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कामकला पर उद्धरण

भारतीय चिंतन-परंपरा

में संस्कृति का मूलाधार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—पुरुषार्थचतुष्टय है। इनमें काम को जीवन की परिधि में केवल विषय-भोग ही नहीं, बल्कि अन्य जीवनोपयोगी ज्ञान की तरह मानव-अस्तित्व का एक मूर्धन्य और सृजनात्मक हेतु माना गया है। आचार्य वात्स्यायन ने ‘कामसूत्रम्’ में उपायभूत चौंसठ कलाओं का सुचिंतित एवं व्यवस्थित विवेचन प्रस्तुत किया है। ‘कामकला’ के अंतर्गत मानव जीवन से संबद्ध विविध प्रसंगों, व्यवहारों और क्रियाकलापों का वर्णन तथा उनकी परंपरा समाहित है।

अन्य शास्त्रों के ज्ञान से रहित; किंतु चतुष्षष्टि कला से अलंकृत कामकला का ज्ञाता पुरुष, नर-नारियों की कला-विषयक गोष्ठी में अग्रगण्य होकर सम्मानित होता है।

वात्स्यायन

जैसे सुअर किसी वस्तु को चबा ले, वैसे ही नायक नायिका के स्तनों के एक भाग को चबा लें, फिर दूसरी जगह पर दांत गड़ाए, फिर तीसरी जगह। इस तरह एक साथ लगे हुए लंबे-लंबे, ताम्रवर्ण के दंतक्षत के निशान पंक्तिबद्ध रूप में बने हों, तो ऐसा दंतक्षत 'वराहचर्वितक' कहलाता है।

वात्स्यायन

जब नायक हृदय की प्यारी अत्यंत प्रिय प्रेमिका को मन में रखकर, किसी दूसरी नायिका के साथ आरंभ से लेकर रतावसान तक; संभोग का सभी व्यवहार करता है, उसी प्रकार नायिका भी अपने प्राणप्रिय, अभीष्ट प्रेमी को मन में ध्यान कर; दूसरे नायक के साथ यथोचित संभोग-व्यवहार करती हैं, तो उसे 'व्यवहित राग' कहते हैं।

वात्स्यायन

जब नायक-नायिका परस्पर एक-दूसरे के अधरों का कसकर चुम्बन करते हैं, तो 'अवपीड़ितक' चुम्बन कहलाता है।

वात्स्यायन

मिलने आने वाली प्रेमिका के वस्त्र; यदि वर्षा के कारण भीग गए हों और वह शृंगार-भ्रष्ट हो गई हो, तो नायक का कर्तव्य है कि वह ख़ुद ही प्रेमिका के वस्त्र बदल, उसका पुनः शृंगार करे।

वात्स्यायन

परदेश जाते समय नायक, नायिका के स्तनों और जंघाओं पर स्मृतिस्वरूप जो तीन-चार रेखाएँ खींच देता है, उसे 'स्मारणीयक' नखक्षत कहते हैं।

वात्स्यायन

चुम्बन की बाज़ी में यदि स्त्री हार जाए; तो वह सिसकती हुई हाथ को इधर-उधर कंपित करे, नायक को ठेलकर दूर कर दे, दाँतों से काटे और करवट बदल ले। यदि नायक ज़बरदस्ती अपनी ओर करना चाहे, तो उससे विवाद करे और कहे कि फिर से बाज़ी लगा लो और उसमें भी यदि हार जाए, तो दुगुना हाथ-पैर पटके और रोने लगे। इस प्रकार के चुम्बन-कलह से रागोद्दीपन होता है।

वात्स्यायन

नायक के साथ संभोग की कामना करने वाली नायिका के स्तनों के अग्रभाग अर्थात् कुचाग्रों की ओर, पाँचों नखों को मिलाकर जो रेखा खींची जाती है—उसे 'शशप्लुत' नामक नखक्षत कहते हैं।

वात्स्यायन

चुम्बन की बाज़ी में नायक के विश्वास के साथ असावधान हो जाने पर, मौक़ा पाकर नायिका नायक के अधर को पकड़कर, अपने दाँतों के अंदर दबोच कर अपनी जीत पर हँसे, ज़ोर से चिल्लाए, धमकाए, ताना मारे, व्यंग्य कसे और नाचने लगे तथा भौहों को नचाती, चंचल नेत्रों से हँसती हुई, मुख से बार-बार, तरह-तरह के व्यंग्य वचन बोले। इस प्रकार के प्रणय-कलह से कामेच्छा जागृत होती है और अनुराग में वृद्धि होती है।

