योग पर उद्धरण
योग षड्दर्शन में से
एक है। इसका अर्थ है समाधि या चित्त-वृत्तियों का निरोध। इसका अर्थ जोड़ या योगफल भी है। ‘गीता’ में योग के तीन प्रकार बताए गए हैं—कर्म, भक्ति और ज्ञानयोग। भक्तिधारा में योग-मार्ग के अनुयायी संतों ने योग पर पर्याप्त बल दिया है। इस चयन में पढ़िए—योग विषयक कविताएँ ।
लोग मुझसे पूछते हैं : योग क्या है? मैं उनसे कहता हूँ : ‘अस्पर्श’ भाव। ऐसे जियों कि जैसे तुम जहाँ हो वहाँ नहीं हो।
योगी को अधिक विलास और कठोरता—दोनों ही त्याग देने चाहिए।
योगी जानते हैं कि संसार के सभी भोग पुरुष और मन के संयोग द्वारा होते हैं।
योगी को चाहिए कि वे तन-मन-वचन से किसी के विरुद्ध हिंसाचरण न करें। दया मनुष्य-जाति में ही आबद्ध न रहे, वरन् उसके परे भी वह जाए और सारे संसार का आलिंगन कर ले।
भारतवर्ष में जितने वेदमतानुयायी दर्शनशास्त्र हैं, उन सबका एक ही लक्ष्य है और वह है—पूर्णता प्राप्त करके आत्मा को मुक्त कर लेना। इसका उपाय है योग। 'योग' शब्द बहुभावव्यापी है। सांख्य और वेदांत उभय मत, किसी न किसी प्रकार से योग का समर्थन करते हैं।
प्रेम का मार्ग सहज, सरल और सीधा है, निर्गुण का पथ कंटकाकीर्ण, दुरूह, दुर्गम और चक्करदार है। संपूर्ण भ्रमरगीत में उद्धव और गोपियों के संवाद के माध्यम से, ज्ञान और योग के ऊपर प्रेम के विजय की घोषणा हुई है।
अत्यंत भूखा मनुष्य यदि कंठनली में चित्त का संयम कर सके, तो उसकी भूख शांत हो जाती है।
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यम और नियम चरित्र-निर्माण के साधन हैं। इनको नींव बनाए बिना किसी तरह की योगसाधना सिद्ध न होगी। यम और नियम में दृढ़प्रतिष्ठ हो जाने पर योगी अपनी साधना का फल अनुभव करना आरंभ कर देते हैं।
जब ध्यान में वस्तु का रूप या बाहरी भाग परित्यक्त हो जाता है, तभी समाधि-अवस्था आती है।
रहस्यस्पृहा मानव-मस्तिष्क को दुर्बल कर देती है। इसके कारण ही आज योगशास्त्र नष्ट सा हो गया है।
योगी प्रयत्न करते हैं कि वे अपने को ऐसा सूक्ष्म अनुभूति-संपन्न कर लें, जिससे वे विभिन्न मानसिक अवस्थाओं को प्रत्यक्ष कर सकें।
योगशास्त्र के मतानुसार, आत्मा अविद्या के कारण प्रकृति के साथ संयुक्त हो गई है, प्रकृति के पंजे से छुटकारा पाना ही हमारा उद्देश्य है। यही सारे धर्मों का एकमात्र लक्ष्य है।
आत्मा की उन्नति का वेग बढ़ाकर किस प्रकार थोड़े समय में मुक्ति पाई जा सकती है, यही सारे योगशास्त्र का लक्ष्य और उद्देश्य है।
योगी का ब्रह्मचर्यवान होना अनिवार्य है।
यदि श्वास-प्रश्वास की गति लयबद्ध या नियमित की जाए, तो शरीर के सारे परमाणु एक ही दिशा में गतिशील होने का प्रयत्न करेंगे।
जो पूर्ण योगी होना चाहते हैं, उन्हें स्त्री-पुरुष भेद का भाव छोड़ देना पड़ेगा। आत्मा का कोई लिंग नहीं है—उसमें न स्त्री है, न पुरुष; तब क्यों वह स्त्री-पुरुष के भेदज्ञान द्वारा अपने आपको कलुषित करे?
किस प्रकार इस प्राण पर विजय पाई जाए, यही प्राणायाम का एकमात्र उद्देश्य है।
एकाग्रता का अर्थ ही है, शक्तिसंचय की क्षमता को बढ़ाकर समय को घटा लेना। राजयोग इसी एकाग्रता की शक्ति को प्राप्त करने का विज्ञान है।
हम जो कुछ देखते हैं, कल्पना करते हैं या जो कोई स्वप्न देखते हैं—सारे अनुभव हमें आकाश में करने पड़ते हैं। हम साधारणतः जिस परिदृश्यमान आकाश को देखते हैं, उसका नाम है महाकाश। योगी जब दूसरों का मनोभाव समझने लगते है या अलौकिक वस्तुएँ देखने लगते हैं, तब वे सब दर्शन चित्ताकाश में होते हैं। और जब अनुभूति विषयशून्य हो जाती है; जब आत्मा अपने स्वरूप में प्रकाशित होती है, तब उसका नाम है चिदाकाश। जब कुण्डलिनीशक्ति जागकर सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है; तब जो सब विषय अनुभूत होते हैं, वे चित्ताकाश में ही होते हैं। जब वह उस नाड़ी की अंतिम सीमा मस्तक में पहुँचाती है, तब चिदाकाश में एक विषयशून्य ज्ञान अनुभूत होता है।
योगी यह दावा करते हैं कि जो मन को वशीभूत कर सकते हैं, वे भूत को भी वशीभूत कर लेते हैं।
गीता कहती है; जो अपने को अनर्थक क्लेश देते हैं, वे कभी योगी नहीं हो सकते।
स्नान करने, दान देने, शास्त्र पढ़ने, वेदाध्ययन करने को तप नहीं कहते। न तप योग ही है और न यज्ञ करना। तप का अर्थ है वासना को छोड़ना, जिसमें काम-क्रोध का संसर्ग छूटता है।
हे अर्जुन! जिसने समत्व बुद्धि रूप योग द्वारा सब कर्मों का संन्यास कर दिया है, जिसने ज्ञान से सब संशय दूर किए हैं, और जो आत्मबल से युक्त है, उसको कर्म नहीं बाँधते हैं।
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जो योग का आचरण करता है, जिसका हृदय शुद्ध है, जिसने स्वयं को जीत लिया है, जो जितेंद्रिय है और जिसकी आत्मा सब प्राणियों की आत्मा बनी है, वह कर्म करता हुआ भी अलिप्त रहता है।
भक्ति-मार्ग का सिद्धांत है भगवान को बाहर जगत में देखना। 'मन के भीतर देखना' यह योग-मार्ग का सिद्धांत है, भक्ति मार्ग का नहीं।
योगियों के मतानुसार, सारा व्यक्त जगत्-प्रकृति से उत्पन्न हुआ है; पर प्रकृति का अपना कोई उद्देश्य नहीं है, केवल पुरुष को मुक्त करना ही उसका प्रयोजन है।
जीवन के सिद्धांतों को व्यवहार में लाने की जो कला या युक्ति है, उसी को 'योग' कहते हैं। सांख्य का अर्थ है— 'सिद्धांत' अथवा 'शास्त्र' और 'योग' का अर्थ है 'कला'।
ब्रह्मचर्य के बिना राजयोग की साधना बड़े ख़तरे की है, क्योंकि उससे अंत में मस्तिष्क में विषम विकार पैदा हो सकता है।
जो सचमुच योगी होने की इच्छा करते हैं, उन्हें इस प्रकार के थोड़ा-थोड़ा हर विषय को पकड़ने की वृत्ति सदैव के लिए छोड़ देनी होगी। एक विचार लो; उसी विचार को अपना जीवन बनाओ, उसी का चिंतन करो, उसी का स्वप्न देखो और उसी में जीवन बिताओ।
योग की ऐसी अद्भुत शक्ति है कि बहुत थोड़ी मात्रा में भी उसका अभ्यास करने पर बहुत अधिक फल प्राप्त होता है।
योगी के लिए सब कुछ आनंदमय है, वह जिस भी मनुष्य का चेहरा देखता है, उससे उसे प्रसन्नता मिलती है। यही एक गुणी व्यक्ति की पहचान है।
योगी एक देह में क्रियाशील रहते हुए भी, अन्य किसी मृत देह में प्रवेश करके उसे गतिशील कर सकते हैं।
जो ज्ञान और विज्ञान से तृप्त हो चुका है, जो सबसे उच्च स्थान में स्थिर हुआ है, जो जितेंद्रिय है तथा जिसकी दृष्टि में मिट्टी, पत्थर और सोना समान है, उस यात्री का योग सिद्ध हुआ ऐसा कहते हैं।
योगाभ्यास करने पर जो चिह्न योगियों में प्रकट होते हैं, देह की स्वस्थता उनमें प्रथम है।
जब योगी उसमें संयम करने में सफल होते हैं, तब प्रकाश के सारे आवरण नष्ट हो जाते हैं और समस्त अंधकार एवं अज्ञान नष्ट हो जाने के कारण, सब कुछ उन्हें चैतन्यमय प्रतीत होता है।
ब्रह्मचर्य से मतलब है ब्रह्म अथवा परमेश्वर के मार्ग पर चलना; अर्थात् मन और इंद्रियों को परमेश्वर के मार्ग पर रखना।
ब्रह्मचर्य का प्रयत्न करने वाले बहुतेरे लोग विफल होते है, क्योंकि वे खाने-पीने, देखने-सुनने इत्यादि में अब्रह्मचारी की तरह रहना चाहते हुए भी,ब्रह्मचर्य-पालन की इच्छा रखते हैं।
सच्चा योगी वही है, जो प्रभु-मिलन की युक्ति को समझता है और जो गुरु की कृपा से एक ईश्वर को जानता है।
जब तक मन की क्रियाओं पर नज़र न रखोगे, उसका संयम न कर सकोगे।
यथायोग्य आहार-विहार करने वाले, कर्मों को यथा-योग्य करने वाले, यथायोग्य शयन करने तथा जागने वाले का योग दुःख दूर करने वाला होता है।
योगी मुक्ति और बंधन दोनों का विचार करते हैं, और उनका अज्ञानांधकार दूर हो जाता है।
वस्तुतः योग जीवन की एक शैली है—न कि स्वयं को युवा बनाए रखने के लिए कुछ एक व्यायामों का अभ्यास मात्र।
ब्रह्मचर्य का अर्थ है, मन-वचन-काया से समस्त इंद्रियों का संयम।
योग का अर्थ है जीवन की एक ऐसी शैली जिसमें कोई विभाजन नहीं है और इसलिए कोई द्वंद्व भी नहीं है वक्ता की दृष्टि में योग का यही अर्थ है।
जीवात्मा का परमात्मा से संयोग ही योग कहा जाता है।
जो कुछ उच्चतम तत्त्व है उसके साथ अपनी सत्ता को सभी भावों में एक हो जाना है- 'योग'।......समस्त प्रकृति और सभी जीवों के साथ एक हो जाना ही है योग।
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