नियम साधना का लोभ भी कष्ट की मात्रा का हिसाब लगाकर आनंद पाता है। अगर कड़े बिछौने पर सोने से शुरू किया जाए; तो आगे चलकर मिट्टी पर बिछौना बिछाकर, फिर सिर्फ़ एक कंबल बिछाकर, फिर कंबल को भी छोड़कर निखहरी ज़मीन पर सोने का लोभ क्रमशः बढ़ता ही रहता है।
परित्राण का अर्थ यह है कि व्यर्थता और असफलता से अपनी रक्षा करना, अपने भीतर सत्यरूपी जो रत्न छिपा हुआ है, उसका उद्धार करना।
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अस्पर्श में प्रतिष्ठित हो जाने का नाम ही संयम है। और, संयम सत्य का द्वार है।
जगत् के सभी महान् पैग़ंबरों का प्राण पर अत्यंत अद्भुत संयम था, जिसके बल से वे प्रबल इच्छाशक्तिसम्पन्न हो गए थे।
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हममें मन के निग्रह की शक्ति बहुत थोड़ी है।
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अत्यंत भूखा मनुष्य यदि कंठनली में चित्त का संयम कर सके, तो उसकी भूख शांत हो जाती है।
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यम और नियम चरित्र-निर्माण के साधन हैं। इनको नींव बनाए बिना किसी तरह की योगसाधना सिद्ध न होगी। यम और नियम में दृढ़प्रतिष्ठ हो जाने पर योगी अपनी साधना का फल अनुभव करना आरंभ कर देते हैं।
मन को बाहरी विषय पर स्थिर करना अपेक्षाकृत सहज है। मन स्वभावतः बहिर्मुखी है, किंतु धर्म, मनोविज्ञान, अथवा दर्शन के विषय में ऐसा नहीं है।
आप अपने विचारों और आकर्षण के नियम द्वारा अपने जीवन का सृजन कर सकते हैं।
मन की अस्थिरता के कारण शरीर भी पूरी तरह अस्थिर हो जाता है।
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अलादीन के जिन्न की तरह ही आकर्षण का नियम भी हमारे हर आदेश का पालन करता है।
मन के संयम का पहला सोपान यह है कि कुछ समय के लिए चुप्पी साधकर बैठे रहो, और मन को अपने अनुसार चलने दो।
शक्तिशाली भावना; शक्तिशाली आत्मनियंत्रण को भी जन्म देती है, सिर्फ़ व्यक्ति में इसके अभ्यास की आदत होनी चाहिए।
योगी प्रयत्न करते हैं कि वे अपने को ऐसा सूक्ष्म अनुभूति-संपन्न कर लें, जिससे वे विभिन्न मानसिक अवस्थाओं को प्रत्यक्ष कर सकें।
अधिकांश मनुष्य पशु से बहुत थोड़े ही उन्नत हैं, क्योंकि अधिकांश स्थलों में तो उनकी संयम की शक्ति, पशु-पक्षियों से कोई विशेष अधिक नहीं।
उत्कृष्ट योद्धा अनुशासनप्रिय होता है और इसी अनुशासन ने अश्वत्थामा को निगल लिया।
जब कोई अपनी समस्त शक्तियों का संयम करता है, तब वह अपनी देह के भीतर के प्राण का ही संयम करता है। जब कोई ध्यान करता है, तो भी समझना चाहिए कि वह प्राण का ही संयम कर रहा है।
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हमेशा याद रखो कि प्रत्येक राष्ट्र को अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी। इसी तरह प्रत्येक मनुष्य को भी अपनी-अपनी रक्षा करनी होगी।
धारणा करने के लिए संयम चाहिए और मिथ्याचार के लिए असंयम।
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गढ़ने में संयम की ज़रूरत होती है, नष्ट करने में असंयम की।
अपने मन का संयम करने के लिए सदा अपने ही मन की सहायता लो और यह सदा याद रखो कि तुम यदि रोगग्रस्त नहीं हो, तो कोई भी बाहरी इच्छाशक्ति तुम पर कार्य न कर सकेगी।
संसार में शक्ति के जितने विकास देखे जाते हैं, सभी प्राण के संयम से उत्पन्न होते हैं।
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जो केवल अपने हृदय के द्वारा परिचालित होते हैं, उन्हें अनेक कष्ट भोगने पड़ते हैं, क्योंकि प्रायः ही उनके भ्रम में पड़ने की संभावना रहती है।
किस प्रकार इस प्राण पर विजय पाई जाए, यही प्राणायाम का एकमात्र उद्देश्य है।
योगी का ब्रह्मचर्यवान होना अनिवार्य है।
योगी यह दावा करते हैं कि जो मन को वशीभूत कर सकते हैं, वे भूत को भी वशीभूत कर लेते हैं।
