सूरदास के काव्य में कृष्ण से राधा और दूसरी गोपियों का प्रेम, सामंती नैतिकता के बंधनों से मुक्त प्रेम है।
भक्त कवियों की दृष्टि में मानुष-सत्य के ऊपर कुछ भी नहीं है—न कुल, न जाति, न धर्म, न संप्रदाय, न स्त्री-पुरुष का भेद, न किसी शास्त्र का भय और न लोक का भ्रम।
मुक्ति का अर्थ किसी विद्यमान वस्तु का विनाश करना नहीं है, बल्कि केवल अविद्यमान और सत्य मार्ग के अवरोधक कोहरे का निवारण करना है। जब अविद्या का यह अवरोध हट जाता है, तभी पलकें ऊपर उठ जाती हैं—पलकों का हटना आँखों की क्षति नहीं कहा जा सकता।
एक सुसंस्कृत दिमाग़ को अपने दरवाज़े और खिड़कियाँ खुली रखनी चाहिए।
भक्तिकाव्य के बाहर भी अधिकांशतः प्रेम की वही कविता महत्त्वपूर्ण है, जो सम-विषम की रूढ़ि से मुक्त है।
इतिहास विज्ञान है, कल्प-कथा नहीं है। जब तक वैज्ञानिक दृष्टि से, धार्मिक द्वेष से मुक्त, तथ्यपरक इतिहास नहीं पढ़ाया जाएगा, तब तक साम्प्रदायिक द्वेष जा नहीं सकता।
स्वर्ग-नरक तथा आकाश के परे, राज करने वाले शासकों से संबद्ध अनेक कथाओं अथवा अंधविश्वासों के द्वारा मनुष्य को भुलावे में डालकर, उसे आत्मसमर्पण के लक्ष्य की ओर अग्रसर किया जाता है। इन सब अंधविश्वासों से दूर रहकर, तत्वज्ञानी वासना के त्याग द्वारा जान-बूझकर इस लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है।
कबीर शास्त्रीय ज्ञान के बोझ से मुक्त है।
भारतवर्ष में जितने वेदमतानुयायी दर्शनशास्त्र हैं, उन सबका एक ही लक्ष्य है और वह है—पूर्णता प्राप्त करके आत्मा को मुक्त कर लेना। इसका उपाय है योग। 'योग' शब्द बहुभावव्यापी है। सांख्य और वेदांत उभय मत, किसी न किसी प्रकार से योग का समर्थन करते हैं।
योगी को अधिक विलास और कठोरता—दोनों ही त्याग देने चाहिए।
उत्पीड़ितों के लिए निहायत ज़रूरी है कि वे अपनी मुक्ति की सभी अवस्थाओं में, स्वयं को पूर्णतर मनुष्य बनने के सत्तामूलक तथा ऐतिहासिक कार्य में संलग्न मनुष्यों के रूप में देखें।
घर-गृहस्थी के प्रति धार्मिक कट्टरता जैसा जुड़ाव, दरअसल बाहरी दुनिया के प्रति शत्रुता का ही दूसरा नाम है—और अनजाने में ही इससे बाहरी दुनिया के नुक़सान के साथ-साथ, घर-गृहस्थी का और उन उद्देश्यों का—जिनके लिए हम जी रहे होते हैं—नुक़सान होने लगता है।
आलोचना और स्वतंत्र चिंतन, क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण होते हैं।
एक पूर्ण एवं मुक्त प्राणी, कभी किसी चीज़ की आकांक्षा नहीं करता।
उत्पीड़ित लोग स्वयं पर भरोसा करना तभी शुरू करते हैं, जब वे उत्पीड़क को खोज लेते हैं और अपनी मुक्ति के लिए संगठित संघर्ष करने लगते हैं।
कर्तव्य तो एक व्यर्थ की बकवास है। मैं मुक्त हूँ—मेरे सारे बंधन कट चुके हैं। यह शरीर कहीं भी रहे या न रहे, इसकी मुझे क्या परवाह।
हम अपनी सारी शक्तियों को किसी एक विषय की ओर लगा देने के फलस्वरूप उसमें आसक्त हो जाते हैं; तथा उसकी और भी एक दिशा है, जो नेतिवाचक होने पर भी उसके सदृश ही कठिन है—उस ओर हम बहुत कम ध्यान देते हैं—वह यह है कि क्षण भर में किसी विषय से अनासक्त होने की, उससे अपने को पृथक् कर लेने की शक्ति। आसक्ति और अनासक्ति, जब दोनों शक्तियों का पूर्ण विकास होता है, तभी मनुष्य महान् एवं सुखी हो सकता है।
‘कर्तव्य’ में मैं विश्वासी नहीं हूँ, कर्तव्य तो संसारियों के लिए एक अभिशाप है—संन्यासियों का कोई कर्तव्य नहीं है।
मैं मुक्त हूँ, सदा मुक्त रहूँगा। मेरी अभिलाषा है कि सभी कोई मुक्त हो जाएँ—वायु के समान मुक्त।
मुक्ति अकेले की नहीं होती। अलग से अपना भला नहीं हो सकता। मनुष्य की छटपटाहट है—मुक्ति के लिए, सुख के लिए, न्याय के लिए। पर यह बड़ी लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती है।
संस्कृति मनुष्य को जकड़ती नहीं, मुक्त करती है। संस्कृति वह जीवन-मूल्य है, जिसे अपनी विकास-यात्रा में मनुष्य, समाज विकसित और अंगीकार करता है। संस्कृति मनुष्य का उदात्तीकरण करती है, उसे क्षुद्रता से ऊँचा उठाती है।
