शहर पर बेला
शहर आधुनिक जीवन की आस्थाओं
के केंद्र बन गए हैं, जिनसे आबादी की उम्मीदें बढ़ती ही जा रही हैं। इस चयन में शामिल कविताओं में शहर की आवाजाही कभी स्वप्न और स्मृति तो कभी मोहभंग के रूप में दर्ज हुई है।
‘हिन्दवी उत्सव’ में प्रेम की संभावनाएँ
फ़्योदोर दोस्तोयेवस्की की ‘वाइट नाइट्स’ से एक पंक्ति पिछले दो दिन से ज़ेहन में घूम रही है, “यह एक अद्भुत रात थी—ऐसी रात, जो केवल तब संभव होती है, जब हम युवा होते हैं।” ऐसी ही एक अद्भुत रात से पहले का
02 सितम्बर 2026
‘हासिल’ से आगे का इलाहाबाद
बीते 23 अगस्त को उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र [NCZCC], प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में ‘हिन्दवी उत्सव’ 2026 का आयोजन किया गया। मैं इस बात का आग़ाज़ इस तरह नहीं करूँगा कि मैं झूँसी से निकला तो बारि
28 अगस्त 2026
हिन्दवी उत्सव : कविता, आलोचना और संगीत के बीच एक दिन
मेरी इच्छा थी कि मैं ‘हिन्दवी उत्सव’ की रपट को किसी कविता से शुरू करूँ, लेकिन डर था कि कहीं रपट छोड़कर उस कविता को निशाने पर ना ले लिया जाए, इसीलिए थोड़ा लरजते और पाठकों की संख्या का अनुमान लगाते हुए म
23 अगस्त 2026
बिंदुघाटी 2.0 : ‘हिन्दवी’ अपना उत्सव लेकर इलाहाबाद आ तो गया, लेकिन यहाँ से जा नहीं पाएगा
• ‘हिन्दवी’ अपना उत्सव लेकर इलाहाबाद आ तो गया, लेकिन यहाँ से पूरी तरह जा नहीं पाएगा। यह मज़ाक नहीं है, इसके मा’नी तक पहुँचने के लिए इससे गुज़रिए : दरअस्ल, इलाहाबाद की हवा ही नॉस्टैल्जिक है। यहाँ रह
22 अगस्त 2026
शनिवारेर चिट्ठी : इलाहाबाद मेरा दिल तोड़ देगा
दर्शन क्या हम किसी ऐसे शहर के प्रेम में हो सकते हैं जहाँ कभी गए नहीं? शहर—जिसे देखा नहीं। जिसकी गलियों को तैरकर पार न हुए। धूल जूतों पर चढ़ी नहीं। जिसकी किसी दीवार से पीठ टिकाकर चुप बैठे नहीं य
इश्क़, इंक़लाब और इलाहाबाद
पुराने शहर के पुराने इलाहाबादियों के पास थोक के भाव में नेहरू-गांधी ख़ानदान के क़िस्से हैं—जैसे-जैसे गंगा खिसककर यमुना के पास जाती रही, ठीक वैसे ही इलाहाबादियों ने इन गुज़रे क़िस्सों में स्वादानुसार
ईदगाह की सरज़मीं : प्रेमचंद और गोरखपुर
जब कभी ईद आती है या ईद का ज़िक्र छिड़ता है, एक कहानी और उसके किरदार अपने-आप ज़ेहन में उतर आते हैं—प्रेमचंद की ‘ईदगाह’, हामिद और दादी अमीना। हामिद का चिमटा, उसकी क़ुर्बानी और दादी के प्रति उसका बेपनाह
22 जुलाई 2026
प्रयागराज-यात्रा : सुकून की तलाश में
लोग कुंभ या माघ मेले में पुण्य की कामना लेकर प्रयागराज आते हैं, किंतु मुझे मेले में जाने पर न जाने क्यों ख़ुद को खो देने का भय लगता है। फिर अपने पापों का हिसाब भी भला कौन रखता है! सच तो यह है कि जब-ज
09 जुलाई 2026
ई-रिक्शा : कहाँ जाओगे भाई सा’ब!
तीन का आँकड़ा क्या है? तीन लोग हों, तो भी अर्थी ले जाई जा सकती है, बस एक तरफ़ थोड़ा झुकाव रहेगा। लोक-विश्वास देखें, तो तीन तिगाड़ा-काम बिगाड़ा। सुखी परिवार को भाषा को बिन परखे कहा जाए तो दो मिय
मैं शहरों को देखकर कभी मुस्कुरा नहीं सका!
