पुरुष का जीवन संघर्ष से आरंभ होता है और स्त्री का आत्मसमर्पण से।
हमारी आँखें सामने हैं, पीछे नहीं। सामने बढ़ते रहो और जिसे तुम अपना धर्म कहकर गौरव का अनुभव करते हो, उसे कार्यरूप में परिणत करो।
स्त्रियाँ जब प्रेम में आकर सही या ग़लत कुछ भी ठान लेती हैं, तो उनको ऐसा करने से ब्रह्मा भी नहीं रोक सकता है।
अभ्यास के बिना साध्य की प्राप्ति हो, यह संभव नहीं है।
पहली नज़र को प्रेम मानकर समर्पण कर देना भी पागलपन है।
पहली नज़र को प्रेम मानकर समर्पण कर देना भी पागलपन है।
हर चीज़ के लिए समर्पित रहो, हृदय खोलो, ध्यान देकर सुनो।
किसी स्वार्थपूर्ण इरादे के बिना, इहलोक या परलोक में कोई पुरस्कार पाने की इच्छा के बिना, बिल्कुल अनासक्त भाव से मैंने अपना जीवन आज़ादी के उद्देश्य के लिए अर्पित किया है, क्योंकि मैं ऐसा किए बिना रह नहीं सका।
कार्य करने की अटूट शक्ति होनी चाहिए। जो कुछ तुम करते हो, उस समय के लिए उसे अपनी पूजा समझो।
अकेले रहने पर ही मैं अधिक अच्छी तरह से कार्य कर सकता हूँ, और जब मैं संपूर्णतः निःसहाय रहता हूँ, तभी मेरी देह एवं मन सबसे अधिक अच्छे रहते हैं।
पहले समर्पण करो और फिर देखो।
जो अपने कर्त्तव्यों का पालन नहीं करता, उसे 'स्वत्व' की दुहाई देने तक का कोई स्वत्व नहीं, और जो अपने कर्तव्य की ओर पूरी और पक्की दृष्टि रखेगा, उसके स्वत्व को कोई बड़ी से बड़ी निरंकुश शक्ति भी नहीं छीन सकती।
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जो स्वेच्छापूर्वक अपने मस्तक आगे बढ़ा देते हैं, वे अनेक यातनाओं से मुक्ति पा जाते हैं और जो बाधा उपस्थित करते हैं, उन्हें बलपूर्वक दबाया जाता है एवं उनको कष्ट भी अधिक भोगना पड़ता है।
उच्चता की जैसी प्राप्ति; उच्च को आत्मसमर्पण करने से हो सकती है, वैसी समान को आत्मसमर्पण करने से नहीं।
सत्, चित् और आनंद-ब्रह्म के इन तीन स्वरूपों में से काव्य और भक्तिमार्ग 'आनंद' स्वरूप को लेकर चले। विचार करने पर लोक में इस आनंद की दो अवस्थाएँ पाई जाएँगी—साधनावस्था और सिद्धावस्था।
मनुष्य जीवन, जन्म और मृत्यु का एक अनंत चक्र है और उसका साथ यह है कि हम हरि के प्रति समर्पित हो सकें। इस समर्पण के बिना जीवन का अर्थ नहीं है।
अपने कर्त्तव्य से अनभिज्ञ मनुष्य, कभी भी परोपकार-परायण या समाज-हितचिंतक नहीं कहा जा सकता।
कर्त्तव्य-ज्ञानशून्य मनुष्य को मनुष्य नहीं, पशु समझना चाहिए।
विघ्न के भय से नीचजन कार्य को आरंभ ही नहीं करते, और मध्यजन पहले आरंभ करके; पुनः विघ्न को देख कार्य को छोड़ कर बैठ जाते हैं, और उत्तमजन बारंबार विघ्न के आने पर भी, कार्य आरंभ करके उसका परित्याग नहीं करते अर्थात् उसको पूरा ही करके छोड़ते हैं।
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सत्पुरुष वे हैं, जो अपना स्वार्थ छोड़ कर दूसरे के कार्य को साधते हैं, सामान्य पुरुष वे हैं; जो अपने और पराए दोनों के कार्यों को साधन करते हैं और मनुष्यों में राक्षस वे पुरुष हैं, जो अपने हित के लिए पराए के कार्य को नष्ट करते हैं और जो व्यर्थ पराए कार्य की हानि करते हैं।
कर्त्तव्य के विचार से युक्त होने पर ही साहसी मनुष्य आत्मोत्सर्गी बन सकता है।
आदर्श की प्राप्ति समर्पण की पूर्णता पर निर्भर है।
कार्य-सिद्धि के उपायों में लगे रहने वाले भी असावधानी से अपने कार्यों को नष्ट कर देते हैं।
मनस्वी अर्थात् ब्रह्मविचारवान् को लुभाने के लिए ब्रह्मांडमंडल तुच्छ है, मछली के उछलने से समुद्र नहीं उमड़ता।
कार्य करने वाले में थोड़ा कट्टरपन हुए बिना तेजस्वी कार्य नहीं हो सकता।
कल कोई पूछता था: ‘मैं क्या करूँ?’ मैंने कहा: ‘क्या करते हो, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि कैसे करते हो।
अगर तुम्हारी सनक का परिणाम यह होता है कि तुम आत्मनियंत्रण खो बैठते हो, तो तुम्हें अपनी जिज्ञासा का कोई भी समाधान प्राप्त नहीं हो सकता। हमें भावनाओं के झंझाबात में भी शांत रहना होगा। तभी और केवल तभी, हम अपने जीवन का निर्माण रचनात्मक आधार पर कर सकेंगे।