यदि मनुष्य का जन्म लेकर मैं मानवीय अस्तित्व के उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकूँ, यदि मैं उसकी नियति को चरितार्थ नहीं कर सकूँ, तो उसकी सार्थकता ही क्या है?
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जीवन के दो पक्ष होते हैं—बुद्धि और चरित्र । इतना ही काफ़ी नहीं है कि तुम देश को केवल चरित्र अर्पित करो, तुम्हें बौद्धिक आदर्श भी देना चाहिए।
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मेरी परिकल्पना और मेरी रूझान के अनुकूल, आकर्षण के केन्द्र हैं आरंभ से ही—त्यागी की वृत्ति, सादा जीवन और उच्च विचार, तथा देश-सेवा के लिए हार्दिक अनुरक्ति।
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हम तभी प्रभु के लिए प्रार्थी होते हैं, जब हम कष्ट में होते हैं और तभी शायद कुछ हद तक सच्चाई से उसे याद करते हैं। लेकिन जैसे ही हमारा कष्ट दूर हो जाता है और हम बेहतर महसूस करने लगते हैं, वैसे ही हम प्रार्थना करना बंद कर देते हैं और भूल जाते हैं।
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जो जाति एकमन होकर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों की साधना में लगी रहती है, उस जाति में किसी भी तरफ़ उपयुक्त मनुष्य का अभाव नहीं होता।
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