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विडंबना पर उद्धरण

पाखंडी लोग कितनी आसानी से इस जगत् को धोखे में डाल देते हैं। सभ्यता के प्राथमिक विकास-काल से लेकर भोली-भाली मानव-जाति पर, जाने कितना छल-कपट किया जा चुका है।

स्वामी विवेकानन्द

जहाँ सीधे प्रमाण नहीं मिलते, वहाँ दर्शन हावी हो जाता है।

भगत सिंह

जब इंसान भूखा रहता है, जब मरता रहता है, तब संस्कृति और यहाँ तक कि ईश्वर के बारे में बात करना मूर्खता है।

जवाहरलाल नेहरू

युद्ध के बीच कही गई गीता भी, युद्ध में उपस्थित धर्मसंकट का ही समाधान बताती है। यह भी कहा जा सकता है कि वहाँ भी युद्ध का ‘समर्थन’ है। पर सच पूछें तो गीता धर्म-संकट का उतर, कर्म की धारणा को कर्म के साधारण व्यवहार-निष्ठ धरातल से हटा कर ही देती है—उससे ऊपर आरोहण कर जाती है।

मुकुंद लाठ

यह संसार बेरहम है। इसमें जब हम मोल लिए हुए दासों की तरह रह सकेंगे; तभी लोग हमारे प्रति सहानुभूति दिखाएँगे, अन्यथा नहीं।

स्वामी विवेकानन्द

मानव-सभ्यता में हुआ आज तक का विकास और सारी-की-सारी आधुनिक प्रवृत्तियाँ, सिर्फ़ एक ही संकेत करते हैं—यह आदिम व्यवस्था भविष्य की दुनिया से मेल नहीं खाती और इसका ख़त्म हो जाना अनिवार्य है।

जॉन स्टुअर्ट मिल

सच्चाई यह है कि कोई और रास्ता देख पाने वालों को, ताक़त का क़ानून ही एकमात्र रास्ता नज़र आता है।

जॉन स्टुअर्ट मिल

मरने पर भी सांसारिक बुद्धि दूर नहीं होती।

स्वामी विवेकानन्द

चीज़ों के सही या ग़लत होने के परे एक मैदान है, मैं वहाँ तुमसे मिलूँगा।

रूमी

उत्पीड़ितों की कमज़ोरी का आदर करते हुए; उत्पीड़कों की सत्ता को नरम बनाने का कोई भी प्रयास, प्रायः हमेशा ही एक मिथ्या उदारता के रूप में सामने आता है।

पॉलो फ़्रेरा

यदि वर्तमान मानवजाति का एक बिल्कुल छोटा-सा अंश भी; इस क्षुद्र संकीर्ण और स्वार्थी भाव का त्याग कर सकें, तो कल ही यह संसार स्वर्ग में परिणत हो जाएगा, पर नाना प्रकार के यंत्र तथा बाह्यजगत्-संबंधी भौतिक ज्ञान की उन्नति से यह कभी संभव नहीं हो सकता।

स्वामी विवेकानन्द

हम हर उस चीज़ को 'इंस्टिंक्ट' कहने लगे हैं, जो हम अपने अंदर महसूस करते हैं और जिसके लिए हमें कोई तार्किक आधार नहीं मिलता।

जॉन स्टुअर्ट मिल

धार्मिक उपदेशकों और सत्ताधारियों की मिलीभगत से ही जेलों, फांसियों, कोड़ों और इन सिद्धांतों का निर्माण हुआ है।

भगत सिंह

जो लोग हमारे निकट होते हैं; उन्हीं पर शक्ति-प्रदर्शन का सबसे ज़्यादा आनंद आता है, उन्हीं के साथ हमें ज़िंदगी बितानी होती है, उन्हीं के साथ हमारे हित-अहित जुड़े होते हैं और उन्हीं की स्वतंत्रता हमारी पसंद-नापसंद में दख़लंदाज़ी कर सकती है।

जॉन स्टुअर्ट मिल

आधुनिक काल का ग़रीब, दया का पात्र नहीं समझा जाता; बल्कि उसे कचरे की तरह हटा दिया जाता है। बीसवीं सदी की उपभोक्ता अर्थव्यवस्था में पहली ऐसी संस्कृति की निर्मिति हुई, जिसके लिए भिखारी होना—कुछ नहीं होने का तक़ाज़ा है।