आज से क़रीब दस महीने पहले मैं दूसरी बार दिल्ली की ओर आया। दिल्ली के किनारे, नोएडा को ठिकाना बनाया। जब मैं आया तब मेरे पास शब्दों का एक बड़ा-सा गोदाम था। इस गोदाम से मैं शब्द निकालता, उसे वाक्य बनाता
फ़ीफ़ा, मैकडॉनल्ड्स और बीस साल पहले का इलाहाबाद
इस दफ़ा फ़ुटबॉल विश्वकप की मेज़बानी अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको संयुक्त रूप से कर रहे हैं और दबी-दबी-सी चर्चा है कि भारत में कोई भी ब्रॉडकास्टर इसके प्रसारण अधिकार ख़रीदने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा ह
जगह-जगह 2.0 : चौरंगी, होटल कैलिफ़ोर्निया और गॉडफ़ादर
जगहें कैसे बनती हैं? तुम्हारे और मेरे बैठने से पहले, समंदर किनारे पड़े उन पत्थरों को क्या ‘जगह’ कहा जाए? फ़िल्म ‘रंगीला’ का समुद्र, ‘सदमा’ का समुद्र और ‘Life of Pi’ का समुद्र एक ही है? जगह एक दशा ह
रविवासरीय 4.0 : मेरी बहन की कविताएँ, एक प्लेलिस्ट की याद और थोड़ा-सा कानपुर
• एक बंद घर में प्रतीक्षा भरी होती है। एक प्रतीक्षा जिसमें इच्छा नहीं होती। डोरबेल बजती और बजती और बजती ही रहती है। इस पर वस्तुएँ कैसे प्रतिक्रिया करती हैं, इस पर गंध कहाँ तक जा सकती है, इस पर मनुष्य
जगह-जगह 2.0 : पुणे के बहाने
जाऊ नका कोणी तिथे जाऊ नका कोणी जे गेले, नाही आले परतोनी तुका पंढरीसी गेला पुन्हा जन्मा नाही आला पंढरीचे भूत मोठे — संत तुकाराम (1608-1650) संत तुकाराम इस अभंग में पंढरपुर के अलौकिक आकर्ष
शिवेन्द्र से 10 सवाल : मुंबई मुझे मज़दूरों का शहर लगता है
शिवेन्द्र हिंदी की नई पीढ़ी के कथाकार हैं। वह मुंबई में रहते हैं। उनका एक उपन्यास (चंचला चोर) और दो कहानी-संग्रह (‘चॉकलेट फ़्रेंड्स और अन्य कहानियाँ’ और ‘सतरूपा’) प्रकाशित हो चुके हैं। आज प्रस्तुत है
31 मार्च 2026
मणिपाल यूनिवर्सिटी, जयपुर में ‘हिन्दवी कैंपस कविता’
हिन्दवी कैंपस कविता—‘हिन्दवी’ का एक विशेष आयोजन है। इस आयोजन के माध्यम से देश के विभिन्न शैक्षिक संस्थानों के साथ मिलकर वहाँ के छात्रों को साहित्य-सृजन के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाता है।
तू साडे नाऴ वरत के देख
मेरे बारे में मेरे साथियों की राय बहुत हास्यास्पद है। यात्राओं की योजना पर तो और भी ज़्यादा। मैं जब भी आगे बढ़कर योजना बनाता हूँ तो वे इसे गंभीरता से नहीं लेते, इसके बावजूद मैंने पंजाब यात्रा की योजन
09 फरवरी 2026
शिरीष कुमार मौर्य के बहाने : बनारस से निकला हुआ आदमी
मैं पहली बार शहर आए किसी गँवई किसान-सा निहारता था चीज़ों को अलबत्ता देखे थे कई शहर जीवन के धूप-छाँव में यात्राएँ कहीं पीछे छूट जाती हैं। जीवन में आने वाली समानांतर समस्याएँ समझौते करने को वि
अहमदाबाद : एक प्रवासी स्त्री की आँखों से
तीन वर्ष पहले जब मैं अहमदाबाद आई, तो लगा जैसे किसी अपरिचित भूमि पर क़दम रख रही हूँ। पर धीरे-धीरे यह शहर मेरे भीतर उतरने लगा। या शायद यूँ कहूँ कि यह कभी पराया लगा ही नहीं। अहमदाबाद में एक अद्भुत सहजता
शहर नक़्शे से नहीं, यात्राओं से पहचाने जाते हैं
जाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था। घर में ही एक कोना दे दिया गया, जैसे किसी मुट्ठीभर उम्मीद को दरकिनार कर दिया गया हो। सोफ़ा बिस्तर बन गया, जो कमरा कभी साझा हँसी और कहानियों से भरा होता था, वह अब
बालमुकुंद गुप्त के भूले-बिसरे साहित्यिक घराने की ओर
कल रात बारिश और आँधी आई थी तो मौसम ने भी प्रतिदिन की आदत को छोड़ते हुए हम पर रहम किया और सूर्य देवता काफ़ी देर तक ग़ायब ही रहे तथा बादलों ने ख़ुद को ढाल बनाकर हमें शीतलता प्रदान की। महेंद्रगढ़, ऐसी ज
दक्षिण भारत : कुछ यात्राओं का अंत नहीं होता…
क़रीब तीस साल पहले जब मैं मुंबई में पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत थी, तब एक बार सिटी प्रोफ़ाइल करने के वास्ते बैंगलोर (वर्तमान में बेंगलुरु) और मैसूर जाना हुआ था। मुंबई से बैंगलोर की वह फ़्लाइट त
दिसंबर में होगा कोच्चि–मुज़िरिस बिएनाले का छठा संस्करण
भारत की सर्वाधिक प्रतिष्ठित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त समकालीन कला प्रदर्शनी कोच्चि–मुज़िरिस बिएनाले (Kochi-Muziris Biennale) का छठा संस्करण 12 दिसंबर, 2025 से केरल के ऐतिहासिक समुद्री
अँगूठा मेहनत कर रहा है, दिमाग़ आराम!
सड़क के किनारे फ़ुटपाथ पर लेटा बूढ़ा व्यक्ति लगातार खाँस रहा है। बग़ल में बैठा जवान बेटा हथेली पर खैनी ठोंकते हुए खाना बनने का इंतज़ार कर रहा है। चेस-नुमा शरीर के साथ अधनंगा एक छोटा बच्चा खेल रहा है।
13 नवम्बर 2025
इस बार शांतिनिकेतन में होगा ‘संगमन’
वर्ष 1993 में कानपुर से शुरू हुआ रचनात्मक व बौद्धिक हस्तक्षेप के सहकारी उपक्रम ‘संगमन’ का 26वाँ आयोजन देश के विभिन्न राज्यों से गुज़रता हुआ इस बार शांतिनिकेतन (पश्चिम बंगाल) में हो रहा है। तारीख़ें हैं
छितवन : स्मृति में बसी गंध
चाहता हूँ कि छितवन को उसके नाम से भूल जाऊँ, कहीं से गुज़रूँ तो उसकी महक नथुनों में घुसे और मैं बेचैन होकर उस महक का पता खोजता फिरूँ। मैं उन दिनों को फिर से जीना चाहता हूँ, महसूस करना चाहता हूँ; और उस
बेगम अख़्तर और लखनऊ का पसंदबाग़
सवेरा कमरे में पसर गया था इसलिए हमें उठना पड़ा। कमरे का दरवाज़ा खुलते ही बालकनी शुरू हो जाती, जहाँ से मंदिर का शिखर दिखता जो गली के उस तरफ़ पार्क के दक्षिणी छोर पर था, जिसमें संघ की शाखा लगती। हम बाल
झाड़ियों का शाप
यह घटना नवंबर के आस-पास की है, जब सेमेस्टर का ख़ौफ़ हर विद्यार्थी पर तारी होता है। इन दिनों में हर अच्छा और गदहा विद्यार्थी आपको रट्टा मारते मिलेगा और बात अगर हॉस्टल में रहने वाले लड़कों की हो तो कहन
मैं अब हर घर को उल्टा देखना चाहती हूँ
थाइलैंड और कम्बोडिया : घासतेल की बूँदों के साथ तैरता हुआ जीवन सब कुछ तैर रहा था वहाँ, बैंकॉक की तैरती सब्ज़ी-मंडी में। केले के पत्ते, प्याज़ के छिलके, आस-पास के पेड़ों के साए, और नहर के दोनों तरफ़ ब
झाँसी-प्रशस्ति : जब थक जाओ तो आ जाना
मेरा जन्म झाँसी में हुआ। लोग जन्मभूमि को बहुत मानते हैं। संस्कृति हमें यही सिखाती है। जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से बढ़कर है, इस बात को बचपन से ही रटाया जाता है। पर क्या जन्म होने मात्र से कोई शहर अपना ह
11 अक्तूबर 2025
दिल्ली आना और दिल्ली से जाना एक जैसा नहीं होता है!
