एक सुभाषित है—'कवितारसमाधुर्य्यम् कविर्वेत्ति’, कविता का रस-माधुर्य सिर्फ़ कवि जानता है। ठीक उसी प्रकार सुर में सुर मिलना चाहिए, नहीं तो वाद्ययंत्र कहेगा ‘गा’ और गले से निकलेगा ‘धा’।
कलावान् गुणीजन भी जहाँ पर वास्तव में गुणी होते हैं; वहाँ पर वे तपस्वी होते हैं, वहाँ यथेच्छाचार नहीं चल सकता, वहाँ चित्त की साधना और संयम—है ही है।
-
संबंधित विषय : आत्म-अनुशासनऔर 3 अन्य
अभिव्यक्ति का अभ्यास कलाकार का एक मुख्य कर्त्तव्य है।
-
संबंधित विषय : अभिव्यक्तिऔर 3 अन्य
सच्चा लेखक जितनी बड़ी ज़िम्मेदारी अपने सिर पर ले लेता है, स्वयं को उतना अधिक तुच्छ अनुभव करता है।
मौत तारकोल-सी स्याह है, पर रंग रोशनी से भरे होते हैं। एक चित्रकार होने के नाते हरेक को रोशनी की किरणों को साथ लेकर काम करना चाहिए।
एक फ़ोटोग्राफ़र का जो कौशल होता है, उसका योग वस्तु के बाह्य रूप के साथ होता है और एक शिल्पी का जो योग होता है, वह उसके भीतर-बाहर के साथ वस्तु के भीतर-बाहर का योग होता है, और उस योग का पंथ होता है कल्पना और यथार्थ घटना—दोनों का समन्वय कराने वाली साधना।
वे कभी इस बात पर ग़ौर नहीं करेंगे कि ये कलाकृतियाँ मुश्किल घड़ियों और बहुत नाज़ुक पलों में बनाई गईं, कि ये कलाकृतियाँ कोरी आँखों से बिताई गईं रातों का नतीजा हैं, कि इन कलाकृतियों ने मुझसे मेरे ख़ून की क़ीमत वसूली है और मेरी शिराओं को कमज़ोर किया है… हाँ, वे कभी इस बात पर ग़ौर नहीं करेंगे।
लेखक का दिल, कवि का दिल, कलाकार का दिल, संगीतकार का दिल हमेशा टूटता रहता है। हम उस टूटी खिड़की से दुनिया को देखते हैं…
महान् कलाकारों की रचनाएँ तो हमारे बीच उदित और अस्त होने वाले सूर्य जैसी हैं। प्रत्येक महान् कृति जो आज अस्ताचल की ओर चली गई है, वही कल उदयाचल में प्रकट होगी।
कलाकार का काम मानव हृदय में प्रकाश भेजना है।
लोगों को कलाकार की निजी मंशा को जानने की ज़रूरत नहीं है। उसका काम ही सब कुछ दर्शाता है।
'आदानेक्षिप्रकारिता प्रतिदाने चिरायुता' अर्थात् ग्रहण करने में शीघ्रता करनी चाहिए किंतु जब दूसरों को देने का अवसर आए तब उसमें देर लगानी चाहिए। शिल्पी पर शास्त्रकार ने यह जो आदेश लागू किया है, उसका एक अर्थ है कि वस्तु के कौशल और रस को चटपट ग्रहण करना चाहिए। किंतु प्रस्तुत करते समय सोच-समझकर चलना चाहिए।
एक छोटे कलाकार के पास एक महान कलाकार के सभी त्रासिक दुःख और संताप होते हैं और वह महान कलाकार नहीं होता।
सुरूप-कुरूप दोनों को मिलाकर सुंदर की अखंड मूर्ति की कल्पना करना कठिन ज़रूर है किंतु मनुष्य के लिए एकदम असंभव है, यह नहीं कहा जा सकता है। भक्त, कवि और आर्टिस्ट—इनके लिए सुंदर-असुंदर जैसी कोई चीज़ है ही नहीं, सभी चीज़ों और भावों में जो वस्तु नित्य है, उसी को वे सुंदर रूप में मानते हैं।
कोई भी भगोड़ा और कलाकार बनकर एक ठोस नागरिक, एक ईमानदार और सम्मानजनक आदमी नहीं हो सकता।
साहित्य या कला-रचना में मनुष्य की जिस चेष्टा की अभिव्यक्ति होती है, उसे कुछ लोग मनुष्य की खेल करने की प्रवृत्ति जैसा मानते हैं।
-
संबंधित विषय : अभिव्यक्तिऔर 4 अन्य
अभिनेता ही ईमानदार ढोंगी होते हैं। उनका जीवन एक संकल्पित स्वप्न है और उनकी आकांक्षाओं की चरम परिणति है स्वयं के अतिरिक्त कुछ होना। वे दूसरे मनुष्यों के भाग्यों की पोशाकें पहनते हैं। उनके अपने विचार भी अपने नहीं होते।