जॉन बर्जर

ज़िंदगी थामे रहने और छोड़ देने का संतुलन है।

रूमी

आदमी के चारों तरफ़ जो अज्ञात शक्ति है, मज़हब ने उसके रहस्य और अचंभे की आदमी को अहमियत जताई है। लेकिन साथ ही उसने सिर्फ़ उस अज्ञात को समझने की कोशिश की, बल्कि सामाजिक प्रयत्न को समझने की कोशिश को रोका भी है। जिज्ञासा और विचार को बढ़ावा देने की जगह उसने प्रकृति के सामने, स्थापित संप्रदाय के सामने, और सारी मौजूदा व्यवस्था के सामने—सिर झुकाने के फ़लसफ़े का प्रचार किया है।

जवाहरलाल नेहरू

आदमी की ज़िंदगी पर विचार और जाँच; बिना किसी स्थाई आत्मा के लिहाज़ के होती है, क्योंकि अगर किसी ऐसी आत्मा की सत्ता है भी, तो वह हमारी समझ से परे है; मन को शरीर का अंग, मानसिक शक्तियों की एक मिलावट समझा जाता था।

जवाहरलाल नेहरू

सांसारिक मोर्चे पर जब देश पराजित हो गया, तो उसके बुद्धिवादी लोग आध्यात्मिक बन गए और औसत लोग रूढ़िवादी हो गए। चोर का ख़तरा होने पर हमने अपने सांस्कृतिक दरवाज़े कसकर बंद कर दिए, बच्चों को बाहर झाँकने से मना किया और दम साधकर बैठ गए। इससे हमारी रक्षा तो हो गई। लेकिन हज़ार साल तक साँस रोके बैठने से हम बदल चुके हैं। हम वे नहीं हैं, जो हम खुले दरवाज़ों के ज़माने में थे। चोर चले गए, लेकिन हमारे दरवाज़े बंद हैं। रोशनी से हमारी आँखें चौंधियाती हैं और खुली हवा में हमें ज़ुकाम होता है।

राजेंद्र माथुर

हम अपनी काल्पनिक सृष्टि से सत्य को ढकने की कोशिश करते हैं और असलियत से अपने को बचाकर, सपनों की दुनिया में विचरने का प्रयत्न करते हैं।

जवाहरलाल नेहरू

बिना विचारे अतिशीघ्रता से काम करने का फल, मरणपर्यंत हृदय को जलाता है और कंटक के समान खटकता है।

भर्तृहरि

भय से बुराई, दुःख और पछतावा होता है।

जवाहरलाल नेहरू

सब मज़हबों के नज़रियों और उपदेशों में इतनी समानता है कि यह देखकर हैरत होती है कि लोग छोटी-छोटी, और ग़ैर-ज़रूरी बातों के बारे में झगड़ा करने की बेवकूफ़ी क्यों करते हैं।

जवाहरलाल नेहरू

हमने आध्यात्मिकता को व्यक्तिगत भक्ति-साधना के बीच आबद्ध कर दिया है, उसके आह्वान से हम मानव-मात्र में ऐक्य स्थापित नहीं कर सके।

रवींद्रनाथ टैगोर

सारे विज्ञापन लोगों की व्यग्रताओं पर टिके होते हैं।

जॉन बर्जर

विपत्ति में अमृत भी विष की तरह हो जाता है।

भर्तृहरि

भारत में जीवन ही मूल्य है, गया-बीता, घिघियाता जीवन ही मूल्य है; लेकिन ज़िंदादिली मूल्य नहीं है, अच्छा जीवन मूल्य नहीं है। मरने से तो गया-बीता जीवन ही अच्छा है, यह हमारा उद्देश्य वाक्य है। क्या कुरुक्षेत्र में कृष्ण ने यही उपदेश दिया था?

राजेंद्र माथुर

उन लोगों को नज़रअंदाज़ करो जो तुम्हें भयभीत और दुखी करते हैं, जो तुम्हें बीमारी और मौत की ओर वापस ले जाते हैं।

रूमी

समाज हमारा हिमाचल की तरह अटल रहा, लेकिन राजा और राज्य समुद्र की लहरों की तरह क्षणभंगुर रहे। ऐसा क्यों हुआ? चक्रवर्ती राजा की अवधारणा होते हुए भी सच्चे चक्रवर्ती यहाँ एक हाथ की उंगलियों पर आसानी से क्यों गिने जा सकते हैं? चीन की तरह एक अखंड देश और अखंड समाज हम यहाँ क्यों नहीं बना सके?

