किरीस का गाना सुनेगा!
आदित्य कुमार
11 जनवरी 2026
21वीं सदी का एक चौथाई हिस्सा समाप्त हो चुका है। सरकारी आँकड़ों की मानें तो हम आधुनिकता के आगे निकल चुके हैं। यानी उत्तराधुनिकता में प्रवेश कर चुके हैं, जिसके कई उदाहरण हमें दिखाई देते हैं। इनमें से एक उदाहरण है सोशल मीडिया तक देश की लगभग आधी आबादी की पहुँच। सोशल मीडिया के नफ़ा-नुक़सान का अनुपात ऊपर नीचे होता रहता है, यह फ़िलहाल डिबेट का मसला बना हुआ है जिससे कई न्यूज चैनल और कंटेंट क्रिएटर्स की रोज़ी-रोटी चलती है।
बीते कुछ दिनों से इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक, एक्स तथा अन्य सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर एक वीडियो धड़ल्ले से वायरल हो रहा है, जिसमें एक लड़का यह कहता है—“किरीस का गाना सुनेगा?” इसके बाद वह एक गीत गाता है—“दिल ना लिया, दिल ना दिया, तो बोलो ना बोलो क्या किया? आके दुनिया में भी अगर प्यार ना किया तो क्या किया? ले बेटा...”, वह जब गाता है इसी तरह से टूटे-फूटे-आगे-पीछे करके लिरिक्स होते हैं।
यह वीडियो वायरल होने की कोई ख़ास वजह नज़र नहीं आती है। ना कोई लय, ना कोई रिदम, फिर भी यह वीडियो इतनी रफ़्तार से फैल रहा है कि इसने कोरोना की रफ़्तार को भी मात दे दी है। पिछले कुछ दिनों में इसे लगभग आठ से दस करोड़ लोगों ने देखा है। वीडियो में दिखने वाला लड़का अपना नाम ‘धूम’ बताता है। धूम—छोटी कद-काठी का है और फटे-पुराने कपड़ों से दिसंबर की ठंड का सामना कर रहा है। बोलते समय उसका शरीर ऐसे डगमगा रहा होता है, जिसे देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह या तो नशे में है या किसी अंदरूनी बीमारी से ग्रसित है। वीडियो को एक-दो बार और देखने से पता चलता है कि लोग ना तो उसके गाने को पसंद करते हैं और ना ही धूम को। लोग पसंद करते हैं धूम की परिस्थिति को, उसकी बदहाली को, उसकी ग़रीबी को और उसकी अभावग्रस्त ज़िंदगी को। भिखारी जैसा दिखने वाला लड़का अपने आप को धूम नाम देता जो जॉन अब्राहम, ऋतिक रोशन, आमिर ख़ान अभिनीत फ़िल्मों से (धूम शृंखला) से प्रेरित लगता है। वह कृष का गाना सुनाता है, यह प्रसंग मुख्यधारा के तथाकथित समृद्ध लोगों के बीच में कौतूहल का विषय बन जाता है, लोगों के लिए यह मज़ाक़-मस्ती का साधन बन जाता है। अपने इस सुख को वे अपने मित्रों तक साझा करते हैं, जिसका नतीजा यह होता है कि हर महीने धूम जैसा कोई ग़रीब, अभावग्रस्त लड़का या लड़की किसी के मनोरंजन के साधन के रूप में सोशल मीडिया पर सुर्खियों में रहता है।
कई महान् मनोवैज्ञानिकों और दार्शनिक विचारकों ने यह तर्क दिया है कि मनुष्य दूसरों के दुख से दुखी होता है। आलम यह है कि धूम जैसे कचरा उठाने वाले के दुख को देखकर सुख लूटने वालों ने उनके इस तर्क की धज्जियाँ उड़ा दी है। विलासियों की भीड़ में यह मालूम होता है कि हमारी संवेदना समाप्त हो चुकी है। यह भीषण त्रासदी का संकेत है। बाल मज़दूरी को रोकने के लिए मुख्य कानून बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 है, जो 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कारख़ानों, खदानों और ख़तरनाक व्यवसायों में काम करने से रोकता है और संविधान के अनुच्छेद 24 के तहत इसे प्रतिबंधित करता है। बावजूद इसके दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों में भारी मात्रा में बाल मज़दूर होटलों में बर्तन धोते, गराज में हेल्पर का काम करते तथा –कूड़ा-कबाड़ बिनने का काम करते नज़र आ सकते हैं। यूनिसेफ़ (UNICEF) के आंकड़ों के अनुसार भारत में अभी भी 1.07 करोड़ बाल श्रमिक सक्रिय हैं, जो अपने मूल अधिकारों से वंचित हैं। शिक्षा-स्वास्थ्य तो दूर की बात है, उन्हें दो वक़्त का खाना भी नसीब नहीं होता और मजबूरन उन्हें खेलने-खाने की उम्र में मज़दूरी करनी पड़ती है।
कृष का गाना सुनाने वाले करोड़ों धूम हमारे महान् देश भारत में हैं जिसकी ऐतिहासिक विरासत का गुणगान करते वक़्त हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। ख़ैर हमारा देश महान् था इसमें मुझे कोई शक नहीं। लेकिन उसी महान् देश भारत में एक तरफ़ गांधी, आम्बेडकर, विवेकानंद, बुद्ध और महावीर जन्में जिन्होंने मानवता का पाठ पढ़ाया और संवेदनाशीलता को मानव हृदय का विशिष्ट अंग बताया और दूसरी तरफ़ धूम की बदहाली को अपने मनोरंजन का साधन बनाने वाले संवेदनहीन लंपट भी।
आधुनिक होने के नाते हम अपनी तुलना अमेरिका, रूस, चीन तथा अन्य यूरोपीय देशों से करते हैं और उनके समकक्ष खड़े होने की प्रबल इच्छा भी रखते हैं। यह ख़याली पुलाव मात्र है। मुझे नहीं लगता इन विकसित देशों के बच्चे भी धूम की स्थिति में होंगे और वहाँ की जनता अपना काम-काज छोड़ एक-दूसरे से पूछती होगी—‘किरीस का गाना सुनेगा’।
पश्चिमी देशों में जहाँ युवा तकनीकी कौशल में पारंगत होता है तो हमारे भारत में युवा या तो धूम की स्थिति में होता है या धूम का मज़ाक़ उड़ाने की स्थिति में। जबतक संसार के किसी भी कोने में धूम जैसा असहाय निर्धन रोटी के एक टुकड़े के लिए नालों और गटरों से प्लास्टिक की बोतल चुनता रहेगा, तब तक हमारे विकसित होने का कोई अर्थ नहीं है। मैं चाहता हूँ कि धूम को दिल खोलकर गाना चाहिए, लेकिन वैसी परिस्थिति में नहीं अपितु सामान्य जीवनशैली के साथ।
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