भक्ति पर दोहे

भक्ति विषयक काव्य-रूपों

का संकलन।

तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझ मैं रही हूँ।

वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तूँ

जीवात्मा कह रही है कि ‘तू है’ ‘तू है’ कहते−कहते मेरा अहंकार समाप्त हो गया। इस तरह भगवान पर न्यौछावर होते−होते मैं पूर्णतया समर्पित हो गई। अब तो जिधर देखती हूँ उधर तू ही दिखाई देता है।

कबीर

मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा।

तेरा तुझकौं सौंपता, क्या लागै है मेरा॥

मेरे पास अपना कुछ भी नहीं है। मेरा यश, मेरी धन-संपत्ति, मेरी शारीरिक-मानसिक शक्ति, सब कुछ तुम्हारी ही है। जब मेरा कुछ भी नहीं है तो उसके प्रति ममता कैसी? तेरी दी हुई वस्तुओं को तुम्हें समर्पित करते हुए मेरी क्या हानि है? इसमें मेरा अपना लगता ही क्या है?

कबीर

हिंदू पूजइ देहरा मुसलमान मसीति।

रैदास पूजइ उस राम कूं, जिह निरंतर प्रीति॥

हिंदू मंदिरों में पूजा करने के लिए जाते हैं और मुसलमान ख़ुदा की इबादत करने के लिए मस्जिदों में जाते हैं। दोनों ही अज्ञानी हैं। दोनों को ही ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम नहीं है। रैदास कहते हैं कि मैं जिस राम की आराधना करता हूँ, उसके प्रति मेरी सच्ची प्रीति है।

रैदास

‘तुलसी’ काया खेत है, मनसा भयौ किसान।

पाप-पुन्य दोउ बीज हैं, बुवै सो लुनै निदान॥

गोस्वामी जी कहते हैं कि शरीर मानो खेत है, मन मानो किसान है। जिसमें यह किसान पाप और पुण्य रूपी दो प्रकार के बीजों को बोता है। जैसे बीज बोएगा वैसे ही इसे अंत में फल काटने को मिलेंगे। भाव यह है कि यदि मनुष्य शुभ कर्म करेगा तो उसे शुभ फल मिलेंगे और यदि पाप कर्म करेगा तो उसका फल भी बुरा ही मिलेगा।

तुलसीदास

ख़ुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग।

तन मेरो मन पीउ को, दोउ भए एक रंग॥

ख़ुसरो कहते हैं कि उसके सौभाग्य की रात्रि बहुत अच्छी तरह से बीत गई, उसमें परमात्मा प्रियतम के साथ जीवात्मा की पूर्ण आनंद की स्थिति रही। वह आनंद की अद्वैतमयी स्थिति ऐसी थी कि तन तो जीवात्मा का था और मन प्रियतम का था, परंतु सौभाग्य की रात्रि में दोनों मिलकर एक हो गए, अर्थात दोनों में कोई भेद नहीं रहा और द्वैत की स्थिति नहीं रही।

अमीर ख़ुसरो

प्रेम दिवाने जो भये, मन भयो चकना चूर।

छके रहे घूमत रहैं, सहजो देखि हज़ूर॥

सहजोबाई कहती हैं कि जो व्यक्ति ईश्वरीय-प्रेम के दीवाने हो जाते हैं, उनके मन की सांसारिक वासनाएँ-कामनाएँ एकदम चूर-चूर हो जाती हैं। ऐसे लोग सदा आनंद से तृप्त रहते हैं तथा संसार में घूमते हुए परमात्मा का साक्षात्कार कर लेते हैं।

सहजोबाई

राम नाम अवलंब बिनु, परमारथ की आस।

बरषत वारिद-बूँद गहि, चाहत चढ़न अकास॥

राम-नाम का आश्रय लिए बिना जो लोग मोक्ष की आशा करते हैं अथवा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों परमार्थों को प्राप्त करना चाहते हैं वे मानो बरसते हुए बादलों की बूँदों को पकड़ कर आकाश में चढ़ जाना चाहते हैं। भाव यह है कि जिस प्रकार पानी की बूँदों को पकड़ कर कोई भी आकाश में नहीं चढ़ सकता वैसे ही राम नाम के बिना कोई भी परमार्थ को प्राप्त नहीं कर सकता।

