सिनेमा पर बेला
सिनेमा ऐसा कला-रूप है
जहाँ साहित्य, संगीत, अभिनय, नृत्य जैसे कलासिक कला-रूपों के साथ ही फ़ोटोग्राफी, एनीमेशन, डिजिटल एडिटिंग, ग्राफ़िक्स जैसे अन्य आधुनिक कला-रूप प्रतिबिंबित होते हैं। आधुनिक समाज और सिनेमा का अनन्य संबंध देखा जाता है, जहाँ दोनों एक-दूसरे की प्रवृत्तियों का अनुकरण करते नज़र आते हैं। इस चयन में सिनेमा विषयक कविताओं का संकलन किया गया है।
नाना पाटेकर : असा नटसम्राट पुन्हा होण नाहि
जब कोई कलाकार यथार्थ और स्वप्न में भेद ख़त्म करके जीने लगता है तो उसका कहीं कोई घर नहीं होता, कोई ठिकाना, कोई निवास नहीं। न बाहर और न ही भीतर। वह दोनों जगह से विस्थापित है। वह हर जगह से विस्थापित है।
अनफ़्रेम्ड : नाना पाटेकर : आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने!
नाना पाटेकर (1 जनवरी 1951–8 अक्टूबर 2026) हिंदी पॉपुलर सिनेमा के पहले और शायद आख़िरी एब्सर्ड किरदार थे। हमने दुःख और त्रासदी में डूबे दिलीप कुमार के समानांतर राज कपूर को देखा—भोला और ग़रीब, लेकिन नैतिक
अनफ़्रेम्ड : लाइफ़ में जब ‘स्किप इंट्रो’ नहीं था
मुझे प्रतीक्षा की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति ‘रजनीगंधा’ फ़िल्म में दिखती है, बासु चटर्जी इंतज़ार और दूरियों के बीच सिमटे छोटे-छोटे पलों को सहेजते चलते हैं। “रजनीगंधा फूल तुम्हारे...” गीत देखते हुए स्क्रीन
अनफ़्रेम्ड : 5G की स्पीड में 60 के दशक की ‘तड़प’
ऐसा मेरे साथ कभी पहले नहीं हुआ था, तो यह बात मेरे मन में बैठ गई। ऑफ़िस से घर लौटते समय स्पॉटिफ़ाई पर अचानक लता मंगेशकर का एक गीत लूप में बज उठा, जिसे पहले कभी नहीं सुना था। गीत था, ‘हम तेरे प्यार में स
मुकेश पांडेय की फ़िल्म ‘डॉटर ऑफ़ द माउंटेन्स’ को ‘इंडियन इंडिपेंडेंट फ़िल्म फ़ेस्टिवल’ में सम्मान
उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ों में रहने वाली महिलाओं के मौन संघर्ष, अकेलेपन और साहस की कहानी कहती स्वतंत्र फ़िल्म ‘डॉटर ऑफ़ द माउंटेन्स’ (Daughter of the Mountains) को ‘इंडियन इंडिपेंडेंट फ़िल्म फ़ेस्टि
मिर्ज़ापुर : कहानीहीन अंतहीन सिनेमा
सर पानी में डूबता है, गोली सिर के पीछे से माथे को चीरती हुई निकलती है, पूरा का पूरा पानी सुर्ख़ लाल हो जाता है और इसी कलात्मकता के साथ फ़िल्म सबसे पहले अपने नाम से आपको रूबरू करवाती है। एक पारंपरिक भ
05 सितम्बर 2026
शनिवारेर चिट्ठी : सिनेमा पर कैसे न लिखें
