नवोदय विद्यालय के पच्चीस साल : स्मृतियों की यात्रा
गीतांजली सिन्हा
18 फरवरी 2026
इस साल हमारे नवोदय विद्यालय [जवाहर नवोदय विद्यालय छिंदपाली, महासमुंद (छत्तीसगढ़)] को पच्चीस बरस पूरे हो रहे हैं। 1 नवंबर 2000 को दो बड़ी घटनाएँ इतिहास में घटी थीं। पहला यह कि इस दिन हिंदुस्तान का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश से एक बेहद ज़रूरी हिस्सा टूटकर अलग हुआ था और हमारा छत्तीसगढ़ बना था। दूसरा यह कि इसी दिन हमारे ज़िले में जवाहर नवोदय विद्यालय की स्थापना हुई थी और हमें अपना घर मिला था।
हमारे नवोदय विद्यालय की शुरुआत तो देखिए कैसे हुई—शहर के बाहरी हिस्से में स्थित एक महाविद्यालय था। वही भवन हमें किराए पर मिला, नवोदय विद्यालय शुरू करने के लिए। एक ही कैंपस था, एक आँगन, जिसके चारों ओर बरामदे और बरामदों में खुलते कमरे। कुछ कमरे कक्षाएँ बन गए, एक कोने के कुछ कमरे बने बॉयज़ हॉस्टल और दूसरे कोने में कुछ कमरे बने गर्ल्स हॉस्टल। एक कमरा बना प्रिंसिपल ऑफ़िस, गर्ल्स हॉस्टल और प्रिंसिपल ऑफ़िस के बीच एक कमरा बना प्रिंसिपल का घर। आँगन में कुछ पीले गुलमोहर के पेड़ थे, जिन पर बगुले रहा करते थे। एक ताड़ का पेड़ था, जिस पर बहुत मीठे फल लगा करते थे। एक बेल का पेड़ था। दोनों ही फलदार पेड़ बॉयज़ हॉस्टल की तरफ़ थे। बॉयज़ और गर्ल्स हॉस्टल के बीच था इमली का पेड़, जिसका ज़्यादातर हिस्सा भी बॉयज़ हॉस्टल की तरफ़ ही था। पर इमली के गिरते ही हम दौड़ कर बीन लिया करते थे।
एक प्रिंसिपल, कुछ शिक्षक और लगभग 60-65 बच्चों के साथ स्कूल शुरू हुआ था। फिर एक-एक कर साल बीते और नए बैच आते गए। पहला बैच पूरे पाँच साल इसी भवन में रह कर पढ़ा। मैं पाँचवें बैच में स्कूल आई थी। पहली बार घर से इतने दूर अकेले आना, जहाँ लोगों की भाषा-बोली तक बदल गई थी। दस बरस की संवेदनशील लड़की के लिए ये सब सहना बहुत कठिन था। मैं पूरे सात दिन तक रोती रही थी। रो-रोकर बीमार रही, इस ज़िद में थी कि नहीं रहना यहाँ, घर जाना है। तब प्रिंसिपल मैम ने कहा कि ठीक है मत रहना, पर यह एक महीना रह लो, महीने के अंत में पालक-शिक्षक मीटिंग होगी तब तुम अपने घर चली जाना। पालक दिवस पर मेरे पेरेंट्स आए, मम्मी-पापा और भाई। उन्हें देखकर मैं बहुत ख़ुश हुई, जब वे जाने लगे तो मैं बहुत रोई, पापा ने कहा बेटा बस यह एक महीना और रह लो फिर अगले महीने ले जाएँगे। महीने साल में बदल गए और वह अगला महीना कभी नहीं आया।
पुराने भवन में मैं दो साल रही, असुविधाओं में कोई कमी नहीं थी। फिर भी किसी तरह हम वहाँ रखना सीख गए थे। हर शनिवार हम अपने घर पर पोस्ट कार्ड पर चिट्ठियाँ लिख कर भेजा करते थे। कभी रोते-रोते आँसू टपक कर पोस्ट कार्ड में गिर जाते थे तो स्याही फैल जाती थी। टेढ़े-मेढ़े अक्षरों और धुँधले शब्दों को पिताजी कैसे समझते थे पता नहीं, पर हर सप्ताह उनकी चिट्ठी बराबर आती थी।
जब आठवीं में आई, तब हम अपने ख़ुद के नए भवन में शिफ़्ट हुए। वह शहर से बहुत बाहर था और उड़ीसा बॉर्डर के बिल्कुल पास। इधर की बोलियाँ, गाँव, खेत, पेड़-पौधे यहाँ तक की मिट्टी तक बहुत अलग थी। अपने नए भवन ने शिफ़्ट होने से वैसे ही ख़ुशी मिली थी, जैसे किसी किराए के मकान में रहने वाले लोगों को अपने ख़ुद के नए मकान में शिफ़्ट होने पर होती होगी। पर नई जगह का अनजानापन भीतर घात करने लगा था और रोने का सिलसिला फिर शुरू हुआ। घर वालों का कहना था कि मिडिल स्कूल तक यहाँ पढ़ लो।
