हम ईश्वर को देख नहीं सकते। यदि हम ईश्वर को देखने का प्रयत्न करते हैं, तो हम ईश्वर की एक विकृत और भयानक आकृति बना डालते हैं।
कबीर प्रत्येक लौकिक और अलौकिक वस्तु को जुलाहे की नज़र से देखते हैं। उनके लिए ईश्वर भी एक बुनकर ही है और उसकी यह दुनिया तथा मानव काया—‘झिनी-झिनी बीनी चदरिया है।’
जब मनुष्य ईश्वर को देखता है, तो वह उसे मनुष्य रूप में देखता है। इसी प्रकार अन्य प्राणी भी ईश्वर को अपनी-अपनी कल्पना, अपने-अपने रूप के अनुसार देखते हैं।
जो ईश्वर से प्रेम करना चाहता है, उसे अपनी उत्कट अभिलाषाओं का त्याग करना चाहिए। ईश्वर को छोड़ अन्य किसी बात की कामना नहीं करनी चाहिए।
भगवत्प्रेमियों को किसी इंद्रजाल से नहीं डरना चाहिए।
परमात्मा की कृपा पर मेरा अखंड विश्वास है। वह कभी टूटनेवाला भी नहीं। धर्मग्रंथों पर मेरी अटूट श्रद्धा है।
प्रेम, प्रेमी और प्रेमास्पद अर्थात् भक्ति, भक्त और भगवान् तीनों एक ही हैं।
आत्मा प्रेम के सतत विकास-पथ पर परमात्मा के संयोग की कामना से गतिमान है।
जगत में ईश्वर से हमें अपना कोई विशेष संबंध बना लेना होगा। कोई एक विशेष सुर बजाते रहना होगा।
सभी धर्म, निम्नतम मूर्तिपूजा से लेकर उच्चतम निरपेक्षता तक, मानव आत्मा द्वारा अनंत को समझने और अनुभव करने के अनेक प्रयास मात्र हैं।
धर्म का प्रवाह, कर्म, ज्ञान और भक्ति इन तीन धाराओं में चलता है। इन तीनों के सामंजस्य से धर्म अपनी पूर्ण सजीव दशा में रहता है। किसी एक के भी अभाव से वह विकलांग रहता है।
यह दुनिया बड़े मज़े की जगह है और सबसे मज़ेदार है—वह असीम प्रियतम।
मैं हर साँस के साथ भक्ति के बीज बोता हूँ—मैं हृदय का किसान हूँ।
जब तक तुममें ईमानदारी, भक्ति और विश्वास है, तब तक प्रत्येक कार्य में तुम्हें सफलता मिलेगी।
तुम पवित्र तथा सर्वोपरि निष्ठावान बनो; एक मुहूर्त के लिए भी भगवान् के प्रति अपनी आस्था न खोओ, इसी से तुम्हें प्रकाश दिखाई देगा। जो कुछ सत्य है, वही चिरस्थाई बनेगा; किंतु जो सत्य नहीं है, उसकी कोई भी रक्षा नहीं कर सकता।
प्रत्येक धर्म में प्रार्थनाएँ हैं, पर एक बात ध्यान में रखनी होगी कि आरोग्य या धन के लिए प्रार्थना करना भक्ति नहीं है—वह सब कर्म है।
प्रीति के वशीभूत होकर ही भगवान श्रीकृष्ण नरलीला करते हैं।
जो ऊँचा है और नीचा है, परम साधु है और पापी भी, जो देवता है और कीट है, उस प्रत्यक्ष, ज्ञेय, सत्य, सर्वशक्तिमान ईश्वर की उपासना करो और अन्य सब मूर्तियाँ तोड़ दो।
मंत्र नामक वस्तु जीवन को बाँधने का एक उपाय है।
रामकृष्ण परमहंस ने भिन्न-भिन्न धर्मों की साधना स्वयं करके, सब धर्मों की एकरूपता प्रत्यक्ष कर ली। तुकराम ने अपनी उपासना के सिवा दूसरे किसी की भी उपासना न करते हुए भी, सारी उपासनाओं का सार जान लिया। जो स्वधर्म का निष्ठा से आचरण करेगा, उसे स्वभावतः ही दूसरे धर्मों के लिए आदर रहेगा।
हम तभी प्रभु के लिए प्रार्थी होते हैं, जब हम कष्ट में होते हैं और तभी शायद कुछ हद तक सच्चाई से उसे याद करते हैं। लेकिन जैसे ही हमारा कष्ट दूर हो जाता है और हम बेहतर महसूस करने लगते हैं, वैसे ही हम प्रार्थना करना बंद कर देते हैं और भूल जाते हैं।
