Font by Mehr Nastaliq Web

कलाकार पर उद्धरण

एक निगाह से देखना कलाकार की निगाह से देखना नहीं है।

अज्ञेय
  • संबंधित विषय : आँख

चेख़व की तरह मुझे भी मनुष्य के भविष्य पर आस्था है। मेरी कला मनुष्य को निराश नहीं कर सकती। रवींद्रनाथ ठाकुर का यह संदेश में कभी नहीं भूल सकूंगा कि 'मानुषेर विश्वास हरण पाप।'

ऋत्विक घटक

एक सुभाषित है—'कवितारसमाधुर्य्यम् कविर्वेत्ति’, कविता का रस-माधुर्य सिर्फ़ कवि जानता है। ठीक उसी प्रकार सुर में सुर मिलना चाहिए, नहीं तो वाद्ययंत्र कहेगा ‘गा’ और गले से निकलेगा ‘धा’।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

कलावान् गुणीजन भी जहाँ पर वास्तव में गुणी होते हैं; वहाँ पर वे तपस्वी होते हैं, वहाँ यथेच्छाचार नहीं चल सकता, वहाँ चित्त की साधना और संयम—है ही है।

रवींद्रनाथ टैगोर

अभिव्यक्ति का अभ्यास कलाकार का एक मुख्य कर्त्तव्य है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

सच्चा लेखक जितनी बड़ी ज़िम्मेदारी अपने सिर पर ले लेता है, स्वयं को उतना अधिक तुच्छ अनुभव करता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

मौत तारकोल-सी स्याह है, पर रंग रोशनी से भरे होते हैं। एक चित्रकार होने के नाते हरेक को रोशनी की किरणों को साथ लेकर काम करना चाहिए।

एडवर्ड मुंक

एक फ़ोटोग्राफ़र का जो कौशल होता है, उसका योग वस्तु के बाह्य रूप के साथ होता है और एक शिल्पी का जो योग होता है, वह उसके भीतर-बाहर के साथ वस्तु के भीतर-बाहर का योग होता है, और उस योग का पंथ होता है कल्पना और यथार्थ घटना—दोनों का समन्वय कराने वाली साधना।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

अतीत, परंपरा, वर्तमान, भविष्य : इनकी लगातार उपस्थिति का बोध, या इनमें से किसी एक की अति-उपस्थिति का बोध निर्धारित करता है कि एक कलाकार अपने समय में मनुष्य की स्थिति और उसकी आधुनिकता को, अपनी रचनाओं में किस तरह ग्रहण और परिभाषित करता है।

कुँवर नारायण

कवि, लेखक और कलाकार यदि ज्ञान में टुटपुँजिए हों, तो उनकी कृतियों में गंभीरता नहीं सकती।

राहुल सांकृत्यायन

रचनात्मक दृष्टि से डाक्युमेंटरी एक प्रवृत्ति का नाम है। सत्य यथार्थ में निहित होता है, और कैमरा भौतिक यथार्थ के सभी पक्षों को पकड़ने में विशेष सक्षम होता है। यह कलाकार का कर्तव्य है कि वह यथार्थ को अंकित कर, कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करे।

ऋत्विक घटक

मैक्स रेनहार्ड ने कहा है कि 'कलाकार को अपने बचपन का एक अंश अपनी जेब में रख लेना चाहिए।' चैप्लिन इसे प्रचुर मात्रा में संभाल कर रख सके। आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत के पीछे भी यही तत्त्व सक्रिय था।

ऋत्विक घटक

कलाकार का काम मानव हृदय में प्रकाश भेजना है।

जॉर्ज सैंड

वे कभी इस बात पर ग़ौर नहीं करेंगे कि ये कलाकृतियाँ मुश्किल घड़ियों और बहुत नाज़ुक पलों में बनाई गईं, कि ये कलाकृतियाँ कोरी आँखों से बिताई गईं रातों का नतीजा हैं, कि इन कलाकृतियों ने मुझसे मेरे ख़ून की क़ीमत वसूली है और मेरी शिराओं को कमज़ोर किया है… हाँ, वे कभी इस बात पर ग़ौर नहीं करेंगे।

एडवर्ड मुंक

लेखक का दिल, कवि का दिल, कलाकार का दिल, संगीतकार का दिल हमेशा टूटता रहता है। हम उस टूटी खिड़की से दुनिया को देखते हैं…

