प्रोपेगेंडा फ़िल्मों के ‘परफ़ेक्ट डेज़’
आशीष कुमार शर्मा
08 फरवरी 2026
हाल बीच में एक फ़िल्म देखी—‘परफ़ेक्ट डेज़’। सन् तेईस [2023] में आई यह जापानी फ़िल्म, जापान और जर्मनी का संयुक्त निर्माण रही। इसे 96वें अकादमी पुरस्कार (ऑस्कर) में सर्वोत्कृष्ट विदेशी फ़िल्म के नामजद किया गया। साथ ही इसे कान्स फ़िल्म महोत्सव में भी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
फ़िल्म कुछ इस प्रकार है कि अभिनेता कोज़ी याकूशो का किरदार हिरायामा टोक्यो शहर के शिबुया इलाक़े में एक शौचालय सफ़ाई कर्मचारी है। अधेड़ उम्र का हिरायामा एक लीक का, साधारण और एकाकी जीवन जीता है। उसका जीवन एक अनुष्ठान के जैसा नपा हुआ, निश्चित पद्धति के अधीन व्यतीत होता है। वह रास्ते पर सफ़ाई के लिए चलने वाले झाड़ू की ध्वनि से जागता है। अपना बिस्तर तह करके एक कोने में रखता है। दातुन करता है। अपनी मूछें क़रीने से मिलाता है। दाढ़ी की हज़ामत करता है। अपने घर में रखे पौंधों पर पानी छिड़कता है। अपनी वर्दी पहनता है। बाहर निकलता है। कुछ क्षण स्नेह और कृतज्ञता से आसमान की ओर देखता है। फिर वेंडिंग मशीन से एक कॉफ़ी लेता है। अपनी वैन में बैठकर कैसेट्स निकालता है। सुनिश्चित करता है कि आज वह कौन-सा गीत सुनेगा और वही बजाने लगता है। अपनी वैन लेकर दुपहर तक काम करता है। इस दौरान एक मंदिर के परिसर में पेड़ों के नीचे बैठकर सैंडविच खाता है। अपने कैमरे से पेड़ों की तस्वीर लेता है। फिर वापस आकर साइकिल से नहाने के लिए जाता है। वहाँ से भोजन करने के लिए एक रेस्तराँ जाता है। लौटकर अपना बिस्तर लगाता है। किताब उठाकर पढ़ता है। उसी बीच सो जाता है। प्रातः फिर बाहर झाड़ू की आवाज़ से आँख खुलती है। और वही नियम, उसी धारा के साथ हिरायामा का जीवन चलता रहता है।
‘परफ़ेक्ट डेज़’ की ख़ासियत यह है कि यह विशुद्ध सिनेमा है। एब्सोल्यूट सिनेमा! विशुद्ध सिनेमा से मेरा तात्पर्य ऐसी कृति से जिसे विस्थापित नहीं किया जा सकता। कई फ़िल्में हैं जिन्हें यदि उचित तरीक़े से वर्णित किया जाए तो तत्पश्चात देखने के लिए कुछ शेष नहीं रह जाता। देखने पर दुहराव अनुभव होता है। किसी फ़िल्म की कहानी सुना कर भी यह संभव होता है। पर ‘परफ़ेक्ट डेज़’ के साथ ऐसा नहीं है। इसमें कोई कहानी नहीं है। एक व्यक्ति है। उसकी जीवनचर्या है। कोई आत्मा का एकालाप नहीं। कोई नैरेटर नहीं। कोई आकाशवाणी नहीं। सम्मुख दृश्य हैं और इधर दर्शक। उनके मध्य कोई नहीं। कोई दार्शनिक आरोपण नहीं। फ़िल्म आप पर ख़ुद को थोपती नहीं है। फ़िल्म बह रही है। फ़िल्म हो रही है। जीवन की तरह। आप स्वतंत्र हैं जो उसमें से उठा लें। ‘परफ़ेक्ट डेज़’ को देखकर ही भोगा जा सकता है।
दो घंटे क़रीब की फ़िल्म में आरंभ के आधा घंटे में कुल चार संवाद न होंगे। मुझे सत्यजित रे के एक साक्षात्कार का ध्यान हो आता है, जिसमें वह कहते हैं कि उत्कृष्ट चलचित्र सबसे अधिक दृश्य पर निर्भर करता है। दृश्य जब अपनी बात कह सकने में अक्षम होता है—जब संगीत का प्रयोग होता है। और दोनों के असफल होने की स्थिति मात्र में संवाद का प्रयोग होता है। यही सिनेमा को उपन्यास आदि अंकित माध्यमों से भिन्न बनाता है। दृश्य, संगीत और संवाद का आनुक्रमिक यह विचार मौलिक रूप से अल्फ़्रेड हिचकॉक का है। रे की ख़ुद की फ़िल्मों में यह देखने को मिल जाता है। ‘पाथेर पांचाली’ के सबसे प्रसिद्ध दृश्य संवाद विहीन ही हैं। फिर चाहे वो बारिश में भीगते दुर्गा और अपु का दृश्य हो, काशफूलों के खेतों के निकट से धुआँ उड़ाती हुई रेल का दृश्य हो या फिर मिठाई वाले के पीछे अपने कुत्ते के साथ जाते बच्चों का दृश्य हो। ‘परफ़ेक्ट डेज़’ भी उसी कोटि की फ़िल्म है।
