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उपकार पर उद्धरण

अपनी शक्ति के अनुसार उत्तम खाद्य पदार्थ देने, अच्छे बिछौने पर सुलाने, उबटन आदि लगाने, सदा प्रिय बोलने तथा पालन-पोषण करने और सर्वदा स्नेहपूर्ण व्यवहार के द्वारा माता-पिता पुत्र के प्रति जो उपकार करते हैं, उसका बदला सरलता से नहीं चुकाया जा सकता।

वाल्मीकि

छोटे लोग भी पहले के उपकार का ध्यान करके मित्र के आश्रय के लिए आने पर विमुख नहीं होते—फिर ऊँचे लोगों का तो कहना ही क्या।

कालिदास

उपकारों को भूलना मनुष्य का स्वभाव है। अतः यदि हम दूसरों से कृतज्ञता की आशा करेंगे तो हमें व्यर्थ ही सर दर्द मोल लेना पड़ेगा।

डेल कार्नेगी

पुत्र को सभा में अग्रिम स्थान में बैठने योग्य बनाना पिता का सबसे बड़ा उपकार होगा।

तिरुवल्लुवर

विश्वास, उपकार, सुख-दुःख में समान भाव, क्षमा प्रेम—यही सज्जनों की मित्रता है।

अश्वघोष

ज्ञान कहीं भी मिलता हो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। परंतु अपनी ही भाषा और उसी के साहित्य को प्रधानता देना चाहिए, क्योंकि अपना, अपने देश का, अपनी जाति का उपकार और कल्याण अपनी ही भाषा के साहित्य की उन्नति से हो सकता है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी

दूसरा मनुष्य जितना उपकार करे, उससे कई गुना अधिक प्रत्युपकार स्वयं उसके प्रति करना चाहिए।

वेदव्यास

उपकार्य के अभाव में उपकारी सामग्री से क्या लाभ?

भट्टनारायण
  • संबंधित विषय : लाभ

किसी उपकार के प्रतिरूप किया गया उपकार कभी पूर्वकृत उपकार के समान नहीं हो सकता, यह तो उपकृत व्यक्ति की गुण-गरिमा के अनुसार ही होता है।

तिरुवल्लुवर

थोड़ा दोष अतिशय उपकार का नाश नहीं करता।

भारवि

तृणतुल्य भी उपकार क्यों हो, उसके फल को समझने वाले उसे ताड़ के समान मानेंगे।

तिरुवल्लुवर

तुकाराम कहते हैं कि अब मैं उपकार के लिए ही रह गया हूँ।

संत तुकाराम