छोटी नदियों का बड़ा शोक
रमाशंकर सिंह
16 फरवरी 2026
यदि कविता, साहित्य की प्राचीनतम विधा है तो यह भी सही है कि शायद ही ऐसा कोई कवि होगा जो अपने साहित्यिक जीवन में नदी पर कविता न लिखे। ऋग्वेद तो कविता की सबसे प्राचीनतम किताब है और उसमें नदियों के विवरण भरे पड़े हैं। एक ज़माने में ‘पंचतंत्र’ में कहा गया था कि गंगा में नौ सौ और इतनी ही सिंधु में सहायक नदियाँ हैं। भारत का राष्ट्रगान दरअस्ल नदियों की महिमा का गान है लेकिन आज भारत में नदियों का जाल विशृंखल हो रहा है। उसमें जगह-जगह बाधा आ गई है। मैं इसे एक उदहारण से स्पष्ट करता हूँ—मैं और मनन पटेल 2019 में हिमाचल प्रदेश में एक नदी के किनारे घूमने गए थे। शिमला से कोई बहुत ज़्यादा दूर नहीं है गंभर नदी। यह नदी साठ-सत्तर किलोमीटर लंबी होगी। हम लोग जहाँ पर गए थे, उसके ऊपर तारा देवी का मंदिर था और नीचे नदी में बहुत कम पानी बचा था; लेकिन यह पानी इतना स्वच्छ था कि उसके तल का एक-एक कंकड़ साफ़ दिखता था। नदी के दोनों किनारों पर छोटे-छोटे पम्प लगाकर पानी को ऊपर खींचा जा रहा था। नदी को थोड़ा-थोड़ा बाधित कर दिया गया था और बीच-बीच में नदी के बहाव को रोक दिया गया था, जिससे पानी को आसानी से ‘लिफ़्ट’ किया जा सके।
नदी के किनारे कुछ खच्चर और गायें चर रही थीं। वहीं पास में एक महिला भी खड़ी थीं। मैंने उनसे एक सहज बातचीत में पाया कि वह पास के एक गाँव में रहती थीं और अपनी गायों को हाँकने आई थीं। उन्होंने नदी की दुर्दशा के बारे में कहा कि पहले यह नदी काफ़ी सुंदर और पानी से भरी हुआ करती थी। पिछले 15-20 साल में इसे तबाह कर दिया गया है। दिल्ली और चंडीगढ़ से आ-आकर लोगों ने नदी के किनारे घर बना लिए हैं। उन्होंने नदी के साथ उसका बालू भी निकलवाना शुरू कर दिया है। वे छोटी-छोटी धाराएँ जिनसे बहकर पानी आता है और उसके बाद ही कोई नदी बनती है—इन धाराओं की संख्या कम होती जा रही है। इस दौरान उन्होंने एक मार्मिक बात कही—जिसे कोई महिला ही कह सकती है—“जिस तरह से माँ के स्तन में दूध की हज़ारों धाराएँ होती हैं और फिर वे एक जगह इकट्ठा होकर शिशु की भूख मिटाने के लिए बाहर निकलती हैं, वैसे ही खड्डों के बीच जलधारा बहती है। दुर्भाग्य से इन्हें सुखाया जा रहा है।”
भारत में बड़ी नदियों पर तो संकट थे ही, अब छोटी नदियाँ उनकी जद में आ गई हैं। आधुनिक भारत में विकास की कहानी बड़ी नदियों पर बाँध बनाने और उनसे नहर निकाले जाने से सीधे जुड़ी हैं। उनमें बढ़ते प्रदूषण और बाँध विरोधी आंदोलनों के कारण भी बड़ी नदियों पर पर्याप्त बहस होती रहती है, लेकिन छोटी नदियों का मुद्दा ग़ायब ही रहता है। लेकिन इसे लंबे समय तक उपेक्षित रखना भारत के लिए घातक होता जा रहा है। भारत की बड़ी नदियों की सहायक नदियाँ धीरे-धीरे सूख रही हैं और इन सहायक नदियों को पोषित करने वाली अत्यंत छोटी पहाड़ी और मैदानी सरिताएँ संकट में आ गई हैं। इन नदियों में प्रदूषण और अतिक्रमण ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। ‘डाउन टू अर्थ’ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक पृथ्वी पर 640 लाख किलोमीटर की नदियों और धाराओं में से 51 से 60 फ़ीसदी ने समय-समय पर बहना बंद कर दिया है। यह वे नदियाँ हैं जो साल भर नहीं बहती हैं या बारहमासी नहीं हैं लेकिन दूसरी नदियों को जीवित रखती हैं। भारत में इन नदियों से लोगों का ध्यान हट जाना किसी सामाजिक-सांस्कृतिक त्रासदी से कम नहीं है।
