शिरीष कुमार मौर्य के बहाने : बनारस से निकला हुआ आदमी
डॉ. सुनीता
09 फरवरी 2026
मैं पहली बार शहर आए
किसी गँवई किसान-सा निहारता था
चीज़ों को
अलबत्ता देखे थे कई शहर
जीवन के धूप-छाँव में यात्राएँ कहीं पीछे छूट जाती हैं। जीवन में आने वाली समानांतर समस्याएँ समझौते करने को विवश भी करती हैं। उन बेबस दिनों से भागने की चाह भीतर कहीं बची रहती है। अक्सर बग़ैर नक़्शे की यात्रा पर निकल जाना अच्छा लगता है। बिना तलाश के तलाश से सुकून का एहसास गहरा होता है। गहरे एहसास के नाम निकल पड़ी। उपरोक्त पंक्तियाँ यात्रा के ज़रूरी समान सरीखे हैं, जिसे गले लगाए अनवरत वर्षों तक चलना चुना। शरीर से अधिक मन सफ़र पर रहा। जब हाथ में कुछ नहीं था, तब और अब भी।
एक बेहद शांत सुबह, जब हल्की ठंडी हवा पेड़ों की पत्तियों से सरसराती हुई गुज़र रही थी—उस वक़्त मैं एक पुराने बग़ीचे से कटे पगडंडी के रास्ते पर थी, जहाँ फूलों की महक, चिड़ियों की चहचहाहट हवा में घुली थी। बाएँ हाथ के रास्ते पर टंगे बोर्ड पर नज़र पड़ी। हम ठिठक गए। बेंच पर पक्षी बैठे बतिया रहे थे। डालियाँ झूम रही थीं। हवा में हल्की ठंडक बनी हुई थी। आँखों में एक गहरी चमक उभरी। अनकहे गीत दिल-दिमाग़ में बज उठे। उँगलियाँ मोबाइल पर स्वाइप की मुद्रा में थीं, जबकि अधर सघन मुस्कान से भरे। मेरे बग़ैर कहे रथवान ने गाड़ी रोक दी। लंबे वर्षों से साथ-साथ यात्रा की सबसे अच्छी बात होती है कि हर बात कहने की ज़रूरत ख़त्म-सी हो जाती है।
हम रुके। लंबी साँस ली और फिर सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। ऊपर चढ़ते वक़्त जादुई एहसास भीतर से बेचैन और उत्सुकता बढ़ा रहे थे। ऊपर चढ़ने के बाद रथवान ने मेरी ओर देखा, हम साथ-साथ मुस्कुराए। हमारी मुस्कान पल में ग़ायब भी हो गई, जब बाहर ताला जड़ा देखा। तभी पास से कोई गुज़र रहा था। ‘आप लॉक खोलकर ऊपर जा सकते हैं।’ जड़बुद्धि दिल यक़ीन से इंकार करता, तब पर भी लॉक खोल ऊपर सीढ़ियाँ चढ़ गए। सबकी ग़ैर मौजूदगी में हवा औपचारिकता निभाने आ गई। हवा की सरगोशी कपोलों पर ठहरी तो चंद पसीने की शबनमी बूँदें चुचुहाआ आए। वक़्त के किनारे ख़ामोशी का गीत बज उठा। कान में शब्द गूँजें—“भाई से मिलकर लौटी हो?” गर्दन घूमाकर इधर-उधर देखा हर तरफ़ सन्नाटा था। हवा में गति बनी हुई थी। चिड़ियाँ-चुनमुन की चीं-चीं-चूँ-चूँ चल रही थी। प्राइमरी स्कूल के बच्चे प्रार्थना सभा कर रहे थे। उनके अनगढ़ ऊँचे स्वर चिड़ियों के चहचह को टक्कर दे रहे थे। धूप चढ़ रही था। जून की तीखी धूप सीधे चनुवर पर चमकी। जबकि रुई के फाहे से छोटे-छोटे बादल आकाश में बिखरे थे। बादल देखने के लिए गर्दन ऊपर उठाते ही आँखें चौंधियाई। उस