एक सामान्य मनुष्य के मन पर सुंदर-असुंदर की जैसी प्रतिक्रिया होती है, वैसी ही प्रतिक्रिया एक कलाकार के मन पर भी होती है।
आप शिक्षित लोग और कलाकारों के पास, निस्संदेह, आपके सिर में श्रेष्ठ चीज़ें हैं; लेकिन आप भी बाक़ी की तरह इंसान हैं।
एक इतिहासकार का मापदंड घटनाप्रधान होता है, डॉक्टर का मापदंड शरीर प्रधान होता है, और जो रचनाकार होते हैं, उनका मापदंड अघटन-घटना-पदीयसी माया प्रधान होता है।
एक शिल्पी जिसे छू लेता है, वही सोना हो जाता है। हालाँकि बेचारा किसी भी दिन अपने बाल-बच्चों के शरीर को उस सोने से कभी लाद नहीं पाता।
मधुकर मधु लेकर तृप्त हो जाए; इससे फूल को जितना आनंद मिलता है, इसकी अपेक्षा एक शिल्पी की सजीव आत्मा, एक समझदार पारखी इससे भी आनंदित होती है, यह सत्य है, किंतु यह उसका ऊपरी पाना होता है। मिल जाए तो भी अच्छा है, न मिले भी अच्छा।
कलाकार अंतर में उत्थित उन तत्त्वों को ही प्रधानता देता है, जो उसे महत्त्वपूर्ण प्रतीत होते है। यह महत्त्व-भावना केवल सब्जैक्टिव नहीं है, यह महत्त्व-भावना उस वर्ग की मनोवैज्ञानिक स्थिति के आधार पर खड़ी हुई मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के अनुसार बनती है।
पश्चिम का कलाकार रूप (फ़ार्म) की खिड़की से देखकर वस्तु को संवेद्य बनाता है, उसका संप्रेषण करता है। भारत का कलाकार प्रतीक की खिड़की से वस्तु को नहीं, वस्तु के पार वस्तु-सत् को संवेद्य बनाता है।
लेखक-कलाकार भले ही इस तथ्य को अस्वीकार कर दे कि वह बाह्म अनुरोधों या आग्रहों को कदापि नहीं मानता, किंतु सच तो यह है कि वह अपने ढंग से उन्हें किसी न किसी रूप में स्वीकार करता रहता है।
कविता की तरह चित्रकला भी मनुष्य की कोमल भावनाओं का परिणाम है। जो काम कवि करता है, वही चित्रकार करता है, कवि भाषा से, चित्रकार पेंसिल या कलम से। सच्ची कविता की परिभाषा यह है कि तस्वीर खींच दे। उसी तरह सच्ची तस्वीर का यह गुण है कि उसमें कविता का आनंद आए। कवि कान के माध्यम से आत्मा को सुख पहुँचाता है और चित्रकार आँख के द्वारा और चूँकि देखने की शक्ति सुनने की अपेक्षा अधिक कोमल और संवेदनशील होती है, इसीलिए जो बात चित्रकार एक चिन्ह, एक रेखा, या ज़रा से रंग से पूरा कर देगा, वह कवि की सैकड़ों पंक्तियों से न अदा हो सकेगी।
कला के स्वायत्त क्षेत्र का स्वातंत्र्य तभी सार्थक है, जब कलाकार में आंतरिक सम्पन्नता हो। ऐसी आंतरिक सम्पन्नता, जो वास्तविक जीवन-जगत् के संवेदनात्मक आभ्यंतरीकरण से उत्पन्न हुई है।
सत् और असत् का विवेक नित्यशः इतना सीधा और सरल नहीं होता कि साहित्य-सृजन की जो वास्तविक जीवन-भूमि है, उससे उस वास्तविक जीवन-भूमि की विविध परिस्थितियों तथा प्रक्रियाओं से, साहित्यिक कलाकारों के बाह्य तथा अंतर्जीवन से—इन सबसे या इनमें से किसी एक से, असंपृक्त और संबंधहीन बनकर, उनके और अपने बीच लंबे-चौड़े फ़ासले क़ायम करके, वह समीक्षकीय सत्-असत्-विवक—एक अनिवार्यतः होने वाले परिणाम की भाँति अपने ही आप सत्य प्राप्त कर सके।
-
संबंधित विषय : गजानन माधव मुक्तिबोधऔर 3 अन्य
सच्चा संवेदनशील कलाकार, अपने को बाह्म प्रभावों को ग्रहण करने के लिए छुट्टा छोड़ देता है, या उसे छोड़ देना चाहिए।
कवि का कार्य-क्षेत्र चित्रकार से अधिक विस्तृत है।
समीक्षक के अहं-बद्ध विचारों का तुषार जिस भाँति उसके उग्र अहंकार का ही द्योतक होता है, उसी प्रकार कलाकार का अहंकार भी एक बड़ी अजीब चीज़ होती है।