हिरायामा के चरित्र में कई ग़ौर करने वाली बातें हैं। हिरायामा नई तकनीक से दूर रहता है। वह डिजिटल कैमरे के स्थान पर रील वाले कैमरे का उपयोग करता है। वह कीपैड फ़ोन रखता है। उसके पास टीवी नहीं है। वह मनोरंजन के लिए बाहर घूमता है। किताब पढ़ता है। वह आज भी संगीत के लिए कैसेट्स रखता है। उसकी कई कैसेट्स इतनी पुरानी और दुर्लभ हैं, उनकी कीमत सौ डॉलर से ऊपर है। सत्तर और अस्सी के दशक के अँग्रेजी गानों की ये कैसेट्स पूरी फ़िल्म में एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक के रूप में काम करती हैं।
ऐसा प्रतीत होता है जैसे हिरायामा अपने अतीत से जुड़ा हुआ है। पर ये मोह जैसा प्रतीत नहीं होता। कहीं भी हिरायामा के चरित्र से यह बात प्रसारित नहीं होती कि वह नई तकनीक से घृणा करता हो। जुगुप्सा रखता हो। हेय दृष्टि से देखता हो कि नई तकनीक दुनिया खा जाएगी, कि दुनिया पहले जैसी नहीं रही। वह कुढ़ नहीं रहा। तकनीकी विकास और आसक्ति के लिए प्रसिद्ध जापान में हिरायामा विरोधाभास में दिखता है। वह कम बोलता है। अपने जीवन में प्रसन्न है। उसके लिए वह आभारी है। एक जगह अपने घर से भागकर हिरायामा के पास आई हुई उसकी भांजी से वो कहता है कि यह संसार कई संसारों से मिलकर बना है। कुछ जुड़े हुए हैं, कुछ नहीं। हिरायामा का संसार अलग-थलग है। महत्त्वपूर्ण यह है कि हिरायामा इस अलग-थलग पड़े संसार में संतुष्ट है। बिना कुंठा के।
दूसरी उल्लेखनीय बात है कि हिरायामा अपना काम अत्यधिक समर्पण और संतोष के साथ करता है। शौचालय साफ़ करने जैसे काम को भी हिरायामा ऐसे करता है जैसे कोई कलाकार अपनी रचना के निर्माण में लगा हुआ हो। जापान अपनी व्यावसायिक गुणवत्ता के लिए विश्वप्रसिद्ध है। परंतु हिरायामा उनमें भी शीर्ष पर है। एक स्थान पर हिरायामा का सहयोगी कर्मचारी तकाशी कहता है कि ऐसे काम के लिए आप इतने समर्पित कैसे हो सकते हैं? हिरायामा कोई उत्तर नहीं देता है। पर दर्शक तब तक समझ चुके होते हैं क्यों? हिरायामा को काम की प्रवृत्ति से कोई अंतर नहीं पड़ता। वह प्रतिदिन संतोष के साथ असमान को देखते हुए अपने घर से निकल पड़ता है। जब उसकी भांजी को वापस घर लेने के लिए हिरायामा की बहन आती है तो स्पष्ट होता है कि हिरायामा संपन्न परिवार से आता है। ऐसे में उसकी बहन उससे पूछती है कि क्या वह सच में शौचालय साफ़ कर रहा है? उसकी बहन के प्रश्न में उपहास नहीं है, घृणा नहीं है, बस एक आत्मीय कष्ट है। अपने प्रिय के लिए।
बहन के जाने के बाद हिरायामा वहीं खड़े हुए ही फुट-फूटकर रो देता है। एक बार के लिए हमें लगता है कि हिरायामा कष्ट में है। असफल है। हीनभावना में है। पर फिर अगले क्षण हिरायामा के सुबह उठकर काम पर जाते हुए आसमान को देखने वाला चेहरा सामने आ जाता है। उसमें संतोष है। सुख है। स्पष्ट है हिरायामा का रोना किसी और कारण से है। कदाचित अपने पिता के बिगड़े स्वास्थ्य की जानकारी, अपने पिता से उसके ख़राब संबंधों, पिता के देहांत की आशा या फिर मात्र अपनी बहन से वर्षों बाद मिलने के कारण भावावेश के कारण ही हृदय का कोई हिमखंड बह निकला हो। हमें नहीं मालूम।
