जीवन पर बेला
जहाँ जीवन को स्वयं कविता
कहा गया हो, कविता में जीवन का उतरना अस्वाभाविक प्रतीति नहीं है। प्रस्तुत चयन में जीवन, जीवनानुभव, जीवन-संबंधी धारणाओं, जीवन की जय-पराजय आदि की अभिव्यक्ति देती कविताओं का संकलन किया गया है।
14 जून 2026
होर्खे लुइस बोर्खेस का साक्षात्कार : ‘मैं दूसरी दुनिया में रहूँगा’
होर्खे लुइस बोर्खेस (Jorge Luis Borges) बीसवीं शताब्दी के उन विरल साहित्यकारों में हैं जिन्होंने कविता, कहानी, निबंध और दर्शन के बीच की सीमाओं को लगभग समाप्त कर दिया। वह केवल अर्जेंटीना के लेखक नहीं
फ़िक्शन एक ज़्यादा बड़ा सच है : ख़ालिद जावेद से पूजा भाटिया की बातचीत
तक़रीबन पाँच साल पहले मैंने पहली बार ख़ालिद जावेद का उपन्यास ‘मौत की किताब’ पढ़ा था। पाँच बरस बाद जब उसे दुबारा पढ़ा तो साथ में उनका उपन्यास ‘नेमतख़ाना’ और ‘आख़िरी दावत और अन्य कहानियाँ’ भी पढ़ीं। इस
कहानी : स्वस्थित
Every word is like an unnecessary stain on silence and nothingness. ~ Samuel Beckett एक लगातार अशांत रह रही आत्मा विचित्र भाषाऍं सीख लेती हैं। ~ स्वदेश दीपक किचन में नंगे खड
रागदर्पण : उस जादुई शाम के नाम
अपने हालिया सफ़र के बाद, मैं पूरे यक़ीन के साथ कह सकती हूँ कि मैंने अपने अब तक के जीवन की सबसे करामाती शाम को देखा है। बुलंद बर्फ़-पोश पहाड़ियों के पीछे पश्चिम में दहककर बुझता हुआ लाल अलाव। वह दृश्य मेरे
रविवासरीय 4.0 : दस सवालों के जवाब
• इस तारीख़ पर अभी सवेरा नहीं उतरा है। पक्षियों के स्वर अभी दूर हैं। कुछ देर में दूर बीतेगा और वे चहचहाएँगे—अपने-अपने साथियों के साथ। इस प्रकार समूह में समूह के साथ न रहकर भी समूह के साथ होने की सचाई
The Last Tenant : इरफ़ान की क़ब्र पर 25 साल पुराना फूल
अब शादियों के एल्बम नहीं दिखते। आजकल नीले-नीले लिंक होते हैं जो सीधे हम-आपको तस्वीरों के समंदर में पटक देते हैं। लगाइए गोता। दो-तीन स्क्रॉल में अपनी तस्वीर तक पहुँच जाइए। बेहतर क्वालिटी में डाउनलोड क
25 अप्रैल 2026
शनिवारेर चिट्ठी : अनुशोचना और बाक़ी गल्प
स्फुलिंग कमरा-तर, कमरा-कम या अ-कमरा जैसे शब्द भी कहीं होते हैं, कहो तो! तो फिर बहुत से कमरों के बारे में अंतर की कुछ-कुछ बातें कहने के लिए यो-वो शब्द न हो तो किस कार्य में लगेगा वह कवि के? अंतर की
जगह-जगह 2.0 : पुणे के बहाने
जाऊ नका कोणी तिथे जाऊ नका कोणी जे गेले, नाही आले परतोनी तुका पंढरीसी गेला पुन्हा जन्मा नाही आला पंढरीचे भूत मोठे — संत तुकाराम (1608-1650) संत तुकाराम इस अभंग में पंढरपुर के अलौकिक आकर्ष
नशे से ‘नशा मुक्ति केंद्र’ तक का सफ़र
नशे से ‘नशा मुक्ति केंद्र’ तक का सफ़र सिर्फ़ दूरी का नहीं होता; यह एक ऐसे अँधेरे से गुज़रने जैसा होता है, जहाँ हर क़दम पर आदमी ख़ुद से थोड़ा-थोड़ा टूटता है... और मैं अब इस झूठ के साथ नहीं जीना चाहता कि
शनिवारेर चिट्ठी : दिनानुदिन की चूलें बिठाते हुए
सोमवार मैं लौटने की आख़री सड़क पर हूँ। यह सोमवार की तेज़ भागती सड़क है। इसकी रफ़्तार को दो दिनों के घर-आराम के बाद ‘काम पर लौटने’ के पंख लगे हैं। घर से पश्चिम की ओर निकलती है पहली सड़क। वह रास्ता बदलती