राजेंद्र माथुर

जब हम दुःख से गुज़रते हैं तो हम अपने बिल्कुल शुरुआती बचपन में लौटते हैं, क्योंकि वही वह समय है जब हमने पहली बार ‘पूरी तरह खोने’ का अनुभव करना सीखा था, बल्कि यह समय उससे भी कहीं अधिक था। बचपन वह समय है, जब हम अपनी पूरे जीवन की तुलना में कहीं अधिक ‘पूरी तरह खो देने’ के अनुभवों से गुज़रते हैं।

जॉन बर्जर

एकतंत्रवाद के अंतर्गत योग्य व्यक्तियों की कमी हो जाती है

सुभाष चंद्र बोस

जब भावनाएँ जड़ एवं भ्रष्ट हो जाती हैं, तब पूजा शुरू हो जाती है।

राजेंद्र माथुर

भारत में जब किसी की हमें उपेक्षा करनी होती है, तो हम उसकी पूजा शुरू कर देते हैं।

राजेंद्र माथुर

अपने दुःख, दारिद्रय और अपमान को धर्मनिष्ठा का पुरस्कार कहकर हम आध्यात्मिकता के क्षेत्र को विस्तृत नहीं बना सकते।

रवींद्रनाथ टैगोर

पहिले जो विद्या; पंडितों के चित्त के क्लेश को दूर करने के निमित्त थी, कुछ दिन परे वही विद्या विषयी लोगों के विषयमुख सिद्ध करने के लिए हो गई।

भर्तृहरि

जो आदमी आज अपनी कलाई पर घड़ी पहनता है; वह उन पुराने युगों की कल्पना नहीं कर सकता, जब एक टिक-टिक करता कांटा, चेतावनी की तरह, चाबुक की तरह, हड़बड़ाने वाले यातना-यंत्र की तरह, क़यामत के पैग़ाम की तरह हमें हाँका नहीं करता था। घड़ी के काँटे ने मनुष्य की चेतना को कितना बदला है, यह आज कोई सोचता भी नहीं। लगभग इतना ही बड़ा परिवर्तन राष्ट्र-राज्य की नई अवधारणाओं ने मनुष्य की चेतना में किया है। राष्ट्र हमारी कलाई पर एक घड़ी की तरह बंधा है और वह चाबुक की तरह, चेतावनी की तरह, हड़बड़ाने वाले यातना-यंत्र की तरह हमें हाँक रहा है। पाँच सौ साल पहले यह घड़ी थी ही नहीं और यदि थी तो वह रेत के कण या सूरज की छाया का इस्तेमाल करने वाली अनगढ़ घड़ी थी।

राजेंद्र माथुर

कवित्व के कलंक को मैं स्वीकार करता हूँ, यह कालिमा की पृथ्वी पर उतरनेवाली रात्रि की तरह है। इसके सिरहाने विज्ञान का जगद्विजयी दीप है, लेकिन वह उसके शरीर पर हाथ नहीं उठाता—स्नेह से कहता है, "आहा, स्वप्न देखने दो इसे।"

रवींद्रनाथ टैगोर

विद्वान लोग तो अपनी ईर्ष्या से ही ग्रसित हैं, और धनवान् लोग अपने द्रव्य के गर्व से किसी के गुणों का आदर ही नहीं करते। अन्य जो हैं, वे साधारण अल्पज्ञ हैं—इन कारणों से सुभाषित उत्तम काव्य शरीर ही में जीर्ण होता जाता है।

भर्तृहरि

सेवा ढंग से की जाए, तो वह धंधा भी हो जाती है।

हरिशंकर परसाई

बेचारा आदमी वह होता है; जो समझता है कि मेरे कारण तमाम हलचल हो रही है, पर वास्तव में उनके कारण कोई छिपकली भी कीड़ा नहीं पकड़ रही है। बेचारा आदमी वह होता है, जो समझता है कि मेरे सब दुश्मन हैं, पर सही यह है कि कोई उस पर ध्यान नहीं देता। बेचारा आदमी वह होता है, जो समझता है कि मैं वैचारिक क्रांति कर रहा हूँ और लोग उससे सिर्फ़ मनोरंजन करते हैं। वह आदमी सचमुच बड़ा दयनीय होता है, जो अपने को केंद्र बनाकर सोचता है।

हरिशंकर परसाई