Font by Mehr Nastaliq Web

तेग़ अली : भोजपुरी ग़ज़ल के प्रथम पुरुष

साहित्य ‘में’, या साहित्य ‘से’ किसी क़िस्म की कोई बदमाशी होती नहीं, या हो नहीं सकती—ऐसी कोई बात अगर कही जाती है, तो मैं तो कम से कम ठीक-ठीक नहीं ही कह सकता कि इस बात में किसकी तौहीन ज़्यादा है, बदमाशी की कि साहित्य की! मेरे जानते तो साहित्य ‘में’ भी और साहित्य ‘से’ भी, बदमाशी [बल्कि बदमाशियाँ] होती भी रही हैं, होती रहेंगी भी, और कैसे कहे कोई कि होनी नहीं चाहिए! कई बार तो इतनी ज़रूरी लग सकती है यह बदमाशी, साहित्य के लिए भी और जिसके लिए हुआ करता है साहित्य उसके लिए भी, कि न हो तो अखरने लगे कि है क्यों नहीं! कि नहीं है यहाँ, तो आख़िर गई कहाँ! लेकिन फ़िलहाल, सवाल साहित्य-कृत या साहित्य में निहित-सन्निहित किसी बदमाशी या बदमाशी की किसी क़िस्म का नहीं है। अभी तो सवाल यह है कि क्या बदमाशी ‘से’ भी साहित्य संभव है? संभव है क्या कि बदमाशी-बदमाशी में भी साहित्य बन पड़े? कि रचने का रोग लग जाए बदमाशी को और बच न पाए बेचारी! जिन कुछेक रचनाकारों के चलते इस सवाल का जवाब ‘हाँ’ में है, उनमें से एक हैं तेग़ अली। तेग़ अली तेग़, जिन्होंने बदमाशी को कविता में ही, और ख़ूब खुलकर ख़र्च करके उससे एकदम-से ख़ाली हो जाने का, मुक्त हो लेने का, नायाब-सा एक उपाय निकाला। ऐसे इस बिरले-से कवि के बारे में और उसकी विरल-ही-सी कविताई के बारे में कुछ-कुछ बातें करनी हैं। 

और यक़ीन कीजिए कि ‘कुछ-कुछ बातें करनी हैं’ में जो ‘कुछ-कुछ’ है, उसका मतलब सचमुच ‘कुछ-कुछ’ ही है। अब अगर सवाल हो कि क्यों, कुछ-कुछ ही क्यों, तो उसका एक सजता-सा जवाब तो यही है कि इसलिए, कि रचनाएँ भी तेग़ अली की, कुछ ही हैं। हो सकता है कि और भी रही हों, लेकिन जो सामने हैं, वे उनकी कुल 23 ग़ज़लें हैं, और उनमें समाए दो ही सौ के क़रीब शेर हैं। लेकिन आप जानते हैं कि साहित्य की दुनिया में मात्रा का कोई मतलब नहीं होता। उसमें थोर भी बहुत-ज़्यादा-अधिक बहुत हो सकता है और बहुत भी बहुत-ज़्यादा-अधिक थोर हो सकता है। किसी की थोड़ी रचनाएँ भी बातचीत की बहुतेरी गुंजाइशें बना सकती हैं, किसी की बहुतेरी रचनाएँ भी बहुत संभव है कि बातचीत की बहुत थोड़ी गुंजाइश ही बना पाएँ। हालाँकि एक बात और है कि बातचीत की गुंजाइशों के नाते ही कोई रचना बड़ी बन जाए, यह ज़रूरी नहीं। बड़ी रचनाएँ बहुधा ‘कहि न जाइ का कहिए’ और ‘समुझि मनहिं मन रहिए’ की भावदशा तक लिए चली जाती हैं। और फिर यह भी है कि बातचीत की गुंजाइश का बनना भी सिर्फ़ रचना पर, सिर्फ़ रचनाकार पर मुनहसर नहीं है, जिसे बातचीत करनी है, वही कम-क़ुव्वती हो, वही कम-क़ाबिल हो, तो रचना क्या कर लेगी, रचनाकार क्या कर लेगा! तेग़ अली को लेकर बतियाने की बात अगर मेरे पास कम है तो इसका श्रेय न तेग़ अली को है, न उनकी कविताई को, विशुद्ध रूप से मुझे है, मेरी कम-क़ुव्वत को है, मेरे कम-कबिलाँव को है।

तो, गिनती की कुछ ही जो बातें हैं मेरे पास, उनमें से एक तो यह है कि तेग़ अली कवि हैं, यह तो ख़ैर उनकी कविताएँ कहती ही हैं, लेकिन जैसी कविताएँ वे हैं, जिस तरह; उनका वैसी कविताएँ होना, उस तरह; यह भी कहता है कि वे कवि ही नहीं हैं, वह भी हैं जिसके नाते उनकी कविता-किताब का नाम ‘बदमाश-दर्पण’ है। बदमाश-दर्पण की कविताएँ मनवा ही लेती हैं लगभग कि इस दर्पण में जिसकी छवि है, वह कवि के ख़ुद की है। जिस वाली बदमाशी से ये कविताएँ रची गई हैं, वह कवि की अपनी है। और इससे ज़ाहिर है कि कवित्व में व्यक्तित्व का घुल जाना जिसे कहते हैं, उसे तेग़ अली के वार्ताकारों ने तेग़ अली की कविताई में पूरी तरह से घटित-घुलित पाया है। ‘बदमाश-दर्पण’ के संपादक-व्याख्याकार श्री नारायण दास ने उनके व्यक्तित्व की जो छवि प्रस्तुत की है, जिसके आधार पर ही इस पुस्तक के मुखपृष्ठ की रचना की गई है, वह छवि उनकी ग़ज़लों से ही छनकर आई है—”छह फ़ुट ऊँचा कद। सर पर छोटे घुँघराले बालों पर सुनहरे पल्ले का साफ़ा। बिच्छू के डंक की तरह नुकीली चढ़ी हुई मूँछें। साँप की तरह साँवले रंग की, चिकनी चमकीली काया। शरीर पर रेशमी लाल किनारे की नागपुरी धोती। कमर में बनारसी सेल्हे का कसा हुआ फेंटा। फेंटे में खुँसा आबनूस की मूठ का, तीखी धार का बिछुआ। हाथ में टीके से हाथ भर ऊँची पक्के मिर्ज़ापुरी बाँस की लाठी, जिसे बड़े प्यार से तेल पिला-पिलाकर पाला गया। जेठ-बैसाख की कड़ी धूप, सावन-भादो की झड़ी और माघ-पूस की कड़कड़ाती ठंड में भी नंगे बदन।” [प्रस्तावना, बदमाश-दर्पण, संपादक नारायण दास, विश्वविद्यालय प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2002, पृ. 9]