''तद् आहुः केन जुहोति कस्मिन् हूयत इति। प्राणेनैव जुहोति प्राणे हूयते''—पूछा जाता है कि आहुति किस से दी जाती है और किस में दी जाती है? आहुति प्राण की दी जाती है, और प्राण में ही दी जाती है।”
मनुष्य सर्वाधिक भयभीत मृत्यु से रहता है, इसलिए संहार के देवता शिव की बड़ी भक्ति करता है।
जब दुनिया आपको घुटनों के बल धकेलती है, तो आप प्रार्थना करने के लिए एकदम सही स्थिति में होते हैं।
किसी की मूर्ति नहीं बनानी चाहिए, क्योंकि इससे आपकी आँखें धुंधली हो जाएँगी।
हम में से हर कोई अपनी समझ के हिसाब से कुरान की व्याख्या करता है। व्याख्या करने के चार तरीके हैं। पहला तरीका है : केवल बाहरी अर्थ को समझना, जिससे ज्यादातर लोग संतुष्ट हो जाते हैं। दूसरा तरीका है : आंतरिक अर्थ को समझना जिसे बातें भी कहते हैं। तीसरा तरीका है : आंतरिक आत्मा को समझना। और चौथा तरीका इतना गहरा है कि उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
भक्ति किसी वस्तु का संहार नहीं करती, वरन् हमें यह सिखाती है कि हमें जो-जो शक्तियाँ दी गई हैं, उनमें से कोई भी निरर्थक नहीं है, बल्कि उन्हीं में से होकर मुक्ति का स्वाभाविक मार्ग है। भक्ति न तो किसी वस्तु का निषेध करती और न वह हमें प्रकृति के विरुद्ध ही चलाती है।
जिस वैराग्य का भाव प्रेम है, जो समस्त भिन्नता को एक कर देता है, जो संसारूपी रोग को दूर कर देता है, जो इस नश्वर संसार के त्रय-तापों को मिटा देता है, जो सब चीज़ों के यथार्थ रूप को प्रकट करता है, जो माया अंधकार को विनष्ट करता है, और घास के तिनके से लेकर ब्रह्मा तक सब चीज़ों में आत्मा का स्वरूप दिखता है, वह वैराग्य, हे शर्मन्! अपने कल्याण के लिए तुम्हें प्राप्त हो।
जिस मनुष्य को परमात्मा ने ही मार्ग नहीं दिखलाया, बुद्धि (तर्क-वितर्क) के प्रयोग मात्र से उस पर कोई रहस्य नहीं खुलेगा।
ईश्वर की वाणी को बाँधने के अनेक संबंध हैं, उनमें से अपने मन के मुताबिक किसी एक संबंध को स्थिर कर लेना होगा।
जो तुम्हारे भीतर भी है और बाहर भी, जो सभी हाथों से काम करता है और सभी पैरों से चलता हैं, जिसका बाह्य शरीर तुम हो, उसी की उपासना करो और अन्य सब मूर्तियाँ तोड़ दो।
भक्ति के दो विभाग हैं। एक वैधी भक्ति, जो विधिमयी या अनुष्ठानात्मक होती है और दूसरी मुख्य भक्ति या परा भक्ति।
हृदय में निर्गुण ब्रह्म का ध्यान, नेत्रों के सामने सगुण रूप की सुंदर झाँकी और जीभ से सुंदर राम नाम का जप करना। यह ऐसा है मानो सोने की सुंदर डिबिया में मनोहर रत्न सुशोभित हो।
मनुष्य जीवन, जन्म और मृत्यु का एक अनंत चक्र है और उसका साथ यह है कि हम हरि के प्रति समर्पित हो सकें। इस समर्पण के बिना जीवन का अर्थ नहीं है।
धूमधाम से क्या प्रयोजन? जिनकी हम पूजा करते हैं, उन्हें तो हृदय में स्मरण करना ही पर्याप्त है। जिस पूजा में भक्तिचंदन और प्रेमकुसुम का उपयोग किया जाए, वही पूजा जगत् में सर्वश्रेष्ठ है। आडंबर और भक्ति का क्या साथ?