वात्स्यायन

गोष्ठियों में लोकप्रचलित सरल भाषा में काव्य, कला-विषयक चर्चा करता हुआ नागरक, लोक में सर्वमान्य होता है।

वात्स्यायन

नायक-नायिका दोनों में जो पहले अधर को पकड़ ले, उसी की जीत होती है।

वात्स्यायन

अपने प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए, संभोगेच्छा प्रकट करने के लिए दर्पण में, दीवार में अथवा जल में प्रतिबिम्बित नायक या नायिका की छाया का चुम्बन करना 'छाया-चुम्बन' कहलाता है।

वात्स्यायन

नायक के प्रति संकेतों के द्वारा; अपने प्रेमभाव को प्रकट करती हुई संवाहिका नायिका का, चुम्बन की इच्छा रखने वाली अकामा नायिका के समान भाव प्रदर्शित करती हुई, नींद के बहाने नायक के जाँघों पर अपना मुख रखना और जाँघों का चुम्बन करना प्रेमवर्द्धक होता है।

वात्स्यायन

यदि कठोर शब्दों या अपशब्दों का प्रयोग करने के बावजूद भी; नायिका नायक से प्रेम संबंध जोड़ना चाहती है, तो उसे पुनः वश में करने का प्रयत्न करना चाहिए।

वात्स्यायन

काम-भावना को प्रकट करने के लिए जैसा पुरुष करे, वैसा ही स्त्री को भी करना चाहिए। जिस प्रकार नायक नायिका पर ताड़ना या आघात करे, उसी प्रकार नायिका भी पुरुष को ताड़ित करे। जिस प्रकार नायक जिस अंग से; नायिका के जिस अंग का चुम्बन करे, उसी प्रकार नायिका भी उसी अंग से पुरुष के उसी अंग का चुम्बन करे।

वात्स्यायन

नखक्षत से उच्छिष्ट स्तनों वाली युवति नायिका को दूर से ही देखकर, परपुरुष के मन में उसके प्रति सम्मान और प्रेम-भावना अर्थात् संभोग की कामना उत्पन्न हो जाती है।

वात्स्यायन

अपने गुप्त अंगों पर अंकित नखक्षतों को देखकर; नायिका का प्रेम संबंध बहुत दिनों से छूट जाने पर भी कोमल प्रीति नवीन-सी हो जाती है।

वात्स्यायन

नायिका को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए, नायक नायिका की विश्वासपात्र सहेलियों तथा धाय की लड़की से मेल-जोल बढ़ाए। क्योंकि वे नायिका के मनोभावों को अच्छी तरह समझकर, उससे नायक के गुणों की प्रशंसा कर, नायक की ओर उसे आकृष्ट कर सकती हैं।

वात्स्यायन

जब नायक को यह विश्वास हो जाए कि मनोभिलाषित कन्या मुझे चाहती है, तो वह उस कन्या की प्राप्ति के लिए उपाए करे।

वात्स्यायन

नायक के धन से सारे शरीर पर अलंकार योग अर्थात् ख़ुद के लिए आभूषण आदि बनवाना, भवन को कलात्मक ढंग से सजाना, क़ीमती बरतनों को ख़रीदवाना, परिचारकों द्वारा घर को स्वच्छ रखना—ये रूपाजीवा नायिका के विशेष लाभ हैं।

वात्स्यायन

जब नायक-नायिका परस्पर एक-दूसरे के पीछे की ओर बैठकर; एक-दूसरे की ठुड्डी पकड़कर थोड़ा पीछे की ओर घुमाकर चुम्बन करते हैं, तो उसे 'उद्भ्रांत' चुम्बन कहते हैं।

वात्स्यायन

नायक के अन्यमनस्क रहने पर, कलह की स्थिति में होने पर अथवा दूसरी ओर ध्यान लगाए हुए हो, अथवा सोने की स्थिति में होने पर, नायक को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अथवा निद्रा-भंग करने के लिए नायिका द्वारा किया गया चुम्बन 'चलितक' चुम्बन कहलाता है।

वात्स्यायन

रात्रि में देर से घर लौटे हुए नायक के द्वारा, शय्या पर सोती हुई नायिका का चुम्बन—'प्रातिबोधिक' चुम्बन कहलाता है।

वात्स्यायन

नायक और नायिका के राग (प्रेम) को बढ़ाने वाला, कोई और दूसरा सशक्त साधन नहीं है—जितना नखक्षत और दंतक्षत से उत्पन्न कामोत्तेजना।