आप तेग़ अली की कविताई से गुज़रें तो उनकी यह तस्वीर जो खींची गई है, भरसक तो उसका समर्थन ही पाएँगे। वैसे भी, यह मान लेने के अच्छे-भले कारण हैं कि साहित्य की किसी भी दूसरी विधा की तुलना में कविता अपने कर्ता के ज़्यादा क़रीब होती है। यही वजह है शायद कि जब हम कहते हैं—‘उपन्यासकार’ या ‘नाटककार’ तो उसमें विधा का नाम, ‘उपन्यास’ या ‘नाटक’ पहले आता है, जब कहते हैं ‘कविता’ तो विधाता का नाम, ‘कवि’ पहले आता है। कवि से ही कविता है, जबकि कहानीकार से कहानी नहीं है, कहानी से कहानीकार है। ज़ाहिर है कि ऐसे में ‘इंदुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोए थे’ जैसे सवाल कवि से ही किए जा सकने लायक़ हैं। यों ही नहीं है कि निबंध अगर निबंधकार को, उसके मन-मिज़ाज को प्रकटाए, तो उसे अलग से व्यक्ति-व्यंजक के विरुद से नवाज़ा जाता है, लेकिन कविता का कविता होना ही कवि-व्यक्तित्व की व्यंजना के लिए काफ़ी मान लिया जाता है। ऐसे में एतराज़ के लायक़ यह भी नहीं है कि “न कौनो काम करींला न नौकरी बा कहूँ / बइठ के धूर क रसरी रजा बटत बाटी” जैसे किसी शेर के आधार पर न सिर्फ़ यह मान लिया जाता है कि तेग़ अली के पास जीवन-यापन के लिए वैध कोई रोज़गार नहीं था, यह भी मान लिया जाता है कि तब ‘राजा दरवाजा’ मुहल्ले में जूए का जो अड्डा चलता था उसमें रुपल्ली में अधेली की हिस्सेदारी तेग़ अली की भी थी। किस आधार पर मान लिया जाता है यह? इस आधार पर कि उनका एक शेर है कि “दुआरे राजा के जूआ परल बा, जानऽ ल / रजा अधेली क पत्ती हमार बटलै बा”। यह मान लेना, ‘बदमाश’ का जो व्युत्पत्तिमूलक अर्थ है—बद मआश, बद माने बुरा, मआश माने जीविका, कुजीवी, बुरे साधनों से जीविका उपार्जन करने वाला—उसके भी काम आता है। और फिर कई शेर मिल जाते हैं, जो इस कुजीविता के मेल में हैं। जैसे यह, कि “चढ़ जालैं कौनो दाँव पै सारे त लेईंला / कंचन क गोप, मोती क माला तोरे बदे”। जैसे यह, कि जाने किस वसूली-अभियान के तहत “आज खरचौ त दुकनदार से पउले बाटीं / चलके बैठक में तनी चाभ के मगदल आवऽ”। 

लेकिन, यह जो कविता के ‘मैं’ का मतलब ‘कवि’ मान लेना है, उसे एकदम-से मान लेने का भी और सिरे से मना कर देने का भी, मन नहीं बनता। संयोग से तेग़ अली को लेकर एक दूसरी तरह की मान्यता भी मौजूद है। रुद्र काशिकेय ने नारायण दास संपादित बदमाश-दर्पण के 37-38 साल पहले प्रकाशित ‘तेग़ अली और काशिका’ में गुंडई को तेग़ अली का पेशा मानने से असहमति जताई है। [प्रस्तावना, बदमाश-दर्पण, संपादक नारायण दास, विश्वविद्यालय प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2002, पृ. 10] 

इस असहमति से भी असहमत होने का कोई मतलब नहीं है, वह भी महज़ इस आधार पर कि रुद्र जी ने तेग़ अली की जीविका के किसी अन्य साधन का उल्लेख नहीं किया है। अन्य साधन के उल्लेख के न होने या अन्य साधन के ही न होने का सीधा-सा मतलब क्या यही है कि तब वह साधन छिनैती है, वसूली है, इसलिए कि उनकी कविता में उसका ज़िक्र है और ‘मैं’ से जोड़कर ज़िक्र है! यह भी कोई बात हुई कि कवि के ‘मैं’ को केवल और केवल कवि का ही ‘मैं’ मान लिया जाए! संभव है क्या कि काव्यवस्तु से दूरी बरती ही न गई हो और कविता हो गई हो! और, कवि तेग़ अली का ‘मैं’ केवल तेग़ अली का नहीं है, यह तो साहित्येतिहास-प्रमाणित है। जयशंकर प्रसाद ने सप्रसंग बताया है कि तेग़ अली ने अपनी कविता के ज़रिए जिनके ‘मैं’ का बखान किया था, जिनके-जिनके, उनमें एक थे बाबू नन्हकू सिंह। 1922 में प्रकाशित ‘गुंडा’ कहानी में प्रसाद ने नन्हकू सिंह का जो चित्र खींचा है, उसे देखिए तो पाएँगे कि उसके कई रंग, उसकी कई रेखाएँ तेग़ अली की कविताई से ली गई हैं, और फिर बदमाश-दर्पण की 2002 में लिखी गई प्रस्तावना में प्रस्तुत तेग़ अली का चित्र देखिए तो पाएँगे कि यह नन्हकू सिंह के ही चित्र की एक और प्रति है। जो 50 का वय और बलिष्ठ-दृढ़ शरीर और बिच्छू के डंक की तरह चढ़ी मूँछ और साँप-सा साँवला रंग और नागपुरी धोती और बनारसी सेल्हे का फेंटा और सीप की मूठ का बिछुआ वगैरह-वगैरह नन्हकू सिंह की निशानी है, वही-वही बिना किसी हिचक के तेग़ अली के नाम भी दर्ज कर दी गई है। ज़ाहिर है कि ये निशानियाँ तेग़ अली की कविताई से चलकर नन्हकू सिंह तक और नन्हकू सिंह से चलकर तेग़ अली तक आई हैं। मानना चाहिए कि प्रसाद ने ईसा की अठारहवीं शताब्दी के अंतिम भाग में काशी के विच्छिन्न और निराश नागरिक जीवन से निकले जिस नवीन संप्रदाय का ज़िक्र किया है, वीरता जिसका धर्म था, सिंह-वृत्ति से जो जीविका ग्रहण करता था, जो गिरे हुए प्रतिद्वंद्वी पर शस्त्र नहीं उठाता था, जो निर्बल का बल था और तब जिसे ‘गुंडा’ नाम दिया गया था [कथानिका, संपादक विश्वनाथ सिंह, वाणी मंदिर, प्रतापगढ़, चौथा संस्करण 1986 पृ. 28-29], तेग़ अली उसी संप्रदाय के दीक्षित थे, और तब ज़ाहिर है कि न गुंडा का वही अर्थ रह जाता है, जो है, न बदमाश का। हालाँकि इसमें एक पेंच भी है, कि गुंडा अगर काशी का हो तब, बनारस का हो बदमाश, तब। तब, जब वह ‘तब’ की काशी का गुंडा हो, ‘तब’ के बनारस का बदमाश हो।

और एक बात जो तेग़ अली की कविताई में बिना उतरे ही कहनी है मुझे। यह कि वह उन सदास्वल्प कवियों में से हैं, जिन्हें कालजय हासिल है। अपनी कविताई के नाते तो बाद में, इस नाते तो निःसंशय कि वह भारतेंदु-मंडल में शामिल थे। यह कोई छोटी बात नहीं है। इतनी बड़ी बात है कि तेग़ अली के कवित्व पर संशय करे कोई, तो वह ‘कोई’, समझ के चाहे जिस पायदान पर हो, उसकी समझदारी पर ही संशय हो आए, एक बस इस बात से कि तेग़ अली भारतेंदु के प्रिय कवियों में से एक हैं। जिस एक काल्पनिक मुशायरे को प्रस्तुत किया है भारतेंदु ने, उसमें बाक़ी शाइरान—लाला साहब और ललाइन साहिबा और शोहदा साहब और क़ब्रिस्तान के फ़क़ीर, मरघट के बाम्हन कवि—सबके लिए भारतेंदु ने अलग-अलग मन-मिज़ाज की कविताएँ तो अपने तैयार की है, लेकिन उन सबके समानांतर बनारस के भैवा कवि या कवियों के लिए तेग़ अली की, एक-दो नहीं, चार-चार ग़ज़लें उठा ली है। और किसी ने ध्यान नहीं दिया, तेग़ अली के संपादकों ने भी नहीं, कि न सिर्फ़ भैवा कवियों में से एक के लिए तेग़ अली की चार ग़ज़लें या चार भैवा कवियों के लिए तेग़ अली की एक-एक कर चार ग़ज़लें भारतेंदु ने ली है, बल्कि इन भैवा कवियों से भिन्न बैसवारे के तिलंगा भाई के लिए भी उन्होंने एक ग़ज़ल का इंतज़ाम तेग़ अली के ही खाते से किया है। इस ग़ज़ल को भी जोड़ लें तो उनकी उपलब्ध ग़ज़लों की संख्या 23 से बढ़कर 24 हो जाती है। ‘बदमाश-दर्पण’ में यह शामिल नहीं है, इसलिए और सनद रहे, इसके लिए यहाँ तेग़ अली की ग़ज़लों में एक का इज़ाफ़ा करने वाली यह पूरी ग़ज़ल प्रस्तुत है—फुरै कहत हौं मोहितें जो जइहौ रिसाय के / भरुका माँ बिख भरा है, मैं मरि जैहौं खाय के // सारन के आज सार में भँवरी बताय के / लैहौं करेजा दूध बकेना पिआय के // खरिहान माँ जो रात के रइहौ तूँ आय के / दैहौं उकाँव गोहुँ क तुम कै उठाय के // सूरज कै कुछ न लीन न तुम हन गुनाहगार / काहे क हमकै मारथौ घामे डहाय के // बौरान रोज फिरत हौं बारी-बगैचा में / टोला माँ हमरे आएव न एक दिन भुलाय के // घरहू न आय तेग़ क दरसन नहीं हौ देत / औरन तें तौ मिलत हौ रजा धाय-धाय के।” [मुशायरा, भारतेंदु समग्र, हिंदी प्रचारक पब्लिकेशंस, छठा संस्करण 2009, पृ. 999]

