15 अक्तूबर 2026
अनफ़्रेम्ड : टैरेंटीनो के बहाने, हॉलीवुड से इलाहाबाद तक
क़रीब सात साल पहले इन्हीं दिनों क्वेंटिन टैरेंटीनो की फ़िल्म ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन हॉलीवुड’ देखी थी। अक्सर बदलता मौसम आपको
08 अक्तूबर 2026
कविता समारोह नहीं, कविता : ‘वीरेनियत’ का आठवाँ आयोजन कल
हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवि वीरेन डंगवाल की स्मृति में आयोजित वार्षिक कविता-पाठ ‘वीरेनियत’ का आठवाँ आयोजन 9 अक्टूबर को जवा
कठपुतली : डोरियों में बसी सदियों पुरानी लोक-स्मृति
कठपुतली कला मानव सभ्यता की उन प्राचीन लोक-अभिव्यक्तियों में से एक है, जिनमें मनोरंजन, शिक्षा, धार्मिकता और सामाजिक चेतना
दास्तानगोई : बिखरे फूलों का मज़मूँ
आज से क़रीब-क़रीब आठ बरस पहले जब साहित्य और अन्य किसी कला से मेरा शायद ही कोई नाता रहा हो, तो ऐसे में आजकल से ही किसी आम
05 सितम्बर 2026
शनिवारेर चिट्ठी : सिनेमा पर कैसे न लिखें
देखना यह बड़ी फ़िल्म है। यह मेरा विचार नहीं; वह अवगतता है, जिसके साथ मैं इसे देखने बैठा हूँ। यहीं से देखने की एक बाध
संतोष झा और साथी कलाकार : कविता का संगीत-आवास
कविता और संगीत का संबंध केवल कविता को धुन में बाँध देने तक सीमित नहीं है। कविता में शब्दों की ध्वनि, लय, आरोह-अवरोह, विर
तिग्मांशु धूलिया : मोटिवेशन के दौर में
तिग्मांशु धूलिया बॉलीवुड में जब पहचाने गए, जब चमके, उससे बहुत पहले से वह बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स में पर्दे के पीछे की बहुत
07 अगस्त 2026
अंतिम शय्या पर रवींद्रनाथ
श्रावण-मास! बारिश की झरझर में मानो मन का रुदन मिला हो। शाल-पत्तों के बीच से टपक रही हैं—आकाश-अश्रुओं की बूँदें। उनका मन
रज़ा स्मृति : सतपुड़ा, नर्मदा, बेमज़ा वक्ता
नर्मदा के किनारे, सतपुड़ा की तलहटी में बसे मंडला में हमारे पहुँचने के दिन से शायद ही कोई ऐसा दिन गुज़रा हो जब बारिश न हु
क्रिस्टोफ़र नोलन की ‘द ओडिसी’ : होमर के महाकाव्य की उदास सिनेमाई पुनर्रचना
एक राजा और महानायक होते हुए भी ओडिसस की ज़िंदगी कोई जश्न नहीं है, बल्कि एक लंबा इंतज़ार, एक बेबसी और ज़िंदगी के आख़िर मे
मुकुल शिवपुत्र : समदरसी है नाम तिहारो, चाहो तो पार करो
समदरसी है नाम तिहारो, चाहो तो पार करो ठुमरी सुनी। ख़याल भी। इंदौर और देवास में स्टेज के सामने दरी पर बैठकर घंटों सुन
तीजनबाई और पंडवानी
आज से बहुत साल पहले की बात है। एक छोटी-सी लड़की थी, सात-आठ बरस की। बारिश का मौसम उसको पसंद नहीं था, इसलिए बारिश के दिनों
तीजनबाई : इकतारे पर महाभारत
अवसर था दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कालेज के वार्षिकोत्सव पल्लव की सांस्कृतिक संध्या का। वहाँ उपस्थित थीं कलाकार प
मणि कौल की ‘बादल द्वार’ : कविता को पर्दे पर संभव करने का सलीक़ा
मणि कौल की फ़िल्म ‘बादल द्वार’ उन क्लासिक अप्रतिम फ़िल्मों में से है, जिसे हिंदी सिनेमा के दायरे से बाहर भी अतीव प्रशंसा
तपते सूरज और थियो की तलाश
विन्सेंट वॉन गॉग के प्रति सदा एक आकर्षक बना रहा। उनकी पेंटिंग के कारण नहीं विन्सेंट से जुड़ी कहानियों के कारण। शेष संसार
कोहबर : मिथिला की लोक-आस्था की सांस्कृतिक विरासत
कलाएँ मानवीय अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम होती हैं। प्राचीन काल से ही मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति कलाओं के विविध रूपों में करता
बंदर : डोपामाइन की भूखी दुनिया में बेचैनी परोसती फ़िल्म
