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व्यंग्य : लाख काम छोड़कर बिहार जाना चाहिए

(डिसक्लेमर : मैं जन्मना बिहारी, कर्म से झारखंडी, मन से भारतीय और असंभव विश्व नागरिकता प्राप्त करने का आकांक्षी हूँ। इतने पर भी कोई शंका करे तो तुलसीदास के शब्दों में वह मुझसे भी अधिक जड़मति रंका है।)

मेरे गाँव में एक शादीशुदा संत थे। शादीशुदा संत अधिक विश्वसनीय होते हैं। उनके भटकने का भय थोड़ा कम रहता है। उनके वचनों को प्रामाणिक मानना चाहिए। वह अक्सर कहा करते थे—“सौ काम छोड़कर ससुराल जाना चाहिए और हज़ार काम छोड़कर बाज़ार जाना चाहिए।” उनकी बात आगे बढ़ाते हुए, मैं कहना चाहता हूँ कि लाख काम छोड़कर बिहार जाना चाहिए। बिहार विहार करने योग्य है। न जाने कितने देसी-विदेशी यात्री बिहार आकर समृद्ध हुए हैं। उनके बारे में आप सब जानते ही हैं। जैसा कि पहले कह चुका हूँ कि बिहार मेरी मातृभूमि है, पूर्वजों की बात मानूँ तो यह मेरे लिए स्वर्ग से बढ़कर है। इस बात की पुष्टि मेरे पड़ोस के ग्रामवासी बुज़ुर्ग सेक्रेटरी साहब ने भी की। जब उन्होंने बिहार का सिक्रेट बतलाया तो मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। कहा—“दुनिया में कहीं घूम लीजिए, लेकिन हम लोग जिस एरिया में रहते हैं, ऐसा इलाक़ा कहीं नहीं पाइएगा। यहाँ न बाढ़, न सुखाड़ माने हरदम सदाबहार। मैंने भी महसूस किया—सचमुच, जब से होश सँभाला, बिहार में सुशासन है, सरकार है। मुझे भी गर्व हुआ कि मेरी जन्मभूमि भगवान महावीर की जन्मभूमि से मात्र बीस किलोमीटर की दूरी पर है। प्राचीन लिच्छवी राजाओं की राजधानी यहीं है। लोकतंत्र की जननी के रूप में विख्यात वैशाली को कौन नहीं जानता? मेरा तो यहाँ तक मानना है कि प्रथम विश्व सुंदरी प्रतियोगिता यहीं हुई थी। हर वर्ष नगरवधुओं का चयन इस बात का संकेत और सबूत है। इस पुण्यभूमि पर पैर रखते ही श्रद्धानत होकर, मैंने भगवान बुद्ध की तरह आँखें मूँद ली। भगवान महावीर से प्रार्थना की कि सत्य, अहिंसा, अस्तेय आदि जीवन मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए फिर से इसी भूमि पर अवतरित होइए, अन्यत्र नहीं। वर्तमान में आपकी सख्त ज़रूरत है। पता नहीं, वह मेरी प्रार्थना सुनेंगे या नहीं। इस बीच मुझे अपने राष्ट्रीय पेय चाय की तलब होने लगी तो कुछ किलोमीटर की यात्रा कर सड़क किनारे जब चाय-दुकान पर बाइक को स्टैंड किया तो मेरी आँखें साइन बोर्ड पर अटकीं रह गईं। थोड़ी देर चाय का आर्डर करना भूल मैं उस पर उत्कीर्ण स्लोगन को पढ़ने लगा। अंततः उसे मोबाइल में सहेज लिया। सबसे पहले उस दुकान का शुभ नाम सुनिए—बेवफ़ा चाय दुकान। अब स्लोगन आपके लाभार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ— 

न चाँद ला सकता हूँ, न तारे तोड़ सकता हूँ 
ज़मीन से जुड़ा आशिक़ हूँ यार, तुम्हारे लिए चाय बना सकता हूँ।

सोचिए, जीवन के प्रति इतना रियलिस्टिक अप्रोच किस प्रांत में मिलेगा। इतने सच्चे प्रेमी पर कौन नहीं क़ुर्बान हो जाए। चाँद-तारे तोड़ने वाले करोड़ों प्रेमी काल-कवलित हो गए। सब झूठे थे। शीशे की तरह साफ़ दिल वाले ऐसे लोग केवल अपने प्रदेश में पाए जाते हैं। कुछ तो इतने मशहूर हो गए हैं कि उन्हें लोग नज़ीर की तरह पेश करते हैं और लगे हाथ एक शेर हवा में उछाल देते हैं—

काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के,
दीवाना बिना पढ़े-लिखे मशहूर हो गया

भाई, मैं गदगद हो गया। मैंने मन ही मन सोचा—मुझे बिहार में कुछ दिन और गुज़ारना चाहिए। यात्रा के दूसरे दिन मैंने बाइक छोड़ सार्वजनिक वाहन का सहारा लिया। ई-रिक्शा अच्छा विकल्प लगा। इसे अपने यहाँ टुक-टुक कहते हैं। बड़ी प्यारी गाड़ी है, मृदु मंद-मंद मंथर-मंथर चलती है। इस पर बैठकर मुझे सुमित्रानंदन पंत की कविता ‘नौका विहार’ याद आ गई। संयोग देखिए कि सामने वाली सीट पर शादीशुदा प्रेमी-प्रेमिका आसीन थे। उन्हें देख कोई पारखी कवि भी डिसाइड नहीं कर पाता कि वे प्रेमी-प्रेमिका हैं या पति-पत्नी। पर जो प्रेम रस छलक रहा था, वह स्वकीया के भाव का अतिक्रमण कर रहा था। बहरहाल, मेरे कानों में अमृत की बूँदें उसी तरह टपक रही थीं, जैसे भोर में महुआ टपकते हैं। मैं बतरस का आनंद ले रहा था। प्रेमियों की बातें अशेष-अनंत होती हैं। उन्हें सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए। बुद्धिमान को इशारा काफ़ी है। पर एक बात बतलाए बिना नहीं रह सकता। उस अभिसारिका ने अपने प्रेमी के समक्ष होटल में उसकी प्रतीक्षा में बिताए गए पलों और उसके साथ-साथ जलपान गृह की ख़ास मिठाई रसमाधुरी का जो वर्णन किया, उसे सुन मैं आनंद-विभोर हो गया। उसे शब्दों में कैसे कहूँ। और जाते-जाते उस प्रेयसी ने उसे सुरक्षित जगह पर उतर जाने की ऐसी सलाह दी कि मैं पाप-पुण्य का ध्यान दिए बिना उसे एकटक देखता रह गया। अपने यहाँ तो घोषित है—देखो मगर प्यार से। वैसे भी कवि, व्यभिचारी और चोर को शंका करने और चारों ओर देखने का लाइसेंस मिला हुआ है। ख़ैर, मैं चाहता था कि यह यात्रा लंबी हो, लेकिन वे दोनों जब गांधी-चौक पर उतर गए तो मैं ठगा-सा रह गया। रसमाधुरी खाने की मेरी इच्छा नियंत्रण के बाहर हो रही थी। लिहाज़ा, मैंने पातालेश्वर मिष्ठान भण्डार का रुख़ किया।