पिछले 15 वर्षों से मैं गंगा और यमुना के किनारे बसे नगरों और समुदायों की ज़िंदगानी पर लिखता-पढ़ता रहा हूँ। इन नदियों के किनारे गुज़रते हुए कोई भी इस बात को अनुभवमूलक तरीक़े से देख सकता है। यह एक सामान्य बात है कि भारत में कोई नदी चाहे छोटी हो या बड़ी, वह लोगों के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन का आधार है। ये नदियाँ स्थानीय समुदायों को पीने का पानी, सिंचाई, मछली पालन और विभिन्न किस्म से आजीविका प्रदान करती हैं। निषाद, मछुआरे, किसान और विभिन्न प्रकार के पशुपालक समुदाय इन नदियों पर निर्भर हैं। इन नदियों के साथ इन समुदायों की एक गहरी सांस्कृतिक संलग्नता भी है। इसके बिना उनकी पहचान संकट में पड़ जाती है और जीविका का आधार ख़त्म हो जाता है। इस बात को मैंने अन्यत्र भी लिखा है कि सहारनपुर और उसके आस-पास के ज़िलों की छोटी नदियों पर संकट आने पर उसके किनारे बसे समुदाय अपना घर-बार छोड़ देने को मज़बूर हुए और उन्हें दिल्ली आकर, यमुना के किनारे की झुग्गी बस्तियों में रहना पड़ा। चूँकि, वे कोई अन्य काम ठीक से नहीं जानते थे और शिक्षा बिल्कुल नहीं मिली थी इसलिए उनके हिस्से में सबसे अधिक मेहनत और कम पैसे वाले रोज़गार आए।
छोटी नदियाँ कितनी महत्त्वपूर्ण हैं और उनके साथ समाज का क्या व्यवहार रहा है, इसे हिंडन नदी के उदाहरण से समझा जा सकता है। हिंडन नदी के पूरे अस्तित्व पर जैसे संकट आ गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में हुई एक सुनवाई के विवरण इस कहानी को ठीक ढंग से वर्णित करते हैं। कहानी कुछ इस तरह है : हिंडन नदी गंगा और यमुना नदियों के बीच लगभग 350 किलोमीटर की दूरी तय करती है और उत्तर प्रदेश के सात राजस्व ज़िलों—सहारनपुर, मुजफ़्फ़रनगर, मेरठ, बागपत, शामली, ग़ाज़ियाबाद और गौतम बुद्ध नगर (नोएडा और ग्रेटर नोएडा) में से होकर बहती है। यह दिल्ली के ठीक बाहर गौतम बुद्ध नगर के मोमनाथल गाँव में यमुना नदी में जाकर मिल जाती है। हिंडन और इसकी सहायक नदियों के किनारे कुल 872 गाँव बसे हुए हैं और इसमें 68 बड़े और छोटे नाले मिलते हैं। यह नाले इस नदी को एक बड़े नाले में तब्दील कर देते हैं। जब हिंडन नदी यमुना में शामिल होती है तो वहाँ का दृश्य बहुत भीषण होता है। गंधाता हुआ जल पहले से ही प्रदूषित यमुना को और प्रदूषित कर देता है। हिंडन की मुख्य सहायक नदियाँ हैं—पाँवधोई नदी (7 किलोमीटर), कृशनी नदी (153 किलोमीटर), धमोला नदी (153 किलोमीटर), पश्चिमी काली नदी (145 किलोमीटर)। इसमें हर एक नदी हिंडन को जीवन देती है। हिंडन यमुना को और यमुना गंगा को जीवन देती है। वे लोग जो प्रयागराज में कुंभ नहाने जाते