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जिज्ञासा पर उद्धरण

जिज्ञासा-संबंधी वृहत

और विविध प्रसंगों के पाठ रचती कविताओं से एक चयन।

ज्ञात से अज्ञात की ओर जाने से ही ज्ञान की विशेषताएँ टूटती रहेगी; उसकी सरहदें टूटती रहेंगी, लेकिन जिस दिन से आप केवल ज्ञात से ज्ञात की ओर जाएँगे, उस दिन आप केवल अपनी ही कील पर अपने ही आसपास घूमते रहेंगे।

गजानन माधव मुक्तिबोध

बिना दूँढ़ने का श्रम किए, प्रिय वस्तु की अनुपमता और अमूल्यता का बोध हो ही नहीं सकता।

कुबेरनाथ राय

जीवन का रहस्य ही अंतिम जिज्ञासा है। यही तो मानवीय प्रज्ञा का सुंदर पहलू है।

श्याम मनोहर

मज़े में ख़ुशहाल होकर जीना है, तो डिस्कवर नहीं हो सकते।

श्याम मनोहर

आज भी आदमी जो कुछ अपने बारे में जानता है और अपनी दुनिया के बारे में जानता है, उसके बीच सही और जीवंत रिश्तों की खोज—कलाओं की एक सार्थक कोशिश है।

कुँवर नारायण

जिस सभ्यता में सीधा-सादा आम आदमी भी खोज करने की क्षमता रखता है, वह सभ्यता महान है।

श्याम मनोहर

राजनीति वाले संस्कृति का निर्माण नहीं कर सकते। शोधक और अन्वेषक संस्कृति निर्माण करते हैं।

श्याम मनोहर

श्रद्धा जिज्ञासा का वह भाव है, जो खरेपन के साथ सत्य की ओर उन्मुख रहता है; मिथ्या के बहलावे में मोह में नहीं जाता, उसी को सत्य कहना चाहता है जो प्रामाणिक रूप से ‘है’—निःसंदेह ‘है’।

मुकुंद लाठ

मेरा मूलमंत्र है कि जहाँ जो कुछ अच्छा मिले, सीखना चाहिए।

स्वामी विवेकानन्द

कुतूहल, कल्पनाशक्ति और चेतना, मनुष्य को मनुष्य होने के लक्षण हैं। कुतूहल, कल्पनाशक्ति, चेतना के लक्षणों के कारण मनुष्य खोज करता है।

श्याम मनोहर

दो तरह का सिनेमा बनता है। या तो आप सिने इतिहास की राहों पर चल दें या अपनी पगडंडियाँ ख़ुद बनाएँ, नए रास्ते ढूँढें, बनाएँ।

ऋत्विक घटक

जीवन-शैली इस तरह बनानी चाहिए कि हमें डिस्कवरर होना है। इस बात का एक छोटा-सा धागा ही क्यों हो, अपने तन-मन में होना चाहिए।

श्याम मनोहर

सबसे अधिक योग्यता मैं उनकी मानता हूँ, जो मार्ग ढूँढ़नेवाले होते हैं। वे नए मार्ग खोजते हैं; बहुत हिम्मत से आगे बढ़ते जाते हैं, अपनी चीज़ नहीं खोते और दुनिया की मार खाते रहते हैं।

विनोबा भावे

कौतूहल होना, उत्सुक होना—जीने की सर्वोत्तम स्थिति है।

श्याम मनोहर

अपने अंतरतम की गहराइयों में इस प्रश्न को गूँजने दो: 'मैं कौन हूँ?' जब प्राणों की पूरी शक्ति से कोई पूछता है, तो उसे अवश्य ही उत्तर उपलब्ध होता है।

ओशो

हम अपने बारे में इतना कम और इतना अधिक जानते हैं कि प्रेम ही बचता है प्रार्थना की राख में।

नवीन सागर

अपने लक्ष्यों के प्रति हार्दिक स्नेह के बिना, जिज्ञासा, आत्म-संस्कार, आत्म-निरीक्षण तथा आत्म-संघर्ष—सब व्यर्थ है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

बाल्यकाल, नवयौवन और तारुण्य के विभिन्न उषःकालों में; जिज्ञासा हृदय का छोर खींचती हुई, आकर्षण के सुदूर ध्रुव-बिंदुओं में हमें जोड़ देती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

"मैं कौन हूँ?" जो स्वयं इन प्रश्न को नहीं पूछता है, ज्ञान के द्वार उसके लिए बंद ही रह जाते हैं।

ओशो

लक्ष्यों के प्रति दुर्दांत स्नेह की आस्तिकता के बिना, वास्तविक अस्मिता का विकास नहीं हो सकता और उन्हीं के संदर्भ से हमेशा यह जाना जाएगा कि कवि किस सतह से बोल रहा है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

ज्यों-ज्यों मनुष्य उम्र में बढ़ता है; जिज्ञासा पर केवल आग्रहों और दुराग्रहों के पुंज लदते-चलते हैं, वरन् स्वयं जिज्ञासा भी (शतधा) होती चलती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

आवश्यकताओं का तक़ाज़ा पुराने शब्दों को शनैः-शनैः नए अर्थ प्रदान कर देता है।

विजयदान देथा

जीवन में एक उम्र ऐसी आती है जब मनुष्य के संबंध में नई प्रत्याशा के लिए कुछ बचता ही नहीं है, तब वह हमारे लिए एक तरह से समाप्त हो जाता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

