सृजन

संगठित राजनीति और रचना में तनाव का रिश्ता होना चाहिए और सत्ता और रचना में भी तनाव का रिश्ता होना चाहिए।

रघुवीर सहाय

यात्रा-साहित्य खोज और विश्लेषण से जुड़ा है। यह लेखक के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपनी यात्राओं में किन चीज़ों को महत्त्व देता है।

रघुवीर सहाय

दुनिया में नाम कमाने के लिए कभी कोई फूल नहीं खिलता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
  • संबंधित विषय : फूल

भावनाएँ अस्तित्व की निकटतम अभिव्यक्ति हैं।

गोरख पांडेय

कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध इनमें क्या भेद है, यह आज अप्रासंगिक है।

रघुवीर सहाय

कहानी लिखना केवल कहानी ही लिखना नहीं है, गद्य लिखना भी है।

रघुवीर सहाय

साहित्य की प्रमुख चिंता इसमें है कि वह उन स्थायी सचाइयों पर भी हमारी पकड़ ढीली होने दे जिन पर एक उदार और मानवीय संस्कृति की नींव पड़नी चाहिए।

कुँवर नारायण

जीवन-बोध, केवल वस्तुगत नहीं, चेतना-सापेक्ष होता है, और साहित्य की निगाह दोनों पर रहती है।

कुँवर नारायण

साहित्य मेरी दृष्टि में किसी एक पक्ष की वकालत होकर दो या दो से अधिक पक्षों की अदालत है। इस अदालत का न्यायप्रिय, संतुलित, निष्पक्ष और मानवीय होना मैं बहुत ज़रूरी समझता हूँ।

कुँवर नारायण

गद्य को तोड़ने और बनाने का अपना एक अलग मज़ा है।

रघुवीर सहाय

अस्ल में साहित्य एक बहुत धोखे की चीज़ हो सकती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

हर रचना अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाने का प्रयत्न है।

रघुवीर सहाय

साहित्य को केवल सामाजिक होना है, बल्कि विवेकशील ढंग से सामाजिक होना है, यह बात आधुनिक नहीं लगती कि साहित्यकार अपने आपको सुशिक्षित रखने की ज़िम्मेदारी से बचे।

कुँवर नारायण

साहित्य की विधाओं के अलग-अलग ख़ेमे बनाकर रहना लेखक को और भी असहाय करेगा।

रघुवीर सहाय

साहित्य तुम्हारी तुम्हीं से पहचान और गहरी करता है।

अज्ञेय

अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे। तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।

गजानन माधव मुक्तिबोध

एक प्रसिद्ध उक्ति है कि ‘अच्छे साहित्य’ का निर्धारण आलोचक करते हैं, लेकिन ‘महान साहित्य’ वही हो पाता है जिसे समाज स्वीकृत करता है।

मंगलेश डबराल

रचनात्मक प्रक्रिया के सिलसिले में ‘बौद्धिक’ शब्द से जो ध्वनि निकलती है, वह तनिक भ्रामक है।

कुँवर नारायण