जिसकी पाँच-पाँच ग़ज़लें, बेशक नाम-छाप के साथ, लेकिन एक काल्पनिक मुशायरे के, काल्पनिक शाइरों के इस्तेमाल के लिए ले ली जाएँ, साधिकार, भारतेंदु का ऐसा अपनत्व जिसे हासिल हो, हो नहीं सकता कि कवि के रूप में उसे कालजय हासिल होने से रह गई हो। ध्यान इस ओर भी जाना चाहिए कि भारतेंदु ने इन कविताओं को गुंडों की बोली की कविता तो कहा है, गुंडे की बोली की कविता नहीं कहा है। जो-बोली-है-वह-गुंडों-वाली-है, यह कहा है; जो-बोल-हैं-वे-गुंडों-वाले-हैं, यह नहीं कहा है। यही नहीं, इस मज़ाक़िया-से मुशायरे में शामिल और-और शाइरों की शाइरी भी, ध्यान से सुनें, तो पाएँगे कि तेग़ अली की कविताई के ही मन-मिज़ाज से मिलती-जुलती है। इस मन-मिज़ाज को ही हथियार बनाकर और बड़ी होशियारी से इस मुशायरे को शुरू-शुरू में ही चिड़िमारों के टोले में मुफ़्तख़ोर शाइरों की जुटान बताकर भारतेंदु ने व्यवस्था को भरमन लपेट सकने की राह बना ली है। “गल्ला कटै लगा है कि भैया जो है सो है / बनियन का गम भवा है कि भैया जो है सो है // कुप्पा भए हैं फूल के बनिया बफर्ते माल / पेट उनका दमकला है कि भैया जो है सो है” और “लिखाय नाहीं देत्यो, पढ़ाय नाहीं देत्यो / सैंया फिरंगिन बनाय नाहीं देत्यो // लहँगा दुपट्टा नीकै न लागै / मेमिन का गौन मँगाइ नाहीं देत्यो” और “रेखती-फेखती सबसे अलग” माशूक को ही कोसती, “फिर उन्हें हैजा हुआ, फिर सब बदन नीला हुआ / फिर न आने का मेरे घर में, नया हीला हुआ” [मुशायरा, भारतेंदु समग्र, हिंदी प्रचारक पब्लिकेशंस, छठा संस्करण 2009, पृ. 999]

जैसी तेग़वत तेजवंत पंक्तियाँ भी तेग़ अली की सर्वाधिक उपस्थिति वाले इसी मुशायरे से चलकर हिंदी साहित्येतास में दर्ज हुईं, यह अलग बात है कि, चाहे जिस ग़फ़लत में, ख़ुद तेग़ अली साहित्येतिहास में दर्ज हुए, न हुए।

और यही नहीं कि केवल भारतेंदु से, तेग़ अली को यह अपनत्व अपने बाद के कवि जयशंकर प्रसाद से भी हासिल हुआ, जिन्होंने ‘गुंडा’ कहानी के और ईश्वरचंद्र सिनहा से भी हासिल हुआ, जिन्होंने अपनी भोजपुरी कहानी ‘भैरवी के साज’ [‘भैरवी क साज’, सं. रामबली पाण्डेय, भोजपुरी संसद, जगतगंज, वाराणसी, प्रथम संस्करण संवत 2024, पृ. 119]  के ताने-बाने का बहुत-कुछ तेग़ अली की कविताई से ही ताना-बुना है। और सच पूछिए तो भगवती चरण वर्मा की कहानी ‘दो बाँके’ के तार भी एक अलग अंदाज़ में, जुदा देश और जुदा काल के तक़ाज़े को दर्ज करते हुए, लेकिन फिर भी, तेग़ अली के काव्य-नायक से जुड़ते ज़रूर हैं। वर्मा के दिखाए हम देख पाते हैं कि एक तरफ़ अगर ‘बदमाश’ और ‘गुंडा’ जैसे कु-नाम के बावजूद काशी से जुड़े प्रसाद के नन्हकू सिंह हों या ईश्वरचंद्र सिनहा के बल्ली बाबू या बचऊ महाराज, या तेग़ अली के काव्य-नायक; सभी अपने अन-अधीर प्रेम और पराक्रम से दिल जीत लेते हैं, तो दूसरी तरफ़ ‘बाँके’ जैसे सुनाम से लैस होने के बावजूद लखनऊ के नफ़ासती उस्ताद भी हैं, जो बड़बोल बहादुरी के विदूषक बनकर रह जाते हैं। ‘दो बाँके’ कहानी के अंत में जो देहाती आता है, जिसके एक ही महावाक्य “मुला स्वांग ख़ूब भरयो” [इक्कीस कहानियाँ, संपादक रायकृष्ण दास, वाचस्पति पाठक, भारती भंडार, संस्करण 1961] ने पुल के दोनों तरफ़ के बाँके उस्तादों और उनके शागिर्द शोहदों का मुलम्मा उतारकर रख दिया, वही है वह, जिससे अविलग होने के चलते नन्हकू या बल्ली या बचऊ फिर भी नायक बने रहते हैं, और वही है वह, जिससे विलग होने के चलते अपनी-अपनी जीत मनाते दोनों तरफ़ के दोनों बाँके सदलबल चारों खाने चित्त पाए जाते हैं। तेग़ अली के काव्य-नायक के पास अपने प्रेम-व्यवहार में एक जो दबंगई का तत्त्व है, उसके नाते ही नहीं, उसमें एक जो देहातीपन है, उसके नाते भी उसने अपने कवि को कालजय दिलाने में सफलता पाई है।

लेकिन, इस काव्य और काव्य-नायक की बात बाद में, अभी तो यही कि कवि के रूप में उनकी महत्ता को इस बात से भी जोड़कर देखना चाहिए कि उनकी इन दो ही दर्जन ग़ज़लों को अब तक चार बार संपादित-प्रकाशित किया जा चुका है, और हर बार इसका बीड़ा साहित्य के किसी-न-किसी धीर धुरंधर ने ही उठाया है। पहली बार भी वह 1895 ई. में ‘बदमाश-दर्पण’ के नाम से ही, और कवि के नहीं, कवि के समकालीन, भोजपुरी के ही एक दूसरे कवि रामकृष्ण वर्मा ‘बलबीर’ के प्रयत्नों से प्रकाश में आया [भोजपुरी के कवि और काव्य, श्री दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, प्रथम संस्करण, 1950, पृ. 143]।