मेरी रचनात्मकता, मेरे द्वंद्व
कहते हैं कला आत्मा का फूल होती है। हाँ होती है, पर यह फूल किसी सरोवर में नहीं, किसी दलदल में, किसी कीचड़ में ही खिलता है। उसकी ख़ूबसूरती देखकर आप क़तई अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि वह किन परिस्थितियों में
आशा भोसले : गीतों में बसी ज़िंदगी
आशा भोसले भारतीय संगीत जगत और भारतीय फ़िल्म जगत में पार्श्व गायन का एक विराट नाम हैं। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था, “मैं भारतीय फ़िल्म गायन की अंतिम मुग़ल हूँ।” यह बात उनके लंबे संगीत जीवन, भार
कथा अनिल गुरव और सचिन तेंदुलकर की
दुनिया के नायक जितना मनोरंजन करते हैं, उतने बड़े होते हैं। बाक़ी सब जो अस्ल में दुनिया बनाते हैं और इसमें रहते हैं—वे मज़दूर हैं और मज़दूरों की ज़िंदगी को भुला दिया जाता है। उनकी मौत को हम याद करते ह
तू साडे नाऴ वरत के देख
मेरे बारे में मेरे साथियों की राय बहुत हास्यास्पद है। यात्राओं की योजना पर तो और भी ज़्यादा। मैं जब भी आगे बढ़कर योजना बनाता हूँ तो वे इसे गंभीरता से नहीं लेते, इसके बावजूद मैंने पंजाब यात्रा की योजन
बॉम्बे जयश्री की संगीत यात्रा
मनुष्य होने के नाते हमारी स्मृतियाँ ही हमारी सबसे बड़ी पूँजी हैं। इन्हीं स्मृतियों के सहारे हम अपने अतीत को अर्थ देते हैं, वर्तमान को समझते हैं और भविष्य की दिशा तय करते हैं। यदि कोई व्यक्ति इस विश्व
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-10
नवीं कड़ी से आगे... दस अरुण कमल सत्तर साल से अधिक का जीवन देख चुके हैं और वरिष्ठ कवियों की सूची में भी आ चुके हैं। अरुण कमल हिंदी में प्रसिद्ध और लोकप्रिय कवि भी हैं। कभी रामचंद्र शुक्ल ने लिखा
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-9
आठवीं कड़ी से आगे... नौ ‘अपनी केवल धार’ जो देखने में छोटी पर अरुण कमल की कीर्ति का आधार-स्तंभ है कि तरह मेरी एक और प्रिय छोटी-सी कविता है जिसका शीर्षक है—‘थूक’ : “जब वह ग़ुंडा प्राचार्य मान बहाद
22 फरवरी 2026
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-8
सातवीं कड़ी से आगे... आठ अरुण कमल ‘मैं’ अर्थात् अपनी आँखों से दुनिया को देखते हैं। इसलिए विस्तार उनके यहाँ कम है। इसलिए कभी राजेश जोशी ने अरुण कमल की कविता के लिए कहा था, ‘‘उनके यहाँ कल्पनाशीलत
21 फरवरी 2026
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-7
छठी कड़ी से आगे... सात अरुण कमल ‘कविता की राजनीति’ को उसी रिपोर्टर के निगाह से तौलते और फिर बोलते हैं जिसमें उन्हें फ़ायदा ज़्यादा दिखता है। काफ़ी गंभीरता से दिया गया वक़्तव्य है, जहाँ अपने को
20 फरवरी 2026
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-6
पाँचवीं कड़ी से आगे... छह कविता में निजी स्पेस का या घर-परिवार का कम होना, लगता है जानबूझकर है या फिर विचारधारा या किसी ख़ास मानसिकता का परिचायक। अरुण कमल के पास एक ख़ास तरह की काव्य-भाषा है जो
19 फरवरी 2026
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-5