वात्स्यायन

परस्पर प्रीति को उत्पन्न करने वाले अपने अनुकूल आलिंगनादि भावों के अनुसरण से, क्षणभर में नाराज़ होकर मुख फेर लेने से और क्षणभर में ही, परस्पर प्रेम भरी निगाहों से देखने से रति की इच्छा बढ़ती है।

वात्स्यायन

जब दीवार या खंभे को दोनों ओर से पकड़ कर; नायक-नायिका परस्पर एक-दूसरे को ज़ोर से दबाएँ, तो वह 'पीड़ितक' आलिंगन कहलाता है।

वात्स्यायन

शाल वृक्ष पर लिपटती हुई लता के समान, नायिका जब नायक का मुख चूमने के लिए उसके मुख को थोड़ा झुकाए, फिर उठाकर सी-सी करती हुई; उससे लिपटकर उसके मुख-सौंदर्य को देखे, तो यह आलिंगन 'लतावेष्टितक आलिंगन' कहलाता है।

वात्स्यायन

यदि नायिका नायक से बार-बार मिल चुकी हो, किंतु संभोग से बचना चाहती हो—उसे नीरस हृदय वाली समझना चाहिए। उससे प्रेम-संबंध विच्छेद कर देना चाहिए।

वात्स्यायन

प्रणय-कलह के समय नायक को युक्त्तिपूर्वक प्यार भरी मीठी-मीठी बातों से, अथवा नायिका के पैरों पर गिरकर और अनुनय-विनय के द्वारा, उसे अपने अनुकूल करके प्रसन्नचित होकर शय्या पर बिठाना चाहिए।

वात्स्यायन

जब नायक नायिका के दोनों होंठों को अपने होंठों में समेटकर चुम्बन करे, तब नायिका को भी प्रत्युत्तर में नायक के दोनों होंठों को अपने होंठों से पकड़कर चुम्बन करना चाहिए। अगर नायक के मुख पर मूँछें हों तो चुम्बन करना चाहिए, यदि नायक के मुख पर मूँछें हों, तो नायिका को चुम्बन नहीं करना चाहिए। इस प्रकार के चुम्बन को ‘सम्पुटक’ कहा जाता है।

वात्स्यायन

जो कोई भी राग को बढ़ाने वाली अशास्त्रीय कामोद्दीपक विधियाँ हैं; जिनका शास्त्रों में वर्णन नहीं है, साम्प्रयोगिकों को उनका भी यथावसर आदर के साथ प्रयोग करना चाहिए।

वात्स्यायन

रात्रि में नाटक देखने के समय, अथवा किसी सामाजिक उत्सव में पास में आई हुई नायिका के हाथ-पैर की उँगलियों का चुम्बन करना—'अँगुलि-चुम्बन' कहलाता है।

वात्स्यायन

स्त्रियों की आकृति और शरीर के लक्षणों को देखकर, उनकी चेष्टाओं तथा आकृति के द्वारा स्त्रियों की प्रवृत्ति को समझना चाहिए।

वात्स्यायन

नायक के शरीर के अंगो पर नखों से अंकित नखचिंहों को देखकर, स्थिर चित्त वाली सदाचारिणी नायिका का भी चित्त प्राय: चंचल हो जाता है।

वात्स्यायन

रतिक्रीड़ा के अवसान में भी माल्यादि धारण, तांबूल-भक्षण, मद्यपान, पानकरस सेवन, चंदनाद्यनुलेप, प्रेमभरी मीठी-मीठी बातें आदि उपचारों से बढ़ी हुई प्रीति, विश्वास युक्त्त चर्चाओं के योग से उत्कृष्ट रति उत्पन्न करती है।

वात्स्यायन

मृगी नायिका प्रचंडवेग पुरुष के साथ, योनि-पीड़ा के भय से सहवास नहीं करती।

वात्स्यायन

चुम्बन, नखक्षत और दंतक्षत के प्रयोग में कोई पौर्वापर्य (अनुक्रम) क्रम नहीं होता। अनुराग की अधिकता से; संभोग के पहले इनका प्रयोग प्रधान रूप से करना चाहिए और प्रहणन एवं सीत्कार का प्रयोग, संभोग-काल में करना चाहिए।

वात्स्यायन

जीवन-व्यापार में मनोरंजन हेतु, पाँच प्रकार की क्रीड़ाओं में नागरक के प्रवृत्त होना चाहिए—घटानिबंध, गोष्ठीसमवाय, समापानक, उद्यानगमन और समस्याक्रीड़ा।

