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'सारा दिन सड़कों पे ख़ाली रिक्शे-सा पीछे-पीछे चलता है'

हमारी नई-नई शादी हुई थी और मैंने शिवानी से कहा, “अच्छा तुम्हें एक बात बताता हूँ।” 

उसने सिर हिलाया। 

मैंने कहा, “तुम्हें पता है, तुम्हारे एक दूसरे ससुर भी हैं।” 

शिवानी हैरानी से मेरी तरफ़ देखने लगी। फिर मैंने मोबाइल खोलकर उसे एक तस्वीर दिखाई और हँसते हुए उससे कहा, “ये रहे, इनके पैर छुओ।” उसने भी हँसी-हँसी में मोबाइल की तस्वीर को छूकर हाथ अपने सर पर लगा लिया।

हँसी की नदी भी किसी सत्य के उद्गम से ही निकलती है। मोबाइल में मौजूद उस व्यक्ति के प्रति मेरी आस्था का अंदाज़ा इस वाक़िए से लगाया जा सकता है। वह तस्वीर गुलज़ार साहब की थी।

बचपन में किसी ने कभी नहीं बताया था कि गुलज़ार कौन हैं या यह गाना गुलज़ार का है (सपने में मिलती है), यह फ़िल्म गुलज़ार की है। हाँ यह दिलीप साहब हैं, यह देव साहब, यह मीना कुमारी हैं और यह वहीदा रहमान। या यह मुकेश का गाया गीत है और यह वाला रफ़ी का। लेकिन इस सबके बीच चित्रहार देखते हुए या दूरदर्शन पर कोई फ़िल्म देखते हुए बड़ों की यह टिप्पणी कभी नहीं आई कि यह गुलज़ार का गीत है। वह तो बस मुझे ऐसे ही मिले थे, स्वयं की खोजबीन से। 

जब कुछ गीतों ने लगातार यह सोचने पर मजबूर किया कि वे दूसरे गीतों से इतने अलग क्यों हैं! और अलग हैं तभी इनमें कुछ है जो लगातार अपनी तरफ़ खींचता है। हालाँकि उस उम्र में उनके अर्थ पूरी तरह मुझ पर खुल जाते हों, ऐसा भी नहीं था। मैं तो यूँ ही सुनते-सुनते उनके गानों का मुरीद होता जा रहा था। जैसे मुझे ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है’ गीत पूरी तरह याद हो गया था लेकिन उसमें ‘एक सौ सोलह चाँद की रातें और एक तुम्हारे कांधे का तिल’ का मतलब नहीं समझ आता था। शायद वह उम्र ही नहीं थी इतनी बारीक़ बातें समझ पाने की। गुलज़ार के गीतों में कुछ बेहद नया था जो भले ही अबूझ था, लेकिन ख़ूबसूरत और दिलचस्प था।

“जल गए जो धूप में तो साया हो गए
आसमाँ का कोई कोना ओढ़ा, सो गए।”

जलकर चीज़ें काली होती हैं और साया भी काला होता है। एक चीज़ गरम और दूसरी ठंडी फिर भी कैसा साम्य है। सोने के लिए आसमान को चादर बनाया जा सकता है, ये सब बिल्कुल ही नए ख़याल था मेरे लिए। अपनी हद को आसमान तक पँहुचा देना कितना अद्भुत था।

“पानी-पानी रे, खारे पानी रे, नैनों में भर जा, नींदे ख़ाली कर जा।”

नींद को पुकारना सुना था लोरियों में, लेकिन नींद से ख़ाली हो जाने की अरज कहाँ कभी पहले सुनी थी।

“दिन ख़ाली-ख़ाली बर्तन है और रात है जैसे अँधा कुँआ” में ख़ालीपन की जिस तरह की गूँज भरी हुई है, वैसा उदाहरण कहीं और नहीं था।

“ख़ामोश-सा अफ़साना पानी पे लिखा होता
न तुमने कहा होता न हमने सुना होता”