ध्यान के लिए वस्तुतः सर्वोच्च ढंग की संवेदनशीलता चाहिए तथा प्रचण्ड मौन की एक गुणवत्ता चाहिए—ऐसा मौन जो प्रेरित, अनुशासित या साधा हुआ नहीं हो।
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कर्म, उपासना, मन, संयम अथवा ज्ञान—इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ।
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जिस प्रकार कला अपने आभ्यंतर नियमों के कठोर अनुशासन के बिना अपंग या विकृत होती है; अथवा अभाव बनकर रहती है, उसी प्रकार व्यक्ति-स्वातंत्र्य अपनी अंतरात्मा के कठोर नियमों के अनुशासन के बिना—निरर्थक और विकृत हो जाता है, खोखला हो जाता है।
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भीतर इतनी गहराई हो कि कोई तुम्हारी थाह न ले सके। अथाह जिनकी गहराई है, अगोचर उनकी ऊँचाई हो जाती है।
सिद्ध होना हो तो प्रबल अध्यवसाय चाहिए, मन का अपरिमित बल चाहिए।
मन—जिसमें मस्तिष्क और हृदय समाविष्ट हैं—को पूर्ण संगति में होना चाहिए।
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अपने लक्ष्यों के प्रति हार्दिक स्नेह के बिना, जिज्ञासा, आत्म-संस्कार, आत्म-निरीक्षण तथा आत्म-संघर्ष—सब व्यर्थ है।
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विकारी मन अनेक प्रकार के स्वादों और भोगों की तलाश में रहता है और बाद में उन आहारों तथा भोगों का प्रभाव मन पर पड़ता है।
आत्म-संयम अर्थात् आत्मानुशासन ही कलात्मक सौंदर्य को सुंदर एवं व्यवस्था को सुव्यवस्थित और आनंददायक बनाता है।
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जो मनुष्य निश्चय करके कार्य प्रारंभ करता है, कार्य के मध्य में रुकता नहीं, समय को नष्ट नहीं करता और स्वयं को वश में रखता है, उसी को पंडित कहा जाता है।
एक सूफ़ी कभी किसी चीज़ के दायरे से बाहर नहीं जाता, बल्कि हमेशा दायरे में ही रहता है।
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जो लोग ख़ुद को जीवन के प्रति समर्पित कर देते हैं, उन्हें कोई चिंता नहीं होती और वे शांति का जीवन जीते हैं, जबकि पूरी दुनिया मुसीबतों पर मुसीबतों से जूझ रही होती है।
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ब्रह्मचर्य के बिना राजयोग की साधना बड़े ख़तरे की है, क्योंकि उससे अंत में मस्तिष्क में विषम विकार पैदा हो सकता है।
स्वयं को खोकर कुछ करो, तो उससे ही स्वयं को पाने का मार्ग मिल जाता है।
अगर मैं दु:खी हूँ, तो यह मेरी अपनी ग़लती है और यही बात दिखाती है कि अगर मैं चाहूँ तो ख़ुश हो सकता हूँ।
वे महान् पुरुष धन्य हैं जो अपने उठे हुए क्रोध को अपनी बुद्धि के द्वारा उसी प्रकार रोक देते हैं, जैसे दीप्त अग्नि को जल से रोक दिया जाता है।
कर्म—विशेषतः मंगल-कर्म—तभी सहज और सुख-साध्य होता है; जब प्रवृत्ति को संयम के साथ चलाने की शिक्षा हो, साधना हो।
बुद्धत्व का आगमन किसी नेता या गुरु द्वारा नहीं होता, आपके भीतर जो कुछ है उसकी समझ द्वारा ही इसका आगमन होता है।
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संबंधित विषय : आत्म-चिंतनऔर 2 अन्य
प्रकृतिदत्त सुडौल शरीर पर, चर्बी की पर्तें चढ़ाकर हम लोग ही उसे बेढब बना देते हैं। चर्बी के ये भंडार बच्चों के नाम कर जाते हैं, और इस प्रकार चर्बी की यात्रा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल पड़ती है।
विचार-मात्र विकार हैं, उन्हें वश में करने का मतलब है, मनको वश में करना और मनको वश में करना तो वायु को वश में करने से भी कठिन है।
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हम अपने ऊपर राज करें वही स्वराज्य है और वह स्वराज्य हमारी हथेली में है।
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संबंधित विषय : आत्म-सम्मानऔर 2 अन्य
द्रौपदी का पातिव्रत्य झूठा नहीं, किंतु उसकी वासनाएँ, उसकी प्रणय भावनाएँ अत्यंत स्वयंशासित थीं।
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