एक तो समकालीन, दूसरे स्वयं भी कवि, फिर भी प्रकाश में लाए किसी और समकालीन को ही, और कवि को ही, इसमें ‘मोह न नारि नारि के रूपा’ की जो पलट-सी प्रतीति है, वह कवि के रूप में तेग़ अली के, चाहे जिस आधार पर, लेकिन कवि-परंपरा में कुछ हटकर होने की सूचना तो देती ही है। वर्मा जी काशी से निकलने वाले साप्ताहिक ‘भारत जीवन’ के संपादक थे, रत्नाकर जी जैसे सिद्ध कवि के गहरे मित्रों में से थे और ‘बलबीर’ उपनाम से भोजपुरी में ‘बिरहा-नायिका-भेद’ के रचयिता के रूप में उन्होंने स्वयं भी कोई कम ख्याति अर्जित नहीं की थी। तेग़ अली को उनका जो समर्थन था, वह कितने समर्थ कवि का समर्थन था, इसे समझने के लिए इस बलबीर कवि से प्रोषितपतिका का एक बखान सुनते हैं—“फुलिहें अनरवा सेमर कचनरवा, पलसवा गुलबवा अनंत / बिरहा क बिरवा लगायो बलबिरवा, से फुलिहें जो अइहें बसंत / रजवा करत मोर रजवा मथुरवा में हम सब भइलीं फकीर / हमरी पिरितिया निबाहे कइसे ऊधो, बलबिरवा के जतिया अहीर।” [भोजपुरी के कवि और काव्य, श्री दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, प्रथम संस्करण, 1950, पृ. 145]

एक पं. पुरुषोत्तमलाल दवे ‘ऋषि’ हुए 1942 के आस-पास, ‘ख़ुदा की राह पर’ के संपादक, बताया जाता है कि उन्होंने भी ‘बदमाश-दर्पण’ का संपादन किया था [प्रस्तावना, बदमाश-दर्पण, पृ. 12]। यह किसी के देखने में नहीं आया, दवे जी के बारे में भी ख़ास कुछ पता न चला, सिवा इसके कि अमृतलाल नागर ने इनका ज़िक्र रामविलास शर्मा पर केंद्रित अपने संस्मरण ‘तीस बरस का साथी’ में अपने एक मित्र के रूप में किया है। बताया है कि उनके संपादन में बनारस से निकलने वाला पत्र ‘ख़ुदा की राह पर’ पाक्षिक था, हास्य रस का था और उन्हीं के सुझाव पर नागर जी ने ‘अल्लाह दे’ नाम से एक पाक्षिक पत्र की योजना बनाई थी और लखनऊ से इसके तीन अंक भी निकाले थे। यह भी बताया है कि दवे जी का दिया यह ‘अल्लाह दे’ नाम न उन्हें न उनके मित्रों को पसंद आया था, सो बाद में उन्होंने इसे ‘चकल्लस’ नाम से निकाला था। लेकिन आप काशिका के भूगोल से बाहर की प्रतीति देने वाले ‘दवे’ आस्पद पर ग़ौर करें, और ‘ऋषि’ उपनाम पर, और इन ऋषि-संपादित ‘ख़ुदा की राह पर’ और उनके सुझाए ‘अल्लाह दे’ पर, तो मानेंगे कि काशिका के कवि तेग़ अली से उनके जुड़ने का ख़ास ही कोई मतलब रहा होगा। बदमाश-दर्पण अभी जिस रूप में हमारे सामने है, नारायण दास द्वारा संपादित होकर और 2002 में विश्वविद्यालय प्रकाशन से प्रकाशित होकर, उसका आधार 1964 में ज्ञानमंडल से प्रकाशित, पं. शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र काशिकेय’ द्वारा भाष्य सहित संपादित ‘तेग़ अली और काशिका’ पुस्तक है [प्रस्तावना, बदमाश-दर्पण, पृ. 12]। यह भी अब अनुपलब्ध है और अगर मिल जाए तो इसका पुनः प्रकाशन इसलिए भी ज़रूरी है कि यह न केवल तेग़ अली के, बल्कि काशिका के भी, भोजपुरी के भी हक में है। ‘बहती गंगा’ के सर्जक के रूप में, आप जानते ही हैं, कि रुद्र जी ने स्वयं भी कालजय हासिल की है, और गुरु बनारसी के तौर पर भोजपुरी कविता को भी उन्होंने अपने अनोखे अंदाज से संपन्न किया है — “न रखिए रमउलीं, न अँखिए लड़उलीं / गुरू जिनगी क मजा कुछ न पउलीं / कबो राम क नाम लेहलीं न मन में / न रामा क सूरत रचउली नयन में / भवन में न रहलीं, बिहरलीं न बन में / न मेले में जमलीं, न रमलीं हो रन में / हमेसा बखत मार के मन बितउलीं / गुरू जिनगी क मजा कुछ न पउलीं।” [भोजपुरी के कवि और काव्य, पृ. 235-36]

वैसे, बदमाश-दर्पण का उपलब्ध जो संस्करण है, वह भी अपनी टीका, भाष्य और व्याख्या सहित न सिर्फ़ तेग़ अली को बल्कि काशिका को भी, भोजपुरी के अन्य रूपों से उसकी विभाजक विशेषताओं के साथ समझने के आधार-ग्रंथ जैसा उपादेय है। भाष्यकार नारायण दास न सिर्फ़ विधिवेत्ता और काशिका सहित हिंदी, उर्दू, बांग्ला और अँग्रेज़ी के मर्मज्ञ हैं, बल्कि काव्य-संस्कार उनके ख़ून में है, वह कविवर रत्नाकर के पौत्र हैं [प्रकाशकीय भूमिका (पुरुषोत्तम दास मोदी), बदमाश-दर्पण, पृ. 6] और बदमाश-दर्पण का यह संस्करण इस सबकुछ से लाभान्वित है।

तेग़ अली की कविताई में उतरने के पहले की यह थोड़ी लंबी खिंच गई चर्चा महज इसलिए कि ठीक से नहीं भी उतर पाएँ तो क्या, जो उतरे हैं उसमें, उनकी पंक्ति में लग लेना भी ‘एक मुश्त ख़ाक हैं मगर आँधी के साथ हैं’ वाले अहसास से भर देता है, तर कर देता है।

वैसे, एक ख़ास ही ख़ुशी की बात भोजपुरी के हिस्से की भी है। आप जानते हैं कि जिन्हें भोजपुरी के पहले कवि के रूप में हम जानते हैं, कबीर, शुरू-शुरू में उन कबीर की कविता को भी ऊँचे दर्जे की कविता कहने में विद्वज्जन को दिक़्क़त पेश आई थी [“इसी प्रकार उन्होंने हठयोगियों के साधनात्मक रहस्यवाद के कुछ सांकेतिक शब्दों को लेकर अद्भुत रूपक बाँधे हैं जो ‘सामान्य जनता की बुद्धि पर पूरा आतंक जमाते हैं’... अनेक प्रकार के रूपकों और अन्योक्तियों द्वारा ही इन्होंने ज्ञान की बातें कही हैं जो नई न होने पर भी वाग्वैचित्र्य के कारण ‘अपढ़ लोगों को चकित किया करती थीं’।” आ. रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, 17वाँ संस्करण 2021 पृ. 51], इसलिए भी शायद कि जिस तरह की होकर कोई कविता कविता होती है, सुधीजन के लायक, आम तौर पर, उस तरह की कविता कबीर की नहीं है। और यह संयोग मात्र नहीं है कि जिन्हें हम भोजपुरी के पहले ग़ज़लगो के रूप में जानते-मानते हैं, तेग़ अली, उनकी ग़ज़लें भी, जिस तरह की ग़ज़लों की आदत रही है हमें, एकदम-से उसी तरह की ग़ज़लें नहीं है। ये दोनो बातें मिलकर यह सुअवसर तो देती ही हैं कि कह सकें कि भोजपुरी के भीतर ऐसा कुछ जरूर है जो लगी लीक से हटकर चलने को कहता है। कहता तो खैर, है ही, कोई सुने, न सुने ! यही नहीं केवल कि भोजपुरी ग़ज़ल के इतिहास में प्रायः पहला नाम तेग़ अली का है, यह भी, कि वे पहले मनई हैं जिन्होंने ग़ज़ल और भोजपुरी दोनो को एक-दूसरे के काबिल किया, दोनो में एक-दूसरे की ग्राहकता जगाने को ज़रूरी जाना। तेग़ अली की ग़ज़लगोई से गुजरना केवल ग़ज़लगोई से होकर गुजरना नहीं है, ख़ास भोजपुरी की और उसमें भी ख़ासमख़ास काशिका की, बनारसी भोजपुरी की ग़ज़लगोई से होकर गुजरना है। आई होगी ग़ज़ल फारस से, लेकिन तेग़ अली के यहाँ वह खाँटी काशी की होकर है ; ‘गंगा के पार, गैबी पै, नद्दी के तीर’, राजा दरवाजा, बहरी ओर, लक्सा पर और गलियों में, गंगा की रेती पर, मेले-तमाशे में टहलकदमी करते हुए, बुढ़वा मंगल मनाते हुए, काशी के ही रिखई तमोली और नरकू, चिथरू, पनारू, चिरकिट, घुरपतरी और खड़कू की चर्चा चलाते हुए ; साकी-शराब-मयखाने के बजाय भंग की तरंग में, काशी की आवाज में, काशी के अंदाज में, बात-बात में रामधै से, राम की सौगंध से संपन्न होकर — “तिगैलैं रामधै हमहू के सैकड़न खेवा / रहैलैं संग जे राजा हमार बहरी ओर / कहऽलैं रामधै बूटी के तार में राजा / मिलै के तेग़ से अब बा बिचार बहरी ओर...”।

