साहित्य-सृजेता को स्वतंत्र होना ही चाहिए, तभी उसका स्वर निर्भय और स्वतंत्र होगा। शासन का पिछलग्गू साहित्य, समाज को पतन की ओर ले जाएगा।
आवश्यकताओं की निर्विरोध और निर्बंध पूर्ति ही मनुष्य जीवन की स्वतंत्रता है।
जो प्रौढ़ और तजुर्बेकार हैं, वे ही स्वराज्य भुगत सकते हैं, न कि बे-लगाम लोग।
नारी की आर्थिक परवशता और उसी स्वतंत्रता को विच्छिन करके देखना असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य है।
जीवन की सबसे बड़ी और पहली आवश्यकता, सामाजिक प्राणियों के स्वतंत्र विकासानुकूल वातावरण की सृष्टि कर देना है।
समाज ने किसी ऐसी स्थिति की कल्पना ही नहीं की, जिसमें स्त्री पुरुष से सहायता बिना माँगे हुए ही जीवन-पथ पर आगे बढ़ सके।
जहाँ तक सामाजिक प्राणी का संबंध है; स्त्री उतनी ही अधिक अधिकार-संपन्न है, जितना पुरुष—चाहे वह अपने अधिकारों का उपयोग करे या न करे।
सभ्य संसार के प्रत्येक स्थान में, किसी-न-किसी समय और किसी-न-किसी रूप में स्वतंत्रता की व्यापकता का बोल-बाला अवश्य हुआ।
किसी स्वार्थपूर्ण इरादे के बिना, इहलोक या परलोक में कोई पुरस्कार पाने की इच्छा के बिना, बिल्कुल अनासक्त भाव से मैंने अपना जीवन आज़ादी के उद्देश्य के लिए अर्पित किया है, क्योंकि मैं ऐसा किए बिना रह नहीं सका।
हम दुनिया में किसी को दुश्मन बनाना नहीं चाहते और न हम किसी के दुश्मन बनना चाहते हैं—यह मेरी व्याख्या का स्वराज्य है।
सत्ता-प्रेम और स्वतंत्रता-प्रेम, एक-दूसरे के परस्पर विरोधी विकल्प हैं। जहाँ सबसे कम स्वतंत्रता होती है, वहाँ सत्ता का संघर्ष उतना ही ज़्यादा प्रबल और क्रूर होता है।
यदि समाज की परिभाषा ऐसा मनुष्य-समूह हो; जो पारस्परिक सहयोगापेक्षी है, तो उस समाज से व्यक्ति का नितांत स्वतंत्र होना—किसी युग में भी संभव नहीं हो सका है।
इच्छा को जहाँ अन्य इच्छा की चाह होती है, वहाँ इच्छा फिर स्वाधीन नहीं रह जाती।
यक़ीनन आधुनिक इतिहास में तो ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती, जिसकी अंग्रेज़ों के सत्ता छोड़ने के काम से तुलना की जा सके।
साहित्य की वेगवती सरिता, नियमों की अवहेलना कर स्वछंदतापूर्वक बहने में ही प्रसन्न रहती है।
अगर स्त्री के पास स्वतंत्र संपत्ति नहीं है, तो 'कमाने की शक्ति' उसकी गरिमा के लिए ज़रूरी है।
स्वतंत्रता का पवित्र आदेश है कि किसी को किसी के ऊपर स्वेच्छाचार करने का अधिकार नहीं, किसी को किसी का अधिकार छीनने का हक़ नहीं।
भोजन और आवास जैसी भौतिक ज़रूरतों के बाद, स्वतंत्रता इंसान की सबसे बड़ी और अहम ज़रूरत है।
स्वाधीन देश ही राष्ट्रों की भूमि है; क्योंकि पुच्छविहीन पशु हों तो हों, परंतु अपना शासन अपने हाथों में न रखने वाले राष्ट्र नहीं होते।
हिंदुस्तान के विभाजन ने बेजाने उसके दो हिस्सों को आपस में लड़ने का न्यौता दिया। दोनों हिस्सों को अलग-अलग स्वराज देना, आज़ादी के इस दान पर धब्बे जैसा मालूम होता है।
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हमारी जिस इच्छा में स्वाधीनता का सबसे विशुद्ध रूप होता है, उसी में अधीनता का भी विशुद्ध रूप होता है।
स्त्रियों को विवाह करना ही चाहिए—यह मिथ्या भ्रम है। उसे भी यावज्जीवन ब्रह्मचर्य पालने का अधिकार है।
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स्वतंत्रता और प्रतियोगिता ख़ुद ही यह तय कर देते हैं कि बेहतर भुजबल वाले व्यक्ति ही इस क्षेत्र में आएँ, और कमज़ोर बाँहों वाले व्यक्ति कोई दूसरा कार्यक्षेत्र चुनें।
अराजकता का इलाज स्वतंत्रता है न कि दासता, वैसे ही जैसे अंधविश्वास का सच्चा इलाज नास्तिकता नहीं, धर्म है।
धर्म का द्वार स्वातंत्र्य का द्वार है। हमारा स्वभाव-धर्म हमें स्वतंत्र करता है और हम स्वतंत्र होकर उस धर्म की साधना करते हैं, जो कर्म का औचित्य है।