देखना यह बड़ी फ़िल्म है। यह मेरा विचार नहीं; वह अवगतता है, जिसके साथ मैं इसे देखने बैठा हूँ। यहीं से देखने की एक बाधा शुरू हो गई है। अभी कुछ घटा भी नहीं कि उसके चारों ओर अर्थ जमा हो चुके हैं—आग्र
तिग्मांशु धूलिया : मोटिवेशन के दौर में
तिग्मांशु धूलिया बॉलीवुड में जब पहचाने गए, जब चमके, उससे बहुत पहले से वह बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स में पर्दे के पीछे की बहुत भूमिकाओं में सक्रिय रहे। उनकी फ़िल्मोग्राफ़ी पर नज़र डालें तो हैरत होती है। उन
शराबी क़ौम पर कुछ नोट्स : ‘अनदर राउंड’ के बहाने
शराबियों को एक ‘अस्मितामूलक’ इकाई/क़ौम (आइडेंटिटी) के रूप में देखना चाहिए कि नहीं? सुनने में यह अतिरंजित लग सकता है, लेकिन क्रूर सच्चाइयाँ अक्सर ही अतिरंजित लगती हैं। शराबियों को आइडेंटिटी नहीं मा
‘दिल चाहता है’ के पच्चीस साल
तीन दोस्त हैं। एक को हर दूसरी लड़की से प्यार हो जाता है, लेकिन अंततः शादी किसी और से कर रहा है। एक को अपने से बड़ी उम्र की औरत से प्यार हो जाता है और तीसरे के लिए प्यार एक बेकार की चीज़ है। तीनों का
30 जुलाई 2026
द ओडिसी : हर मनुष्य अंततः घर लौटना चाहता है
जीवन में कुछ चीज़ें अकल्पनीय ही नहीं, अनिश्चित भी हैं। जैसे अंतरिक्ष में आकाशगंगाएँ लगातार एक-दूसरे से दूर जा रही हैं, फिर भी हम ब्रह्मांड के विस्तार के बारे में सब कुछ ठीक-ठीक नहीं बता सकते। हम ज्वा
ओपेनहाइमर से ओडिसियस तक : साम्राज्यवादी महानायकों का खोखलापन
क्रिस्टोफ़र नोलन की ‘द ओडिसी’ की सनसनीख़ेज़ समीक्षाओं की होड़ में कश्मकश करने से पहले सबसे ज़रूरी है कि इस होड़ के पीछे की सोच की समीक्षा करना। आख़िर क्यों और कैसे लोक-कथाओं और पुराणों की समृद्ध संस्क
क्रिस्टोफ़र नोलन की ‘द ओडिसी’ : होमर के महाकाव्य की उदास सिनेमाई पुनर्रचना
एक राजा और महानायक होते हुए भी ओडिसस की ज़िंदगी कोई जश्न नहीं है, बल्कि एक लंबा इंतज़ार, एक बेबसी और ज़िंदगी के आख़िर में पसरा हुआ एक अंतहीन सन्नाटा है। यह एक ऐसे दुख की किरच के साथ घर लौटने की कहानी
सतलुज : बहता हुआ इतिहास
कुछ फ़िल्में शहीद होने के लिए ही बनती हैं। इस तरह देखें तो ‘सतलुज’ भी एक शहीद फ़िल्म है। यह फ़िल्म जब वर्ष 2023 में रिलीज़ के लिए तैयार हुई, तभी से विवादों में घिर गई। इस फ़िल्म का पहला शीर्षक ‘ग़ल्लू
सतलुज : एक धारा को रोकने की कोशिश
तीन साल की लंबी क़ानूनी और सेंसर संबंधी लड़ाई के बाद रिलीज़ हुई फिल्म ‘सतलुज’ मात्र दो दिन के भीतर ही भारत में ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ZEE 5 से हटा दी गई। अब यह फ़िल्म भारत में उपलब्ध नहीं है। सरकार ने इसे स