तेग़ अली की चर्चा इस लिहाज से भी काफी होती रही है कि इस मुसलमान कवि के अभिव्यक्ति-विधान का जो बीज शब्द है वह यही ‘रामधै’ है जो जरूरत पड़ने पर ‘रमधै’ होकर भी है। राम की सौगंध उनके यहाँ लेने-देने दोनो के काम आता है। जरूरत आन पड़े तो गंगा और तुलसी उठाकर, गणेश और दुर्गा की भी कसम देने-दिलाने को तैयार — “गंगा उठावऽ तुलसी औ सोना तयार बा / अब केहू से हँसब न केहू से मिलल करब // पुतरी गनेस किरिया जे करबऽ कहल हमार / तोह से अलग न आँखी से हम एक पल करब // दुरुगा उठावऽ नाहीं त बिछुआ घुसेरींला / सबके छलब न तेग़ के रमधै छलल करब”। काशी, प्रयाग, मथुरा, द्वारिका, वृंदावन का ज़िक्र तो है ही, महावीरी टीका का भी है, इन्दर और उनकी अपछरा का भी है, गोहार में गोजी चलती है, तो, कवि का कहना है कि उसने आकाश में अपने-अपने विमान लिए देवताओं को खड़े होकर देखते देखा है, “बेवान देखली ह सज्जै अकास में बा ठाढ़ / चलै लगल ह जे सिंघा गोहार में गोजी”। राग के इस रंग में ऋषि-मुनी की दशा में पहुँच जाने का भी ज़िक्र है, धूनी रमाने का भी — “रिखी मुनी से भी तोरे बदे बढ़ल बाटी / न दाना खात हईं औ पियत न जल बाटी // तोरे दुआरी पै धूनी रमाईं जिउ में बा / अतीथ जोगी त तोरे बदे भयल बाटी”। ऐसे में एक सामान्य-सा निष्कर्ष, जो निकल ही आता है, वह यह है कि तेग़ अली धार्मिक सहिष्णुता के कायल हैं और इसके जरिए भी वे कायल करते हैं, और उससे भी बढ़कर, रहीम-रसखान के पथ-पथिक हैं। बेशक, इससे इन्कार का कोई मतलब नहीं, लेकिन अपने इस रामधै को या गंगा को या मथुरा-प्रयाग को अपनी कविताई के लिए तेग़ अली हिंदू धर्म से ले रहे हों, ऐसा नहीं है। इन्हें वे उस देश से ले रहे हैं जिस देश के माटी-पानी से वे बने हैं, जिस देश के माटी-पानी में वे सने हैं, मथुरा की माटी जिस देश की माटी है, प्रयाग का पानी जिस देश का पानी है। काशी के या द्वारिका के नाम-जप के लिए कवि का केवल हिंदुस्तानी होना, केवल बनारसी होना ही काफी है, और होना चाहिए, इस संदर्भ में उसके हिंदू या मुसलमान होने का न तो कोई अर्थ है, न होना चाहिए। बात बस इतनी-सी है कि यह जो वृंदावन है और यह जो तेग़ अली हैं, दोनो एक ही देश के वासी-निवासी हैं, इसलिए और इसीलिए साथ-साथ हैं। यही नहीं, तेग़ अली ख़ास काशिका के हैं, इसलिए वृंदावन भी उनके साथ वृंदावन होकर नहीं, ‘बिनराबन’ होकर हैं। यह तो हुआ देश का नाता। एक नाता काल का भी है। तेग़ अली जिस काल की काशी के, जिस काल की काशिका के कवि हैं ‘रामधै’ उस काल की काशी की जुबान पर है, इसलिए तेग़ अली की जुबान पर भी है। अब की काशी, अब की काशिका की जुबान से यह रामधै लगभग गायब है, और काशिका से गायब है तो हिंदू के यहाँ से भी गायब है, मुसलमान के यहाँ से भी गायब है। दोनो के यहाँ से उसके गायब होने की एक ही वजह है, है नहीं तो होनी चाहिए, कि वह काशिका से गायब है। कहना यह है कि कोई कवि हिंदू होकर इस्माइल के संदूक और कारूँ के खजाने का ज़िक्र करता है, कोई कवि मुसलमान होकर प्रयाग-वृंदावन का ज़िक्र करता है — इत्ती-सी बात पर गौरवान्वित जैसा कुछ होने लगना, लगता नहीं कि बनता है। यह सहज नहीं है अगर, स्वाभाविक नहीं है, अलग से खुश होकर दिखने-दिखाने लायक है यह, तो यह चिंता का विषय है, और भारी चिंता का विषय है। मुझे नहीं लगता कि रहीम और रसखान और तेग़ अली जैसे कवियों को, राम-कृष्ण, गंगा-यमुना, द्वारिका-प्रयाग जैसे भारत-वैभव को सांप्रदायिक सद्भाव जैसी किसी टुच्ची चीज की भेंट चढ़ जाने देना चाहिए। माफ कीजिएगा, लेकिन सद्भाव अगर सांप्रदायिक हो तो उसे टुच्चा तो कम-से-कम कहना ही पड़ता है ! भूलना नहीं चाहिए कि हिंदू अगर मुसलमान के प्रति, मुसलमान अगर हिंदू के प्रति सहिष्णु है तो इसका केवल और केवल एक ही मतलब है कि दोनो एक-दूसरे को सह रहे हैं। सह रहे हैं तो यह सवाल इन दोनो की पूँछ से बँधा हुआ है, कि कब तक ? कहाँ तक ? शुक्र है कि तेग़ अली सहकर रहने, सहकर रह जाने वाली बिरादरी के नहीं हैं, और नहीं हैं तभी तो कवि हैं ! 