सखी दिल्ली, कैसी हो? मुझे पहचाना? मैं वही लड़की जो पहले रोज़गार के लिए तुमसे पहली बार मिली थी, उस मौसम में जिसके लिए तुम्हें सबसे ज़्यादा कोसा और प्यार किया जाता है। जिस मौसम तुम कोहरे में कुछ धुँ
बेदिल की दिल्ली
विगत कई दिनों से हमारा मन दिल्ली से बाहर कहीं दूर जाने को छटपटा रहा था। लगभग दो महीने से राजधानी के एक बंद 20×20 के किराये के कमरे में कैद रहते-रहते दिमाग, दिल और शरीर—सब सुस्त और कुछ-कुछ रोबोट जैसे
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी और ‘फ़ानी बाक़ी’
आज का दिन मेरे महबूब शहर इलाहाबाद के महबूब साहित्यकार और आलोचक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की जन्मतिथि है। वह आसमां में चमकते हुए तारों में से एक हैं, जिसे मैं आज के दिन देखना चाहता हूँ। इलाहाबाद के साहित्
इलाहाबाद मेरे लिए यूटोपिया में तब्दील होता जा रहा है
14 सितंबर 2022 कल किसी ने व्हाट्सएप पर एक स्टेटस लगा रखा था। किसी की मृत्यु का। बहुत सुंदर चेहरा था। जवान था। मैंने पूछा : कौन हैं भाई? जवाब आया : शाइर थे! मैंने पूछा : आत्महत्या? जवाब आया : हाँ!
अस्सी वाया भाँग रोड बनारस
कितना अजीब है किसी घटना को काग़ज़ पर उकेरना। वर्तमान में रहते हुए अतीत की गुफाओं में उतरकर किसी पल को क़ैद कर लेना। उसे अपने हिसाब से जीने पर मजबूर कर देना। मैं कितनी बार कोशिश करता हूँ कि जो घटना बार-ब
इलाहाबाद तुम बहुत याद आते हो-4
तीसरी कड़ी से आगे... आगे डायोसिस चर्च ऑफ़ लखनऊ के प्रभारी का आवास है। मैं जब छात्रावास में रहता था। तब एक बार ऐसा हुआ कि छात्रावास ने व्यवस्थाओं से दूर-दूर तक अपना नाता तोड़ लिया। न साफ़-सफ़ाई, न
भारत भवन और ‘अँधेरे में’ मुक्तिबोध की पांडुलिपियाँ
जब हमने तय किया कि भारत भवन जाएँगे तो दिन शाम की कगार पर पहुँच चुका था। ऊँचे किनारे पर पहुँचकर सूरज को अब ताल में ढलना था। महीना मई का था, लिहाज़ा आबोहवा गर्म थी। शनिवार होने के बावजूद लोगों की उपस्थ
ऋषिकेश : नदी के नगर का नागरिक होना
शहर हम में उतने ही होते हैं, जितने हम शहर में होते हैं। ऋषिकेश मेरे लिए वक़्त का एक हिस्सा है। इसकी सड़कों, गलियों, घाटों और मंदिरों को थोड़ा जिया है। जीते हुए जो महसूस होता है, वही तो जीवन का अनुभव
कहानी : मसअला फूल का है
भूख देखी है आपने? भूख वह भी किसी की आँखों में! भूख भरी आँखों को देख या तो सिहरन होती है या विस्मय... इस भूख को तृप्ति कैसे मिलेगी? यह जानने के प्रयास में, मैं उसके पीछे चली गई। पहले मुझे उस भूख की आख
8 A.M. Metro : अर्थ भरी अदायगी
गुलशन देवैया और सैयामी खेर अभिनीत फ़िल्म ‘8 A.M. Metro’ हाल-फ़िलहाल की प्रचलित व्यावसायिक फ़िल्मों से अलग श्रेणी में आती है। अगर फ़िल्म की विषयवस्तु देखें तो आप इसे ‘लंच बॉक्स’ और ‘थ्री ऑफ़ अस’ की पर
8/4 बैंक रोड, इलाहाबाद : फ़िराक़-परस्तों का तीर्थ