सौरव गांगुली सिर्फ़ नॉस्टेल्जिया का नाम नहीं
स्टार गोल्ड पर ‘मोहब्बतें’, सेट मैक्स पर ‘करण-अर्जुन’ और ज़ी सिनेमा पर ‘मैं हूँ ना’ शाहरुख़ ख़ान का दीवाना होने के लिए ये तीन फ़िल्में ही काफ़ी थीं। झूठ क्या कहूँ, लेकिन ‘दीवाना’ मैंने सिर्फ़ दिव्या भारती
सतलुज : ‘मैं हनेरे नूं चैलेंज करदां’
“हिंसा को केवल झूठ के द्वारा छिपाया जा सकता है और झूठ को केवल हिंसा के द्वारा ही क़ायम रखा जा सकता है।” — लेव तोल्स्तोय हनी त्रेहन निर्देशित फ़िल्म ‘सतलुज’ [पहले ‘पंजाब 95’] लंबे संघर्ष के बाद
मणि कौल की ‘बादल द्वार’ : कविता को पर्दे पर संभव करने का सलीक़ा
मणि कौल की फ़िल्म ‘बादल द्वार’ उन क्लासिक अप्रतिम फ़िल्मों में से है, जिसे हिंदी सिनेमा के दायरे से बाहर भी अतीव प्रशंसा मिली। पश्चिम जगत में सराहा जाना कोई उत्कृष्ट कृति का पैमाना नहीं है। मगर ‘बादल
बंदर : डोपामाइन की भूखी दुनिया में बेचैनी परोसती फ़िल्म
डायनासोर के जाने के बाद, इस नीले ग्रह पर लगभग सब कुछ नए सिरे से हुआ। स्तनधारियों के विकास का रास्ता साफ़ हुआ। क्रमिक विकास (evolution) चलता रहा। लाखों वर्ष पूर्व होमो-सेपियंस आए। दो सौ साल पहले उनमें
किम की-यंग : कोरियाई सिनेमा का एक असाधारण नाम
हम जब आज से लगभग एक दशक पूर्व कोरिया के बारे में सोचते थे, तो शायद अधिकांश लोगों के लिए उसका उत्तर अज्ञात ही रहता था। जिनकी समझ या रुचि थोड़ी अधिक विकसित थी, उनके मन में शायद किम जोंग उन का नाम आता र
मैं वापस आऊँगा : क्या कमाल है, न शिकायतें, न मलाल है!
दो गिलहरियाँ इमारत के कोने पर आकर मिलती हैं। एक कहीं से मूँगफली ले आई है, दूसरी हाथ बढ़ाकर उसे ले लेना चाहती है। अचानक बम का धमाका होता है और इमारत ढह जाती है। सब मलबे के हवाले। इस इतनी बड़ी दुनिया म
प्रतिउत्तर : ‘रोएँगे हम हज़ार बार...’
प्रिय रचित, मैंने आपकी इम्तियाज़ अली की फ़िल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ पर लिखी दर्शक-समीक्षा पढ़ी। वह वीडियो भी देखा जिसमें एक लड़की रोते हुए अपना वीडियो रिकॉर्ड कर रही थी, जिसे बाद में उसने फ़ेसबुक पर सा
सहन : चुप्पी की अंतिम सीमा
घरेलू हिंसा पर केंद्रित फ़िल्मों की भीड़ में ‘सहन’ अपनी संयमित अभिव्यक्ति, सौंदर्यबोध और गहन संवेदनात्मक परतों के कारण, एक विशिष्ट स्थान अर्जित करती है। यह फ़िल्म अपने कथ्य को किसी ऊँचे स्वर में नहीं क
तुम्हारा बॉडी काउंट कितना है!