ऐसा भी नहीं कि जिस नाज़ुकी, जिस नफ़ासत के लिए जानी जाती है ग़ज़ल, उसे दबंगई का जो तड़का दिया तेग़ अली ने, इश्क़ की नरमी में अपने मिज़ाज की जो गरमी मिलाई और ‘सुख़न अज़ ज़नान गुफ़्तन’ [“इसी प्रकार उन्होंने हठयोगियों के साधनात्मक रहस्यवाद के कुछ सांकेतिक शब्दों को लेकर अद्भुत रूपक बाँधे हैं जो ‘सामान्य जनता की बुद्धि पर पूरा आतंक जमाते हैं’... अनेक प्रकार के रूपकों और अन्योक्तियों द्वारा ही इन्होंने ज्ञान की बातें कही हैं जो नई न होने पर भी वाग्वैचित्र्य के कारण ‘अपढ़ लोगों को चकित किया करती थीं’।” आ. रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, 17वाँ संस्करण 2021 पृ. 51] को एक तरह से ‘मर्दान गुफ़्तन’ में बदल दिया, उसे सर्वत्र सराहना ही मिली हो। नुक़्ते के हर हेरफेर को हराम मानने वाले मानिंद अदीबों ने तेग़ अली और उन-जैसों को शायद ही कभी कोई भाव दिया हो, लेकिन इसके साथ ही, यह भी नहीं लगता, कहीं किसी ओर से, कि तेग़ अली और उन-जैसों ने ख़ुद भी उन्हें कभी कोई भाव दिया हो।

तेग़ अली की कविताई में माशूक़ के तौर पर जिसका ज़िक्र हुआ है, वह पुरुषवाची है और कहते हैं कि अदब में इसकी भी एक अच्छी-ख़ासी परंपरा रही है। लोकलीलाओं में तो अब भी है कि स्त्री लीलाओं में स्त्रियाँ ही पुरुषों की भी भूमिका निभाती हैं, पुरुष लीलाओं में पुरुष ही स्त्रियों की भी भूमिका निभाते हैं। साहित्य की इस दुनिया में कबीर जब कहते हैं कि ‘राम मोरे पीव मैं राम की बहुरिया’ तब भी, और प्रसाद जब कहते हैं कि “शशिमुख पर घूँघट डाले, अंचल में दीप छिपाए / जीवन की गोधूली में कौतूहल से तुम आए”, तब भी उनकी लैंगिक चेतना को लेकर सवाल नहीं उठाए जाते। साहित्य को छोड़िए, हमारी जो भाषा है, जिसमें हमारा साहित्य है, वह भी इस सवाल का जवाब देने में बहुत रुचि नहीं रखती कि एक ही चीज़ क्योंकर ‘ग्रंथ’ होकर पुंलिंग है और ‘पुस्तक’ होकर क्योंकर स्त्रीलिंग! ऐसे में जो कवि है, जिसे प्रजापति का रुतबा हासिल है, जिससे उम्मीद की जाती है कि रुचे, इस हिसाब से विश्व को बदल दे, उसे अगर लगता है कि आदमजात की लैंगिक चेतना को झकझोरते रहना है, विधिवत् और विविधविध, तो एक दफ़ा सोचना ज़रूर चाहिए कि स्त्री या पुरुष को लेकर लैंगिक विमर्श जिस हिसाब से ज्ञान के दूसरे अनुशासनों में चल रहा है, साहित्य के इलाक़े में भी उसे क्या उसी हिसाब से चलना चाहिए!

बहरहाल, इस सबसे अलग एक बात यह भी है कि समाज में समलैंगिक आकर्षण भी कोई अनसुनी-अनजानी चीज़ नहीं है, और जिन्हें कविताओं में उनके देश-काल को पढ़ने का शौक़ कविताएँ पढ़ने से बढ़कर है, वे कह सकते हैं कि संभवतः तेग़ अली के समय इस तरह के आकर्षण ने समाज में काफ़ी जगह घेर रखी थी। इतिहास में घुसकर इसके विविध आयामों और वजहों और नतीजों की ढेर लगा देना भी विद्वज्जन के लिए कोई कठिन काम नहीं है। ऐसा भी नहीं कि इसका इतिहास ही है केवल; बेशक, वर्तमान भी है, और नहीं कह सकते कि भविष्य नहीं है। इसी से लगकर यह भी सोचा जा सकता है अलग से, कि जो गुंडापन है तेग़ अली की इस कविताई में, वह इसी के नाते है, या यह कि गुंडेपन के नाते ही यह है! इशारे पकड़ने की कोशिश करें तो कई मिल जाएँगे—“जानींला आजकल में झनाझन चली रजा / लाठी लोहांगी खंजर औ बिछुआ तोरे बदे”, “गुंडन से तोरे गल्ली में देखींला रात-दिन / मुक्की चलत त रोज भनाभन बा आजकल”। रक़ीबों में जो उठापटक है सो तो है ही, आरज़ू-मिन्नत से थक चुके आशिक़ की तरफ़ से आख़िरी उपाय के रूप में एक हौलनाक हरकत यह भी है कि “पेटे प छुरी धइलीं त बोलल कि रामधै / जीयत रहब त फेर न कबौं आजकल करब // देखतै छुरी कमर में लगल काँप के कहै / जहँवा तू कहबऽ रामधै तोसे मिलल करब”। संयोग से बहुत सारे शेर इन ग़ज़लों में ऐसे हैं जिनसे लगता नहीं कि मामला क्रिया को पुंलिंग रखने की परंपरा के पालन का ही है सिर्फ़। जिस माशूक़ को राजा और रजा और रजवा और छावा और छलावा और पंछी और खेवा और करेजा और अमोला कहकर बार-बार बुलाया गया है, उसे यह जो बूटी छानने का न्योता है कि “कहाँ तू जालऽ, छनै बूटी चलके बैठक में” उसे जो कुश्ती सिखाकर मल्ल बनाने का इरादा है, “कुस्ती लड़ा के मल् तोहे राजा बनाईंला / खोदींला बइठका में अखाड़ा तोरे बदे” यह सुझाव है कि “निराले तेग़ से आवऽ तूँ सीखऽ कल बल छल / लड़ै के आवऽ ल कुस्ती, पछड़ के चल जालऽ” उसके बेशक ऐसे मतलब निकाले जा सकते हैं जो समाज में सम्मान्य और सामान्य स्त्री-पुरुष के प्रेम-परस्पर से इतर की ओर संकेत करें। लेकिन क्या कि यह जो राजा-रजा-रजवा है, उसके लिए एक संबोधन ऐसा भी तेग़ अली के यहाँ है, जिस तक पहुँचने के बाद स्त्री-पुरुष ही नहीं, किसी क़िस्म के कैसे भी भेद की हस्ती ही मिट जाती है, और वह संबोधन है, और कौन, वही ‘कन्हैया’—“आयल करऽ निराले में राजा कबौं-कबौं / किरपा किहल करऽ ए कन्हैया कबौं-कबौं / कुन्नन तोहार मुखड़ा बनउलन ह रामजी / दरसन दिहल करऽ ए कन्हैया कबौं-कबौं” और “कासी, पराग, द्वारका, मथुरा औ बिनराबन / धावल करैलैं तेग़ कन्हैया तोरे बदे”...। बात कन्हैया की हो तो यह भी समझ में आता है कि कैसे और क्योंकर “मून के आँख तोहैं देखींला रजा रमधै / न त बूटी क नसा हौ न ओंघायल बाटी // तोरे त प्रीत क रसरी में हाय रे बप्पा / ए रजा चोर मतिन आप कसायल बाटी”। लेकिन यह कहने में भी कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि हर जगह कन्हैया ही नहीं हैं, और यह कहने में भी कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि कन्हैया को कहीं भी होने से, किसी भी हाल में होने से भला कौन रोक सकता है!