एक पल अतीत की कई गिरहें खुलीं। दिल का बाग़ हरा हुआ। जिसने छुटपन में मेरे कपोल को सहलाया था, उसके उभरे कृत्रिम गाल को गदोरी से सहलाते ही सिहरन हुई, लगा बेहद क़रीब से कोई परछाईं गुज़री है। उस एक पल में जीवंत संगीत रिदम पर साँसें एक लय में चलती रहीं। क्षणिक लगा मानो सब कुछ ठहर गया है। हवाओं के पंखों पर उनकी कविता की पंक्ति में कवि शिरीष कुमार मौर्य की ध्वनि संगत कर रही थी। नेपथ्य से ‘पंत’ और ‘वर्मा’ की उठती आत्मरागी तरंगें अतीत मोह से बाँध लीं। वृक्षों के डालियों से एक आत्मगल्प महुए-सा टपका। दिल बल्लियों उछल पड़ा। कुछ देर यूँ ही मौन बैठी रही। फ़ोन बजा बातें कीं और भीतर ख़ुशी समेटे नीचे की ओर उतर पड़े।
हृदय गहराइयों में बसी एक अनकही कहानी की तरह उत्तराखंड की सड़क यात्रा पर निकलना अनायास ही रहा। अनायास में सदप्रयास जुड़ते जा रहे थे। मन में उम्मीद, आशंका के बीच अनकहे सपनों का तूफ़ान-सा उमड़-घुमड़ रहा था। गाड़ी की खिड़की से बाहर झाँककर देखा हरे-भरे पहाड़ दिल को अपनी बाहों में समेट रहे थे। उम्मीद की किरणें किनारे-किनारे चल रही थीं। नीले आकाश में तैरते बादल भीतरी आँसुओं को छिपाने की कोशिश में निहंग लग रहे थे। तिस पर गंगा की मधुर लहरें कानों में गूँज रही थीं। ऐसा लगा जैसे प्रेमिल प्रकृति हृदय के दर्द को सुनने आई हों या कि सुनाने, ये ठीक-ठीक तय करना मुश्किल था। दरअस्ल यह यात्रा—आत्मा का प्रकृति के साथ एक करुण संवाद-सा था। जहाँ हर साँस में जीवन की नई धुन बज रही थी। मन मयूर हँस-गा और ग़म में डूब-उतिरा रहा था। अधिक ख़ुशी आँसुओं का पनाहगाह है।
हालाँकि सड़क-मार्ग की यात्रा सुखद होती है। जब जी चाहे रथ उधर मोड़ कर पहुँचा जा सकता है, जिधर जाने का कोई ख़ास एजेंडा पहले से तय न हो। ऐसे में यात्रा कुछ अधिक रोमांचक बन जाती है। सुभोर से चला रथ जल्दी ही ऋषिकेश पहुँचा। गंगा तट पर खड़े होकर जल स्पर्श किया। जल छूते ही ठंडक हाथों से होकर हृदय की गहराइयों तक पहुँची। ऐसे जैसे कोई माँ अपने बच्चे को सहला रही हो। हवा में तैरती घंटियों की टन-टन और मंत्रों की गूँज से मन का सारा शोर थम गया। क्षणिक पलकें झपकीं। दृश्य ओझल हो गए। आँखें बंद थीं। कुछ भाव उभरे—गंगा का जल, सारे संसार के दुखों को अपने साथ बहा ले जा रहा है। तनिक अधर हँसे। चुपके से जलपाश से निकल पहाड़ों की ओर चल दिए। सड़कें घुमावदार थीं। गाड़ी के काँच के बाहर देवदार के घने जंगल ख़्वाबों को छाँव दे रहे थे। दूर बर्फ़ से ढके हिमालय हृदय की उदासी को गलाने की कोशिश में हाँफते-हाँफते ख़ुद ही गलने लगे। भीतर एक अनजानी शांति उतर रही थी। हवा चुप-सी थी। रह-रह कर बादल गरज रहे थे। दिल-दिमाग़ प्रकृति से बातों में मशग़ूल।