प्रत्येक व्यक्ति को कुलीनता और अकुलीनता के भाव को अलग रखकर, अपनी उन्नति का पूरा अवसर मिलना चाहिए। किसी राजा का कुलीन का स्वार्थ, किसी की उन्नति का बाधक न हो।
हम ख़ुद गुलाम होंगे और दूसरों को आजाद करने की बात करेंगे, तो वह संभव नहीं है।
लेखक की स्वतंत्रता तथा कलाकार की स्वतंत्रता; वस्तुतः अभिव्यक्ति के अधिकार की स्वतंत्रता है, किंतु यह स्वतत्रंता समाज-सापेक्ष और समाज-स्थिति-सापेक्ष है।
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यह ज्ञात करा देना ही कि आत्मा प्रकृति से संपूर्ण स्वतंत्र है, प्रकृति का एकमात्र लक्ष्य है।
स्वच्छंद, जीवन-विषयक उपयोगी ज्ञान से युक्त व्यक्ति का उत्तरदायित्व गुरुतर और कार्यक्षेत्र विस्तृततर है, इसे हमें न भूल जाना चाहिए।
वयः प्राप्त पुरुष जितनी स्वतंत्रता का अधिकारी है, उतनी ही स्त्री भी है।
अगर मैं कहूँ; मनुष्य मुक्ति चाहता है, तो यह मिथ्या बात होगी। मनुष्य मुक्ति की अपेक्षा बहुत सारी चीज़ें चाहता है। मनुष्य अधीन होना चाहता है।
स्वतंत्रता स्वयं साध्य ही बनी रहे, तो निरर्थक हो जाती है।
लड़ते हुए मर जाना जीत है, धर्म है। लड़ने से भागना पराधीनता है, दीनता है। शुद्ध क्षत्रियत्व के बिना शुद्ध स्वाधीनता असंभव है।
जहाँ स्वतंत्रता संभव न हो, वहाँ सत्ता उसका एकमात्र विकल्प बन जाती है।
दूसरे लोग जो स्वराज्य दिला दें वह स्वराज्य नहीं है, बल्कि परराज्य है।
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जिस प्रकार कला अपने आभ्यंतर नियमों के कठोर अनुशासन के बिना अपंग या विकृत होती है; अथवा अभाव बनकर रहती है, उसी प्रकार व्यक्ति-स्वातंत्र्य अपनी अंतरात्मा के कठोर नियमों के अनुशासन के बिना—निरर्थक और विकृत हो जाता है, खोखला हो जाता है।
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स्वतंत्रता स्वेच्छाचार और अत्याचार का नाम नहीं।
कला के स्वायत्त क्षेत्र का स्वातंत्र्य तभी सार्थक है, जब कलाकार में आंतरिक सम्पन्नता हो। ऐसी आंतरिक सम्पन्नता, जो वास्तविक जीवन-जगत् के संवेदनात्मक आभ्यंतरीकरण से उत्पन्न हुई है।
आज़ाद हिंदुस्तान में सारे देश पर जनता का अधिकार है।
स्वतंत्रता का व्यवहार करने वाली शिक्षा, प्रभुत्व का व्यवहार करने वाली शिक्षा के विपरीत—मनुष्य को अमूर्त्त, अलग-थलग, अकेला और विश्व से असंपृक्त मानने से इनकार करती है।
जब व्यक्ति की स्वतंत्रता या शांति ख़तरे में हो, तब हम उदासीन नहीं रह सकते और न ही हमें रहना चाहिए। तब तो निरपेक्षता एक तरह से उन बातों के साथ धोखा होगी, जिनके लिए हमने संघर्ष किया है और जो हमारे उसूल हैं।
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नारी जब अपनी उस स्वतंत्र स्थिति को प्राप्त कर लेगी तब एकनिष्ठता का दावा पुरुष के हिस्से में भी उसी अनुपात से आयेगा जितना नारी के लिए है।
व्यक्ति-स्वातंत्र्य कला के लिए, विज्ञान के लिए—अत्यधिक आवश्यक और मूलभूत है।
अनुवाद में विश्वसनीयता और स्वतंत्रता, पारंपरिक तौर से परस्पर विरोधी प्रवृतियाँ मानी गई हैं।
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आज आज़ादी के ज़माने में तो यह पब्लिक का फ़र्ज़ हो जाता है कि गंदे अख़बारों को न पढ़े, उनको फेंक दें।
प्रत्येक व्यक्ति को अपना उद्धार स्वयं करना होगा—उसका कार्य उसी को करना होगा।
जिन्होंने पश्चिम की शिक्षा पाई है और जो उसके पाश में फँस गये हैं, वे ही गुलामी में घिरे हुए हैं।
हमारे देश में भी व्यक्ति-स्वातंत्र्य को साधना का विषय समझा गया था, लेकिन उस स्वातंत्र्य को संकीर्ण अर्थ में नहीं लिया गया।
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