प्रतिरोध पर उद्धरण
आधुनिक कविता ने प्रतिरोध
को बुनियादी कर्तव्य की तरह बरता है। यह प्रतिरोध उस प्रत्येक प्रवृत्ति और स्थिति के विरुद्ध मुखर रहा है, जो मानव-जीवन और गरिमा की आदर्श स्थितियों और मूल्यों पर आघात करती हो। यहाँ प्रस्तुत है—प्रतिरोध विषयक कविताओं का एक व्यापक और विशिष्ट चयन।
बिना आत्मशुद्धि के प्राणिमात्र के साथ एकता का अनुभव नहीं किया जा सकता है और आत्मशुद्धि के अभाव से अहिंसा धर्म का पालन करना भी हर तरह नामुमकिन है।
जनता मुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊँ?
जनकवि हूँ मैं, साफ़ कहूँगा, क्यों हकलाऊँ।
इस संसार में बिना प्रतिरोध, बिना हिंसा और बिना इच्छा के कोई रह ही नहीं सकता। अभी संसार उस अवस्था में नहीं पहुँचा कि ये आदर्श, समाज में प्राप्त किए जा सकें।
सहनशील होना अच्छी बात है, पर अन्याय का विरोध करना उससे भी उत्तम है।
आप जिस चीज़ का प्रतिरोध करते हैं, उसे अपनी ओर आकर्षित करते हैं क्योंकि आप प्रबल भावना से उस पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करते हैं।
किसी क़िस्म का प्रतिरोध खड़ा करने के लिए नेताओं की एक बड़ी संख्या को और उनके समर्थकों को, हर तरह के प्रलोभनों और व्यक्तिगत तरक़्क़ी के प्रस्तुत अवसरों का बहिष्कार करना पड़ता है।
सरकार को समाप्त करने का सबसे अच्छा तरीक़ा, उससे अलग हो जाना है। मैं यह इसलिए नहीं कह रहा हूँ; क्योंकि यह टॉलस्टॉय का सिद्धांत था या गांधी जी इसका प्रचार करते थे, बल्कि इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि मैं इसमें विश्वास करने लगा हूँ।
सामाजिक चेतना सामाजिक संघर्षों में से उपजती है।
जन-समूह विचार से नहीं, आवेश से काम करता है। समूह में ही अच्छे कामों का नाश होता है और बुरे कामों का भी।
हमारे अगणित असुविधारूपी तालों को खोलने के लिए सताग्रहरूपी एक मुख्य कुंजी है।
गति के किसी भी रूप के भीतर अपना विशिष्ट अंतर्विरोध निहित होता है।
कहानी के नेपथ्य में कुकर्मी भी धैर्यपूर्वक इस बात की प्रतीक्षा करता है कि उसके द्वारा सताया गया नायक अपने प्रतिकार का प्रबंधन कर सके।
अगर कविता एक ‘सामाजिक कार्य’ है (जो कि वह है) तो फिर उसका राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ना अनिवार्य ही है।
संगठित राजनीति और रचना में तनाव का रिश्ता होना चाहिए और सत्ता और रचना में भी तनाव का रिश्ता होना चाहिए।
आगे का कलाकार मेहनतकश की ओर देखता है।
हिंदी का रचनाकार इतने-इतने बंधनों में जकड़ा हुआ है कि हम निर्बंध रचना की उम्मीद कर भी नहीं सकते।
क्या यही सच है कॉमरेड कि विचार और क्रिया में दूरी हमेशा बनी रहती है?
बेहया दूसरे की बाढ़ को रोकने वाली वनस्पति है।
प्रतिरोध, साहित्य का स्थायी भाव है।
किसी भी बड़ी वस्तु के विकास की प्रक्रिया में अनेक अंतर्विरोध होते हैं।
प्रवाह के विरुद्ध जाने की या अलग होने-बोलने-करने की निरंतर क़ीमत चुकानी पड़ती है।
कविता के लिए मनुष्य की पक्षधरता के अतिरिक्त मैं किसी अन्य पक्षधरता को आवश्यक नहीं मानता।
कोई यथार्थ से जूझकर सत्य की उपलब्धि करता है और कोई स्वप्नों से लड़कर। यथार्थ और स्वप्न दोनों ही मनुष्य की चेतना पर निर्मम आघात करते हैं, और दोनों ही जीवन की अनुभूति को गहन गंभीर बनाते हैं।
प्रतिरोध केवल अनेक तरह की विकृतियों को जन्म देता है।
अंतर्विरोध सभी वस्तुओं के विकास की प्रक्रिया में मौजूद है; यह प्रत्येक वस्तु के विकास की प्रक्रिया में शुरू से अंत तक बना रहता है।
अंतर्विरोध सार्वभौमिक और निरपेक्ष होता है, वह सभी वस्तुओं के विकास की प्रक्रिया में मौजूद रहता है और सभी प्रक्रियाओं में शुरू से अंत तक बना रहता है।
व्यक्ति-मन होता है जन-मन के लिए।
पूर्णकाम न हो सके लोगों का एक पूरा देश है जो हमारे संतुष्ट-सुरक्षित संसार को हिलाता रहता है।