गोस्वामी जी की राम-भक्ति वह दिव्य वृत्ति है जिससे जीवन में शक्ति, सरसता, प्रफुल्लता, पवित्रता, सब कुछ प्राप्त हो सकती है।
सत्, चित् और आनंद-ब्रह्म के इन तीन स्वरूपों में से काव्य और भक्तिमार्ग 'आनंद' स्वरूप को लेकर चले। विचार करने पर लोक में इस आनंद की दो अवस्थाएँ पाई जाएँगी—साधनावस्था और सिद्धावस्था।
जब ज्ञान से आलोकित तथा कर्म के द्वारा नियंत्रित और भीमशक्ति प्राप्त प्रबल स्वभाव परमात्मा के प्रति प्रेम एवं आराधना-भाव में उन्नत होता है, तब वही भक्ति टिक पाती है तथा आत्मा को परमात्मा से सतत संबद्ध बनाए रखती है।
निरंतर उपासना का तात्पर्य है— निरंतर भजन। अर्थात् नामजप, चिंतन, ध्यान, सेवा-पूजा, भगवदाज्ञा-पालन यहाँ तक कि संपूर्ण क्रिया मात्र ही भगवान की उपासना है।
भक्ति और प्रेम से मनुष्य निःस्वार्थी बन सकता है। मनुष्य के मन में जब किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा बढ़ती है तब उसी अनुपात में स्वार्थपरता घट जाती है।
मुझमें न भगवान् का प्रेम है, न श्रवणादि भक्ति है, न वैष्णवों का योग है, न ज्ञान है, न शुभ कर्म है, और कितने आश्चर्य की बात है कि उत्तम गति भी नहीं है, फिर भी हे भगवान्! हीन अर्थ को भी उत्तम बना देने वाले आपके विषय में आबद्धमूला मेरी आशा ही मुझको प्रयत्नशील बनाए रहती है।
जितनी शक्ति हममें आध्यात्मिक आदर्शों पर चलने से आती है, उतनी और किसी से नहीं।
आज के समाज में प्रतिभा तो बहुत है, परंतु श्रद्धा नहीं है। ज्ञान तो है परंतु व्यावहारिक बुद्धि नहीं है। आडंबरपूर्ण सभ्यता तो है, परंतु प्रेम व सहानुभूति नहीं है।
राज-योग धर्म का विज्ञान है, समस्त पूजा-अर्चना, प्रार्थनाओं, अनुष्ठानों और चमत्कारों का आधार है।
आंतरिक और बाह्य शुद्धि, संतोष, तपस्या, अध्ययन और ईश्वर की उपासना ही नियम हैं।
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गोस्वामी जी के भक्ति-क्षेत्र में शील, शक्ति और सौंदर्य तीनों की प्रतिष्ठा होने के कारण मनुष्य की सम्पूर्ण भावात्मिका प्रकृति के परिष्कार और प्रसार के लिए मैदान पड़ा हुआ है।
मैं गाय की भक्ति और पूजा में किसी से पीछे नहीं हूँ; लेकिन वह भक्ति और श्रद्धा, क़ानून के ज़रिए किसी पर लादी नहीं जा सकती।
हे जगत्पति! मुझे न धन की कामना है, न जन की,न सुंदरी की और न कविता की। हे प्रभु! मेरी कामना तो यह है कि जन्म-जन्म में आपकी अहैतुकी भक्ति करता रहूँ।
जो ईश्वर को अपने पास समझता है, वह कभी नहीं हारता।
जिसमें न पूर्वजन्म घटित होता है न परजन्म, न मृत्यु न आवागमन। जिसमें हम सदा एक होकर रहे हैं, और रहेंगे—उसी ईश्वर की उपासना करो और अन्य सब मूर्तियाँ तोड़ दो।
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