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अवास्तविक पर उद्धरण

पाखंडी लोग कितनी आसानी से इस जगत् को धोखे में डाल देते हैं। सभ्यता के प्राथमिक विकास-काल से लेकर भोली-भाली मानव-जाति पर, जाने कितना छल-कपट किया जा चुका है।

स्वामी विवेकानन्द

यथार्थ के प्रति मनुष्य की जानकारी बदलती रहती है या दूसरे शब्दों में वह विकसित होती रहती है। तब उस यथार्थ विशेष का बोध कराने वाले शब्द का अर्थ भी बदलता रहता है।

विजयदान देथा

आँखें एक जैसी होने पर भी देखने-देखने में फ़र्क़ होता है।

रघुवीर चौधरी

दुनिया में दु:ख तो बहुत हैं, परंतु अगम-अगाध गंभीर दु:ख बहुत ही कम! ठीक वैसे ही जैसे कामबोध की खुजलाहट तो सबके पास है, परंतु निर्मल उदात्त प्रेम की क्षमता बिरले के ही पास होती है।

कुबेरनाथ राय

शरीर अंततः अवास्तविक है।

रघुवीर चौधरी
  • संबंधित विषय : देह

समाज में एक बड़ी संख्या अभी भी उन व्यक्तियों की है, जो अपने मूल पशुत्व और स्वार्थ पर सभ्यता का सिर्फ़ मुलम्मा चढ़ाए हुए हैं—एक दिखावटी आवरण।

जॉन स्टुअर्ट मिल

विज्ञापनों द्वारा की गई दुनिया की व्याख्या और वास्तविक दुनिया में बहुत विरोध है।

जॉन बर्जर

विज्ञान में सत्य-मिथ्या का विचार ही अंतिम विचार होता है। इसी कारण से वैज्ञानिक की अंतिम अपील, विचारक के व्यक्तिगत संस्कार के ऊपर प्रमाण में होती है।

रवींद्रनाथ टैगोर

नींद में आदमी जो सपना देखता है, उसे वह सही मानता है। जब उसकी नींद खुलती है तभी उसे अपनी ग़लती मालूम होती है। ऐसी ही दशा सभ्यता के मोह में फँसे हुए आदमी की होती है।

महात्मा गांधी

जो प्रतिज्ञा प्रत्यक्ष प्रमाण से ही बाधित हो, अर्थात् प्रत्यक्ष प्रमाण से ही अयथार्थ (असत्य) सिद्ध हो जाए, उसे प्रत्यक्षबाधिनी प्रतिज्ञा कहते हैं। यथा, अग्नि शीतल है, रूप का अस्तित्व नहीं है, चंद्रमा उष्ण है।

भामह

किसी किसी जादू या टोने में यक़ीन किए बग़ैर, कवि या लेखक बने रहना शायद ही संभव हो।

कृष्ण कुमार

हम अपनी काल्पनिक सृष्टि से सत्य को ढकने की कोशिश करते हैं और असलियत से अपने को बचाकर, सपनों की दुनिया में विचरने का प्रयत्न करते हैं।

जवाहरलाल नेहरू

प्राण-संशय होने पर प्राणियों के लिए कुछ भी अकरणीय नहीं होता है।

कल्हण

कोरा किताबी ज्ञान मनुष्य को धोखा भी दे सकता है, किन्तु संघर्षों से निकली हुई शिक्षा कभी भी झूठी नहीं होती।

रामधारी सिंह दिनकर

नाटक में सत्य एक शाश्वत मरीचिका है।

हेरॉल्ड पिंटर

यथार्थ और भ्रम के अपने-अपने आकर्षण हैं। यथार्थ को जानते हुए भ्रम में रहना एक तीसरा रास्ता है, और उसके आकर्षण कम नहीं।

कृष्ण कुमार

यथार्थ क्या है और अयथार्थ क्या है–इसका कोई स्पष्ट भेद नहीं रहा है और ही सच्च झूठ में कोई अंतर रहा है।

हेरॉल्ड पिंटर

कल्पना और काल्पनिकता—दोनों में बड़ा अंतर है। सच्ची कल्पना युक्ति, संयम और सत्य के द्वारा सुनिर्दिष्ट आकार में बँधी होती है, काल्पनिकता में सत्य का आभास-मात्र होता है। लेकिन वह अद्भुत अतिरंजना से असंहत रूप में फूली हुई होती है, उसमें जो थोड़ा-बहुत प्रकाश होता है—उससे सौ गुना ज़्यादा धुआँ होता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

आधुनिकता का प्रभाव बीमारी के रूप में लोगों के मन में घुस गया है। इस बीमारी का पहला दुष्परिणाम यह है कि आदमी जो जीता है, उससे भिन्न रूप दिखाता है।

कृष्ण बिहारी मिश्र

वृहत्तर अर्थों में प्रसन्नता कोई ऐसी यथार्थवादी खोज नहीं है। प्रसन्नता एक क्षण है। प्रसन्नता एक तितली है। मैं जब कोई रचना पूरी कर लेता हूँ तो मुझे प्रसन्नता महसूस होती है।

महमूद दरवेश

जब आप राजनीति में शुद्धता की तलाश शुरू करते हैं, तब आप अंततः अवास्तविकता तक पहुँच जाते हैं।

मारियो वार्गास ल्योसा

भोलेपन से ख़ाली तथा दगीली ख़ूबसूरती पहले तो कोई ख़ूबसूरती ही नहीं है, और कदाचित् हो भी तो कुटिलाई और बाँकपन लिए; हाव-भाव दूषित, मलिन और अपवित्र मन की खोटाई के साथ, ऊपर से रंगी-चुंगी सुंदरता छूत के समान देखने वालों के मन में अवश्य अपवित्र और दूषित भाव पैदा करेगी।

बालकृष्ण भट्ट

पुस्तकालयों पर सभी की नज़र रहती है—ठीक वैसी ही जैसी किसी अजायबघर पर। बाहर से कोई आया तो हम अपने वाचनालय और पुस्तकालय दिखला देते हैं, ताकि उन्हें विश्वास हो कि हमारा बौद्धिक स्तर क्या है।

हरिशंकर परसाई
  • संबंधित विषय : नक़ल

राजनीति में जब एक गुट पिट जाता है, तो वह असंतुष्ट होकर जनता के दुःखों पर विलाप करने लगता है।

हरिशंकर परसाई

साहित्य के आचार्यों की बात करनी चाहिए। ये रसवादी प्रकार के आचार्य हैं। ये रँडुए होकर भी अपने-आप हृदय में शृंगार रस जाने कैसे पैदा कर लेते हैं? इन्हें आलम्बन भी नहीं चाहिए शायद, क्योंकि आलम्बन और चेतना का द्वंद्व होने लगता है।

हरिशंकर परसाई