किसी पुस्तक को हम साहित्य या काव्य की उपाधि तभी दे सकते हैं; जब जो कुछ उसमें लिखा गया है, वह कला के उद्देश्यों की पूर्ति करता हो।
हमारी आँकों के समक्ष प्रकृति की जो लीला चल रही है, उसमें एक कारीगर और एक रूपांकन में दक्ष व्यक्ति इन दोनों के हाथ एक साथ काम करते हैं।
यह कहना बिल्कुल ग़लत है कि कलाकर के लिए राजनैतिक प्रेरणा कलात्मक अनुभूति नहीं है, बशर्ते कि वह सच्ची वास्तविक अनुभूति हो—छद्मजाल न हो।
जब विशाल मन विराट सुंदरता को पकड़ना चाहता है तब बड़ी मुक्ति की उसे ऐकांतिक रूप से ज़रूरत पड़ती है। किंतु जहाँ पर मन अत्यंत छोटा हो, वहाँ कला की दृष्टि से यह बड़ी स्वाधीनता देने का अर्थ है, बच्चे के हाथ में आग की मशाल देना।
इंप्रेशनिस्टिक ढंग का चित्रकार, जीवन की उलझी हुई स्थितियों का चित्रण नहीं कर सकता—वह उसके किसी दृश्य-खंड को ही प्रस्तुत कर सकता है।
जो आदमी सच्चा कलाकार है, वह स्वार्थमय जीवन का प्रेमी नहीं हो सकता।
एक शिल्पी की अपेक्षा संसार में एक कारीगर की ही वाहवाह अधिक होती है, क्योंकि एक कारीगर वाहवाही पाकर ही कुछ गढ़ता है, और एक शिल्पी गढ़ता चलता है अपने काम के साथ, अपने को खिलता हुआ महसूस करते-करते।
जो बिल्कुल कलाकार नहीं है, सिर्फ़ उसके लिए ही अलग और खंडित भाव के एक आदर्श सौंदर्य की कल्पना करना संभव है।
कला हमेशा मनुष्य का चुनाव करती है, जो मूर्त है, कला सैधान्त्तिक नहीं होती।
कलाकार भाषा का भी निर्माण करता है।
-
संबंधित विषय : गजानन माधव मुक्तिबोधऔर 2 अन्य
विश्व के प्रत्येक स्पंदन से कलाकार का संबंध है।
-
संबंधित विषय : गजानन माधव मुक्तिबोधऔर 2 अन्य
मनुष्य केवल कलाकार ही नहीं होता, वह दार्शनिक भी होता है।
कलाकार होने मात्र से, रचनाकार होने मात्र से कोई व्यक्ति श्रेष्ठ वांछनीयता का अधिकारी नहीं होता।
-
संबंधित विषय : गजानन माधव मुक्तिबोधऔर 2 अन्य
बड़े शहरों की जो बात मुझे सबसे ज़्यादा बुरी लगती है, वह यह कि वहाँ का कलाकार अपनी कला को बेचना चाहता है। उसके भीतर अपनी कला की रचना करने से ज़्यादा, बेचने का भाव भरा होता
कलाकार क्या है? वह अपने युग की स्फूर्ति के प्रकाश के रंग में डूबी भगवान की प्राणवान प्रेरक और कल्पक कूँची है।
कलाकार भटकता न रहे, उद्भ्रांत न रहे, किसी प्रयोजन में नियोजित कर दिया जाए तो वह बड़ी शक्ति बन जाता है। नहीं तो वह अपने को ही खाता है।
हमारे लेखकों व कलाकारों को अपना साहित्यिक व कलात्मक सृजन-कार्य करना होगा, लेकिन उनका सर्वप्रथम कार्य है जनता को समझना और उसका अच्छी तरह परिचय प्राप्त कर लेना।
-
संबंधित विषय : उत्पीड़ित लोगऔर 1 अन्य
कष्ट-कल्पित रचना और सहज रचना, दोनों को अगर पास-पास रखा जाए तो समझ में आ जाता है कि कहाँ पर रचनाकर अपनी शक्ति के प्रयोग के विषय में थोड़ा अधिक सचेत रहा है और कहाँ पर वह इस विषय में ज़रा भी सजग नहीं रहा है।
संबंधित विषय
- अभिव्यक्ति
- आँख
- आलोचक
- आलोचना
- इतिहास
- उत्पीड़ित लोग
- उद्देश्य
- एहसास
- कल्पना
- कला
- कलाकार
- कवि
- कवि पर कवि
- कविता
- गजानन माधव मुक्तिबोध
- जिज्ञासा
- जीवन
- तस्वीर
- दुख
- नियति
- प्रकृति
- प्रतिरोध
- भाषा
- मज़दूर
- मनुष्य
- मनोविज्ञान
- महत्त्वाकांक्षा
- महात्मा गांधी
- महापुरुष
- यथार्थ
- रचनाकार
- वृद्धावस्था
- विचार
- विज्ञान
- शक्ति
- शहर
- शिल्प
- संघर्ष
- सृजन
- स्वतंत्रता
- संवेदना
- स्वार्थ
- संसार
- सामान्यता
- साहित्य
- सीखना
- सौंदर्य