आगे बढ़ते गए, कारवाँ जुड़ता गया। सफ़र में दो जल बहनें अलकनंदा और भागीरथी मिलीं। जिन्हें देखते ही सहसा आँखें नम हो गईं। दो नदियाँ, दो अलग- अलग रास्तों से आईं। एक होकर गंगा बन गईं। यह दृश्य मेरे लिए सिर्फ़ नदियों का मिलन नहीं था, वस्तुत: टूटे मन के खोए हिस्से से मिलन सरीखा था। त्रिकोण बनाती नदी के पेट में उगे पाषाण सुंदर व सुगढ़ थे। उनके पीठ पर बैठकर कुछ पल बिताए। जल कलकल बहता रहा। नदी जागते हुए कोमल पैर चूम बह रही थी। चिंतन की गाँठे खुलीं। दिल में उठे वेग थिर हुए। सुबह का वक़्त था। हवा में मद्धम ठंडक थी। कानों में नदियों का मधुर राग बज रहा था। ज़ेहन में एक पुरानी याद उभरी—किसी अपने का बिछड़ना और फिर उस दर्द को गंगा की लहरों में बहा देने की स्मृति से उपजा अनाम दर्द। एक लंबी गहरी साँस लेकर हृदय का बोझ हल्का कर उठ खड़े हुए। जल अब भी बह रहा होगा।
रुद्रप्रयाग की तंग गलियों में चलते हुए मंदाकिनी के किनारे रुकना सुख दे रहा था। बुज़ुर्ग चायवाले की मुस्कान, फूल वाले की गुहार। उनकी निर्विकार आँखों में बसी सादगी दिल को छू गई। सदियों पुराना रिश्ता भीतर उमगा—“पहाड़ सब ठीक कर देते हैं।” भीतरी आवाज़ में जादू था। केदारनाथ की ओर बढ़ते ही सड़कें और कठिन होती गईं। हर मोड़ पर प्रकृति सौंदर्य बिखरा था। बर्फ़ीले शिखर के सपने पुकार रहे थे। बर्फ़ीली हवा में घुलना अच्छा लग रहा था। अधिक अच्छा लगना भी भीतरी तह को तोड़ता है। हम जुड़ते-टूटते चलते रहे। वीरान सड़क पर एक बुज़ुर्ग दंपति रस्सी में एक-दूसरे से हाथ फँसाए लगभग दौड़ रहे थे। जाने कौन-सी मन्नत अधूरी थी कि नंगे पैर चलना चुना और ख़ुशी-ख़ुशी बिना रुके बढ़ रहे थे। अंदर एक वितृष्णा ने जन्म लिया। मोह की गाँठे थोड़ी और ढीली हुईं। चुप चित्त में चिंतन अध्याय खुलने लगे।
बद्रीनाथ की सड़कें तनिक अधिक दुर्गम थीं। हाँ! अलकनंदा अब भी साथ-साथ बह रही थी। जो की राहत की बात लगी। सखी-सी संग-संग चलती अलकनंदा हौसला दे रही थी। धीरे-धीरे बर्फ़ीली हवाओं को गालों पर महसूस किया। वहाँ की ठंडक शरीर काँपने पर मजबूर कर रही थी, लेकिन हृदय के अंदर गर्म साँसों के एहसास की गर्माहट बरक़रार थी तो सर्दी, सर्दी-सी न लगकर गर्मी की बहन समझ आई।
हम इस क़दर चल रहे थे कि चलते-चलते थकान ने भी थककर मान लिया कि दरअस्ल ‘चलना ही ज़िंदगी है, चलते ही जा रहे हैं’ शायद इसीलिए थकान के निशान मिट चुके थे। तेजी से गंगोत्री-यमुनोत्री उद्गम के दार्शनिक स्पर्श की ओर बढ़ चले। पास के एक छोटे से चट्टान पर बैठकर सोचा—यह नदी कहानियाँ, दुख और अगणित प्रेम छिपाए बैठी है। नम आँखों से कंकड़ छूते ही जीवन के सारे ख़ालीपन