तुलसीदास

प्रेम लटक दुर्लभ महा, पावै गुरु के ध्यान।

अजपा सुमिरण कहत हूं, उपजै केवल ज्ञान॥

सहजो कहती हैं कि ईश्वरीय प्रेम की अनुभूति अत्यन्त दुर्लभ है। वह सद्गुरु के ध्यान से ही मिलती है। इसलिए स्थिर मन से ईश्वर एवं गुरु का स्मरण-ध्यान करना चाहिए, क्योंकि उसी से ईश्वरीय ज्ञान की साक्षात् अनुभूति हो पाती है।

सहजोबाई

मोहन लखि जो बढ़त सुख, सो कछु कहत बनै न।

नैनन कै रसना नहीं, रसना कै नहिं नैन॥

श्रीकृष्ण को देखकर जैसा दिव्य आनंद प्राप्त होता है, उस आनंद का कोई वर्णन नहीं कर सकता, क्योंकि जो आँखें देखती हैं, उनके तो कोई जीभ नहीं है जो वर्णन कर सकें, और जो जीभ वर्णन कर सकती है उसके आँखें नहीं है। बिना देखे वह बेचारी जीभ उसका क्या वर्णन कर सकती है!

रसनिधि

‘तुलसी’ सब छल छाँड़िकै, कीजै राम-सनेह।

अंतर पति सों है कहा, जिन देखी सब देह॥

गोस्वामी जी कहते हैं कि सब छल-कपटों को छोड़ कर भगवान् की सच्चे हृदय से भक्ति करो। उस पति से भला क्या भेदभाव है जिसने सारे शरीर को देखा हुआ है। भाव यह कि जैसे पति अपनी पत्नी के सारे शरीर के रहस्यों को जानता है वैसे ही प्रभु सारे जीवों के सब कर्मों को जानता है।

तुलसीदास

प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरूँ, प्रेमी मिलै कोइ।

प्रेमी कूँ प्रेमी मिलै तब, सब विष अमृत होइ॥

परमात्मा के प्रेमी को मैं खोजता घूम रहा हूँ परंतु कोई भी प्रेमी नहीं मिलता है। यदि ईश्वर-प्रेमी को दूसरा ईश्वर-प्रेमी मिल जाता है तो विषय-वासना रूपी विष अमृत में परिणत हो जाता है।

कबीर

तुलसी ममता राम सों, समता सब संसार।

राग रोष दोष दुख, दास भए भव पार॥

तुलसी कहते हैं कि जिनकी श्री राम में ममता और सब संसार में समता है, जिनका किसी के प्रति राग, द्वेष, दोष और दुःख का भाव नहीं है, श्री राम के ऐसे भक्त भव सागर से पार हो चुके हैं।

तुलसीदास

तुलसी जौं पै राम सों, नाहिन सहज सनेह।

मूंड़ मुड़ायो बादिहीं, भाँड़ भयो तजि गेह॥

तुलसी कहते हैं कि यदि श्री रामचंद्र जी से स्वाभाविक प्रेम नहीं है तो फिर वृथा ही मूंड मुंडाया, साधु हुए और घर छोडकर भाँड़ बने (वैराग्य का स्वांग भरा)।

तुलसीदास

मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ।

जा तन की झाँई परैं, स्यामु हरित-दुति होइ॥

इस दोहे के तीन अलग-अलग अर्थ बताए गए हैं।

बिहारी

अड़सठ तीरथ गुरु चरण, परवी होत अखंड।

सहजो ऐसो धामना, सकल अंड ब्रह्मंड॥

सद्गुरु के चरणों में सारे अड़सठ पवित्र तीर्थ रहते हैं, अर्थात उनके चरण अड़सठ तीर्थों के समान पवित्र एवं पूज्य है। उनका पुण्यफल पवित्रतम है। इस समस्त संसार में ऐसा कोई धाम या तीर्थ नहीं है जो सद्गुरु के चरणों में नहीं है।

सहजोबाई

दंपति रस रसना दसन, परिजन बदन सुगेह।

तुलसी हर हित बरन सिसु, संपति सहज सनेह॥

तुलसी कहते हैं कि रस और रसना पति-पत्नी है, दाँत कुटुंबी हैं, मुख सुंदर घर है, श्री महादेव जी के प्यारे 'र' और 'म' ये दोनों अक्षर दो मनोहर बालक हैं और सहज स्नेह ही संपत्ति हैं।

