोगों के बात करने का लहजा बदलिए और देखिए कि आपने उनके व्यवहार को बदल दिया है।

हुआन रामोन हिमेनेज़

हमारे देश के लोगों में विचार है, गुणग्राहकता। इसके विपरीत एक सहस्त्र वर्ष के दासत्व के स्वाभाविक परिणामस्वरूप; उनमें भीषण ईर्ष्या है और उनकी प्रकृति संदेहशील है, जिसके कारण वे प्रत्येक नए विचार का विरोध करते हैं।

स्वामी विवेकानन्द

जो देश अथवा जाति; जितनी अधिक परिष्कृत तथा सभ्य होगी, उसकी कला-कृतियाँ उतनी ही अधिक सुंदर और सुष्ठु होंगी।

श्यामसुंदर दास

अपने देश या अपने शासक के दोषों के प्रति सहानुभूति रखना या उन्हें छिपाना देशभक्ति के नाम को लजाना है, इसके विपरीत देश के दोषों का विरोध करना सच्ची देश-भक्ति है।

महात्मा गांधी

क्या कारण है कि संसार के सब देशों में हमारा देश ही सबसे अधम है, शक्तिहीन है, पिछड़ा हुआ है? इसका कारण यही है कि वहाँ शक्ति की अवमानना होती है।

स्वामी विवेकानन्द

जो देश का काम करता है, उसे थोड़ी बदतमीज़ी का हक़ है। देश सेवा थोड़ी बदतमीज़ी के बिना शोभा नहीं देती।

हरिशंकर परसाई

अगर देश का हित अँग्रेजों के हाथों होता हो, तो मैं आज अँग्रेजों को झुककर नमस्कार करूँगा।

महात्मा गांधी

स्वाधीन देश ही राष्ट्रों की भूमि है; क्योंकि पुच्छविहीन पशु हों तो हों, परंतु अपना शासन अपने हाथों में रखने वाले राष्ट्र नहीं होते।

गणेश शंकर विद्यार्थी

मैं नहीं चाहता कि मेरे लिए कोई स्मारक बनवाया जाए, या मेरी प्रतिमा खड़ी की जाए। मेरी कामना केवल यही है कि लोग देश से प्रेम करते रहें और आवश्यकता पड़ने पर उसके लिए प्राण भी न्यौछावर कर दें।

गोपाल कृष्ण गोखले

जिस देश में सुधार की आवश्यकता नहीं, वह इस परिवर्तनशील संसार का भाग नहीं हो सकता।

गणेश शंकर विद्यार्थी

जिस चिह्न से जो देश युक्त होता है और जिससे जिसकी पहचान होती है, विद्वानों का कहना है कि उस देश का वही नाम रखना चाहिए।

वेदव्यास

देश किसका है? देश हमारा नहीं है। हमारे लिए यह देश एक धर्मशाला है, देश इन्हीं शोषक और शासक वर्ग का है। धर्मशाला में रहनेवाले मुसाफ़िर का कर्तव्य है कि वह धर्मशाला के मालिक की ख़ुशहाली के लिए प्राण भी दे दे।

हरिशंकर परसाई

अगर केवल सही व्यक्ति को देश छोड़ना होता, तब बाक़ी सभी लोग देश में रह सकते थे।

हेर्टा म्युलर

हमें यह मान लेना चाहिए कि कोई किसी दूसरे देश में इसलिए विदेशी बन जाता है, क्योंकि वह अंदर से पहले से ही विदेशी होता है?

जूलिया क्रिस्तेवा

हमारी महान् जाति दो स्थितियों में जी रही है—एक तो इसका स्नायु-तंत्र ढीला हो गया है, सो इसे दस्यु सुंदरी-कथाओं जैसा उत्तेजक रस चाहिए। या इसे कोई चिंता अपनी, और अपने देश की नहीं है—घी से तर माल खाकर यह जाति लेटी है, पेट पर हाथ फेरती है।

हरिशंकर परसाई

हिन्दुस्तान का उद्धार हिन्दुस्तान की जनता पर निर्भर है। जनता में अपनी योग्यता के अनुसार यह भाव पैदा करना प्रत्येक स्वदेशवासी का परम धर्म है।

प्रेमचंद

इस देश में लड़की के दिल में जाना हो, तो माँ-बाप के दिल की राह से जाना होता है।

हरिशंकर परसाई

प्रत्येक देश में प्रति सैकड़ा कुछ ही मनुष्य ऐसे होते हैं, जो धार्मिक हो सकते हैं।

