अस्सी : ‘तय करो, इसके नीचे हम नहीं फिसलेंगे’
ममता पंडित
13 मार्च 2026
‘अस्सी’ आपको झकझोरती है, असहज करती है। वह ऐसे प्रश्न सामने रखती है, जिन्हें हम वर्षों से टालते आए हैं। वह हमें हमारे ही समय के कठोर सच से रूबरू कराती है। क्यों आज भी इस देश में प्रतिदिन लगभग अस्सी बलात्कार के मामले दर्ज हो रहे हैं? इनमें से कितने मामले न्यायालय तक पहुँच पाते हैं? और कितनों में अपराधियों को वास्तव में सज़ा मिलती है? हर चरण पर यह संख्या घटती चली जाती है।
पुलिस और न्यायपालिका की स्थिति से हम सभी परिचित हैं। एक बार तारीख़ मिलने का सिलसिला शुरू हो जाए, तो अंत दिखाई नहीं देता। कभी साक्ष्यों की कमी, कभी गवाहों का मुकर जाना, कभी क़ानूनी पेचीदगियाँ— इतने जघन्य अपराध के बाद भी आरोपियों को बचाने के रास्ते खोज लिए जाते हैं। पीड़ित के लिए न्याय की राह लंबी और थका देने वाली हो जाती है। पीड़ित को न्याय मिलने से पहले ही सामाजिक सवालों, चरित्र हनन और मानसिक यातना से गुज़रना पड़ता है। छह माह की बच्ची से लेकर 60-70 वर्ष की बुज़ुर्ग तक—सभी उम्र की स्त्रियाँ इसके दायरे में हैं और हमारी बहस स्त्रियों के कपड़ों, पहनावे और आचरण पर आकर रुक जाती है।
फ़िल्म में पीड़िता का यह संवाद कितना चुभता है... “मेरी ही ग़लती है मैडम, जो मैंने इतनी रात को मेट्रो स्टेशन से घर अकेले आने की हिम्मत की, जबकि माँ ने हमेशा सिखाया था कि कहीं अकेले नहीं जाना है... never without a man”
क्यों इस तरह के मामलों में कई स्त्रियाँ शिकायत दर्ज नहीं करातीं—यह बात इस फ़िल्म को देखकर समझ में आती है। हर किसी के लिए उस तरह की मानसिक प्रताड़ना से गुज़रना संभव नहीं होता। पूरा समाज, यहाँ तक कि सगे-संबंधी भी, अक्सर ऐसा व्यवहार करते हैं मानो ग़लती अपराधी की नहीं, बल्कि उस महिला की ही हो जिसके साथ अपराध हुआ है।
जब अपराधी को बचाने के इतने रास्ते निकाल लिए जाते हैं, तो उसे सज़ा दिलाने के भी कुछ रास्ते तो निकाले ही जा सकते हैं। हमारा समाज अजीब-ओ-ग़रीब रास्ते खोज लेता है। गाँव-देहात में तो बलात्कारी की शादी उसी लड़की से करवा दी जाती है। किसी और के लिए हुआ अपराध, लड़की के लिए जीवन भर की सज़ा बन जाती है। फ़िल्म इस मुद्दे को भी पूरी संवेदना के साथ उठाती है।
एक और तरीक़ा, जो आजकल हर अपराध के लिए खोज लिया गया है, वह है एनकाउंटर। “अपराधियों को भरे बाज़ार में गोली मार देनी चाहिए”—ऐसी बातों से सोशल मीडिया भरा पड़ा है। हैदराबाद पुलिस यह कर भी चुकी है... लेकिन क्या उसके बाद बलात्कार बंद हो गए?
फ़िल्म एक संवेदनशील किरदार के ज़रिए याद दिलाती है कि इस तरह एनकाउंटर की बात करने वाले दरअस्ल अपनी ही किसी कुंठा से जूझ रहे होते हैं। वे ख़ुद से इतने नाराज़ होते हैं कि दूसरों को किसी भी तरह कष्ट पहुँचाना उन्हें सुकून-सा देता है। इस तरह के पब्लिक ट्रायल किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकते—सिर्फ़ इतना कह देने पर नायिका के चेहरे पर स्याही फेंक दी जाती है। और जब वह कहती है, “शुक्र है इंक है, एसिड भी हो सकता था...”, तो आप भीतर तक सिहर उठते हैं।
फ़िल्म ने बहुत छोटे-छोटे दृश्यों के माध्यम से समाज की संकीर्ण सोच को बेहद प्रभावशाली ढंग से उजागर किया है। एक दृश्य है, जिसमें एक पिता अपने अपराधी बेटे से कहता है—“छोले-भटूरे बाहर... सब खाते हैं, बस घर गंदा नहीं होना चाहिए।” यही वह सोच है, जिसे बदलने की ज़रूरत है।
कहानी यही पूछती है कि आख़िर यह सब कब थमेगा? कैसे रुकेगा? सवाल केवल व्यवस्था से नहीं, हमसे भी है।
फिसलने की भी एक सीमा होती है।
“कोई खूँटी ठोको,
कोई कील ठोको,
निशान लगाओ,
तय करो—
इसके नीचे हम नहीं फिसलेंगे।”
फ़िल्म में छोटी-मोटी रिश्वत लेकर काम करने वाला एक पुलिस अफ़सर जब यह कहता है, तो हम उसका दर्द समझ पाते हैं। वह उदय प्रकाश की कविताएँ पढ़ता है। अपराधियों से रामधारी सिंह दिनकर और विनोद कुमार शुक्ल के बारे में पूछता है—ज़ाहिर है, वे उन्हें नहीं जानते। लेकिन क्लाइमेक्स में एक कविता उसे राह दिखाती है और वह सही दिशा में क़दम बढ़ाता है।
“तय करो, इसके नीचे हम नहीं फिसलेंगे”—डॉ लोहिया की ये पंक्तियाँ एक तरह से इस फ़िल्म का सार है।
अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी के प्रयास की प्रशंसा होनी चाहिए, जिन्होंने हमें इस फ़िल्म के माध्यम से आईना दिखाने का साहस किया। सभी कलाकारों ने उम्दा अभिनय किया है। तापसी पन्नू की प्रतिभा से हम पहले से परिचित हैं, लेकिन कुमुद मिश्रा और कानी कुसुरुति इस फ़िल्म के सरप्राइज़ एलिमेंट हैं। कुमुद मिश्रा के किरदार की कई परतें हैं, जिन्हें उन्होंने बेहद ख़ूबसूरती और गहराई से निभाया है। बाक़ी सभी—जीशान अय्यूब, मनोज पाहवा, रेवती और सुप्रिया पाठक—ने भी अपने-अपने किरदार बेहद बख़ूबी निभाए हैं और गहरा असर छोड़ा है।
एक बेहतरीन फ़िल्म वही होती है, जो सिनेमाघर से निकलकर घर तक आपके साथ चलती रहे। यह कहानी इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ती; कुछ न कुछ सवालों के साथ ज़ेहन में बनी रहती है। और इसी वजह से सिनेमा को ऐसी और कहानियों की दरकार है।
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बेला पॉपुलर
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