चौथी कड़ी से आगे... पाँच अरुण कमल क़स्बे की मानसिकता वाले पटने के कवि हैं। एक ख़ास पटनिया आग्रह है उनकी कविता में। अरुण कमल की कविता में एक पटना-टोन लगातार उपस्थित है, जैसे राजेश जोशी में भोपाल
18 फरवरी 2026
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-4
तीसरी कड़ी से आगे... चार 2019 में प्रकाशित अरुण कमल की एक कविता है—‘एक वृद्ध की रात’। एक बूढ़ा है जो जानता है कि ‘कुछ तो है जो मुझे खड़ा कर रहा इस उम्र में’। जिस उम्र में लोग तीर्थ पर निकल जाते ह
नवोदय विद्यालय के पच्चीस साल : स्मृतियों की यात्रा
इस साल हमारे नवोदय विद्यालय [जवाहर नवोदय विद्यालय छिंदपाली, महासमुंद (छत्तीसगढ़)] को पच्चीस बरस पूरे हो रहे हैं। 1 नवंबर 2000 को दो बड़ी घटनाएँ इतिहास में घटी थीं। पहला यह कि इस दिन हिंदुस्तान का दिल
17 फरवरी 2026
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-3
दूसरी कड़ी से आगे... तीन मेरे लिए वे कविता का ककहरा सीखने के दिन थे। कवि-मित्र प्रकाश के सहारे यह संग्रह ‘अपनी केवल धार’ पढ़ गया। यह ‘धार’ कविता दिमाग़ में बैठ गई थी। मैंने उन दिनों अपने मित्रों
16 फरवरी 2026
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-2
पहली कड़ी से आगे... दो कभी-कभी एक कहानी, एक उपन्यास और एक कविता भी आपको अमर कर सकती है। अरुण कमल की यह रोमांटिक, उधार वाली कविता इस श्रेणी की कविता है। कभी तुलसीदास ने लिखा था, “नहिं दरिद्र सम
15 फरवरी 2026
अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’
एक मुक्तिबोध मेरे प्रिय कवि हैं। उनकी कविता-पंक्तियाँ मुझे बूस्ट करती हैं, मतलब प्रेरणा प्रदान करती हैं। यहाँ प्रस्तुत आलेख का शीर्षक उनकी एक कविता का शीर्षक है। मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ शीर्षक स
अथ सुचित्रा कथा! जिसे कथाकार पूरा न कह सका...
‘‘अगर तुम किसी के लिए अच्छा नहीं कह सकते, तो कुछ भी मत कहना...’’ अज्ञात-काया में जाने किस तरह की रोशनी होती है। इन दिनों कथाकार की ज़िंदगी अधलिखी पंक्तियों जैसी है। उसके सपनों की ज़मीन पर अनहोनी क
प्रोपेगेंडा फ़िल्मों के ‘परफ़ेक्ट डेज़’
हाल बीच में एक फ़िल्म देखी—‘परफ़ेक्ट डेज़’। सन् तेईस [2023] में आई यह जापानी फ़िल्म, जापान और जर्मनी का संयुक्त निर्माण रही। इसे 96वें अकादमी पुरस्कार (ऑस्कर) में सर्वोत्कृष्ट विदेशी फ़िल्म के नामजद किया
सुधांशु फ़िरदौस से दस सवाल : जीवन एक घर है, जिसमें बेघर हूँ मैं
सुधांशु फ़िरदौस (जन्म : 1985) इस सदी में सामने आई हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। वर्ष 2020 में उनकी कविताओं की पहली किताब ‘अधूरे स्वाँगों के दरमियान’ शीर्षक से प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के लिए उन
कथा : फ़ैंसी पैकेजिंग के युग में नैतिकता अक़्ल दाढ़ है
यह इमला और सुलेख लेखन का दौर था। इंद्रियों को चौकन्ना रखने और हिंदी को ख़ूबसूरत तरीक़े से बरतने पर ज़ोर रहता था। खुरदुरे काग़ज़ वाले कितने रफ़ रजिस्टर भरे गए, गिनती ही नहीं। ‘समझ ही नहीं आ रहा क्या ब
अँगूठा मेहनत कर रहा है, दिमाग़ आराम!