तिरोहित हो गए। यमुनोत्री चढ़ाई ने शरीर को ख़ूब थकाया पर यमुना के काले-नीले जल और चारों ओर की हरियाली ने पंख दे दिया। यमुना की लहरों में बचपन की उदासियाँ बह गईं। मन बंजारा लगभग बावरा हो गया। दीपों की लौ, मंत्रों की गूँज और गंगा का विशाल प्रवाह। शांत हृदय गहरे में डूबा रहा। प्रवाहित दीप में दुख, थकान और आशंकाएँ लपलपा रही थीं। बिना आयाम जीवन की अनकही यात्रा में गड़हे-गुच्चे वाली सड़कें, नदियों और पहाड़ों की छोटी यात्रा चुपचाप एक हृदय यात्रा बन गई।
सड़क प्रेम प्रवृत्ति ने ही धैर्य व आत्म शांति का पाठ पढ़ाया। शाम ढलान पर थी। रामगढ़ मल्ल पीछे छूट रहा था। नैनीताल के ताल क़रीब आ रहे थे। शिकायती काठगोदाम की धीमी पुकार साथ चल रही थी। नीले-सुफ़ेद बादल काले होने की तैयारी में थे। सूरज पहले ही सिंदूरी हो चुका था। ऐसे में परिंदे भी अपनी नीड़ की ओर लौट रहे थे। कमोवेश उनके संग-संग हम सब भी लौट ही रहे थे।
कम रोशनी वाले दिन में सड़क के दूसरे छोर पर शिरीष के फूल खिले थे। कोमल सौंदर्य के प्रतीक शिरीष संस्कृत, प्राकृत और अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में आवाजाही करते रहे हैं। बिन मौसम खिला शिरीष चकित कर रहा था। इस वृक्ष ने काव्य-नाटक में ख़ूब जगह घेरी है। कथा-वृक्ष का अनूठा संगम कालिदास के ‘मेघदूत’ और ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ में सजीव चित्रित है। नाज़ुक बनावट और मधुर सुगंध प्रेमी-प्रेमिका के मिलन-विरह की कोमल भावनाओं का गवाह जो ठहरा। औचक कोमल कपोल के अधर मुस्कुराए तिस पर किसी की याद आई। प्रकृति और मानव हृदय के बीच सेतु बनाते शिरीष के फूल भवभूति और अन्य कवियों में ठसक संग दर्ज हैं। आस-पास प्रेम और शांति की हल्की सरसराहट बिखरने लगी। वहीं बौद्ध और जैन साहित्य में आत्म-पवित्रता और वैराग्य के अगुआ बन जाते हैं। सुगंध और सादगी मिलकर ध्यान, शांति और आत्मचिंतन का हिस्सा लगे। जीवन के सुख-दुख के चक्र चुपके से मुक्ति की ओर बढ़ने की प्रेरणा देने लगे। वसंत ऋतु बीत चुका था, फिर ये क्योंकर खिले थे? क्या प्रकृति के दूत हमारी राह देख रहे थे? भीतर भ्रम ने जन्म लिया। क्षण भर को माघ, जयदेव याद आए। गीत काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्त्व जेहन में कौंधे। हिंदी, बंगाली, मराठी की मात्राएँ गूँजी। उपमा के रूपक कानों से टकराए। दिल में बार-बार शिरीष-सी कोमल और शिरीष के फूल-सा बिखरता प्रेम उमगने की ध्वनि सुनाई दे रही थी। कालिदास का ‘ऋतुसंहार’ नेत्रों के आगे नाच उठे। तभी ‘मालती माधव’ की कलियाँ चटकीं। हूक उठे दिल में एक आह उपजी। टूटकर उसकी याद आई जिसे साथ होना था पर नहीं था...
