राजनीति पर बेला
राजनीति मानवीय अंतर्क्रिया
में निहित संघर्षों और सहयोगों का मिश्रण है। लेनिन ने इसे अर्थशास्त्र की सघनतम अभिव्यक्ति के रूप में देखा था और कई अन्य विद्वानों और विचारकों ने इसे अलग-अलग अवधारणात्मक आधार प्रदान किया है। राजनीति मानव-जीवन से इसके अभिन्न संबंध और महत्त्वपूर्ण प्रभाव के कारण विचार और चिंतन का प्रमुख तत्त्व रही है। इस रूप में कविताओं ने भी इस पर पर्याप्त बात की है। प्रस्तुत चयन में राजनीति विषयक कविताओं का एक अनूठा संकलन किया गया है।
बिंदुघाटी 2.0 : जीटी रोड पर सावन आ गया है
• ‘बिंदुघाटी’ के पिछले अंकों में भारत की राजनीति के संदर्भ में अगले कुछ वर्षों के लिए दबाव-समूह की महत्ता को रेखांकित कि
पार्टनर, तुम्हारी प्राथमिकता क्या है?
प्राथमिकताएँ न तय कर पाने का संकट जीवन में निरंतर बना रहा है। इससे जूझना मानव की नियति ही रही है। यूँ कहें कि मनुष्य की
चे ग्वेरा : एक समर्पित क्रांतिकारी का एक पूँजीवादी चीज़ में बदलना
रजिस देब्रे ने बोलिविया की जेल में चे ग्वेरा का साक्षात्कार लिया था। बाद में उन्होंने लिखा, “चे आधुनिक युग के ईसा मसीह ह
09 जून 2026
कॉकरोच और क्रांति!
भारत एक अपवाद है और भारतीयता स्वयं अनेक अपवादों का समुच्चय है। जब भी आपको यह आभास होगा कि आपने भारत को समझ लिया है—इसके
रविवासरीय 4.0 : रचनागत द्वंद्व और हार का संसार
• आज से लगभग सात बरस पहले जब 17वीं लोकसभा के लिए मतदान शुरू होने में कुछ ही दिन बाक़ी रह गए थे—1 अप्रैल 2019 को हिंदी-अँग
शपथ पर ग्रहण
वह श्वेतवस्त्रधारिणी अचानक मेरे सामने उपस्थित हो गई। उस म्लानमुख, नतशीश नायिका ने आते ही आग्रह किया—“मुझे ग्रहण करें कवि
हमारे राम कहाँ गए!
ये वे दिन थे जब अँधेरा आकर हमारे आँगन के बीचोबीच बैठ जाता था और हम पाँचों भाई-बहन काँपते हुए संध्या-तारे से धूप की कहानि
रविवासरीय 4.0 : सेवासूक्त
• ‘महर्षि’ पूर्व में अपने कार्यालय को महर्षि-आवास कहते थे। इधर वह कुछ रोज़ से उसे ‘सेवा तीर्थ’ कहने लगे हैं। महर्षि क
प्रतिउत्तर : ‘नाकर्दा गुनाहों की भी हसरत की मिले दाद’
शिवमूर्ति जी ने ‘अगम बहै दरियाव’ पर मेरी आलोचना देखकर एक प्रतिलेख लिखा है और ग़ालिब की यह मनःकामना मेरे हित में पूरी कर
जन्मशती विशेष : युक्ति, तर्क और अयांत्रिक ऋत्विक
—किराया, साहब... —मेरे पास सिक्कों की खनक नहीं। एक काम करो, सीधे चल पड़ो 1/1 बिशप लेफ़्राॅय रोड की ओर। वहाँ एक लंबा सा
मुक्तिबोध का दुर्भाग्य
आज 11 सितंबर है—मुक्तिबोध के निधन की तारीख़। इस अर्थ में यह एक त्रासद दिवस है। यह दिन याद दिलाता है कि आधुनिक हिंदी कविता
जियत न परसिन माँड़ मरे परोसा खाँड़
—मुझे पूरा विश्वास है कि प्रभात रंजन शशिभूषण द्विवेदी के जनाज़े में शामिल हुए थे। —आपको कैसे इतना यक़ीन है? —प्रभात
प्रेम जब अपराध नहीं, सौंदर्य की तरह देखा जाएगा
पिछले बरस एक ख़बर पढ़ी थी। मुंगेर के टेटिया बंबर में, ऊँचेश्वर नाथ महादेव की पूजा करने पहुँचे प्रेमी युगल को गाँव वालों न
बिंदुघाटी : कविताएँ अब ‘कुछ भी’ हो सकती हैं
यहाँ प्रस्तुत इन बिंदुओं को किसी गणना में न देखा जाए। न ही ये किसी उपदेश या वैशिष्ट्य-विधान के लिए प्रस्तुत हैं। ऐसे असं
19 जनवरी 2025
रविवासरीय : 3.0 : पुष्पा-समय में एक अन्य पुष्पा की याद
• कार्ल मार्क्स अगर आज जीवित होते तो पुष्पा से संवाद छीन लेते, प्रधानसेवकों से आवाज़, रवीश कुमार से साहित्यिक समझ, हिंदी
जीवन के मायाजाल में फँसी मछली
पेंगुइन बर्फ़ की कोख में नवजात पेंगुइन पैदा हुआ। पेंगुइन नहीं जानता था, वह क्यों और किस तरह पैदा हुआ। कौन-से उद्देश्य
आपातकाल से अघोषित आपातकाल के बीच
गए दिनों ज्ञान प्रकाश की किताब ‘आपातकाल आख्यान’ आई। राजकमल प्रकाशन से आई इस किताब में, उन्होंने 1975 में लगी इमरजेंसी की
राजनीतिक संगठनकर्ताओं के बीच मुक्तिबोध
भारतीय आर्थिक ढाँचा एक बहुत बड़ी आबादी को ख़ाली समय की सुविधा ही नहीं देता कि वह साहित्य जैसे विषय को अपने जीवन से जोड़
सबसे सुंदर होते हैं वे चुम्बन जो देह से आत्मा तक का सफ़र करते हैं
अंतिम यात्रा लौट आने के लिए नहीं होती। जाने क्या है उस नगर जो जाने वाला आता ही नहीं! (आना चाहता है या नहीं?) सब जानते
01 जून 2024
रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ और दूसरे प्रसंग
‘‘महानतम कृत्य अपनी चमक खो देते हैं, अगर उन्हें शब्दों में न बाँधा जाए। क्या तुम स्वयं को ऐसा उद्यम करने के योग्य समझते
हिंदू कॉलेज में मेरे अंतिम दिन
समय गुज़रता है...ना जल्दी, ना देर से, बस अपनी ही रफ़्तार से। यह जानते हुए भी लग रहा है कि पिछले तीन साल कितनी जल्दी गुज़
14 अप्रैल 2024
बंगाली, बैशाख और रवींद्रनाथ
बांग्ला नव वर्ष का पहला वैशाख वास्तव में बंगालियों के प्राणों का उत्सव है। इस उत्सव में कोई विदेशीपन नहीं है; बल्कि इसमे
‘बिना शिकायत के सहना, एकमात्र सबक़ है जो हमें इस जीवन में सीखना है’
जैसलमेर 10 मई 2023 आज जैसलमेर आया हूँ। अपनी भुआ के यहाँ। बचपन में यहाँ कुछ अधिक आना होता था। अब उतना नहीं रहा। दुपह