यदि तुम क्रांति का सिद्धांत और विधियों के जिज्ञासु हो तो तुम्हें क्रांति में भाग लेना चाहिए। समस्त प्रामाणिक ज्ञान प्रत्यक्ष अनुभव से उद्भूत होता है।

माओ ज़ेडॉन्ग

वेदांत ‘ब्रह्म-जिज्ञासा’ है तो काव्य ‘पुरूष-जिज्ञासा।’

कुबेरनाथ राय

‘देखने’ की इच्छा, जानने की इच्छा ‘रहस्य’ की उलझी हुई आँतों को सुलझाने की इच्छा—कितनी मनोहर कितनी दुर्निवार और अदम्य हो सकती है—यह उसी से जाना जा सकता है, जो जिज्ञासा का शिकार है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

प्रेम का क्या अर्थ है, यह पता लगाने के लिए आपको अपना पूरा जीवन देना होगा, वैसे ही जैसे यह पता लगाने के लिए कि ध्यान क्या है एवं सत्य क्या है, आपको अपना पूरा जीवन देना पड़ता है।

जे. कृष्णमूर्ति

मनुष्य की सबसे बड़ी जिज्ञासा, जीवन का अर्थ क्या है, सृष्टि का अर्थ क्या है—इन प्रश्नों के बारे में होती है। जीवन का अर्थ क्या है, सृष्टि का अर्थ क्या है जैसे मूलभूत प्रश्नों की खोज करने को मैं संस्कृति कहता हूँ।

श्याम मनोहर

अनुमान यदि जिज्ञासा का अंग नहीं है, तो वह हमारे इच्छित विश्वासों की पूर्ति का एक उपादान बन कर रह जाता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

यथार्थवाद में, किसी भी यथार्थवाद में जिज्ञासा बहुत रोल अदा करती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

चरित्र-दर्शन तो हमें तब तक ठीक-ठीक नहीं हो सकता, जब तक हममें चरित्र-संबंधी मूलभूत जिज्ञासा हो।

गजानन माधव मुक्तिबोध

जानने की कोशिश मत करो। कोशिश करोगे तो पागल हो जाओगे।

राजकमल चौधरी

फूलों को तोड़कर गुलदान में सजाने वाले शायद ही कभी किसी बीज का अंकुरण देख पाते होंगे।

सिद्धेश्वर सिंह
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कविता का तात्पर्य है—खोजने की प्रणाली।

श्याम मनोहर

ज्ञान की प्यास के बारे में यह एक पुराना नियम है कि हम सभी को वह सब कुछ मिल जाता है, जो हम चाहते हैं। हममें से कोई भी उस चीज़ के अलावा कुछ नहीं पा सकता, जिस पर हम अपना दिल लगा देते हैं।

स्वामी विवेकानन्द

कलाकार होने का मतलब है—अपनी नज़रों को कभी नहीं फेरना।

अकीरा कुरोसावा

उस ज्ञान की तलाश करो, जो तुम्हारी गाँठ को खोल देगा। उस मार्ग की तलाश करो, जो तुम्हारे पूरे अस्तित्व की माँग करता है।

रूमी

मधुकर की भाँति निर्लिप्त रहकर देखोगे, सर्वस्थान में मिलेगा प्रभु सारंगपाणि।

गुरु नानक

जड़ों की खोज एक बुनियादी मुद्दा है। इसके पीछे जातीय स्मृतियों का आग्रह हैं और है नए इतिहास-बोध की माँग।

श्यामाचरण दुबे

सत्य की हमेशा खोज करनी होती है; उसको नया करना होता है, उसको नई शक्ल देनी होती है और उसे बढ़ाते रहना होता है—ताकि वह विचारधारा की बढ़वार और इंसानी ज़िंदगी की रद्दो-बदल के अनुरूप रह सके।

जवाहरलाल नेहरू

तुम जिसे खोज रहे हो, वह तुम्हें खोज रहा है।

रूमी

ज़बरदस्ती कोई काम करना और आंतरिक प्रेरणा के साथ करते जाना— इन दोनों के भेद से कलात्मक कर्म में कुछ विशेष ही घट जाता है। एक से तो हमें सच्ची कला मिलती है और दूसरे से मिथ्या कला का आभास-भर मिलता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

जिज्ञासा वह वृत्ति है, जो आत्म में रहती हुई सत्य तलाशती है।

मुकुंद लाठ

साधु के पास उसे कुछ देने नहीं, वरन् उससे कुछ लेने जाना चाहिए। जिनके पास भीतर कुछ है, वे ही बाहर का सब कुछ छोड़ने में समर्थ होते है।

ओशो

कहानी क्या कविता का शेषार्थ है?

धूमिल

अनुभव की खोज करने का अर्थ है भ्रांति के मार्ग का अनुसरण करना।

जे. कृष्णमूर्ति

जो केवल जड़ों में दिखाई देता हैं, शायद तुम उसे शाख़ाओं के बीच खोज रहे हो।

रूमी

अपने अंदर के अन्वेषक को बाहर लाएँ और अपने जीवन को बढ़ते हुए देखें।

अशदीन डॉक्टर

ढूँढ़ना स्वतः एक अमृत-फल है।

कुबेरनाथ राय

किसी भी गहरी पूछताछ के अंदर उत्तर छिपा होता है।

रूमी