डायनासोर के जाने के बाद, इस नीले ग्रह पर लगभग सब कुछ नए सिरे से हुआ। स्तनधारियों के विकास का रास्ता साफ़ हुआ। क्रमिक विक
‘कल्पना’ जैसा भोजपुरी में होना अब कल्पना ही है
वह इक्कीसवीं सदी की शुरुआत थी और वह बहुत उदास होकर गा रही थी—घरे छुट्टी लेके अउरी कुछ दिन रही ए बलम जी... और ठीक उसी वक़्
चौख़ानों में बँधा समय
समय रैना की वह लाल चैक वाली शर्ट… आपने नोटिस की होगी! रैना के हालिया कमबैक के साथ, वह शर्ट भी जैसे फिर से हमारे बीच आ खड
मैं वापस आऊँगा : हमन हैं इश्क़ मस्ताना, हमन को होशियारी क्या
इम्तियाज़ अली की फ़िल्मों के लाखों दीवानों में एक दीवानी मैं भी हूँ। क्या वजह है इस दीवानगी की... इसका जवाब है कनेक्ट या
केवल ताली ही तो है : प्रयागराज के NCZCC में ‘ओथेलो’ और रवींद्रालय में ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ देखते दर्शकों का स्त्री-द्वेष
बीते दिनों इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में दो महत्त्वपूर्ण नाटकों का मंचन हुआ—19 मार्च 2026 को एनसीज़ेडसीसी (NCZCC) में शेक्
फ़िक्शन एक ज़्यादा बड़ा सच है : ख़ालिद जावेद से पूजा भाटिया की बातचीत
तक़रीबन पाँच साल पहले मैंने पहली बार ख़ालिद जावेद का उपन्यास ‘मौत की किताब’ पढ़ा था। पाँच बरस बाद जब उसे दुबारा पढ़ा तो
सुमन कल्याणपुर : स्वर और स्वर-भ्रम
अँग्रेज़ी में एक कहन है : people who show you new music are important. मैं अक्सर अपने मित्रों और परिचितों को नए गीत भेजता
27 मार्च 2026
जगह-जगह 2.0 : माई नेम इज़ रेड : फ़ारसी मिनिएचर, नक़्क़ाशख़ाना और पूर्व-पश्चिम का द्वंद्व
चश्म’त बियाफ़रीद ब: हर दम हज़ार चश्म, ज़ीरा ख़ुदा ज़ क़ुदरत-ए-ख़ुद कुदरत’श ब-दाद [तुम्हारी आँखों ने हर साँस के साथ ह
भारतीय रंग-संस्थाओं पर मँडराता मौन संकट
इतिहास की कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें लोग उसी समय पहचान लेते हैं। वे स्पष्ट होती हैं और उनका असर तुरत दिखाई देने लगत
विलेम डैफ़ो का वक्तव्य : ‘जीतने के लिए आपका उपस्थित होना ज़रूरी है’
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के अंतर्गत संचालित इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट (Intern
रचना का प्रयोजन निर्माण है, नाश नहीं
मैंने साहित्य की किसी भी विधा में जब भी लिखा तब यह सोचकर नहीं लिखा कि मैं उक्त विधा की शर्तों को पूरा करने के लिए लिख रह
21वाँ मेटा थिएटर फ़ेस्टिवल आज से दिल्ली में
नई दिल्ली में रंगमंच प्रेमियों के लिए यह सप्ताह ख़ास होने जा रहा है। महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवॉर्ड्स [META] 2026 का
बॉम्बे जयश्री की संगीत यात्रा
मनुष्य होने के नाते हमारी स्मृतियाँ ही हमारी सबसे बड़ी पूँजी हैं। इन्हीं स्मृतियों के सहारे हम अपने अतीत को अर्थ देते है
25 फरवरी 2026
क्रेज़ी किया रे : AI के अतिक्रमण में मौलिकता का अस्तित्व
वह फ़रवरी का नौवाँ दिन था और विभाग में वैसी ही चहल-पहल थी, जैसी अन्य कार्यक्रमों के दिनों में होती है। विभाग में कथाकार र
‘अर्थात्’ की तीसरी गोष्ठी में खुले छायावाद के बंध
प्रसाद-निराला-महादेवी-पंत के चतुष्टय पर आधारित छायावाद की कविताओं, उसकी भाषा, प्रवृत्तियों, संवेदना और सहमतियों-असहमतियो
10 फरवरी 2026
दिल्ली में हो रहा है इशारा अंतरराष्ट्रीय कठपुतली थिएटर फ़ेस्टिवल
इशारा अंतरराष्ट्रीय कठपुतली थिएटर फ़ेस्टिवल का 22वाँ संस्करण 13 फ़रवरी से 22 फ़रवरी 2026 तक इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयो
चेख़व का पत्र निकोलाय के लिए : देखो, जीवन की अपनी शर्तें होती हैं...