यह किस जहान की बातें थीं और कितनी रूहानी।

“जाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेटकर
आँखों पे खींचकर तेरे आँचल के साये को
औंधे पड़े रहे यूँ ही करवट लिए हुए।”

यह बिल्कुल वैसा था जैसा मैंने सर्दियों की दुपहर में महसूस किया था और इससे पहले किसी और गीतकार ने इस बात को नहीं लिखा।

“सारा दिन सड़कों पे ख़ाली रिक्शे-सा पीछे-पीछे चलता है”

आख़िर ऐसी मिसाल कहाँ थी इससे पहले। गुलज़ार के गीत ऐसे ही ख़ाली रिक्शे की तरह पीछे पड़ गए थे। उनके गीतों में दी गई मिसालों पर अचरज करते हुए दिन कब बीत जाता था, पता ही नहीं चलता। कुछ मिसालें बेहद सटीक थीं तो कुछ बिल्कुल नई। उन दिनों दुनिया गुलज़ार की मिसालों के जरिए मुझ पर खुल रही थी। मिसाल क्या होती है, किसी बहुत बड़ी चीज़ को जो आँखों से देखी न जा सके, उसको किसी दूसरी चीज़ के सहारे सामने रख देना और फिर उस दूसरी चीज़ में ही पहले के गुमान का उतर आना। जैसे काग़ज़ पर एक गोला बनाकर कहना कि यह पृथ्वी है और देखने वाले को यह यकीन हो जाना कि वह पृथ्वी से बाहर जाकर इस पृथ्वी को देख रहा है। गुलज़ार के गीत सुनते और गुनगुनाते हुए ऐसे ही गुमान मेरे भीतर उतर जाया करते थे।

उस उम्र में गुलज़ार के बारे में आख़िर किससे बात की जा सकती थी। किससे पूछा जा सकता था कि “यहाँ कोई साहिल सहारा नहीं है, कहीं डूबने को किनारा नहीं है” में किनारे पर डूबने से क्या मतलब है? किनारा तो उबरने के लिए होता है न। और फिर यह बात इतनी उल्टी होते हुए भी इतनी अच्छी क्यों लग रही है कि मैं बार-बार इसी को दोहराता जा रहा हूँ। पर किससे कहता, कौन सुनता और कौन समझता। हो सकता है कि इसके जवाब में कोई ये कह देता , “क्या करना है यह जानकर, पहले अपनी पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान दो।”

बहुत बाद में जाकर सोशल मीडिया के लोगों को जानकर पता चला कि इस इंसान की सच्ची दीवानगी वाले लोगों की कितनी बड़ी जमात है। फिर होता है कि आप अपने नायक के बारे में किसी से बात करके प्रफुल्लित होते हैं। तो इतने सालों तक मन के भीतर क़ैद रही अपने नायक की प्रशंसा का अवसर मुझे बोलकर तो नहीं लेकिन आख़िरकार सोशल मीडिया पर अपने साथियों के साथ लिखकर मिला।

मुझे याद है कि मेरे एक दोस्त के कॉलेज के फ़ंक्शन में गुलज़ार साहब आने वाले थे। उसने जब मुझे इस बारे में बताया तो मैंने उसे मेरी तरफ़ से उनके पैर छूने के लिए कहा था।

हम अपने बचपन में अक्सर अपने भीतर एक नायक की उपस्थिति के साथ जी रहे होते हैं। वह नायक सबकी नज़रों से छुपकर हमें कुछ आकार दे रहा होता है। हम अनजान होते हैं कि वह हमें आने वाले जीवन के लिए अपनी तरह से तैयार कर रहा है। गुलज़ार साहब मेरी तरह बहुतों के नायक हैं। मैं नहीं मानता कि मैं साहित्य की सीढ़ी की दूसरे या तीसरे पायदान पर भी हूँ, लेकिन पहली सीढ़ी पर उचकाते हुए जिन अनुपस्थित हाथों का स्पर्श मेरी पीठ पर था, वो निश्चित ही गुलज़ार साहब के थे।

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