शिरीष वृक्ष का अनुपम काव्य हरे रंग की स्याही से आकाश पर लिखी गई एक गीतिका-सी लगी। भूरे रंग की खुरदरी छाल में लिपटा शिरीष का तना समय की कहानियाँ लिए सीधे खड़ा था। निहायत मजबूत। देखने में कोमल। प्राचीन संत सरीखे मौन में सत्य मुखर किए। शाखाएँ आकाश की ओर फैली थीं। हल्की हवा से टुनगहने थिरकन थी। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे नृत्य करती अप्सराएँ सूरज की किरणों से संवादरत हों। छोटी-छोटी पत्तियाँ नाज़ुक और रेशमी। पत्तियाँ हरे रंग की लहरों-सी डालियों में झूल रही थीं। वे सरसराहट की मधुर धुन छेड़ती मोहक लगीं। एकबारगी को लगा कि वीणा की तारों को कोई कोमल अधरों से सहला रहा है। वसंती मौसम होता तो फूल, गुलाबी-सफेद रंग के नन्हे गुच्छों में खिले होते और धरती पर बिछकर सो जाते, तब ऐसा लगता कि तारों ने रात की बजाय दिन में वसुंधरा को चूमने का इरादा किया है। हर तरफ़ मधुर सुगंध हवा में तैर रही थी। अजीब-सी शांति की तलब बनी रही। गर्मी की तपन में छाया देता, बारिश में भीगकर निखरा शिरीष सिरहाने तन के खड़ा हो गया। उसके लटों से मोती सरीखे टूट कर गिरी बूँदें हौले से शरद में अपनी पत्तियाँ धरती को सौंपकर लौटे। स्मृति में उभरे बिंब एकाकार हो गए। आकृतियों की आँखें होतीं तो देखता कि कितना कुछ मचल-उछल रहा है। एक पल में उसके स्पर्श सघन हुए। क्षणभंगुर जीवन नाज़ुकता सौंदर्य में खो गया। बेशक सुंदरता स्थायी नहीं पर असर गहरा था। प्रकृति का मौन संदेश दिल सुन रहा था। होंठ बुदबुदा रहे थे—‘दिल कहे रुक जा रे रुक जा यहीं पर कहीं...’
चिरयुवा पृथ्वी पर कब कुछ रुका है जो दिल रुकता। दिल का रुकना बेजान हो जाना है। ज़ेहन में जीवन चक्रीय स्वरूप- जन्म, विकास और विलय एक साथ प्रकट हुए। नवीकरण आशा के भाव जाग उठे। हृदय गहन चिंतन में डूब रहा था और सड़कें सिकुड़ रही थीं। अँधेरा बढ़ रहा था। औचक कवि शिरीष की कविता ‘बनारस से निकला हुआ आदमी’ की पंक्तियाँ बार-बार याद आ रही थीं। फिर क्या, लौटानी बेला में कवि शिरीष कुमार मौर्य की कविताओं के रंग में हवा में ठंडक की सौंधी महक, दूर तक फैले देवदार के जंगल और कहीं नीचे घाटी में गंगा की उन्मुक्त लहरों की गूँज सुनाई देने लगी। उनको सुनते चलते रहे। धीरे-धीरे सड़क यात्रा एक कविता में तब्दील हो गई। दरअस्ल प्रकृति के कैनवास पर रचना अमिट होती है। शिरीष की कविता का साथी बन चलना स्वाभाविक लगा। हर मोड़ पर भावना को शब्द मिलने लगे। दृश्य के मायने बदलने लगे। उनकी कविताओं की संवेदनशीलता और प्रकृति के प्रति गहरा लगाव इस यात्रा को और भी मार्मिक बना दिए। पहले से यादों का गट्ठर साथ था। थोड़ी और रसद जुड़ गए।