मॉस्को, 1886 …तुम मुझसे अक्सर शिकायत करते रहे हो कि लोग तुम्हें “समझते” नहीं हैं! गेटे और न्यूटन ने कभी ऐसी शिकायत नह
हबीब तनवीर : साधारण में असाधारण की खोज
नाट्य शास्त्र के पहले ही अध्याय में एक श्लोक है जो एक तरह से नाटक की परिभाषा है— योऽयम स्वभावां लोकस्य सुखदुखसमन्वितः
पंडित छन्नूलाल मिश्र : तकलीफ़ में गाने से ही सिद्धि मिलती है
अगर हम गा पाते तो गाकर आपका बखान करते महाराज! लेकिन हमारी ज़िंदगी में लय नहीं है उतनी, इसमें खरज ज़्यादा है, ज़िंदगी का रिय
22 दिसम्बर 2025
तारकोवस्की का सिनेमा : एक कलाकार की हैसियत से
बात 14 अगस्त 1986 की है। आन्द्रे तारकोवस्की पेरिस के किसी अस्पताल में मौत से लड़ रहे थे। इधर कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में उनकी
दृष्टि का निर्माण : लोक से हाइपर-रियलिटी तक
“हर शाम हम सूर्य को धीरे-धीरे क्षितिज के पीछे डूबते हुए देखते हैं। हम जानते हैं कि हमारी पृथ्वी सूर्य से दूर जा रही है।
बीथोवन के संगीत के लिए
दुनिया को हिटलर के ‘होलोकास्ट’ के लिए नहीं, बीथोवन की ‘सिम्फ़नी’ के लिए याद रखा जाना चाहिए। हिटलर की नफ़रत से और उसके द
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का शब्दकोश : पंडित अमरनाथ की विरासत को नया आयाम
26 नवंबर, 2025 को नई दिल्ली में शास्त्रीय संगीत गुरु पंडित अमरनाथ द्वारा रचित ‘हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का शब्दकोश’
दिसंबर में होगा कोच्चि–मुज़िरिस बिएनाले का छठा संस्करण
भारत की सर्वाधिक प्रतिष्ठित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त समकालीन कला प्रदर्शनी कोच्चि–मुज़िरिस बिएनाले (Koch
समीक्षा : त'आरुफ़-ए-मंटो
पिछले हफ़्ते विभाजन पर आधारित एक नाटक देखने गया था। नाटक दिल्ली के एक प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान में था। विभाजन भारतीय उप
30-31 अगस्त को दिल्ली में होगा ‘एक है अमृता’
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता कहते हैं अगर प्यार इंसान की शक्ल लेता, तो उसका
मेटा 2026 : लीजिए देश के सबसे बड़े थिएटर फ़ेस्टिवल में हिस्सा
भारतीय रंगमंच के लिए मार्च 2026 का महीना एक सुनहरे अवसर की तरह दर्ज होने जा रहा है। महिंद्रा ग्रुप द्वारा स्थापित और टीम
मुझे यूट्यूबर नहीं बनना, पर एक यूट्यूब-चैनल बनाया है : AmoebAI
जिस वक़्त मुझे सबसे ज़्यादा जॉब सिक्योरिटी की ज़रूरत थी, सबसे ज़्यादा फ़ाइनेंशियल सिक्योरिटी की ज़रूरत थी, उस वक़्त मैंने
दिल्ली में ‘मुंबई स्टार’
नादिर ख़ान द्वारा निर्देशित और अवंतिका बहल द्वारा कोरियोग्राफ किया गया, एक बेहतरीन डांस म्यूजिकल द ड्रैगन रोज़ प्रोजेक्ट
04 जून 2025
'संतोष' और बॉलीवुड का दलित सिनेमा
सिनेमा एक दर्पण है, जिसके माध्यम से हम अक्सर ख़ुद को देखते हैं। — एलेजांद्रो गोंज़ालेज़ इनारितु साहित्य समाज का द
पत्र : अभिभावकों-सहयात्रियों-कला में विश्वास रखने वालों के नाम
भोपाल 25 मई 2025 प्रिय अभिभावकों, सहयात्रियो और कला में विश्वास रखने वालों के प्रति... विहान ड्रामा वर्क्स : ‘स
21 अप्रैल 2025
‘अजब तोरी दुनिया हो मोरे रामा...’
बरस 1947 है, तारीख़ 14 अगस्त, दिन गुरुवार, रात का समय। जब जवाहरलाल नेहरू अपना चुस्त पजामा और शेरवानी पहन रहे थे, स
एक बाल नाटक लिखते हुए
मैं अक्सर सोचती हूँ कि हम सब कितनी सारी चीज़ों से घिरे हैं। एक वयस्क के रूप में जीवन और दुनिया को देखते हुए ऊब गए हैं। अक
मेटा 2025 : प्रेम, दर्द, समय, समाज और लोक का रंगमंच
भारतीय रंगमंच की जीवंत परंपरा को प्रोत्साहित करने और देश भर के प्रतिभाशाली कलाकारों को एक मंच प्रदान करने के उद्देश्य से