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एम.ए. में पढ़ने वाले एक विद्यार्थी मेरे मित्र बन गए। मैं उनसे उम्र में छोटा था, लेकिन काव्य हमारे मध्य की सारी सीमाओं पर हावी था। हमारी अच्छी दोस्ती हो गई। उनका नाम वीरेंद्र
पूर्वांचल के बंकहों की कथा
कहते हैं इवोल्यूशन के क्रम में, हमारे पूर्वज सेपियंस ने अफ़्रीका से पदयात्रा शुरू की थी और क्रमशः फैलते गए—अरब, तुर्की, बाल्कन, काकेशस, एशिया माइनर, भारत, चीन; और एक दिन हर उस ज़मीन पर उनकी चरण पादुक
ग्लोबल विलेज के शोर में पुरबिया गाँव
यह संस्मरण भूमंडलीय पीढ़ी का देहाती क़िस्सा है। गाँव-देहात को इसलिए नहीं याद कर रहा हूँ कि मेरे पास कुछ कहने के लिए कुछ यादें हैं, बल्कि इसलिए याद कर रहा हूँ कि मेरी पीढ़ी ने बदलावों को इतने तीव्र गति
23 मई 2025
इलाहाबाद तुम बहुत याद आते हो-3
दूसरी कड़ी से आगे... हाँ तो मैं ऑटो में था। वह धड़धड़ाता हुआ बैरहना डाट पुल से सीएमपी कॉलेज से मेडिकल चौराहा होते हुए सिविल लाइंस, हनुमान मंदिर के पास पहुँचा। मैं वहाँ से सीधा पुस्तक मेला गया। मेल
ओ इरशाद, प्यारे इरशाद! अलविदा!
ओ अज़ीज़ इरशाद खान सिकंदर! ओ बुजुर्गों की तमीज़ से भरे युवा इंसान और शाइर-कवि! यह अचानक क्या! तुम्हारी हमेशा-हमेशा की ख़ामोशी हमें बहुत सताएगी यार! हमें फ़ख़्र है कि दिल्ली में दिल जीतने
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी महिला छात्रावास का फ़ोन, कविता और प्रेम
दूसरी कड़ी से आगे... टेलीफ़ोन का युग मध्यवर्गीय परिवार के लिए तब आया, जब मैं पंद्रह-सोलह साल का रहा होऊँगा। नब्बे का दशक अपने अंतिम सालों में था। मोहल्ले में बहुत कम लोगों के पास फ़ोन था। हम भी उनमें
यूनिवर्सिटी का प्रेम और पापा का स्कूटर
पहली कड़ी से आगे... उन दिनों इलाहबाद में प्रेम की जगहें कम होती थीं। ऐसी सार्वजनिक जगहों की कमी थी, जहाँ पर प्रेमी युगल थोड़ा वक़्त बिता सकें या साथ बैठ सकें। ग्रेजुएशन में मुझे पहला प्रेम हुआ। वह ह
इमली, इलाहाबाद, इश्क़
बचपन का इलाहाबाद बहुत खुला-खुला था। उसकी सड़कें खुली और ख़ाली थीं। सड़कों के अगल-बग़ल बाग़, जंगल और पेड़ बहुत थे। एक मुहल्ले से दूसरे मुहल्ले तक की दूरी तब बहुत लंबी और वीरान हुआ करती थी। हमारी तरफ़ से आ
22 अप्रैल 2025
इलाहाबाद तुम बहुत याद आते हो-2
पहली कड़ी से आगे... इसी उधेड़बुन में लगा हुआ था। दोपहर हो गई थी। बिस्तर मेरे भार से दबा हुआ था। मुझे उसे दबाएँ रखने की आज की मियाद पूरी हो गई थी। वह बिस्तर ओवरटाइम काम कर रहा था। जब उसे लगा कि मै
इलाहाबाद तुम बहुत याद आते हो!
“आप प्रयागराज में रहते हैं?” “नहीं, इलाहाबाद में।” प्रयागराज कहते ही मेरी ज़बान लड़खड़ा जाती है, अगर मैं बोलने की कोशिश भी करता हूँ तो दिल रोकने लगता है कि ऐसा क्यों कर रहा है तू भाई! ऐसा नहीं