बॉडी काउंट शब्द मैंने कहाँ जाना या सुना इस बात पर सोचता हूँ तो दोस्तों की याद आती है। व्यक्ति में गाली, शराब जैसे सामाजिक विकारों की मृत जड़ों को अक्सर दोस्तों द्वारा ही पानी दिया जाता है, शायद इसीलि
केवल इम्तियाज़ हँस रहा है और सब रो रहे हैं
किसे चाहिए मन का सोना आँख का मोती किसे पड़ी है अंदर क्या है होती रेत है लगता पानी [वर्ष 2015 में आई इम्तियाज़ अली निर्देशित फ़िल्म ‘तमाशा’ से।] मैं गए बुधवार इम्तियाज़ अली का इं
मैं वापस आऊँगा : 78 घंटे बनाम 78 साल का प्रेम
जीवन में पहली बार अकेले फ़िल्म देखने आई हूँ। अकेले घूमी हूँ, शॉपिंग पर गई हूँ, पर अकेले थिएटर में बैठकर फ़िल्म देखना कभी नहीं हुआ था। शायद इसलिए क्योंकि मुझे लगता था कि मैं दुनिया में इस क़दर अकेली क
मैं वापस आऊँगा : हमन हैं इश्क़ मस्ताना, हमन को होशियारी क्या
इम्तियाज़ अली की फ़िल्मों के लाखों दीवानों में एक दीवानी मैं भी हूँ। क्या वजह है इस दीवानगी की... इसका जवाब है कनेक्ट या जुड़ाव। आप उनकी फ़िल्मों के किरदारों से जुड़ पाते हो और फ़िल्म ख़त्म होते-होते प
15 जून 2026
हम ‘लगान’ देख रहे थे
साल 2001, जून का महीना। तारीख़ याद नहीं... गूगल बता सकता है, लेकिन क्या पूछना... मैं नया-ताज़ा पटना पहुँचा था, दूसरी बार—इस बार स्थायी रूप से रहने के लिए, क्योंकि मैं आयरन गेट तोड़ चुका था... जी
The Last Tenant : इरफ़ान की क़ब्र पर 25 साल पुराना फूल
अब शादियों के एल्बम नहीं दिखते। आजकल नीले-नीले लिंक होते हैं जो सीधे हम-आपको तस्वीरों के समंदर में पटक देते हैं। लगाइए गोता। दो-तीन स्क्रॉल में अपनी तस्वीर तक पहुँच जाइए। बेहतर क्वालिटी में डाउनलोड क
धुरंधर : दुख और जिन्न
दुख आदमी के जिस्म में दाख़िल होता है और फिर कभी नहीं निकलता। कोई मौलवी बताए, कोई हकीम समझाए, कोई फ़लसफ़ेबाज़ अपनी मोटी किताब खोलकर साबित करे—मगर दुख जाता नहीं। वो बदलता है। रीढ़ की हड्डी के इर्द-गिर्
‘धुरंधर द रिवेंज’ से बचकर लौटे धुरंधर का बयान
मैंने भी अंतत ‘Dhurandhar The Revenge’ देख ली। वैसे आजकल के ‘मल्टीप्लेक्स कल्चर’ वाले दौर में पीवीआर [PVR] जैसे सिनेमाई मंदिरों में माथा टेकना सीधे अपनी जेब पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करने जैसा है, जहाँ ए
पथेर पांचाली : हाशिए पर खड़े जीवन की कथा
मैंने हाल में ‘पथेर पांचाली’ उपन्यास पढ़ा। यह मेरा क़ुबूलनामा है कि इससे पहले बंगाली साहित्य के नाम पर मैंने केवल रवींद्रनाथ ठाकुर की ‘गीतांजलि’ का हिंदी अनुवाद पढ़ा था। यहाँ आपका अंदाज़ा सही है कि बं
म्यूज़ियम ऑफ़ इनोसेंस : अधूरे प्रेम का अभिज्ञान
वेब सीरीज़ ‘म्यूज़ियम ऑफ़ इनोसेंस’ [Museum of Innocence] ओरहान पामुक के इसी नाम से प्रकाशित नॉवेल पर आधारित है। इस सीरीज़ के नौ एपिसोड हैं। ज़ेयनेप गुनाई [Zeynep Günay Tan] इसकी निर्देशक हैं और उन्होंने ओ
पास्ट लाइव्स : जो था, जो है और जो रह जाएगा
साल 2023 में आई हुई एक दक्षिण कोरियाई फ़िल्म है—पास्ट लाइव्स। कोरियाई मूल की कनाडाई निर्देशक सेलीन सॉंग की इस फ़िल्म का बहुत नाम सुना। अनगिनत सिने-फ़ाइल्स यूट्यूब चैनलों, इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक अकाउंटो
अस्सी : ‘तय करो, इसके नीचे हम नहीं फिसलेंगे’
‘अस्सी’ आपको झकझोरती है, असहज करती है। वह ऐसे प्रश्न सामने रखती है, जिन्हें हम वर्षों से टालते आए हैं। वह हमें हमारे ही समय के कठोर सच से रूबरू कराती है। क्यों आज भी इस देश में प्रतिदिन लगभग अस्सी बल
इनसोम्निया : मुझे सोने दो!