सड़क के दोनों ओर बेशुमार हरियाली थी। हरियाली की बाहें मोहपाश बन गईं। घुमावदार रास्तों पर गाड़ी की खिड़की से झाँकती हवाएँ चेहरे को सहलाती संग-संग चल रही थीं। पहाड़ों की साँस में बसती है सृष्टि की धड़कन और हर पत्ती में छिपा है एक अनकहा सपना। कुलाचें भरते मन साथ थे। जब भी सूरज की किरणें पेड़ों की पत्तियों से छनकर सुनहरी रेखाएँ बनाती, मुझे शिरीष की कविताओं में वर्णित प्रकृति की वह सादगी और सघनता महसूस होती। उनके रचे में पहाड़ों का सौंदर्य, संस्कृति की पीढ़ी झाँकती है, तब ‘ऋतुरैण’ नहा-धो, संज-सँवर प्रकट हुई। हौले से सुनाई पड़ा कि पत्थरों से टकराकर, झरने गाते हैं गीत, हर बूँद में बसती है, जीवन की अनघट प्रीत। लक्ष्मण झूला के सानिध्य में गंगा की लहरों के मध्य ‘नदी की बातें’ मन में उभरीं—
नदी बहती है चुपके से,
लेकिन कहती है बहुत कुछ,
उसके जल में डूब जाओ,
तो मिलता है सत्य का स्पर्श
उस वक़्त दीपों की रोशनी नदी की सतह पर तैर रही थी। आध्यात्म की लहर उठी। भीतर वैराग्य महसूस हुआ। शब्द की अनुभूति का आकार बड़ा था। हर तरफ़ विशाल हिमपर्वत थे। हिमालय की गोद में छोटे-छोटे गाँव बसे थे। आतुर मन हिमालय छूने को व्यग्र। बर्फ़ से ढके शिखर मन में भावावेग उत्पन्न कर गए। प्रकृति दृश्य के स्थान पर सजीव सत्ता-सी लगी। जो अपने भीतर समेट रही थी। यह यात्रा भौगोलिक से अधिक भीतरी तलाश थी। प्रकृति से आलिंगन दुनिया का सबसे दुर्लभ सफ़र है। जिसकी अनघट गूँज आजीवन साथ चलती है। हालाँकि एहसास का चक्षु खोले बग़ैर यह असंभव है।
बिना मैप के यात्रा में ‘धर्म वह नाव नहीं’ और ‘आत्मकथा’ से भेंट की अनुभूति अलग तासीर लिए रही। संग्रह के बहाने समकालीन संवेदना पाठ धीरे-धीरे खुला। शिरीष कुमार मौर्य हिंदी कविता में एक सशक्त स्वर व ठसक लिए मौजूद हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक प्रश्नों को सघन संवेदनशीलता से उठाते हैं। कविताएँ एक साथ आत्मीय और सार्वभौमिक हैं। अधिकांश कविताएँ व्यक्तिगत और सामूहिक चेतना यात्रा पर ले जाती हैं। उनके दो काव्य संग्रह, ‘धर्म वह नाव नहीं’ [2024] और ‘आत्मकथा’ [2022 कविता शृंखला] इस बात के प्रमाण हैं। शिरीष जी ‘स्व’ व ‘व्यक्तिगत’ अनुभूति को सामाजिक यथार्थ में पिरोने में माहिर हैं।
शिरीष की काव्य-चेतना, विषय-वस्तु और शिल्प की विशिष्टता सूक्ष्म विश्लेषण की माँग करती है। ‘धर्म वह नाव नहीं’ धर्म और मानवता का नवीन चर्यापद है। जिसे कवि के काव्य-यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव कह सकते हैं। संग्रह में आठवीं से बारहवीं शताब्दी के बौद्ध सिद्धों द्वारा रचित चर्यापद की परंपरा को समकालीन संदर्भों में पुनर्जीवित