हैं, क्या उन्हें पता होता है कि उनके नहाने में धमोला नदी का भी योगदान है। उधर धमोला और पाँवधोई नदी का हाल भी सुन लीजिए—दोनों नदियाँ सहारनपुर में बहती हैं और ‘नागरिकों की इच्छा’ के चलते नदी पर रिवरफ़्रंट बनाए जाने की तैयारी हो रही है। नदी प्रदूषित रहे तो रहे, उसमें जलकुंभी बहे तो बहे लेकिन रिवरफ़्रंट अवश्य बनेगा। जो लोग बनारस गए होंगे और यदि उन्होंने वरुणा नदी को देखा होगा तो इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते हैं। वरुणा काफ़ी प्रदूषित है, लेकिन उसके किनारे भी रिवरफ्रंट बना है। जनवरी 2025 में आईआईटी बीएचयू ने वरुणा पर केंद्रित एक सेमिनार किया था, जिसमें जाने का मौक़ा मुझे भी मिला था। इसमें देश भर से नदियों के अध्येता आए थे। योजना यह थी कि इस नदी पर बात हो और इसे पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाए। दूसरे दिन हम लोग ‘शहर के अंदर नदी’ देखने गए। नदी का बड़ा बुरा हाल बना रखा है बनारस वासियों ने। उसके अधिकांश तट को क़ब्ज़िया लिया है और उसमें अशोधित जल के नाले खोल दिए हैं। उसके किनारे लगभग दो घंटे तक चलने के पश्चात हमारा सर दर्द करने लगा। आँखों में हल्की-सी चुनचुनाहट भी होने लगी। बनारस को प्राचीन काल से ही वाराणसी कहा जाता है। उसको यह नाम वरुणा और असी नदियों के बीच स्थित होने के कारण मिला है। वरुणा तो अभी किसी तरह से बहती है और बारिश के महीनों में उसमें पर्याप्त पानी आ जाता है और गंगा से मिलकर संगम बनाती है, लेकिन असी का तो और बुरा हाल है। उन्हें नाले में तब्दील कर दिया गया है। बनारस में असी नदी की चोरी कर ली गई है और इस छोटी-सी नदी में नाले गिरा-गिराकर उसे भी नाले का रूप दे दिया गया है। वाराणसी शहर के अंदर इन दो नदियों की दुर्दशा करने वाले बनारस के लोग गंगा पर मुग्ध रहने का दिखावा करते रहते हैं।
वास्तव में अति प्रदूषित नदियों के किनारे अक्सर औद्योगिक कचरा, सीवेज और जैविक अपशिष्ट सड़ते रहते हैं, जिससे हानिकारक गैसें जैसे अमोनिया, हाइड्रोजन सल्फ़ाइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक निकलते हैं। ये गैसें हवा में मिलकर आँखों की श्लेष्मिक झिल्ली को प्रभावित करती हैं। इसके कारण आँखों में जलन, लालिमा या पानी बहने जैसी समस्याएँ होती हैं। यदि आपको लगता है कि यह बातें किताबी हैं तो किसी प्रदूषित नदी के किनारे दो घंटे लगातार चलकर देखिए। दिल्ली में यमुना नदी के किनारे भी मुझे ऐसा ही अनुभव कई बार हुआ है जब मैंने कश्मीरी गेट से वज़ीराबाद तक यमुना के बिल्कुल किनारे पैदल यात्रा की। एक-दो बार तो कवि अखिलेश सिंह भी थे।