अल पचीनो को मैंने पहली बार ‘गॉडफ़ादर’ में देखा था—माइकल कारलिओने। फिर मैंने यह फ़िल्म कई बार देखी, अल पचीनो की वजह से ही। बहरहाल, एक दूसरी फ़िल्म देखी गई, लेकिन अल पचीनो की वज़ह से नहीं। यह बात और ह
27 फरवरी 2026
हत्यावादी जूनून के चक्रव्यूह में फँसा ‘कैनेडी’
वर्ष 2021 में देश के सबसे अमीर लोगों में से एक के घर के सामने एक गाड़ी पाई गई थी, जिसमें विस्फोटक सामग्री पाए जाने की ख़बर थी। उस घटना के बाद संबंधित राज्य के सत्ता समीकरणों में बहुतेरे बदलाव देखे गए
ओ रोमियो : क्राइम-रोमांस का थका हुआ प्रयोग
O Romeo, Romeo! wherefore art thou Romeo?—ओ रोमियो, रोमियो! तुम रोमियो क्यों हो? शुरुआत के पाँच मिनट उलझन में नहीं बीते। बहुत सीधा-सादा कथानक आदित्य धर या सिद्धार्थ आनंद सरीखे डायरेक्टरों की फ़िल्म
प्रोपेगेंडा फ़िल्मों के ‘परफ़ेक्ट डेज़’
हाल बीच में एक फ़िल्म देखी—‘परफ़ेक्ट डेज़’। सन् तेईस [2023] में आई यह जापानी फ़िल्म, जापान और जर्मनी का संयुक्त निर्माण रही। इसे 96वें अकादमी पुरस्कार (ऑस्कर) में सर्वोत्कृष्ट विदेशी फ़िल्म के नामजद किया
अरिजीत सिंह : पार्श्वगायन का बाणभट्ट
यह तुलना आपको विचित्र लग सकती है, लेकिन मेरे देखे वैश्विक स्तर पर भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय गायक अरिजीत को और किसी तरह परिभाषित किया जाना संभव नहीं है। वाणी बाणो बभूव ह! यह संस्कृत की एक प्रसिद
Humans In The Loop : ग़लतफ़हमी है कि CAPTCHA भरकर आप रोबोट होने से बच जा रहे हैं
दुनियाभर में आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस का हल्ला है। जहाँ एआई (AI) शब्द जुड़ जाता है, वह चीज़ एलीट लगने लगती है। यूट्यूब वीडियोज़ के समंदर में अगर पत्थर उछालो तो वो कोई न कोई एआई टूल सिखाने वाले पर ही ग
किम की डुक का सिनेमा : हिंसा और बर्बरता के आवरण में प्रेम और सौंदर्य की कल्पना
जापान से आधिपत्य ख़त्म होने के बाद 50 के दशक में उत्तर और दक्षिण कोरिया के गठन और अलग-अलग सिनेमा उद्योग बनने के बाद आज दक्षिण कोरियाई सिनेमा उद्योग को सिनेमा के जानकार ‘हैल्युवुड’ के नाम से पुकारते है
22 जनवरी 2026
फिर भी : कमलेश्वर की लिखी एक दुर्लभ फ़िल्म
पापा, क्यों सब लोग मिलकर; मुझे तुमसे अलग करना चाहते हैं? मुझे और पुरुषों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। अगर तुम मेरे साथ नहीं रह सकते तो मुझे यहाँ से इन सब लोगों से दूर कहीं और ले चलो। अब तो मम्मी अकेल