सड़क के किनारे फ़ुटपाथ पर लेटा बूढ़ा व्यक्ति लगातार खाँस रहा है। बग़ल में बैठा जवान बेटा हथेली पर खैनी ठोंकते हुए खाना बनने का इंतज़ार कर रहा है। चेस-नुमा शरीर के साथ अधनंगा एक छोटा बच्चा खेल रहा है।
13 नवम्बर 2025
जन्मतिथि विशेष : मुक्तिबोध : आत्मा के मित्र को स्नेहांजलि
यह सभा एक बंधु के निधन पर एक कवि के अपने रचना-क्षेत्र हो उठ जाने पर, दुःख प्रकट करने और शोक-संतप्त परिवार को हम सबकी संवेदना पहुँचाने के लिए एकत्र हुई है। बंधु की स्मृति से अभिभूत हो जाना स्वाभाविक ह
12 नवम्बर 2025
केवल नाम के बूढ़े आदमी द्वारा बनाए गए ‘सत्तावन’ प्रसिद्ध बहाने
जो लोग सफल नहीं होते हैं, उनमें आम तौर पर एक ख़ास विशेषता होती है। उन्हें विफलता के सभी कारणों का पता होता है और वे उपलब्धि की अपनी कमी के स्पष्टीकरण के लिए विश्वस्त ठोस बहाने बनाते हैं। इन बहानों में
07 नवम्बर 2025
कामू-कमला-सिसिफ़स
“The struggle itself toward the heights is enough to fill a man’s heart. One must imagine Sisyphus happy.” —अल्बैर कामू, द मिथ ऑफ़ सिसिफ़स कुछ सुबहें होती हैं जब दुनिया कुछ तिरछी प्रतीत होती है
असमाप्य अनुष्ठान : रतन थियम का रंगकर्म
नाटक शुरू होने के पहले की थर्ड बेल बजती है। नाट्यशाला का अँधेरा गाढ़ा होते-होते किसी प्रागैतिहासिक, चंद्रमा विहीन रात्रि के ठोस अँधेरे में बदल जाता है। और तब पृथ्वी के किसी सुदूर कोने से एक वृंदगान क
झाँसी-प्रशस्ति : जब थक जाओ तो आ जाना
मेरा जन्म झाँसी में हुआ। लोग जन्मभूमि को बहुत मानते हैं। संस्कृति हमें यही सिखाती है। जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से बढ़कर है, इस बात को बचपन से ही रटाया जाता है। पर क्या जन्म होने मात्र से कोई शहर अपना ह
बेदिल की दिल्ली
विगत कई दिनों से हमारा मन दिल्ली से बाहर कहीं दूर जाने को छटपटा रहा था। लगभग दो महीने से राजधानी के एक बंद 20×20 के किराये के कमरे में कैद रहते-रहते दिमाग, दिल और शरीर—सब सुस्त और कुछ-कुछ रोबोट जैसे
इलाहाबाद मेरे लिए यूटोपिया में तब्दील होता जा रहा है
14 सितंबर 2022 कल किसी ने व्हाट्सएप पर एक स्टेटस लगा रखा था। किसी की मृत्यु का। बहुत सुंदर चेहरा था। जवान था। मैंने पूछा : कौन हैं भाई? जवाब आया : शाइर थे! मैंने पूछा : आत्महत्या? जवाब आया : हाँ!