किया है। संग्रह में धर्म को रूढ़िगत ढाँचे से निकालकर उसे मानवता, करुणा और आत्म-जागरूकता से जोड़ते हुए बाहरी संसार यात्रा और आंतरिक साधना यात्रा साथ-साथ पर ले जाते हैं। कविताओं को पढ़ने के पश्चात भीतर से महसूस होता है कि आंतरिक संताप, जीवन की व्याकुलता, महत्त्वाकांक्षी धार्मिकता की निस्सारता और साधारणता की महत्ता को नए तरह से पुनर्परिभाषित किया जा सकता है।
बेहद सूक्ष्मता से कर्मकांडीय ढांचे से मुक्त मानवीय संवेदना का हिस्सा बनाते हैं। मनुष्य को प्राण चले जाने का भय होता है। भय को स्थविर दृष्टि से देखने से भय का स्वरूप बदल जाता है। मानव के अस्तित्वगत भय धर्म से जोड़ने का निमित्त है, परंतु इसे किसी रूढ़िगत समाधान की ओर नहीं ले जाते बल्कि आत्म-चिंतन और करुणा की ओर इशारा करते हैं। यथोचित व्यंग, कटाक्ष और दर्शन को सरलता के साथ पिरोते हैं। जो मन में सहज ही उतरती हैं। भाषा में लयबद्धता है। यह चर्यापद प्राचीन परंपरा से आधुनिक संदर्भ में जीवंत बन पड़ा है। धर्म को सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी परखते हैं। वह ‘राजनीति का ऋतुरैण’ भी लिख चुके हैं। संभवत: ‘उत्तरा महिला पत्रिका’ के 21 मार्च, 2022 अंक में प्रकाशित हुई थी। समाज में धर्म और प्रेम के बीच के टकराव को रेखांकित करते हैं—“धर्म हर बार प्रेम के विरुद्ध खड़ा होता है/ धर्म को बचाने जितना आसान नहीं है प्रेम को बचा पाना।” शिरीष यहाँ धर्म की उस प्रवृत्ति पर प्रहार करते हैं जो प्रेम और मानवीय रिश्तों को दबाने का प्रयास करती है। उनकी कविता सामाजिक टकरावों से निपजती है। ‘कासगंज दंगे’ ऐतिहासिक परिवेश की रचना है। कविता में वसंत जैसे कोमल मौसम को हिंसा और विध्वंस के साथ जोड़कर अलग ही विडंबना रचते हैं। ‘धर्म वह नाव नहीं’ में आध्यात्मिक चिंतन के मध्य समकालीन सामाजिक यथार्थ को कठोरता से जाँचा है। जीवन का बहुवचन अर्वाचीन शैली में दर्ज है।
‘आत्मकथा’ निज का सार्वजनिक संवाद है। समकालीन समाज और इतिहास से संवाद है। काव्य संग्रह में आत्मकथा का पारंपरिक ढाँचा टूटता है और कविता की एक नई आत्मकथा शैली जन्मती है। यह कृति व्यापक यथार्थबोध का परिचायक है जिसमें कवि की अपनी व्यथा-चिंतन ही नहीं बल्कि समकालीन समाज की पीड़ा बोध है। ये कविताएँ मित्र स्वरूप विचार की तरह साथ चलती हैं। स्मृतियाँ हैं। पहाड़ों की पुराकथाएँ हैं। मंडुए की रोटी है। घुघुती चिड़िया की नाज़ुक चोंच के उपाख्यान हैं। ये पूर्णत: सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृतियों के साथ गूँथे हुए हैं। पुराकथा में कविता ‘तीन दशकों के बाद अचानक मुझे मेरी ही एक पुरानी आवाज़ आती है/ बोलते-बोलते मैं ख़ामोश हो जाता हूँ।’ स्मृति और समय के बीच की ख़ामोशी रेखांकित है। कवि का आत्म-संघर्ष, जन का संघर्ष है।