तुलसीदास

अमर बेलि बिनु मूल की, प्रतिपालत है ताहि।

रहिमन ऐसे प्रभुहिं तजि, खोजत फिरिए काहि॥

अमरबेल की जड़ नहीं होती, वह बिना जड़ के फलती-फूलती है। प्रभु बिना जड़ वाली उस लता का पालन-पोषण करते हैं। ऐसे प्रभु को छोड़कर अपनी रक्षा के लिए किसी और को खोजने की क्या आवश्यकता है! उस पर ही विश्वास रखना चाहिए।

रहीम

कोऊ कोटिक संग्रहौ, कोऊ लाख हजार।

मो संपति जदुपति सदा, बिपति-बिदारनहार॥

कोई चाहे करोड़ों की संपत्ति एकत्र कर ले, चाहे कोई लाख हजार अर्थात् दस करोड़ की संपदा प्राप्त कर ले। मुझे उससे और उसकी संपदा से कुछ भी लेना-देना नहीं है। कारण यह है कि मेरी असली संपत्ति तो यदुवंशी कृष्ण हैं, जो सदा ही विपत्तियों को विदीर्ण करने वाले हैं।

बिहारी

कब कौ टेरतु दीन रट, होत स्याम सहाइ।

तुमहूँ लागी जगत-गुरु, जग-नाइक, जग-बाइ॥

हे भगवान, मैं आपको कब से कातर स्वर में पुकार रहा हूँ, किंतु आप मेरे सहायक नहीं हो रहे हैं। हे संसार के गुरु, हे संसार के नायक, क्या मैं यह समझ लूँ कि आपको भी इस संसार की हवा लग गई है?

बिहारी

लोग मगन सब जोग हीं, जोग जायँ बिनु छेम।

त्यों तुलसी के भावगत, राम प्रेम बिनु नेम॥

लोग सब योग में ही (अप्राप्त वस्तु के प्राप्त करने के काम में ही) लगे हैं, परंतु क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा) का उपाय किए बिना योग व्यर्थ है। इसी प्रकार तुलसीदास के विचार से श्रीरामजी के प्रेम बिना सभी नियम व्यर्थ हैं।

तुलसीदास
  • संबंधित विषय : योग

प्रतिपालक सेवक सकल, खलनि दलमलत डाँटि।

शंकर तुम सम साँकरैं, सबल साँकरैं काटि॥

सब सेवकों का पालन करने वाले और दुष्टों का दमन करने वाले—नष्ट-भ्रष्ट कर देने वाले—हे भगवान् शंकर! आपके समान दु:खों या कष्टों की मज़बूत शृंखलाओं—ज़ंजीरों को काटने वाला भला मेरे लिए और दूसरा कौन है!

मतिराम
  • संबंधित विषय : शिव

गुरुवचन हिय ले धरो, ज्यों कृपणन के दाम।

भूमिगढ़े माथे दिये, सहजो लहै राम॥

सहजो कहती हैं कि सुगंधित सुंदर फूलों की माला के समान सद्गुरु के वचनों को हदय में धारण करना चाहिए। अतीव विनम्रता रखकर, सहर्ष मन में धारण कर सद्गुरु-वचनों को अपनाने से ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है।

सहजोबाई

जो पै जिय लज्जा नहीं, कहा कहौं सौ बार।

एकहु अंक हरि भजे, रे सठ ‘सूर’ गँवार॥

सूरदास जी कहते हैं कि हे गँवार दुष्ट, अगर तुझे अपने दिल में शर्म नहीं है, तो मैं तुझे सौ बार क्या कहूँ क्योंकि तूने तो एक बार भी भगवान् का भजन नहीं किया।

सूरदास

तुलसी परिहरि हरि हरहि, पाँवर पूजहिं भूत।

अंत फजीहत होहिंगे, गनिका के से पूत॥

तुलसी कहते हैं कि श्री हरि (भगवान् विष्णु) और श्री शंकर जी को छोड़कर जो पामर भूतों की पूजा करते हैं, वेश्या के पुत्रों की तरह उनकी अंत में बड़ी दुर्दशा होगी।