जब तक हम प्रकृति के हाथ से अपना उद्धार नहीं कर लेते, तब तक हम ग़ुलाम हैं। प्रकृति जैसा कहती है, हम उसी प्रकार चलने को लाचार होते हैं।
सब पर समान स्नेह रखना अत्यंत कठिन है, किंतु उसके बिना मुक्ति नहीं मिल सकती।
मुक्ति केवल उसके लिए है, जो दूसरों के लिए सर्वस्व त्याग देता है; परंतु वे लोग जो 'मेरी मुक्ति-मेरी मुक्ति' की अहर्निश रट लगाए रहते हैं, वे अपना वर्तमान और भावी वास्तविक कल्याण, नष्ट कर इधर-उधर भटकते रह जाते हैं।
जब तक वास्तविकता की सही पहचान कराके सही चेतना का निर्माण नहीं किया जाता, मुक्ति दिलानेवाला ख़ुद उनके विरोध का शिकार होता है, जिन्हें वह मुक्त कराना चाहता है।
हम जिससे मुक्त होकर बाहर निकलकर नहीं आएँगे, उसे हम नहीं प्राप्त कर पाएँगे।
जो बंधन के कारण हैं, वे बंधन के मार्ग हैं। उनका नाश करने वाली आत्मा की शुद्ध अवस्था मोक्षमार्ग है कि जिससे भवभ्रमण का अंत होता है।
मुक्ति एक प्रसव है और यह प्रसव पीड़ादायक है।
संसार की समस्त संस्थाएँ; चाहे वे आरंभ में कैसी भी लाभदायक रही हों, समय पाकर मनुष्य जाति की उन्नति में बाधा डालने लगती हैं और उस समय उनका विध्वंस कर देना ही बुद्धिमत्ता है।
हमारे जीवन की एकमात्र साधना यही है कि हमारी आत्मा का जो स्वभाव है, उसी को हम बाधा मुक्त बना लें।
अगर मैं कहूँ; मनुष्य मुक्ति चाहता है, तो यह मिथ्या बात होगी। मनुष्य मुक्ति की अपेक्षा बहुत सारी चीज़ें चाहता है। मनुष्य अधीन होना चाहता है।
कर्म, उपासना, मन, संयम अथवा ज्ञान—इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ।
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मनुष्य का इतिहास साक्षी है कि विराग मनुष्य की आत्मा में बहुत गहरा बसा हुआ है।
ऐसे पुण्यवान् कवीश्वर सदा ही उत्कृष्टता के कारण विजयी हैं; जो रससिद्धि को पाए हैं, क्योंकि उनके यशरूपी शरीर में ज़रा-मरण का भय नहीं है।
आत्मिक साधना का एक अंग है, जड़ विश्व के अत्याचार से आत्मा को मुक्त करना।
योगियों के मतानुसार, सारा व्यक्त जगत्-प्रकृति से उत्पन्न हुआ है; पर प्रकृति का अपना कोई उद्देश्य नहीं है, केवल पुरुष को मुक्त करना ही उसका प्रयोजन है।
मुक्त दु:ख अभिनव प्रज्ञा देता है। उसे पुराने अनुभव के भारी संपुट में बंद करने से उसकी शक्ति कम हो जाती है।
अहं अपनी मृत्यु के द्वारा आत्मा के अमरत्व को व्यक्त करता है।
हम वह नहीं हैं जो हम बनना चाहते हैं, लेकिन कुछ न पाने की हमारी इच्छा हमें आगे बढ़ने की क्षमता देती है।
घर को तोड़कर बाहर निकलने की आकांक्षा का जैसा सहज, स्वाभाविक और मार्मिक चित्रण सूरदास के यहाँ है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
भारत जैसे देश में और विशेषकर उन परिवारों में, जहाँ रूढ़िवादी, संकीर्ण, सांप्रदायिक या जातिगत प्रभाव सर्वोपरि हैं—परिपक्वता प्राप्त करना और यहाँ तक कि उच्च विश्वविद्यालयी उपाधियाँ प्राप्त करना—वास्तव में मुक्ति प्राप्त किए बिना संभव नहीं है।
जीवन का जाल कभी-कभी बहुत जटिल हो जाता है; संसार का प्रवाह कभी-कभी प्रलय की भँवर में हमें खींचता रहता है, तब मनुष्य व्याकुल होकर कह उठता है—मुक्ति दो, मुक्तिदाता, मुझे मुक्ति दो!
संकीर्णतावाद किसी भी क्षेत्र का हो, मानवमुक्ति में बाधक होता है।
जहाँ एक ओर हर व्यक्ति; इस दुनिया में अपना पूरा जीवन लगा कर कुछ बनना चाहता है और फिर उसके मरने के बाद जो कुछ बचता है, वहीं दूसरी ओर एक सच्चा सूफ़ी इस दुनिया से कुछ नहीं चाहता—इस जीवन से हमें शून्य महत्वाकांक्षाएँ रखनी चाहिए।
धर्म में और अन्य सभी मामलों में, हर उस चीज़ को त्याग दें जो आपको कमजोर करती है, उससे कोई संबंध न रखें।
सतिगुरु जीव को मुक्ति प्रदान करता है और परमात्मा के ध्यान में लगाता है। इस प्रकार हरिपद को जानकर जीव प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।
त्याग के द्वारा हम मुक्त होते हैं।
जिन समाजों में नारी अपनी मुक्ति के लिए छटपटा रही थी, उनमें द्रौपदी को अपने लिए प्रेरणा और मुक्ति का प्रतीक माना गया।
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