यहाँ भी इश्क़ ही है, आशिक़ है, माशूक़ है, हुस्न है और उसके तमाम सारे ज़ोर-ज़ुलुम हैं, जलवे हैं, बेक़रारी है, शिकवा-शिकायत है, जलन है, उलाहने हैं और और भी जो होता है, है, लेकिन प्रायः सर्वत्र यह अहसास बना रहता है कि जो है, वही है; जैसा है, वैसा ही है; जैसे है, वैसे ही है; भीतर कुछ रख लिया गया नहीं है; छिपाकर, छोड़कर, छिनगाकर कहा गया कुछ नहीं है। और जो उफनकर है, सबसे ज़्यादा उघरकर, वह यह कि शौर्य सौंदर्य के सामने नतमस्तक है—“सुनरका सारे गिरावैलैं हमके गोड़े पर / कहै के बाँका बहादुर हईं आ मल बाटी // मिलावे वाला केहू आँख बा न जानऽ ल / से तोहरे गोड़े प देखऽ रजा खसल बाटी // जेहल में तोरली ह बेड़ी औ हथकड़ी डंडा / से तोहरे जुल्फी के फंदा में हम फँसल बाटी”। बार-बार और तरह-तरह से उभर आती है यह बात कि “हम झारै वाला बाटी हजारन में रामधै / पै राजा तोसे बेंत मतिन थरथराईंला”, कि “लगावै वाला हजारन में हईं, जानऽ ल / रहींला गोड़े पे तोहरा खसल सुनऽ त सही”। ताक़त की बात बहुत है इन ग़ज़लों में, और ताक़त को और ताक़त मिल जाती है जिन चीज़ों से — छूरी, कटारी, खंजर, करौली, बिछुआ, तरुआर, गोजी, चक्कू, बन्नूक वगैरह-वगैरह—उनकी भी भरमार हैं, लेकिन अमूमन तो ये सारे हथियार माशूक़ के ही हवाले हैं। उसका दूसरों से आँख लड़ाना कलेजे पर ज़हर की छूरी चलाने जैसा है, वही बिछुआ को धार देता रहता है, उसी के पास है ज़हर-बुझी तलवार, “ई सुरमा आँख में नाहीं तू घुलावत बाटऽ / दुतर्फी बिछुआ पै ई बाढ़ चढ़ावत बाटऽ // अतर ई देही में नाहीं तू लगावत बाटऽ / जहर के पानी में तरुआर बुझावत बाटऽ”। ज़ाहिर है कि जो हथियार हैं वे उठा लिए गए नहीं, डाल दिए गए हथियार हैं। कुलमिलाकर जो कथा बनती है, वह बदमाशी की नहीं है, बदमाशी से बहरियाने की है, गुंडागिरी के छक्के छूट जाने की है। प्रेम की ही वह अकथ कथा है, और अथक भी, जिसका रंग चढ़ जाए तो सारी-सारी रंगबाज़ियों के सारे-सारे रंग उतर जाएँ। फिर तो, “कासी, पराग, मथुरा, जगरनाथ, द्वारिका / बरिसन से हम फिरत हईं धावल तोरे बदे”, और “रोज खोजींला, नाहीं मिलतऽ, बुरा हौ लत्ती / तेग़ के लट्टू मतिन काहे नचावत बाटऽ”, और “सहर में, बाग में, ऊसर में, बन में, धरती पर / तूँ देखले हौअ बवंडर मतिन फिरत बाटी”, और “माथा पटक-पटक के रोईं ला तोरे बदे / ई आँख दुऔ भादो आ सावन बा आजकल”, और “पाँचो पकवान नीक नाहिं लगत बा रमधै / तिल क चेहरा के तोरे तेग़ भुखायल बाड़ैं...”।

इस भूख-भुखायल से जुड़ी एक बात यह भी है कि तेग़ अली के यहाँ खाने-खिलाने को बहुत-बहुत बार और बहुत-बहुत है। वो जो कहा जाता है कि ‘और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा’ उसके ‘और ग़म’ में ही शामिल है यह खाना-खिलाना भी। तेग़ अली के यहाँ खाने को रूखा-सूखा है, खिलाने को तरमाल। ज़ाहिर है कि इस ‘और ग़म’ का इस्तेमाल भी उनके यहाँ मुहब्बत के ही वास्ते है। ऐसे में जो स्वाद है वह न खाने के रूखे-सूखे में है, न खिलाने के तरमाल में, वह है, और बाक़ायदा स्वाद से आस्वाद बनकर, बार-बार के इस बयान में कि “खराई होई बजल आठ, चाभ ल हलुआ / हमें त सतुआ चबेना तयार बटलै बा” और “हम खरमिटाव कइली ह रहिला चबाय के / भेंवल धयल बा दूध में खाजा तोरे बदे” और “डन् कै के अपने रोज त रहिला चबाईंला / राजा के अपने खुरमा औ बुनिया चभाईंला // ठेंगे से तोरे ठोर्री औ रहिला चबाईंला / तोह के त राजा पूड़ी औ हलुआ खिआईंला” और “उड़ल करै ई करींला बिचार बहरी ओर / बसौंधी-सतुआ तोहार और हमार बहरी ओर”। यह भी बताया जाता है कि कितनी खटनी से प्रिय को पसंद इस पेट-पूजा को उपराया गया है, “बुनिया, बसौंधी, बरफी, बतासा लियाईंला / धूरे क रसरी रामधै हम बट तोरे बदे”।

यह भी नहीं कि सारा-का-सारा ध्यान महज़ क्या-खिला-दें क्या-पिला-दें पर ही टिका है, मुहब्बतेतर और भी बहुतेरी बातों का ख़याल रखा गया है, यह बात अलग है कि वह भी निर्भ्रांत रूप से मुहब्बतार्थ ही—“देईंला पहिना तोहें रातदिन में सब गहना / रजा तूँ जानेलऽ रैयत सोनार बटलै बा” और “जरदोजी जूता टोपी दुपट्टा बनारसी / सहुआ से लेलीं आज रजा जट तोरे बदे”। अपने लिए कमरी भी काफ़ी, प्रिय के लिए लाल दुशाला से कम कुछ नहीं, “अपने के लोई लेहली ह, कमरिऔ बा धइल / किनली ह रजा लाल दुसाला तोरे बदे।” इरादे और भी बहुतेरे हैं — “चढ़ जालैं कवनो दाँव पै सारे त लेईंला / कंचन क गोप मोती क माला तोरे बदे // मलिया से देलीं कह ऊ लियायल करी रजा / बेला चमेली जूही क गजरा तोरे बदे // झोला में लेहले पान तोरे सँग रहल करी / कह देली ह रिखइया तमोलिया तोरे बदे”। यह नहीं कि तन के सिंगार के लिए ही, मन के सिंगार के लिए भी काफ़ी कुछ है, “ले आवऽ गुदड़ी से करतार, जोड़ी औ मुरुचंग / चिकारा, ढोल, तमूरा तयार बटलै बा”। तनबढ़पन तो ख़ैर, एकाध ही जगह है, वह भी आज के साहित्यसिनेमादिक में जितना आमतौर पर हुआ करता है उससे कम ही है, लेकिन मनबढ़पन तो तेग़ अली के यहाँ कुछ इस क़दर लबालब और ठसाठस है कि “मंगर में अबकी रेती प रजवा तोरे बदे / जरदोजी क तनाईंला तँबुआ तोरे बदे // पारस मिलल बा बीच में गंगा के रामधै / सजवा देईंला सोने क बँगला तोरे बदे // संझा सबेरे घूमऽ छलावा बदल-बदल / काबुल से हम मँगौली ह घोड़ा तोरे बदे // अत्तर तू मल के रोज नहायल करऽ रजा / बीसन भरल धयल बा कराबा तोरे बदे // बुलबुल बटेर लाल लड़ावऽलैं दुकड़हा / हम काबुली मँगउली ह मेढ़ा तोरे बदे”। और कैसे सँपरेगी यह ज़रदोज़ी के तंबू और सोने के बंगले वाली साहबी? इसका फुलफ़ंतास जवाब है तेग़ अली के पास कि पारस मिल गया है मुझे, इस्माइल जोगी का संदूक़ भी ले लूँगा और इधर “खजाना कारूँ क राजा तयार बटलै बा”। यही नहीं, “सिखली ह एक फकीर से कुन्नन बनावै हम / सोने के सज देईंला छपरखट तोरे बदे”।