मुझे आत्मकथा लिखनी है
पर लिखते हुए चली आती हैं
न जाने कितनी कथाएँ
न जाने कितने लोगों से जुड़ीं
और मैं नियम तोड़ बैठता हूँ
नियम तोड़ने की ज़िद से उत्पन्न सलाहियत, संग्रह का प्राणतत्त्व है।
शिरीष कुमार मौर्य की अधिकांश कविता प्रकृति, लोक-संस्कृति और मानवीय संवेदना की हैं। बार-बार पहाड़, नदियाँ और लोक-गीत उभरते हैं। सघन स्थानीयता और वैश्विक संवेदना उच्च स्तर पर है। सामाजिक अन्याय का शिनाख्त सूक्ष्मता से किया है। यत्र-तत्र धर्म की सत्ता व हिंसा की राजनीति को चुनौती देते प्रतीत होते हैं। कुल मिलाकर आत्म- चेतना और सामाजिक-जन चेतना, सरोकार का संगम कह सकते हैं। कवि स्वयं को समाज दर्पण में देख ही रहे हैं, औरों को भी देखने का मार्ग देते हैं। अनूठे शिल्पगत परिष्कार की रचनाओं में व्यंग, कटाक्ष और दर्शन एक साथ मिलते हैं जो विचारशीलता को उकसाते हैं। संवेदना के संवेग को गहराई तक छूते हैं। वेद, वेदांग, इतिहास को अतीत से निकालकर वर्तमान आत्म संसर्ग के बीच ले आते हैं। हालाँकि सामूहिक स्मृतियों को काव्यात्मक आख्यान में बदलते हुए यथार्थबोध से उनका हाथ नहीं छूटता। ‘धर्म वह नाव नहीं’ और ‘आत्मकथा’ कविता शृंखला व्यापकता लिए है। धर्म को नई परिभाषा देते हैं, जहाँ मानवता और करुणा एक धार बहते हैं। बहने की सीख, ठहरने से बड़ी है।
क्षितिज पर नारंगी-गुलाबी रंगों की छटा बिखेरता सूरज ढल रहा था। भीड़ भरी सड़कों से हम भी लौट रहे थे। भीड़ में हज़ारों की पीठ धीरे-धीरे गुम हो रही थी। मधुर यादों का सैलाब साथ था। खिड़की से एक आख़िरी बार पीछे मुड़कर देखा, एक अश्क़ उभरा। ख़ालीपन से मुस्कुराने की कोशिश की लेकिन ज़ुबाँ चुप रहे, आँखें बोलती रहीं। गहराते शाम में हवा ने अलविदा कहा। एक सरग़ोशी हुई—अनमोल पल पीछे छूट रहे हैं। अचानक मुड़कर देखा कुछ भी नहीं था सिर्फ़ शून्य में जाते हुए हुजूम और ढेरों पीठ की आकृतियाँ थीं। जिस पर अस्फुट-सा कुछ अंकित था... ‘बनारस से निकला हुआ आदमी जहाँ भी जाएगा एक नई दुनिया बसाएगा।’ उस बसे दुनिया की जड़े जितनी पाताल में घँसी होंगी उतना ही आकाश को स्पर्श करेंगी। जब धरती-आकाश एक राग-रंग में मिल जाएँगी देश-दुनिया के नक़्शे से भेदभाव के सारे उपक्रम मिट जाएगा, तब ख़ालिस बचेगा प्रेम और प्रेम के माथे पर लिखा होगा—प्रेम! प्रेम बग़ैर जीवन सूना...
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डॉ. सुनीता को और पढ़िए : बोरसी भर आँच : चीकू की चीख़ों में मनुष्य का चेहरा
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