भूले-भटके दिन : कुछ रूमानी टुकड़े
मैंने अपने सबसे असुरक्षित क्षणों में जब-जब तुम्हें याद किया है, तब-तब यह सवाल आया कि बीतते समय के साथ मैं तुम्हारे लिए महत्त्वपूर्ण रहूँगा कि नहीं! संभव है, यह प्रश्न तुम्हारे ज़ेहन में भी उठता होगा,
मृत्यु ही जीवन का सबसे विश्वसनीय वादा है
जिस क्षण हम जन्म लेते हैं, उसी क्षण मृत्यु हमारे साथ चल पड़ती है। हमारा हर क़दम अपनी मृत्यु की ओर उसकी छाया की तरह उठता है। हर बीता हुआ कल वर्तमान में समाकर आने वाले कल से मिलने की दिशा में बढ़ता है।
इलाहाबाद तुम बहुत याद आते हो-4
तीसरी कड़ी से आगे... आगे डायोसिस चर्च ऑफ़ लखनऊ के प्रभारी का आवास है। मैं जब छात्रावास में रहता था। तब एक बार ऐसा हुआ कि छात्रावास ने व्यवस्थाओं से दूर-दूर तक अपना नाता तोड़ लिया। न साफ़-सफ़ाई, न
त्याग नहीं, प्रेम को स्पर्श चाहिए
‘लगी तुमसे मन की लगन’— यह गीत 2003 में आई फ़िल्म ‘पाप’ से है। इस गीत के बोल, संगीत और गायन तो हृदयस्पर्शी है ही, इन सबसे अधिक प्रभावी है इसका फ़िल्मांकन—जो अपने आप में एक पूरी कहानी है। इस गीत का वीड
समीक्षा : मृत्यु अंत है, लेकिन आश्वस्ति भी
मृत्यु ऐसी स्थिति है, जिसका प्रामाणिक अनुभव कभी कोई लिख ही नहीं सकता; लेकिन इस कष्टदायी अमूर्तता के स्वरूप, दृश्य और प्रभाव को वरिष्ठ कवि अरुण देव ने पूरी सफलता के साथ काव्य शैली में ढाल दिया है। ‘मृ
वापसियों की यात्रा क्या त्रासदियों के अंत से शुरू होती है?
अचानक ही तुम्हें अपनी भटक का उद्गम मिल गया है। वह इतना अस्ल है कि तुम उससे घबरा गए हो। तुम चाहते हो, तुम जितनी जल्दी हो सके—उसे भाषा में उतार दो। भले ही वह अधूरा ही उतरे, लेकिन क़ुबूल हो जाए। भले उसक
कहानी : स्पंदन
अँधेरे से भरा हुआ बंद कमरा, जिसमें बाहर लगी स्ट्रीट लाइट से प्रकाश भीतर आने की कोशिश तो कर रहा था, पर बंद खिड़कियों को भेद पाना संभव न था। राकेश ने जैसे ही कमरे में प्रवेश किया बिस्तर पर जा पड़ा। वह
11 जुलाई 2025
आज़ाद और खुले कैंपस में क़ैद लड़की
मेरा कैंपस (हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय) सुंदर है। यहाँ मन बहलाने और दिल लगाने को काफ़ी कुछ है—ऊँची-ऊँची इमारतें हैं, वूमन और मेंस हॉस्टल हैं, हर कोने में जीवन का कोई न कोई रंग बिखरा हुआ है। मेंस
8 A.M. Metro : अर्थ भरी अदायगी
गुलशन देवैया और सैयामी खेर अभिनीत फ़िल्म ‘8 A.M. Metro’ हाल-फ़िलहाल की प्रचलित व्यावसायिक फ़िल्मों से अलग श्रेणी में आती है। अगर फ़िल्म की विषयवस्तु देखें तो आप इसे ‘लंच बॉक्स’ और ‘थ्री ऑफ़ अस’ की पर
आम की बेला
मिरा वक़्त मुझ से बिछड़ गया मिरा रंग-रूप बिगड़ गया जो ख़िज़ाँ से बाग़ उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ मुज़्तर ख़ैराबादी ज़्यादा नहीं बीस बरस पहले तक, गाँवों में बाग़ों का अस्तित्व बचा हुआ
नायक खोजते अ-नायक हो तुम
उल्टी धार के लिए शुक्रगुज़ार होना चाहिए। परेशानियों का शुक्रिया कहना चाहिए। अधम मनुष्यों से दूर रहना चाहिए। कविता में सूक्तियों के बारे में जो सोचते हो, गद्य में अगर सूक्तियाँ बन जाती हों, तो उनको बन
8/4 बैंक रोड, इलाहाबाद : फ़िराक़-परस्तों का तीर्थ
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एम.ए. में पढ़ने वाले एक विद्यार्थी मेरे मित्र बन गए। मैं उनसे उम्र में छोटा था, लेकिन काव्य हमारे मध्य की सारी सीमाओं पर हावी था। हमारी अच्छी दोस्ती हो गई। उनका नाम वीरेंद्र