वास्तव में, उत्तर भारत के प्रत्येक शहर ने अपने शहर में बहने वाली नदी को नष्ट कर दिया है, पाट दिया है अथवा नाले में तब्दील कर दिया है। यह एक पर्यावरणीय संकट तो है ही, सांस्कृतिक संकट भी है। वर्ष 2025 में हम सबने देखा कि ठट्ठ के ठट्ठ लोग कुंभ स्नान के लिए चले आ रहे हैं। ऐसा इसलिए ही नहीं है कि प्रयागराज का महत्त्व है। ऐसा इसलिए भी है कि लोगों के सांस्कृतिक व्यवहार में मेला और देशाटन सदियों से शामिल है और इसमें सबसे बड़ी भूमिका छोटी नदियों की है। प्रत्येक नदी एक सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दायरे का निर्माण करती है। इसके किनारे मेले लगते हैं। इन मेलों में तरह-तरह के व्यापारी, शिल्पकार, खेल-तमाशे दिखाने वाले लोग शामिल होते हैं। देश की जनता आती है। जब एक जगह मेला समाप्त हो जाता है तो वह वहाँ से उठकर दूसरी जगह पहुँच जाता है। और यह प्रक्रिया हज़ारों सालों से चली आ रही है। इसे इन उदाहरणों से समझ सकते हैं : कासगंज में गंगा के किनारे मोक्षदा एकादशी पर स्नान और भगवान वराह की पूजा होती है। उस समय पंचकोसी परिक्रमा भी की जाती है। इसी प्रकार हापुड़ में गढ़मुक्तेश्वर का मेला लगता है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर लाखों लोग आते हैं। फूलों की वर्षा की जाती है। नौचंदी मेला मेरठ में होता है। यमुना की सहायक काली नदी के किनारे यह मेला लगता है। इसी प्रकार शाकम्भरी देवी का मेला सहारनपुर में लगता है। धमोला और पौंधोई नदियों के किनारे मेला नवरात्रि और होली पर लगता है। लाखों भक्त माँ शाकम्भरी की पूजा करते हैं। लखीमपुर खीरी के गोला गोकरणनाथ में चैत के महीने में शिव मंदिर के पास शारदा नदी के किनारे चैती मेला लगता है। यह मेला एक माह तक चलता है और लाखों श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के लिए आते हैं। इसी प्रकार जौनपुर में गोमती के किनारे कार्तिक मास में एक मेला लगता है। श्रद्धालु गोमती में स्नान कर चौदह कोस की परिक्रमा करते हैं, जिसमें कई मंदिरों के दर्शन शामिल हैं। अयोध्या में इसी समय मेला लगता है। चौदह कोसी परिक्रमा होती है।
यदि आप वर्ष 1880 से 1920 के बीच प्रकाशित विभिन्न ज़िला गजेटियरों को देखें तो पाएँगे कि हर ज़िले में हर महीने में कोई न कोई मेला लग रहा है। इनमें से अधिकांश मेले किसी नदी के किनारे लगते थे। लाखों लोग इकट्ठा होते थे। धीरे-धीरे यानी पिछले सत्तर-अस्सी सालों में यह मेले कम होते गये। ऐसा क्यों हुआ? छोटी नदियाँ प्रदूषित हो गईं। उनके किनारे पाट दिए गए और वहाँ लोगों ने घर बना लिए, क़ब्ज़ा कर लिया। मेले नष्ट हो गए। इन छोटे-छोटे मेलों का नष्ट होना भारत का बहुत बड़ा सांस्कृतिक घाटा है।
अब यदि इन छोटी नदियों को पुनर्जीवित किया जाए तो एक नष्ट हुई दुनिया के अवशेष फिर से लहलहा उठेंगे। मैं यह तो नहीं कह रहा हूँ कि पीछे की तरफ़ दौड़ लगा दी जाए लेकिन जितना बचा है, उसे सहेजा जाए। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा था कि परिचय से प्रेम उपजता है। हमारी पीढ़ी का अपनी नदियों से अपरिचय हो गया है। उसमें नदियों के प्रति सम्मान बहुत कम बचा है। नदियों के इस देश को नदियों के माध्यम से फिर से जानने की आवश्यकता है। केवल बड़ी नहीं बल्कि छोटी नदियों के द्वारा जानने की आवश्यकता है। छोटी नदियाँ ही इस देश को सांस्कृतिक, सामाजिक और अंत में आर्थिक दारिद्र्य से बचा सकती हैं।
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