एलिस वॉकर
  • संबंधित विषय : दिल

महान् कलाकारों की रचनाएँ तो हमारे बीच उदित और अस्त होने वाले सूर्य जैसी हैं। प्रत्येक महान् कृति जो आज अस्ताचल की ओर चली गई है, वही कल उदयाचल में प्रकट होगी।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन

'आदानेक्षिप्रकारिता प्रतिदाने चिरायुता' अर्थात् ग्रहण करने में शीघ्रता करनी चाहिए किंतु जब दूसरों को देने का अवसर आए तब उसमें देर लगानी चाहिए। शिल्पी पर शास्त्रकार ने यह जो आदेश लागू किया है, उसका एक अर्थ है कि वस्तु के कौशल और रस को चटपट ग्रहण करना चाहिए। किंतु प्रस्तुत करते समय सोच-समझकर चलना चाहिए।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

मैं अर्थछठाओं के पीछे भागता हूँ—उन दुर्गाह्य क्षणभंगुर अर्थछठाओं के पीछे। उन्हीं में तो जीवन की चिंगारियाँ छिपी होती है, नाच-गाने भी गले की फाँस नहीं होते, वे रचनात्मक तत्व होते हैं और अगर कथ्य संदर्भ की मांग हो, तो उनमें अनगिनत संभानाएँ होती हैं। अगर भारत में कोई सच्चा गंभीर कलाकार; इस पर अपने तमाम बुद्धि वैभव को दाँव पर लगा देगा, आख़िर मिजोगुची और कुरोसावा या किनुगासा जैसे लोगों ने नोह और काबुकी को अपने हाथों निचोड़कर ही तो उससे अपने नितांत वैयक्तिक वक्तव्य अर्जित किए थे।

ऋत्विक घटक

लोगों को कलाकार की निजी मंशा को जानने की ज़रूरत नहीं है। उसका काम ही सब कुछ दर्शाता है।

सूज़न सॉन्‍टैग

साहित्य या कला-रचना में मनुष्य की जिस चेष्टा की अभिव्यक्ति होती है, उसे कुछ लोग मनुष्य की खेल करने की प्रवृत्ति जैसा मानते हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर

कोई भी भगोड़ा और कलाकार बनकर एक ठोस नागरिक, एक ईमानदार और सम्मानजनक आदमी नहीं हो सकता।

हरमन हेस

इस पर हमेशा बहस की जाती है कि एक आर्टिस्ट को क्या सिर्फ प्रॉब्लम सामने रखनी चाहिए या उसके समाधान की ओर भी इशारा करना चाहिए। मुझे लगता है कि ये चीज़ों की तरफ़ बहुत बचकाने ढंग से देखने का तरीक़ा है। अगर आर्टिस्ट को समाधान सामने रखने की ज़रूरत महसूस होती है, तो उसका स्वागत है। लेकिन अक्सर वह समस्या बताता है और मामले को वहीं छोड़ देता है। ये दोनों ही ट्रीटमेंट समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। हम किसी एक पर आशावादी और दूसरे पर निराशावादी का लेबल नहीं लगा सकते हैं। केंद्रीय बिंदु यह है कि जो भी फ़िल्म की विषय-वस्तु और रचनाकार के दिमाग़ में से सहज रूप से विकसित होता है, वो पूरी तरह स्वीकार्य है। लेकिन जो भी उभरे, वो स्वतः होना चाहिए। सवाल यह है कि क्या वो आर्टिस्ट जीवन और इंसानों को लेकर पक्षपाती है या नहीं? अगर वो है, तो फिर ये प्रॉब्लम कभी नहीं होती।

ऋत्विक घटक

एक छोटे कलाकार के पास एक महान कलाकार के सभी त्रासिक दुःख और संताप होते हैं और वह महान कलाकार नहीं होता।

गर्ट्रूड स्टाइन
  • संबंधित विषय : दुख

कला की रचना-प्रक्रिया की दो अवस्थाएँ होती हैं। एक तो अरूप भावनाओं की रूपात्मक अनुभूति, जो पूर्णतः मानसिक प्रक्रिया है। दूसरी, बिंबात्मक मानसिक अभिव्यक्ति की ध्वनि, रंग, रेखाओं, शब्दों आदि के माध्यम से बाह्याभिव्यक्ति, जिससे कलाकृति का निर्माण होता है।