वात्स्यायन

रागावस्था में भी विचित्रता की अपेक्षा रहती है और संभोग क्रिया में इसी विलक्षणता-विचित्रता के कारण, नायक-नायिका में राग (प्रेम) उत्पन्न होता है।

वात्स्यायन

नायक-नायिका अत्यधिक कामांध होकर; किसी प्रकार की हानि की परवाह करके, एक ही पलंग पर नायिका नायक की गोद में बैठकर अथवा एक-दूसरे के आमने-सामने बैठकर; परस्पर एक-दूसरे से इस प्रकार चिपट जाएँ, मानो एक-दूसरे के अंदर समा जाना चाहते हों, तो इस प्रकार के आलिंगन को 'क्षीरजलक' आलिंगन कहते हैं।

वात्स्यायन

पाँचों विनोदों में एक ‘समापानक’ के अंतर्गत यह अपेक्षित है कि नागरक परस्पर एक-दूसरे के घरों में जाकर मदिरापान -गोष्ठियों का ससम्मान आयोजन करें, तथा ‘आपानक-विधि’ के अनुसार वहाँ मधु, मैरेय, सुरा और आसव आदि विविध प्रकार की मदिराओं को, लवणयुक्त, तिक्त, कटु तथा आम्ल रसों से युक्त फल, शाक और अन्य मसालेदार व्यंजन के साथ गणिकाएँ नागरकों को पान कराएँ और स्वयं भी सहभागिता करते हुए उस गोष्ठी को रसपूर्ण बनाएँ।

वात्स्यायन

मध्यम राग वाले नायक-नायिका के मिलन से जो राग उत्पन्न होता है, उसे 'आहार्य' राग कहते है। उस समय नायक को आलिंगनादि चौंसठ कलाओं के यथावसर अनुकूल प्रयोग से, नायिका की कामवासना को जगा-जगाकर राग अर्थात संभोग में प्रवृत्त होना चाहिए।

वात्स्यायन

सोए हुए नायक के मुख को देखती हुई नायिका; जब किसी विशेष अभिप्राय से चुम्बन करती है, तो उसे 'रागदीपन' चुम्बन कहते हैं।

वात्स्यायन

प्रथम बार संभोग के समय चुम्बनादि का प्रयोग नहीं करना चाहिए, किंतु विश्रब्धिका नायिका में अर्थात नायिका में रत की वृद्धि होने पर विकल्प से प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि इस क्रम से राग की वृद्धि होती है। उसके बाद नायिका में राग-वृद्धि हो जाने पर, काम को प्रज्ज्वलित करने के लिए अत्यंत शीघ्रता से, एक-एक करके अथवा एक साथ चुम्बनादि का प्रयोग करना चाहिए।

वात्स्यायन

यदि नायिका नायक के अधर को चूमने लगे, तो नायक को भी नायिका के ऊपरी होंठ को चूमना चाहिए। यह चुम्बन 'उत्तरचुम्बित' कहलाता है।

वात्स्यायन

स्त्री-पुरुष का संभोगसुख, लज्जा और लोकभय से परतंत्र होता है अर्थात् उनमें लोक-लज्जा और लोक-भय होता है, वे स्वतंत्र रूप से संभोग में प्रवृत्त नहीं होते। अतः उसके लिए उपायों की अपेक्षा होती है और उन उपायों का ज्ञान शास्त्र से होता है।

वात्स्यायन

पाँचों उँगलियाँ मिलाकर; नखों से नायिका के कपोल, दोनों स्तन और अधरोष्ठ पर इस प्रकार का नखक्षत करना चाहिए अथवा हलकी चुटकी काटनी चाहिए, जिससे शरीर पर घाव हो, रेखाएँ उभरे और स्पर्शमात्र से शरीर रोमांचित हो जाए तथा चट-चट की आवाज़ हो। इस प्रकार का नखक्षत 'आच्छुरितक' कहलाता है।

वात्स्यायन

ग्रीवा और स्तनों पर नखों से अर्द्धचंद्राकार, टेढ़ी रेखा बनाना 'अर्द्धचंद्रक' नखक्षत कहलाता है।

वात्स्यायन

अपराह्न में तीसरा पहर गोष्ठी-विहार में जाने के लिए उपयुक्त है। नागरक को वहाँ वस्त्रालंकार से सज-धज कर जाना चाहिए।

वात्स्यायन

नायिका को अपने प्रियतम की छाती से लिपट कर, मुख उठाकर गले में बाँहें डाल; 'मणिमाला' तथा अन्य प्रकार के दंतक्षतों का प्रयोग करना चाहिए।

वात्स्यायन