तुलसीदास

राम-नाम-मनि-दीप धरु, जीह देहरी द्वार।

‘तुलसी’ भीतर बाहिरौ, जौ चाहसि उजियार॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि तुम अपने हृदय के अंदर और बाहर दोनों ओर प्रकाश चाहते हो तो राम-नाम रूपी मणि के दीपक को जीभ रूपी देहली के द्वार पर धर लो। दरवाज़े की देहली पर यदि दीपक रख दिया जाए तो उससे घर के बाहर और अंदर दोनों ओर प्रकाश हो जाया करता है। इसी प्रकार जीभ मानो शरीर के अंदर और बाहर दोनों ओर की देहली है। इस जीभ रूपी देहली पर यदि राम-नाम रूपी मणि का दीपक रख दिया जाय तो हृदय के बाहर और अंदर दोनों ओर अवश्य प्रकाश हो ही जाएगा।

तुलसीदास

उहां कबहूँ जाइए, जहाँ हरि का नाम।

दिगंबर के गाँव में, धोबी का क्या काम॥

मलूकदास

जपमाला छापैं तिलक, सरै एकौ कामु।

मन-काँचे नाचै वृथा, साँचै राँचै रामु॥

माला लेकर किसी मंत्र-विशेष का जाप करने से तथा मस्तक एवं शरीर के अन्य अंगों पर तिलक-छापा लगाने से तो एक भी काम पूरा नहीं हो सकता, क्योंकि ये सब तो आडंबर मात्र हैं। कच्चे मन वाला तो व्यर्थ ही में नाचता रहता है, उससे राम प्रसन्न नहीं होते। राम तो सच्चे मन से भक्ति करने वाले व्यक्ति पर ही प्रसन्न होते हैं।

बिहारी

हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन, रसना राम सुनाम।

मनहुँ पुरट संपुट लसत, तुलसी ललित ललाम॥

हृदय में निर्गुण ब्रह्म का ध्यान, नेत्रों के सामने सगुण स्वरूप की सुंदर झांकी और जीभ से सुंदर राम-नाम का जप करना। तुलसी कहते हैं कि यह ऐसा है मानो सोने की सुंदर डिबिया में मनोहर रत्न सुशोभित हो।

तुलसीदास

‘तुलसी’ साथी विपति के, विद्या, विनय, विवेक।

साहस, सुकृत, सुसत्य-व्रत, राम-भरोसो एक॥

गोस्वामी जी कहते हैं कि विद्या, विनय, ज्ञान, उत्साह, पुण्य और सत्य भाषण आदि विपत्ति में साथ देने वाले गुण एक भगवान् राम के भरोसे से ही प्राप्त हो सकते हैं।

तुलसीदास

या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोइ।

ज्यौं-ज्यौं बूड़ै स्याम रँग, त्यौं-त्यौं उज्जलु होई॥

मनुष्य के अनुरागी हृदय की वास्तविक गति और स्थिति को कोई भी नहीं समझ सकता है। जैसे-जैसे मन कृष्ण-भक्ति के रंग में डूबता जाता है, वैसे-वैसे वह अधिक उज्ज्वल से उज्ज्वलतर होता जाता है।

बिहारी

कबीर कुत्ता राम का, मुतिया मेरा नाऊँ।

गलै राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाऊँ॥

कबीर कहते हैं कि मैं तो राम का कुत्ता हूँ, और नाम मेरा मुतिया है। मेरे गले में राम की ज़ंजीर पड़ी हुई है, मैं उधर ही चला जाता हूँ जिधर वह ले जाता है। प्रेम के ऐसे बंधन में मौज-ही-मौज है।

कबीर

जो तेरे घट प्रेम है, तो कहि-कहि सुनाव।

अंतरजामी जानि है, अंतरगत का भाव॥

मलूकदास

आसिक मासूक ह्वै गया, इसक कहावै सोइ।

दादू उस मासूक का, अलह आसिक होइ॥

जब प्रेमी और प्रेमिका (प्रेम-पात्र) एक रूप हो जाते हैं, तो वह सच्चा इश्क़ कहलाता है। इस अद्वैत की स्थिति में स्वयं ईश्वर उसके प्रेमी और विरहिणी प्रेमिका (प्रेम-पात्र) बन जाते हैं।