मैनेजर पांडेय

सुरूप-कुरूप दोनों को मिलाकर सुंदर की अखंड मूर्ति की कल्पना करना कठिन ज़रूर है किंतु मनुष्य के लिए एकदम असंभव है, यह नहीं कहा जा सकता है। भक्त, कवि और आर्टिस्ट—इनके लिए सुंदर-असुंदर जैसी कोई चीज़ है ही नहीं, सभी चीज़ों और भावों में जो वस्तु नित्य है, उसी को वे सुंदर रूप में मानते हैं।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

चैप्लिन की प्रतिभा का उत्कर्ष हम उसकी मूक फ़िल्मों में ही देख सकते हैं, ख़ास तौर से उसकी लघु फ़िल्मों में। मुझे लगता है कि चैप्लिन को मौन, मूक अभिनय और मूक फ़िल्मों की रचनाप्रक्रिया से गहरा लगाव था। ध्वनि उसके तर्क को ही बदल देती, उसकी प्रभावोत्पादकता में ख़लल डालती।

ऋत्विक घटक

महाकवियों की तो कला चेरी होती है, जब कि मध्यम कोटि के कवियों के लिए वह सहायक दिखाई देती है। निम्न कोटि के कवियों को तो शास्त्र का आधार लेकर ही जीवित रहना पड़ता है।

रांगेय राघव

हर आर्टिस्ट को एक दर्दभरी निजी प्रक्रिया से गुज़रने के बाद, अपना ख़ुद का सच समझना होता है। और यही है, जो उसे अभिव्यक्त करना है।

ऋत्विक घटक

कलाकार के लिए पूरा यथार्थ कच्चा माल है—उसका माध्यम, जिससे वह नया कुछ रचता है। यह 'नया कुछ' परिभाषित किया जा सकता है—सुंदर के संदर्भ में भी और उपयोगिता के संदर्भ में भी : बिल्कुल बाहर भी परिभाषित किया जा सकता है, इस तरह कि तो सुंदर हो उपयोगी, केवल 'नया कुछ' हो।

कुँवर नारायण

कभी भी एक कलाकार से उसके काम के बारे में सवाल करें। क्योंकि he is always biased...इससे कोई फ़ायदा नहीं। पसंद हो या नापसंद, प्रतिक्रियाएँ आपकी अपनी हैं। कुछ लोग ग़ुस्सा हो जाएँगे, कुछ प्रसन्न। इससे मुझे क्या लेना-देना?

ऋत्विक घटक

जिन्हें तालीम नहीं मिली है; ऐसे अपढ़ मनुष्य को जो अपना रस नहीं पहुँचा सकता, उसका ख़ुद का रस का झरना सूख गया है—ऐसा मैं तो मानता हूँ।

विनोबा भावे
  • संबंधित विषय : रस

अगर एक कलाकार निडर है और कायर नहीं, तो यह या वह कुछ भी कर सकता है।

ऋत्विक घटक
  • संबंधित विषय : कला
    और 1 अन्य

अभिनेता ही ईमानदार ढोंगी होते हैं। उनका जीवन एक संकल्पित स्वप्न है और उनकी आकांक्षाओं की चरम परिणति है स्वयं के अतिरिक्त कुछ होना। वे दूसरे मनुष्यों के भाग्यों की पोशाकें पहनते हैं। उनके अपने विचार भी अपने नहीं होते।

विलियम हेज़लिट

कोई कलाकृति जितनी ज़्यादा कल्पनाशील होती है, उतनी ही वह हमें कलाकार के दृश्य-जगत् के अनुभवों के बारे में बताती है।

जॉन बर्जर

एक सामान्य मनुष्य के मन पर सुंदर-असुंदर की जैसी प्रतिक्रिया होती है, वैसी ही प्रतिक्रिया एक कलाकार के मन पर भी होती है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

आप शिक्षित लोग और कलाकारों के पास, निस्संदेह, आपके सिर में श्रेष्ठ चीज़ें हैं; लेकिन आप भी बाक़ी की तरह इंसान हैं।

हरमन हेस

मधुकर मधु लेकर तृप्त हो जाए; इससे फूल को जितना आनंद मिलता है, इसकी अपेक्षा एक शिल्पी की सजीव आत्मा, एक समझदार पारखी इससे भी आनंदित होती है, यह सत्य है, किंतु यह उसका ऊपरी पाना होता है। मिल जाए तो भी अच्छा है, मिले भी अच्छा।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
  • संबंधित विषय : कला

कलाकार अंतर में उत्थित उन तत्त्वों को ही प्रधानता देता है, जो उसे महत्त्वपूर्ण प्रतीत होते है। यह महत्त्व-भावना केवल सब्जैक्टिव नहीं है, यह महत्त्व-भावना उस वर्ग की मनोवैज्ञानिक स्थिति के आधार पर खड़ी हुई मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के अनुसार बनती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

