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तप पर उद्धरण

अहिंसा, सत्य बोलना, क्रूरता त्याग देना, मन और इंद्रियों को संयम में रखना तथा सबके प्रति दयाभाव बनाए रखना इन्हीं को धीर पुरुषों ने तप माना है, शरीर को सुखाना तप नहीं है।

वेदव्यास

स्नान करने, दान देने, शास्त्र पढ़ने, वेदाध्ययन करने को तप नहीं कहते। तप योग ही है और यज्ञ करना। तप का अर्थ है वासना को छोड़ना, जिसमें काम-क्रोध का संसर्ग छूटता है।

संत एकनाथ

मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्म-निग्रह और भावशुद्धि को मानसिक तप कहा जाता है।

वेदव्यास
  • संबंधित विषय : मौन

यदि तपस्या असफल हुई तो बल और बल के असफल होने पर तप।

भास

तप परमतत्त्व का प्रकाशक प्रदीप कहा गया है। आचार धर्म का साधक है। ज्ञान परब्रह्मस्वरूप है। संन्यास उत्तम तप कहा जाता है।

वेदव्यास

तप से हुआ क्या लाभ जब दुष्कर्म में ही लीन हो।

श्याम नारायण पाण्डेय
  • संबंधित विषय : लाभ

जो उद्वेग करने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारक भाषण है, और जो स्वाध्याय का अभ्यास करना है, उसको वाचिक तप कहते हैं।

वेदव्यास
  • संबंधित विषय : सच

सत्य के समान कोई तप नहीं है।

वेदव्यास
  • संबंधित विषय : सच

साधन की आवश्यकता सामान्य लोगों की होती है, योगियों के तो सभी काम तप से ही पूरे होते हैं।

श्रीहर्ष

देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानी जनों का पूजन एवं पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचयं और अहिंसा को शरीर संबंधी तप कहा जाता है।

वेदव्यास

निश्चय ही अभाव में आनंदानुभव करना तप है।

हरिकृष्ण प्रेमी

अर्थ-संचय की अपेक्षा तप-संचय ही श्रेष्ठ है।

वेदव्यास