असल में हमारा जीवन निर्रथक ही है। मण्डेन। हम अपने अस्तित्व को दूसरों के पैमानों से ही माप सकते हैं। सहस्त्राब्दियों से यही होता आया है। ऐसे ही सभ्यता का विकास हुआ। किसी के प्रेम का अभाव इसी कारण अदम्य दुख का कारण बन जाता है। इसी कारण अपने तथाकथित नीरस जीवन में अपने पिता के प्रेम की कमी की पुनर्स्थापना ने हिरायामा को रोने पर विवश कर दिया। इसी विचार के दूसरे छोर की बात करें तो तकाशी की प्रेमिका जब हिरायामा के गाल को चूमकर भाग जाती है तो हिरायामा अगले पूरे दिन विशेष प्रसन्न दिखाई देता है। किसी के प्रेम का पात्र होने की संभावना मात्र ही मनुष्य को जीवन की सार्थकता से भर देती है।
जीवन के सार्थक और निरर्थक होने की बात तो विवाद की बात है। परंतु एक बात ठोस है सो वह यह है कि जीवन चलता रहता है। हम अपने जीवन को नए आयाम देते रहते हैं। जीवन से बहस करते हैं। जीवन अपने दाव रखता है। हम सौदा-समझौता करते आगे बढ़ते रहते हैं। यह कहना धूर्तता होगा कि हिरायामा के जीवन को प्रेरणादायक कह दिया जाए। परंतु यह कहना कि यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में संतुष्ट होकर ग़लत कर रहा है यह निश्चित ही निकृष्टता है।
फ़िल्म के आख़िरी दृश्य में जब हिरायामा अपने काम पर जाता है तो हम देखते हैं कि अनगिनत भाव उसके चेहरे पर उजागर होते हैं। हमें लगता है वह अब रोता है, अब रोता है। जैसे हमें लगता है कि उसके रोने के साथ हम भी फूट पड़ेंगे। लगता है हिरायामा ने ख़ुद को अब संभाल लिया है, अब वह हँस देगा। पर वह भी प्राप्त होते नहीं दिखता। जीवन हास्य और वेदना के मध्य कहीं अपनी उपस्थिति पाता है। और वहीं उसका अवसान होता है।
इन सारी बातों के इतर एक और बात उल्लेखनीय है। वह है कि ‘परफ़ेक्ट डेज़’ एक प्रोपेगेंडा फ़िल्म (एक तरह से) है। हुआ यह कि जापान के सबसे अमीर व्यक्ति तदाशी यनाई के बेटे कोज़ी यनाई ने एक ‘द टोक्यो टॉयलेट’ नाम से परियोजना बनाई। इसके अंतर्गत टोक्यो के शिबुया इलाक़े में नवीनतम तकनीक के साथ विश्वस्तरीय शौचालय बनाए जाने थे। इस प्रोजेक्ट के लिए उत्कृष्टतम वास्तुकारों को बुलाया गया जिनमें स्थापत्य का नोबेल कहे जाने वाले प्रिज़्क़र पुरस्कार से पुरस्कृत वास्तुकार भी सम्मिलित थे। यह प्रोजेक्ट सन बीस के टोक्यो ओलंपिक खेलों के लिए बनाए जाने थे, जो कोविड के कारण न हो सके। इस परियोजना की गुणवत्ता को प्रदर्शित करने के लिए बाद में यनाई ने कुछ निर्देशकों से संपर्क किया। जिनमें जर्मन निर्देशक विम वेंडर्स से बात बनी। यनाई का विचार इन शौचालयों को केंद्र में रखकर कुछ शॉर्ट फ़िल्में बनाने का था। परंतु वेंडर्स ने एक पूरी फीचर फ़िल्म बनाने निर्णय लिया। जिसके परिणामस्वरूप ‘परफ़ेक्ट डेज़’ बनी। हिरायामा का चरित्र ‘द टोक्यो टॉयलेट’ का ही कर्मचारी है। तो क़ायदे से तो ‘परफ़ेक्ट डेज़’ एक प्रोपेगेंडा फ़िल्म ही है। आज जब हर दूसरी फ़िल्म प्रोपेगेंडा कह दी जा रही है। वाम खेमे के लोग फ़िल्मों में मर्दाना क्रूरता, फ़ासीवाद, चरम राष्ट्रवाद आदि को देखते गरिया रहे हैं। बॉयकॉट कर दे रहे। वहीं दक्षिण मोर्चे के लोग फ़िल्मों में नक़ली धर्मनिरपेक्षता, संस्कृति पर प्रहार देखकर गरिया दे रहे। ट्रोल कर दे रहे। ऐसी स्थिति में ऐसी प्रोपेगेंडा फ़िल्मों की बड़ी आवश्यकता है। ऐसे प्रोपेगेंडा चलते रहें।
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बेला पॉपुलर
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