इक्कीस : नफ़रत के दौर में मोहब्बत का पैग़ाम
ख़ून अपना हो या पराया हो नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में अम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर —साहिर लुधियानवी की नज़्म ‘ऐ शरीफ़ इंसानों’ से बीते साल (2025) दिसंबर में हिंदी
22 दिसम्बर 2025
तारकोवस्की का सिनेमा : एक कलाकार की हैसियत से
बात 14 अगस्त 1986 की है। आन्द्रे तारकोवस्की पेरिस के किसी अस्पताल में मौत से लड़ रहे थे। इधर कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में उनकी उस फ़िल्म की स्क्रीनिंग हो रही थी, जिसे उन्होंने अपने बेटे की नज़्र किया था। यह
इरफ़ान एक नया सूरज था जो बहुत जल्द अस्त हो गया
इरफ़ान ख़ान। शिद्दत। उस शिद्दत की ज़िम्मेदारी। इस ज़िम्मेदारी की ख़ामोश अच्छाई। उसकी ख़ामोश अच्छाई की बोलती निगाहें। अगर मुझे किसी ऐसे अभिनेता को पेश करना हो जो अपने होने भर से एक निहायत ही नफ़ीस तरी
ऑक्सफ़ोर्ड, इलाहाबाद विश्वविद्यालय : कैंपस की कहानियाँ, अँग्रेज़ी संस्कृति और सिनेमा
“मैं हॉस्पिटल में वेंटिलेटर पर ऑक्सीजन मास्क पहने हुए नहीं मरना चाहता, बल्कि नेचुरल डेथ चाहता हूँ, अपनों के साथ रहते हुए। हॉस्पिटल में मरने से पहले जो थोड़ी-सी जीने की ख़्वाहिश बची है, वह भी मर जाती
कथा : फ़ैंसी पैकेजिंग के युग में नैतिकता अक़्ल दाढ़ है
यह इमला और सुलेख लेखन का दौर था। इंद्रियों को चौकन्ना रखने और हिंदी को ख़ूबसूरत तरीक़े से बरतने पर ज़ोर रहता था। खुरदुरे काग़ज़ वाले कितने रफ़ रजिस्टर भरे गए, गिनती ही नहीं। ‘समझ ही नहीं आ रहा क्या ब
धर्मेंद्र : सबसे सरल सिने-अध्याय
धर्मेंद्र के निधन पर एक व्यापक सामूहिक क्षति का एहसास हमें न्यूज़ चैनल्स पर दिखाई गईं ख़बरों और सोशल मीडिया पर दी गईं श्रद्धांजलियों से हुआ। धर्मेंद्र एक बड़े जनसमूह के नायक थे, जिन्होंने लंबे समय तक
पोर्ट्रट ऑफ़ ए लेडी ऑन फ़ायर : एक मुकम्मल तस्वीर का सफ़र
साल 2019 की फ़्रांसीसी फ़िल्म ‘पोर्ट्रेट ऑफ़ ए लेडी ऑन फ़ायर’ इस सदी की उन चुनिंदा फ़िल्मों में से एक है, जिनका ज़िक्र ज़रूरी है। इस फ़िल्म की सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि आप कोई भी कोण, कोई भी दृश्य या कोई भी