एक शिल्पी जिसे छू लेता है, वही सोना हो जाता है। हालाँकि बेचारा किसी भी दिन अपने बाल-बच्चों के शरीर को उस सोने से कभी लाद नहीं पाता।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

एक इतिहासकार का मापदंड घटनाप्रधान होता है, डॉक्टर का मापदंड शरीर प्रधान होता है, और जो रचनाकार होते हैं, उनका मापदंड अघटन-घटना-पदीयसी माया प्रधान होता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

यह सिर्फ़ मेरी बात नहीं है, दुनिया में कोई भी गंभीर कलाकार; जो बंगाल में या कहीं और गंभीर काम किया हो, जिसका नाम आपने सुना हो—उनमें से हर एक व्यक्ति एक व्यक्ति से प्रेरित है और उसका नाम सर्गेई आइज़ेंस्टाइन है।

ऋत्विक घटक

पश्चिम का कलाकार रूप (फ़ार्म) की खिड़की से देखकर वस्तु को संवेद्य बनाता है, उसका संप्रेषण करता है। भारत का कलाकार प्रतीक की खिड़की से वस्तु को नहीं, वस्तु के पार वस्तु-सत् को संवेद्य बनाता है।

अज्ञेय

कलाकार किसी भी देश का हो, वर्तमान से आगे बढ़कर अधिक उन्नत भविष्य के दर्शन करता है।

हरिशंकर परसाई

कविता की तरह चित्रकला भी मनुष्य की कोमल भावनाओं का परिणाम है। जो काम कवि करता है, वही चित्रकार करता है, कवि भाषा से, चित्रकार पेंसिल या कलम से। सच्ची कविता की परिभाषा यह है कि तस्वीर खींच दे। उसी तरह सच्ची तस्वीर का यह गुण है कि उसमें कविता का आनंद आए। कवि कान के माध्यम से आत्मा को सुख पहुँचाता है और चित्रकार आँख के द्वारा और चूँकि देखने की शक्ति सुनने की अपेक्षा अधिक कोमल और संवेदनशील होती है, इसीलिए जो बात चित्रकार एक चिन्ह, एक रेखा, या ज़रा से रंग से पूरा कर देगा, वह कवि की सैकड़ों पंक्तियों से अदा हो सकेगी।

प्रेमचंद

लेखक-कलाकार भले ही इस तथ्य को अस्वीकार कर दे कि वह बाह्म अनुरोधों या आग्रहों को कदापि नहीं मानता, किंतु सच तो यह है कि वह अपने ढंग से उन्हें किसी किसी रूप में स्वीकार करता रहता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

कला के स्वायत्त क्षेत्र का स्वातंत्र्य तभी सार्थक है, जब कलाकार में आंतरिक सम्पन्नता हो। ऐसी आंतरिक सम्पन्नता, जो वास्तविक जीवन-जगत् के संवेदनात्मक आभ्यंतरीकरण से उत्पन्न हुई है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

समीक्षक के अहं-बद्ध विचारों का तुषार जिस भाँति उसके उग्र अहंकार का ही द्योतक होता है, उसी प्रकार कलाकार का अहंकार भी एक बड़ी अजीब चीज़ होती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

सत् और असत् का विवेक नित्यशः इतना सीधा और सरल नहीं होता कि साहित्य-सृजन की जो वास्तविक जीवन-भूमि है, उससे उस वास्तविक जीवन-भूमि की विविध परिस्थितियों तथा प्रक्रियाओं से, साहित्यिक कलाकारों के बाह्य तथा अंतर्जीवन से—इन सबसे या इनमें से किसी एक से, असंपृक्त और संबंधहीन बनकर, उनके और अपने बीच लंबे-चौड़े फ़ासले क़ायम करके, वह समीक्षकीय सत्-असत्-विवक—एक अनिवार्यतः होने वाले परिणाम की भाँति अपने ही आप सत्य प्राप्त कर सके।

गजानन माधव मुक्तिबोध

सच्चा संवेदनशील कलाकार, अपने को बाह्म प्रभावों को ग्रहण करने के लिए छुट्टा छोड़ देता है, या उसे छोड़ देना चाहिए।

गजानन माधव मुक्तिबोध

कवि का कार्य-क्षेत्र चित्रकार से अधिक विस्तृत है।

गजानन माधव मुक्तिबोध