इस लेख के अंत के पूर्व एक ज़रूरी बात याद आ गई। इसके पहले कि भूल जाऊँ ,शेयर करना उचित लग रहा है। बिहार का आदमी हूँ, जन्मजात परोपकारी प्रकृति और प्रवृत्ति का भी। आप जानते हैं कि वकील, डॉक्टर कोई मुफ़्त में राय नहीं देता, लेकिन हम लोग हर प्रश्न का जवाब देते हैं। हम नि:शुल्क सेवा करने वाले लोग हैं। इसके लिए हमारे पास पर्याप्त समय होता है। आपको तब तक सुनाते रहेंगे, जब तक आपके घर से खाने के लिए कॉल न आ जाए। हमारे यहाँ किसी से मिल लीजिए—वह रोग का उपचार बतला देगा, क़ानूनी सलाह देगा। धर्म और अध्यात्म पर घंटों प्रवचन देगा। मुक्ति का मार्ग दिखा देगा। मतलब हर आदमी वहाँ मल्टी टास्किंग की भूमिका निभा रहा है। यदि उन्हें फ़िल्म में काम करने का मौक़ा मिले तो अकेले हीरो और विलेन की भूमिका भी निभा लेंगे। निभाने की कला इनसे बेहतर शायद ही कोई जानता हो। रही बात राजनीति की तो इस संबंध में तो पूछिए ही मत। यह तो उनका अपना पसंदीदा क्षेत्र है। राजनीति तो यहाँ के बच्चे-बच्चे के ख़ून में है। अपने यहाँ हर चौक-चौराहे, ढाबे यहाँ तक कि हर पीपल के पेड़ के नीचे मिनी संसद लगती है। क़ानून बनते हैं। मामले की जाँच होती है और त्वरित फ़ैसला सुनाया जाता है। कमज़ोर मान लेता है और मुँहज़ोर उठ कर चल देता है। सच पूछिए तो अपने यहाँ लोग अपना सुख-दुख की बातें कम, नेताओं की हार-जीत की चर्चा अधिक करते हैं। ख़ैर, ज़रूरी बात कहना ही भूल गया। विषयांतर हो जाता है। कह यह रहा था कि जब भी मैं बिहार जाता हूँ, वहाँ विहार करते हुए मुझे महात्मा गांधी याद आते हैं। यह बात समझ में आती है कि वह क्यों थर्ड क्लास में सफ़र करते थे, पदयात्रा करते थे। आप भी जब घूमेंगे तो अनुभव होगा कि यहाँ सार्वजनिक वाहनों का उपयोग करना चाहिए। बहुत कुछ सुनने-सीखने को मिलता है। कभी पढ़ता था कि यात्राएँ करनी चाहिए इससे दृष्टि का विस्तार होता है। अब महसूस करता हूँ। सिद्धांत की वास्तविकता का पता लगाने के लिए प्रयोग ज़रूरी है। इस प्रयोग की शुरुआत बिहार से करनी चाहिए। एक सलाह अवश्य दूँगा—जब वहाँ जाएँ, पर्याप्त समय लेकर जाइए। वहाँ के लोग अतिथि-वत्सल हैं। आप को जल्दी विदा नहीं करना चाहते। उनके पास इफ़रात समय है। यहाँ लोगों में अकेलेपन और अवसाद की समस्या नहीं है। बड़े सामाजिक लोग हैं। यह प्रांत विभिन्न क़िस्म के अनुभवों को महसूस करने के लिए उचित स्थल है।

मैं शब्द-साधकों से निवेदन करना चाहता हूँ कि बिहार की भूमि रचनात्मक है, इसके लिए प्रमाण प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है। यहाँ के लोगों में अद्भुत क़िस्सागोई है। हालिया बिहार दौरे के दौरान मुखिया जी ने अनमोल मणि की कहानी सुनाई, जिससे हर दम प्रकाश निकलता रहता था। वह मणि एक गधे के गले से लटकी रहती थी, जिसके आलोक में धोबी घाट से घर तक की सकुशल यात्रा करता था। यह तो एक बानगी है। हमारे यहाँ लोग संक्षेपण में विश्वास नहीं करते, वे किसी भी घटना या दृश्य का तल्लीन होकर तफ़सील से वर्णन करते हैं। यहाँ के लोगों के कहन में जादुई यथार्थ है, इन्हें सुनते हुए आप दंग रह जाएँगे। यदि इन लोगों ने अपनी प्रतिभा का सदुपयोग किया होता तो वे विश्वस्तरीय कथा-साहित्य का सृजन कर सकते थे। इनमें कवित-विवेक भी है। हर पाँच मिनट पर एक दोहा, चौपाई नहीं तो कम से कम लोकोक्ति या कहावत सुनाकर अपनी बात को संपुष्ट करते हैं। दो-चार पंक्ति के गद्य के बाद अवश्य कहेंगे—गोसाईं जी रामायण में कहिन् हैं। कबीर और रहीम तो इनके पड़ोसी ही हैं। बीच-बीच में अँग्रेज़ी शब्दों का बख़ूबी प्रयोग कर अपने पढ़े-लिखे होने का प्रमाण भी प्रस्तुत करते हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मसले पर उनकी बेबाक राय सुनने का अलग सुख है। आप भी सहमत होंगे कि सारे आंदोलनों की शुरुआत लगभग यहीं से होती है। यह सत्याग्रह और संपूर्ण क्रांति की भूमि है। जब भी मौक़ा मिले, यहाँ अवश्य जाइए, ज़रूरी काम की तरह वहाँ के लोगों से मिलने जाइए। मैं एक रात नहीं पूरा मास वहाँ गुज़ारने की सलाह दूँगा। मैं तो चाकरी के कारण पिछले तीन दशकों से दूर रहा हूँ। अब बार-बार जाऊँगा। जब जाऊँगा, अपने अनमोल अनुभवों को आपसे साझा करता रहूँगा। आपके लाभार्थ इसे मैं आवश्यक समझता हूँ।

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ललन चतुर्वेदी को और पढ़िए : आजकल पत्नी को निहार रहा हूँबुद्धिजीवी और गधे | अफ़सर बनते ही आदमी सुहागन बन जाता है

 

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