दादू दयाल

भजन भलो भगवान को, और भजन सब धंध।

तन सरवर मन हँस है, केसो पूरन चँद॥

संत केशवदास

घर दीन्हे घर जात है, घर छोड़े घर जाय।

‘तुलसी’ घर बन बीच रहू, राम प्रेम-पुर छाय॥

यदि मनुष्य एक स्थान पर घर करके बैठ जाय तो वह वहाँ की माया-ममता में फँसकर उस प्रभु के घर से विमुख हो जाता है। इसके विपरीत यदि मनुष्य घर छोड़ देता है तो उसका घर बिगड़ जाता है, इसलिए कवि का कथन है कि भगवान् राम के प्रेम का नगर बना कर घर और बन दोनों के बीच समान रूप से रहो, पर आसक्ति किसी में रखो।

तुलसीदास

राम-राम के नाम को, जहाँ नहीं लवलेस।

पानी तहाँ पीजिए, परिहरिए सो देस॥

मलूकदास

बिनु विश्वास भगति नहीं, तेही बिनु द्रवहिं राम।

राम-कृपा बिनु सपनेहुँ, जीव लहि विश्राम॥

भगवान् में सच्चे विश्वास के बिना मनुष्य को भगवद्भक्ति प्राप्त नहीं हो सकती और बिना भक्ति के भगवान् कृपा नहीं कर सकते। जब तक मनुष्य पर भगवान् की कृपा नहीं होती तब तक मनुष्य स्वप्न में भी सुख-शांति नहीं पा सकता। अत: मनुष्य को भगवान् का भजन करते रहना चाहिए ताकि भगवान् के प्रसन्न हो जाने पर भक्त को सब सुख-संपत्ति अपने आप प्राप्त हो जाय।

तुलसीदास

इड़ा-गंग, पिंगला-जमुन, सुखमन-सरसुति-संग।

मिलत उठति बहु अरथमय, अनुपम सबद-तरंग॥

दुलारेलाल भार्गव

उठ भाग्यो वाराणसी, न्हायो गंग हजार।

पीपा वे जन उत्तम घणा, जिण राम कयो इकबार॥

संत पीपा

सुख सागर नागर नवल, कमल बदन द्युतिमैन

करुणा कर वरुणादिपति, शरणागत सुख दैन॥

हृदयराम

होफाँ ल्यो हरनांव की, अमी अमल का दौर।

साफी कर गुरुग्यान की, पियोज आठूँ प्होर॥

लालनाथ

सब कोउ साहेब बंदते, हिंदू मुसलमान।

साहेब तिनको बंदता, जिसका ठौर इमान॥

मलूकदास

हम जानत तीरथ बड़े, तीरथ हरि की आस।

जिनके हिरदे हरि बसै, कोटि तिरथ तिन पास॥

मलूकदास

या अनुरागी चित्त की गति समुझै नहिं कोई।

ज्यौं ज्यौं बूड़ै स्याम रँग, त्यौं त्यौं उज्जलु होई॥

मनुष्य के अनुरागी हृदय की वास्तविक गति और स्थिति को कोई भी नहीं समझ सकता है। जैसे-जैसे मन कृष्ण-भक्ति के रंग में डूबता जाता है, वैसे-वैसे वह अधिक उज्ज्वल से उज्ज्वलतर होता जाता है। यानी जैसे-जैसे व्यक्ति भक्ति के रंग में डूबता है वैसे-वैसे वह अपने समस्त दुर्गुणों से दूर होता जाता है।

बिहारी

जो पग धरत सो दृढ़ धरत, पग पाछे नहिं देत।

अहंकार कूँ मार करि, राम रूप जस लेत॥

दयाबाई

जनम-जनम जिनके सदा, हम चक्कर निसि-भोर।

त्रिभुवन-पोषन सुधाकर, ठाकुर जुगल-किशोर॥

श्रीभट्ट

जहाँ-जहाँ बच्छा फिरै, तहाँ-तहाँ फिरे गाय।

कहैं मलूक जहाँ संत जन, तहाँ रमैया जाय॥

मलूकदास

कायर कँपै देख करि, साधू को संग्राम।

सीस उतारै भुइँ धरै, जब पावै निज ठाम॥

दयाबाई

सुंदर बिरहनि अति दुखी, पीव मिलन की चाह।

निस दिन बैठी अनमनी, नैननि नीर प्रबाह॥

सुंदरदास

सगुण मीठौ खांड सौ, निरगुण कड़वौ नीम।

पीपा गुरु जो परसदे, निरभ्रम होकर जीम॥

संत पीपा
बोलिए