ग़ुलामी पर उद्धरण
ग़ुलामी मनुष्य की स्वायत्तता
और स्वाधीनता का संक्रमण करती उसके नैसर्गिक विकास का मार्ग अवरुद्ध करती है। प्रत्येक भाषा-समाज ने दासता, बंदगी, पराधीनता, महकूमी की इस स्थिति की मुख़ालफ़त की है जहाँ कविता ने प्रतिनिधि संवाद का दायित्व निभाया है।
जब ग़ुलाम इतना सयाना और समझदार हो जाए कि बग़ावत पर आमादा हो जाए तो मालिक को नए सिरे से कल्पनाशील बनना पड़ता है।
नीग्रो अपनी हीनता से ग़ुलाम है, श्वेत व्यक्ति अपनी श्रेष्ठता से ग़ुलाम है… दोनों ही एक विक्षिप्त उन्मुखीकरण के अनुसार व्यवहार करते हैं।
किसी भी सक्रिय और ऊर्जावान मस्तिष्क को अगर स्वतंत्रता से वंचित रखा जाएगा, तो वह ग़लत दिशा में विकास करेगा। वह किसी भी तरह सत्ता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।
घर-गृहस्थी के प्रति धार्मिक कट्टरता जैसा जुड़ाव, दरअसल बाहरी दुनिया के प्रति शत्रुता का ही दूसरा नाम है—और अनजाने में ही इससे बाहरी दुनिया के नुक़सान के साथ-साथ, घर-गृहस्थी का और उन उद्देश्यों का—जिनके लिए हम जी रहे होते हैं—नुक़सान होने लगता है।
अराजकता का इलाज स्वतंत्रता है न कि दासता, वैसे ही जैसे अंधविश्वास का सच्चा इलाज नास्तिकता नहीं, धर्म है।
प्रेम में मोक्ष और बंधन परस्पर विरोधी हैं, क्योंकि प्रेम मोक्ष की भी चरम स्थिति है और बंधन की भी।
क्या मैं अपने ही देश में ग़ुलामी करने के लिए ज़िंदा रहूँ? नहीं, ऐसी ज़िंदगी से मर जाना अच्छा। इससे अच्छी मौत मुमकिन नहीं।
प्रभु वर्ग जनता पर शासन करने के लिए, जनता को सच्चा आचरण नहीं करने देता। यह उसकी विवशता होती है कि वह जनता को अपना शब्द न बोलने दे, उसे अपना चिंतन न करने दे।
ग़ुलाम का न दीन है न धर्म है, ग़ुलाम के न रहीम है, न राम हैं।
जो व्यक्ति स्वयं अपने सम्मान का ख़्याल नहीं करता वह दास ही बन जाता है।
हम सभी कम या अधिक अभिमतों के दास हैं।
यदि हम मातृभाषा की उन्नति नहीं कर सके और हमारा यह सिद्वांत रहे कि अँग्रेज़ी के ज़रिए ही हम अपने ऊँचे विचार प्रकट कर सकते हैं और उनका विकास कर सकते हैं तो इसमें ज़रा भी शक नहीं कि हम सदा के लिए ग़ुलाम बने रहेंगे। जब तक हमारी मातृभाषा में हमारे सारे विचार प्रकट करने की शक्ति नहीं आ जाती और जब तब वैज्ञानिक विषय मातृभाषा में नहीं समझाए जा सकते, तब तक राष्ट्र को नया ज्ञान नहीं मिल सकेगा।
अधीनता नामक वस्तु कितनी बड़ी तथा महिमा से युक्त है—इसे हमने वैष्णव धर्म में देखा है।
जब कभी मैं किसी को दासता का पक्ष समर्थन करते देखता हूँ तो मेरे मन में स्वयं उसी व्यक्ति पर उसकी परीक्षा किए जाने की प्रबल प्रेरणा होती है।
दासता का सबसे बुरा रूप ग्लानि की दासता है, क्योंकि तब लोग अपने में विश्वास खोकर निराशा की ज़ंजीरों में जकड़ जाते हैं।
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जहाँ बहुत सारी ग़ुलामी होती है, वहाँ आज़ाद रचनात्मक विचारों के लिए जगह नहीं होती और केवल विनाश के विचार और प्रतिशोध के फूल वहाँ खिल सकते हैं।
बड़े होकर, अपनी सारी मानसिक क्षमताएँ विकसित हो जाने पर किसी के आतंक में जीना पड़े, तभी समझ में आता है कि आतंक किसी कहते हैं।
हमेशा की तरह आज भी लोगों को दो समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है—ग़ुलाम और आज़ाद। वह इंसान जिसके दिन का दो-तिहाई भाग उसका अपना नहीं है वह ग़ुलाम है, चाहे वह राजनेता हो, व्यवसायी हो, अधिकारी हो या कोई विद्वान हो।
विडंबना दासों की महिमा है।
हमारा कर्म भी जब संकीर्ण स्वार्थ में ही चक्कर खाता रहता है, तब वही कर्म हमारे लिए भयंकर बंधन हो जाता है।
जिस युग में सूरदास ने अपनी रचना की उसमें नारी पराधीन थी, लेकिन लीलावर्णन के माध्यम से सूर ने उस स्थिति का स्वप्न देखा, जिसमें नारी बंधनों को तोड़कर कुंठारहित तौर पर अपने प्रिय के साथ विचर सकती है।