स्वामी विवेकानन्द

अनंत स्केंडल हैं इस पवित्र भूमि में। हिमालय जिसका मुकुट है, जिसके चरण सागर धोता है, गंगा-यमुना जिसके हृदय प्रदेश में शोभित हैं, जिसमें राम और कृष्ण जैसे अवतार हुए, जिसमें दुर्योधन, शकुनि, विभीषण पैदा हुए—उस देव-भूमि में सरकार बदलने से स्केंडल नहीं रुक सकते।

हरिशंकर परसाई

दान देना अपना कर्त्तव्य है, ऐसे भाव से जो दान देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर प्रत्युपकार करने वाले के लिए दिया जाता है, वह सात्त्विक दान है।

वेदव्यास
  • संबंधित विषय : दान

धीर और मनस्वी मनुष्य के लिए क्या अपना देश है और क्या विदेश है? वह तो जिस देश में जाता है, उसी को अपने भुजा-बल से अपने वश में कर लेता है।

विष्णु शर्मा

देशभक्त स्वदेश के लिए जीता है क्योंकि उसे जीना ही चाहिए, स्वदेश के लिए ही मर जाता है क्योंकि देश की यह माँग होती है।

श्री अरविंद

आज मैं देश से बाहर हूँ, देश से दूर हूँ, परंतु मन सदा वहीं रहता है और इसमें मुझे कितना आनंद अनुभव होता है।

सुभाष चंद्र बोस

देश की रक्षा राजा की सेना नहीं करती! देश की प्रजा करती है।

लक्ष्मीनारायण मिश्र

प्रत्येक देश और समाज के मुहावरे उसकी सभ्यता, संस्कृति और ऐतिहासिक-भौगोलिक, स्थिति की उपज हैं। पर अँग्रेज़ी की नक़ल में भी हमें इसका भी ध्यान नहीं रहता।

श्रीलाल शुक्ल

देश का अर्थ मिट्टी नहीं है। देश का अर्थ जन-समुदाय है।

गुरजाड अप्पाराव

भारत जैसे देश में ग़रीब या बेरोज़गार होना बड़ी बात नहीं। तभी जब कोई लेखनीधारी नागरिक अपनी विपन्नता के आत्मदयापूर्ण विवरण पेश करता है तो मुझे लगता है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से उन सबका अपमान कर रहा है जो उससे भी कड़े अभावों को झेल रहे हैं पर उसकी तरह आत्म-प्रकाशन नहीं कर पा रहे हैं।

श्रीलाल शुक्ल

बच्चा जब माँ के पेट में आता है, तभी से पोथी-पत्री और पूजा शुरू हो जाते हैं। आदमी पैदा हुआ तो ब्राह्मण तैयार बैठा है। फिर चालू होता है लंबा सिलसिला—छठी, नामकरण, मुंडन, कनछेदन, जनेऊ, विवाह—सब में है ब्राह्मण। आदमी मर जाए तो तेरहवें दिन ब्राह्मण भोजन करके दक्षिणा ले जाएँगे। आगे जब तक उसका वंश चलेगा, हर साल पितृपक्ष में ब्राह्मण भोजन करेगा उसी के नाम से, और दक्षिणा ले लेगा।

हरिशंकर परसाई

क्या मैं अपने ही देश में ग़ुलामी करने के लिए ज़िंदा रहूँ? नहीं, ऐसी ज़िंदगी से मर जाना अच्छा। इससे अच्छी मौत मुमकिन नहीं।

प्रेमचंद

लोगों को अपनी भाषा की असीम उन्नति करनी चाहिए, क्योंकि सच्चा गौरव उसी भाषा को प्राप्त होगा जिसमें अच्छे अच्छे विद्वान जन्म लेंगे और उसी का सारे देश में प्रचार भी होगा।

महात्मा गांधी

जब व्यक्ति की स्वतंत्रता या शांति ख़तरे में हो, तब हम उदासीन नहीं रह सकते और ही हमें रहना चाहिए। तब तो निरपेक्षता एक तरह से उन बातों के साथ धोखा होगी, जिनके लिए हमने संघर्ष किया है और जो हमारे उसूल हैं।

जवाहरलाल नेहरू

अपने देश का क़ानून पक्का है—जैसा आदमी, वैसी अदालत।

श्रीलाल शुक्ल

त्याग के और ज़िंदगी से इनकार करने के ख़याल लोगों में उस वक़्त पैदा होते हैं, जब राजनीतिक या आर्थिक मायूसी का उन्हें सामना करना पड़ता है।

जवाहरलाल नेहरू

देश-दुनिया में सर्वत्र छितरे व्यक्ति के निरुपायता—बोध की संचार की गति का प्रच्छन्न योगदान है।

कृष्ण कुमार

धर्म के मामले में तो भारत हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म—दोनों का ही स्त्रोत था।

जवाहरलाल नेहरू