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शीत का सावन

शीत और शाक का संबंध घनिष्ठ है। जाड़े से जैसा निकटस्थ जुड़ाव इन सब्ज़-रंग भाजियों का है, वैसा शायद ही किसी और का हो। सर्दियों की आगत केवल और केवल एक मौसमी करवट भर नहीं है, बल्कि ऋतुचक्र का यह घूमता पहिया अपने साथ स्वादेंद्रियों के लिए भी एक से बढ़कर एक अनुपम सौगात लेकर आता है।

आगत का उल्लास देखना ही है इन दिनों तो निकल पड़िए आस-पास लगने वाली किसी भी सब्ज़ी मंडी की ओर। थोड़ी शीघ्रता से क्योंकि अभी ही अवसर है, नहीं तो हरे रंग की चुनर ओढ़कर बैठी ऐसी रूपसी अन्य ऋतुओं में तो देखने तक को न मिलेगी।

बाज़ार में नज़र जिस ओर फिरेगी हरियाली ही हरियाली दिखेगी। कहीं बथुए का साग बैठकर बातें कर रहा होगा तो कहीं मेथी और सोया आपस में मिल रहे होंगे। एक ओर पालक की पालकी सजी हुई होगी तो वहीं दूसरी ओर सरसों का साग भी सर ऊँचा किए अपने क़द्रदानों को टेर रहा होगा।

हरी मटर से हरी मिर्च और फूल गोभी से पत्ता गोभी तक बाज़ारों में इन दिनों पसरा रहने वाला सावन कुछ एक क्षण को ही सही किंतु महँगाई की मार से कसमसाई इच्छाओं के लिए सुख का साधन तो अवश्य ही बन जाता है।

शाक के छह प्रकार पाककला प्रवीणों ने बताए हैं—पत्रशाक : जिन सब्ज़ियों में पत्तियाँ खाई जाती हैं [जैसे—पालक, सरसों, मेथी, बथुआ, चौलाई, पत्तागोभी]; पुष्पशाक : जिन सब्ज़ियों में फूल खाया जाता है [जैसे—फूलगोभी, केले का फूल, कचनार का फूल, सहजन (मोरिंगा) का फूल]; फलशाक : जिन सब्ज़ियों में फल खाया जाता है, हालाँकि वनस्पति विज्ञान में ये फल होते हैं, पर बोल-चाल की भाषा में इन्हें सब्ज़ी कह दिया जाता है [जैसे—बैंगन, लौकी, तोरई, कद्दू, टमाटर, भिंडी]; नालशाक : जिन सब्ज़ियों में डंठल या तना खाया जाता है [जैसे—कमल ककड़ी, सहजन की फलियाँ/डंठल, अरबी का डंठल, केले का तना]; कंदशाक : जिन सब्ज़ियों में जमीन के नीचे उगने वाला भाग खाया जाता है, इन्हें मूलशाक भी कहा जाता है [जैसे—आलू, शकरकंद, अरबी, अदरक, हल्दी, मूली, गाजर]; और संस्वेदक शाक : जिनका विकास पृथ्वी, गोबर, लकड़ियों और वृक्षों से होता है। यानि कवक (Fungus), मशरूम या गोबर पर उगने वाले छत्ते [जैसे—ढिंगरी, भुइँफोड़ या गोबर-छत्ता]।

इन सभी में से एक संस्वेदक शाक को छोड़ दिया जाए तो शेष पाँच पत्रशाक, पुष्पशाक, फलशाक, नालशाक और कंदशाक तो हाट-बाज़ार में हमारी प्रतीक्षा करते दिख ही जाएँगे। स्वाद के बींधे हृदयों को ठौर इन शाक-सब्ज़ियों के संसार ही में है।

जंबूद्वीप के आहार का व्यवहार ही इन साग-सब्ज़ियों पर टिका है। भोजन से पशुता को जितना दूर करना है अपनी थाल के, उतना ही निकट इन भाजियों को लाना होगा। जीवनी शक्ति का संग्रह जीव-हत्या से तो कदापि नहीं हो सकता। यह मैं ही नहीं कहता अपितु भारतीय मनीषियों की चेतना से प्रतिध्वनित हुए सूत्रों में भी यह वर्णित है।

भारतीय मनीषा में प्रतीकों का अपना शास्त्र एवम् व्याख्या है। ‘श्रीवराहपुराण’ में जिन सप्तद्वीपों का उल्लेख है, उनमें से एक है ‘शाकद्वीप’। शाक से अपने नाम का संबंध जोड़े इस द्वीप के निवासियों की विशेषता ही यह है कि वे दीर्घायु होते हैं और वहाँ अकाल और महामारी से किसी की मृत्यु नहीं होती।

ज़रा विचार करिए शाकद्वीप का यह आरोग्य कहीं इसलिए तो नहीं कि वहाँ के भोजकक्षों में जो भी पकता है, वह शाकाहार के कोष्ठक को नहीं तोड़ता। इन प्रतीकों का अर्थ किंचित यह भी हो कि व्याधि के व्यवधानों को सुकोमल दिखने वाली इन सब्ज़ियों से काटा जा सकता है। यह कोई कोरी गप्प नहीं क्योंकि वैज्ञानिकों की स्वीकारोक्ति भी इसमें शामिल है।

अच्छा, चिंतन की इस दिशा को कुछ क्षणों के लिए छोड़ पुन: चित्त उस मार्ग पर लगाइए जिसपर चलकर आगे स्वाद आपसे भेंट करेगा। उस पथ पर निकलकर देखिए तो सही जिसके दोनों ओर साग-सब्ज़ियों की सुंदरता फैली है। शाक का यह सौंदर्य केवल बाहरी ही नहीं अपितु निधि का कोष भीतर भी है। जैसा सुंदर रूप उससे कहीं बढ़कर स्वाद। इसीलिए तो पुन: कहता हूँ कि अबकी चुके तो कहीं पछतावा ही न शेष रह जाए क्योंकि हरे रंग की चुनर ओढ़कर बैठी ऐसी रूपसी अन्य ऋतुओं में तो देखने तक को न मिलेगी।

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