तो तय है कि प्रेम का यह वितान जितना ज़मीन पर है, आसमान में भी उससे कम नहीं है। और इसके ज़मीन पर होने के नाते भी, और आसमान में खिलने के नाते भी, जो खिंचाव बनता है वह प्रेम के प्रति ही है, न कि ‘इसके’ प्रेम के प्रति है या ‘उससे’ प्रेम के प्रति है। उस प्रेम के प्रति है जो हज़ार-हज़ार कामनाएँ लेकर भी बिना किसी मोल-तोल के भी, कभी-कभार के दरस-परस से भी राजी है, ‘किरपा किहल करऽ ए कन्हैया कबौं-कबौं’। यह ‘कबौं-कबौं’ न जाने कितनी-कितनी कसक समेटे हुए है। और कसक भी कैसी-कैसी! एक तो यही कि ‘कुन्नन तोहार मुखड़ा बनउलन ह रामजी’, और तुम हो कि अपनी नहीं, रामजी की इस कला पर कुंडली मार के बैठे हो! कि मेरे बारे में कुछ सोचते ही नहीं, रोज़ कहते हो कि आता हूँ और आज तक आ ही रहे हो, यह नहीं सोचते कि इस वादाख़िलाफ़ी के चलते कुछ कर बैठूँगा तो मुझे सात से चौदह साल तक की सजा हो सकती है! कसक कि “न घर तूँ आवऽ ल हमरे, न त बोलावेलऽ”। कि घर तो घर, मेरे टोले में भी, भूले भी कभी नहीं आए तुम, और ज़ुल्म इससे भी बढ़कर यह कि “औरन तें तौ मिलत हौ रजा धाय-धाय के”। कसक कि जो दिलासा देने वाली बात है वह उधर से भी भंग की तरंग में है, “कहऽ लैं रामधै बूटी के तार में राजा / मिले के तेग़ से अब बा बिचार बहरी ओर” और इधर से भी भंग की तरंग में ही है, “तार में बूटी के मिललऽ कि तोहे ले गइलीं / लामे-लामे जे बहुत सान बुझावत बाटऽ”। कसक इस बात की कि वही है जिसने मुझे मार डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी, और वह भी वही है, जिसके ध्यान में होने के चलते ही मैं मरने से रह गया।

ख़ास बात यह है कि यह जो कसक है उसमें दीनता तो है, हीनता किसी क़िस्म की नहीं है, जबकि दीनता जो है वह भी ख़ास कड़क क़िस्म वाली है। खिला-पिलाकर, पहना-उढ़ाकर प्रिय को राजी करने की कोशिश और अपनी तड़प का इज़हार ज़रूर है, अपनी चाहत का और उसके चलते जो साँसत है उसका, और जो राहत हासिल है, चाहे जैसे, जितना, उसका भी, बयान-बखान तो है, लेकिन है यह सबकुछ अपने लड़-भिड़ जाने में निःसंकोच होने की चाशनी में लिपटे रहने देते हुए। अनायास नहीं है कि बसौंधी, बर्फी के न्योते के साथ “सुनींला गैबी पै गोजी चलल, से सच होई / पनारू, नरकू और चिथरू से खार बटलै बा” जैसी प्रत्यक्षतः अप्रासंगिक-सी लगती सूचनाएँ भी अक्सर चस्पाँ कर दी गई हैं। यह अनजाने है तो काव्य-नायक के सहज स्वभाववश होने के नाते और जान-बूझकर है तो दबाव बनाने की महीन कूटनीति के नाते प्रशंसनीय है। चाहे रूप का बखान हो या रीझ का, खीझ का, मान-मनुहार का या उलाहनों का, अंतर्दशाओं का या अभिलाष का, ऐसा बहुत कुछ है, इस कविताई में जो एकदम-से अछूता नहीं है, लेकिन ऐसा भी बहुत कुछ है जो छूता बहुत है। जैसे शाइरी में छूट के ‘सरवा’, ‘सारे’ और ‘सारन’ के ऐसे इस्तेमाल “देके ‘सारन’ के बहाली तूँ घरे चल आवऽ / आज ना आय सकऽ कउनो बखत कल आवऽ // देखऽ चल जाला उहै ‘सरवा’ बतउले झाईं / देख के कैसन हमन्नन के हौ खड़कल आवऽ // ‘सारे’ पछिऔले चलल आवऽलैं झाँई देके / आगे हम जाईंला तू पीछे से लपकल आवऽ // कवनो ‘सरवा’ नाहीं समझाय के कहतें राजा / तेग़ से कवने बदे बाड़ऽ तूँ खड़कल आवऽ”। इसी तरह भोजपुरी का एक शब्द है खनहन। किसी चीज का अपने तमाम अतिरिक्तपन से मुक्त हो जाना उसका खनहन हो जाना है। इस खनहन का जहाँ तक मैं जानता हूँ, एक अश्रुतपूर्व उपयोग तेग़ अली ने किया है — “आवऽ ला जिउ में चूमीं गरे से लगा के यार / मुखड़ा तहार अइसनै ‘खनहन’ बा आजकाल।” शेर के एक मिसरे में जो कहता है कि “साथ परछाहीं मतिन राजा फिरींला दिनरात” वही उसी शेर के दूसरे मिसरे में जब यह दावा करता है “बनके पुतरी तोरे आँखिन में समायल बाटी” तो छू लेती है यह ख़ुशफ़हमी। और वह ख़ुशी भी छू लेती है जो “तिगैलैं रामधै हमहूके सैकड़न खेवा” की सचाई को अगले ही मिसरे में इस रूप में सामने लाते हुए छलक जाती है—“रहैलैं संगे जब राजा हमार बहरी ओर”। तेग़ अली के काव्य-नायक की रीझ किसी सुंदर के प्रति है, सो तो है ही, लेकिन वे यह आभास भी देते हैं कि सामान्य तौर पर तो वह सुंदरता के ही प्रति है। रिखइया तमोली के यहाँ, गंगा के पार, गैबी पर, लक्सा पर, नदी के तीर, यहाँ तक कि अखाड़ों में भी वह इस सौंदर्य नाम की चीज़ से तंग है, जिसका नतीजा है यह कि “सुनरका सारे गिरावैलैं हमके गोड़े पर / कहै के बाँका बहादुर हई आ मल् बाटी”। यह माशूक से बतियाते-बतियाते, ‘सुनरका सारे’ से, माशूकों की पूरी बिरादरी से ही, बतियाने लगने जैसा है, और ठीक इसी तरह कभी-कभी वह आशिक़ की तरफ़ से ही नहीं, आशिकों की पूरी बिरादरी की तरफ़ से अपनी शिकायत दर्ज करता है, “धैके कोदो तूँ करेजा पै दरऽ ल बरबस / ई ‘हमन्नन’ के भला काहे मुआवत बाटऽ”। लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या आशिक़-माशूक़ से अलग कोई बात तेग़ के यहाँ है ही नहीं? वैसे तो इन ग़ज़लों में भी कई शेर ऐसे हैं, जैसे कि तमाम लड़ाइ-भिड़ाई और भौकाल के बाद का यह अहसास कि “लड़ाई झगड़ा बा कोई से औ न मेल-मिलाप / एही के जानींला ए तेग़ हम महा सुन्नर”। जैसे जरदोजी के तंबू तनवा देने के दावेदार के कलेजे से कढ़ आई यह बात कि “मारे महँगी के हिंया सूख के भइलीं चरखा / कहैलैं सब केहू दुबरी त मोटायल बाड़ैं”। और एक पूरी ग़ज़ल तो सिर्फ़ और सिर्फ़ गोजी को ही समर्पित है—लगावै वाला हईं हम हजार में गोजी / सहर में बस्ती में बन में उजार में गोजी / ई गोजी रामधै संजोग से लगल हाथे / रहऽ ला जंगलै बन या पहार में गोजी...। हालाँकि, कैसे कहे कोई कि इसमें भी, गोजी से ही सही, इश्क़ का ही बयान नहीं है!

वैसे, इस बदमाश-दर्पण की पहली ग़ज़ल का पहला शेर है, “आयल करऽ निराले में राजा कबौं-कबौं / किरपा किहल करऽ ए कन्हैया कबौं-कबौं” और अंतिम ग़ज़ल का अंतिम शेर है, “कइसन बना-बना के बिगारऽला मूरती / ए तेग़ तोसे पूछींला कइसन कोंहार बाय”। बदमाश-दर्पण इन्हीं दोनो के बीच है। और दुनिया भी। दुनिया भर की दुनियादारी भी। और ज़ाहिर है कि उस दुनियादारी में जो बदमाशियाँ हुआ करती हैं, वे भी। और उनमें ख़ास बनारस वाली भी, तब के बनारस वाली भी।

[तेग़ अली की उद्धृत काव्य-पंक्तियाँ ‘बदमाश-दर्पण’, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, प्रथम संस्करण, 2002 से।]

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट