हम ईश्वर को देख नहीं सकते। यदि हम ईश्वर को देखने का प्रयत्न करते हैं, तो हम ईश्वर की एक विकृत और भयानक आकृति बना डालते हैं।
कबीर प्रत्येक लौकिक और अलौकिक वस्तु को जुलाहे की नज़र से देखते हैं। उनके लिए ईश्वर भी एक बुनकर ही है और उसकी यह दुनिया तथा मानव काया—‘झिनी-झिनी बीनी चदरिया है।’
जब मनुष्य ईश्वर को देखता है, तो वह उसे मनुष्य रूप में देखता है। इसी प्रकार अन्य प्राणी भी ईश्वर को अपनी-अपनी कल्पना, अपने-अपने रूप के अनुसार देखते हैं।
जब पूज्यभाव की वृद्धि के साथ श्रद्धाभाजन के सामीप्य-लाभ की प्रवृत्ति हो, उसकी सत्ता के कई रूपों के साक्षात्कार की वासना हो, तब हृदय में भक्ति का प्रादुर्भाव समझना चाहिए।
जाति के उन्मूलन की दृष्टि से देखें, तो संतों के संघर्ष से समाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। मनुष्य का मूल्य स्वयंसिद्ध है, स्वतः स्पष्ट है—यह मूल्य उसे भक्ति के मार्ग पर चलकर नहीं मिलता।
आत्मा प्रेम के सतत विकास-पथ पर परमात्मा के संयोग की कामना से गतिमान है।
भक्ति द्वारा अपनी व्यक्त सत्ता को; भगवान् की व्यक्त सत्ता में मिलाना मनुष्य के लिए जितना सुगम है, उतना ज्ञान द्वारा ब्रह्म की अव्यक्त सत्ता में अपनी व्यक्त सत्ता को मिलाना नहीं।
सभी धर्म, निम्नतम मूर्तिपूजा से लेकर उच्चतम निरपेक्षता तक, मानव आत्मा द्वारा अनंत को समझने और अनुभव करने के अनेक प्रयास मात्र हैं।
रस की अनुभूति एक प्राकृतिक और स्वाभाविक अनुभूति है, जो किसी प्रकार के उत्कृष्ट काव्य द्वारा भी हो सकती है। उसी प्रकार की अनुभूति भक्त की भी मानी गई है।
जगत में ईश्वर से हमें अपना कोई विशेष संबंध बना लेना होगा। कोई एक विशेष सुर बजाते रहना होगा।
प्रेम, प्रेमी और प्रेमास्पद अर्थात् भक्ति, भक्त और भगवान् तीनों एक ही हैं।
भगवत्प्रेमियों को किसी इंद्रजाल से नहीं डरना चाहिए।
परमात्मा की कृपा पर मेरा अखंड विश्वास है। वह कभी टूटनेवाला भी नहीं। धर्मग्रंथों पर मेरी अटूट श्रद्धा है।
जो ईश्वर से प्रेम करना चाहता है, उसे अपनी उत्कट अभिलाषाओं का त्याग करना चाहिए। ईश्वर को छोड़ अन्य किसी बात की कामना नहीं करनी चाहिए।
भगवान् का जो प्रतीक तुलसीदासजी ने लोक के संमुख रखा है; भक्ति का जो प्रकृत आलंबन उन्होंने खड़ा किया है, उसमें सौंदर्य, शक्ति और शील—तीनों विभूतियों की पराकाष्ठा है।
धर्म का प्रवाह, कर्म, ज्ञान और भक्ति इन तीन धाराओं में चलता है। इन तीनों के सामंजस्य से धर्म अपनी पूर्ण सजीव दशा में रहता है। किसी एक के भी अभाव से वह विकलांग रहता है।
भक्ति के बदले में उत्तम गति मिलेगी—इस भावना को लेकर भक्ति हो ही नहीं सकती। भक्त के लिए भक्ति का आनंद ही उसका फल है।
भक्ति के भीतर दो भावों का मेल होता है—श्रद्धा और प्रेम का। श्रद्धा भगवान के आहाल्य या महत्त्व की भावना से जगती है और प्रेम उनके सौंदर्य की भावना से।
भक्ति और शील की परस्पर स्थिति ठीक उसी प्रकार बिंब-प्रतिबिंब भाव से है, जिस प्रकार आश्रय और आलंबन की।
प्रीति के वशीभूत होकर ही भगवान श्रीकृष्ण नरलीला करते हैं।
जिस शक्ति की अनंतता पर भक्त केवल चकित होकर रह जाएगा, ज्ञानी उसके मूल तक जाने के लिए उत्सुक होगा। ईश्वर ज्ञानस्वरूप है, अतः ज्ञान के प्रति यह औत्सुक्य भी भक्ति के समान एक 'भाव' ही है।
जो ऊँचा है और नीचा है, परम साधु है और पापी भी, जो देवता है और कीट है, उस प्रत्यक्ष, ज्ञेय, सत्य, सर्वशक्तिमान ईश्वर की उपासना करो और अन्य सब मूर्तियाँ तोड़ दो।
यह दुनिया बड़े मज़े की जगह है और सबसे मज़ेदार है—वह असीम प्रियतम।
जब तक तुममें ईमानदारी, भक्ति और विश्वास है, तब तक प्रत्येक कार्य में तुम्हें सफलता मिलेगी।
मैं हर साँस के साथ भक्ति के बीज बोता हूँ—मैं हृदय का किसान हूँ।
तुम पवित्र तथा सर्वोपरि निष्ठावान बनो; एक मुहूर्त के लिए भी भगवान् के प्रति अपनी आस्था न खोओ, इसी से तुम्हें प्रकाश दिखाई देगा। जो कुछ सत्य है, वही चिरस्थाई बनेगा; किंतु जो सत्य नहीं है, उसकी कोई भी रक्षा नहीं कर सकता।
निर्गुण-सगुण परस्पर पूरक हैं, परस्पर विरुद्ध नहीं। सगुण से निर्गुण तक की मंजिल तय करनी चाहिए और निर्गुण को भी चित्त के सूक्ष्म मल धोने के लिए, सगुण की आर्द्रता चाहिए।
प्रत्येक धर्म में प्रार्थनाएँ हैं, पर एक बात ध्यान में रखनी होगी कि आरोग्य या धन के लिए प्रार्थना करना भक्ति नहीं है—वह सब कर्म है।
भक्त की भावना अपने गृह या कुल के तंग घेरे के भीतर बद्ध नहीं रह सकती। वह समस्त विश्व के कल्याण का व्यापक लक्ष्य रखकर प्रवृत्त होती है।
हम तभी प्रभु के लिए प्रार्थी होते हैं, जब हम कष्ट में होते हैं और तभी शायद कुछ हद तक सच्चाई से उसे याद करते हैं। लेकिन जैसे ही हमारा कष्ट दूर हो जाता है और हम बेहतर महसूस करने लगते हैं, वैसे ही हम प्रार्थना करना बंद कर देते हैं और भूल जाते हैं।
मंत्र नामक वस्तु जीवन को बाँधने का एक उपाय है।
रामकृष्ण परमहंस ने भिन्न-भिन्न धर्मों की साधना स्वयं करके, सब धर्मों की एकरूपता प्रत्यक्ष कर ली। तुकराम ने अपनी उपासना के सिवा दूसरे किसी की भी उपासना न करते हुए भी, सारी उपासनाओं का सार जान लिया। जो स्वधर्म का निष्ठा से आचरण करेगा, उसे स्वभावतः ही दूसरे धर्मों के लिए आदर रहेगा।
भक्ति हृदय से की जाती है। बुद्धि से भक्ति करना ऐसा ही है, जैसे नाक से खाना और कान से सूँघना।
हम में से हर कोई अपनी समझ के हिसाब से कुरान की व्याख्या करता है। व्याख्या करने के चार तरीके हैं। पहला तरीका है : केवल बाहरी अर्थ को समझना, जिससे ज्यादातर लोग संतुष्ट हो जाते हैं। दूसरा तरीका है : आंतरिक अर्थ को समझना जिसे बातें भी कहते हैं। तीसरा तरीका है : आंतरिक आत्मा को समझना। और चौथा तरीका इतना गहरा है कि उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
जिस वैराग्य का भाव प्रेम है, जो समस्त भिन्नता को एक कर देता है, जो संसारूपी रोग को दूर कर देता है, जो इस नश्वर संसार के त्रय-तापों को मिटा देता है, जो सब चीज़ों के यथार्थ रूप को प्रकट करता है, जो माया अंधकार को विनष्ट करता है, और घास के तिनके से लेकर ब्रह्मा तक सब चीज़ों में आत्मा का स्वरूप दिखता है, वह वैराग्य, हे शर्मन्! अपने कल्याण के लिए तुम्हें प्राप्त हो।
भक्ति किसी वस्तु का संहार नहीं करती, वरन् हमें यह सिखाती है कि हमें जो-जो शक्तियाँ दी गई हैं, उनमें से कोई भी निरर्थक नहीं है, बल्कि उन्हीं में से होकर मुक्ति का स्वाभाविक मार्ग है। भक्ति न तो किसी वस्तु का निषेध करती और न वह हमें प्रकृति के विरुद्ध ही चलाती है।
भक्ति का मूल तत्व है—महत्व की अनुभूति। इस अनुभूति के साथ ही दैन्य अर्थात् अपने लघुत्व की अनुभूति का उदय होता है।
भक्ति-रस का पूर्ण परिपाक जैसा तुलसीदासजी में देखा जाता है, वैसा अन्यत्र नहीं।
जो तुम्हारे भीतर भी है और बाहर भी, जो सभी हाथों से काम करता है और सभी पैरों से चलता हैं, जिसका बाह्य शरीर तुम हो, उसी की उपासना करो और अन्य सब मूर्तियाँ तोड़ दो।
गोस्वामीजी की रामभक्ति वह दिव्य वृत्ति है, जिससे जीवन में शक्ति, सरसता, प्रफुल्लता, पवित्रता, सब कुछ प्राप्त हो सकती है।
जिस मनुष्य को परमात्मा ने ही मार्ग नहीं दिखलाया, बुद्धि (तर्क-वितर्क) के प्रयोग मात्र से उस पर कोई रहस्य नहीं खुलेगा।
ईश्वर की वाणी को बाँधने के अनेक संबंध हैं, उनमें से अपने मन के मुताबिक किसी एक संबंध को स्थिर कर लेना होगा।
''तद् आहुः केन जुहोति कस्मिन् हूयत इति। प्राणेनैव जुहोति प्राणे हूयते''—पूछा जाता है कि आहुति किस से दी जाती है और किस में दी जाती है? आहुति प्राण की दी जाती है, और प्राण में ही दी जाती है।”
मनुष्य सर्वाधिक भयभीत मृत्यु से रहता है, इसलिए संहार के देवता शिव की बड़ी भक्ति करता है।
जब दुनिया आपको घुटनों के बल धकेलती है, तो आप प्रार्थना करने के लिए एकदम सही स्थिति में होते हैं।
किसी की मूर्ति नहीं बनानी चाहिए, क्योंकि इससे आपकी आँखें धुंधली हो जाएँगी।
हृदय में निर्गुण ब्रह्म का ध्यान, नेत्रों के सामने सगुण रूप की सुंदर झाँकी और जीभ से सुंदर राम नाम का जप करना। यह ऐसा है मानो सोने की सुंदर डिबिया में मनोहर रत्न सुशोभित हो।
भक्ति के दो विभाग हैं। एक वैधी भक्ति, जो विधिमयी या अनुष्ठानात्मक होती है और दूसरी मुख्य भक्ति या परा भक्ति।
भक्ति राग की वह दिव्य-भूमि है, जिसके भीतर सारा चराचर जगत् आ जाता है।
धूमधाम से क्या प्रयोजन? जिनकी हम पूजा करते हैं, उन्हें तो हृदय में स्मरण करना ही पर्याप्त है। जिस पूजा में भक्तिचंदन और प्रेमकुसुम का उपयोग किया जाए, वही पूजा जगत् में सर्वश्रेष्ठ है। आडंबर और भक्ति का क्या साथ?
संबंधित विषय
- अनुभव
- अहिंसा
- आकांक्षा
- आत्म-अनुशासन
- आत्मा
- आनंदमय
- आस्था
- ईश्वर
- उदारता
- उपासना
- एहसास
- कृपा
- कर्म
- कला
- गांधीवाद
- चेतना
- ज्ञान
- जीवन
- डर
- दिल
- ध्यान
- धर्म
- निष्काम
- प्रेम
- प्रार्थना
- पवित्रता
- पागलपन
- भक्ति
- भक्ति काव्य
- भलाई
- मनुष्य
- महात्मा गांधी
- योग
- रस
- राम
- लोक
- व्यक्ति
- व्यावहारिक
- संगीत
- सुनना
- स्मरण
- समाज
- संवेदना
- स्वार्थ
- संसार
- सहानुभूति
- सौंदर्य