जब नवीं कक्षा में आई तो स्कूल अचानक से अच्छा लगने लगा था। इसी कक्षा में हमारे स्कूल में पढ़ने के लिए, कर्नाटक के एक नवोदय से कुछ स्टूडेंट्स आए थे और कुछ यहाँ से उस नवोदय गए थे, साल इसलिए बहुत मज़े में बीता। फिर दसवीं में आई तो बोर्ड की परीक्षा के चलते जाने का सवाल ही नहीं पैदा होता था। ग्यारहवीं कक्षा तो स्कूल की जान होती है, कोई ग्यारहवीं में स्कूल छोड़कर कैसे जा सकता है, और बारहवीं? कोई बारहवीं में स्कूल क्यों छोड़ेगा भई? यह तो आख़िरी साल होता है।
नवोदय के सात सालों में पहले के कुछ साल नवोदय से नफ़रत करते हुए, फिर उसके प्यार में पड़ते हुए बीते और फिर एक दिन ऐसा भी आया—जब मैं जाना नहीं चाहती थी, गेट पर गाड़ी खड़ी थी, मेरा सारा सामान उसमें भरा जा चुका था, मेरे घर वाले गाड़ी के पास खड़े थे, मेरी आँखों में अब भी आँसू थे, मैं रो रही थी पर इस बार ये आँसू नवोदय को छोड़कर नहीं जाने के लिए थे। मुझे पता ही नहीं चला कि कैसे नवोदय एक स्कूल से घर हो गया।
स्कूल से निकलने के पंद्रह साल के बाद वापस स्कूल जाना हुआ। सोचिए तो पूरे पंद्रह साल! पंद्रह सालों में क्या-क्या नहीं बदल जाता है। पूरी दुनिया बदल जाती है। पर नवोदय वैसा का वैसा रहा। बस ग्राउंड की ख़ाली जगह पर एकेडमिक बिल्डिंग से लगकर ही कुछ एक नए कमरे बन गए और वे तमाम पौधें जो हमने बोए थे अब पेड़ बन गए हैं। इतने घने हो गए हैं कि बिल्डिंग्स अब उनके अंदर छिप जाती है।
मैं यह सोच ही नहीं पाई थी कि वापस स्कूल लौटकर मुझे कैसा लगेगा। मैं सारी बदली हुई चीज़ों को देखकर चकित होऊँगी या ख़ुश होऊँगी—पता नहीं था। जब स्कूल गई तो ऐसा लगा ही नहीं कि इसे छोड़कर कहीं गई भी थी। नवोदय से निकलकर नवोदय को इतनी बार सपने में देखा है कि ऐसा लगा ही नहीं कि इतने सालों बाद प्रत्यक्ष देख रही हूँ। सारी अच्छी और बुरी यादें एक साथ आँखों के सामने तीर गई थी। ऐसी मिली-जुली भावनाएँ मन में उमड़ रही थी। कभी हॉस्टल, लोटस पौंड, या अपने किसी सीनियर्स को देखकर ख़ुशी मिल रही थी तो कभी किसी को देखकर कोई बुरी घटना याद आ रही थी और मन कड़वा हो रहा था। बात करते-करते अचानक भावुक हो रही थी, मन एक ही समय में कभी हल्का तो कभी भारी हुए जा रहा था। पूरा एक दिन वहाँ थी पर यादें-बातें इतनी हैं कि सारी एक साथ मन में घुमड़ रही थी। मेरे आस-पास मेरे जैसे 600 लोग और आए थे, इतनी भीड़ थी फिर भी मन के भीतर—अकेले खड़ा कोई देख रहा था बाहर, अपने को समेटता, बिखेरता, ज़्यादा से ज़्यादा दृश्य, ध्वनि, मिठास, नवोदय का सौंधापन अपने अंदर सोख लेना चाहता था। पर इतने कम समय में सब कुछ भला कैसे समेटा जा सकता है?
अगर आप नवोदय के विद्यार्थी रहे हैं, चाहे एक साल ही क्यों न पढ़ें हो, चाहें आपका नवोदय का अनुभव अच्छा या बुरा कैसा भी रहा हो, मेरा एक ही सुझाव है—मौक़ा मिले तो अपने नवोदय वापस ज़रूर जाइए। आप कुछ नया अनुभव करेंगे, अपने जड़ों से जुड़ाव अनुभव करेंगे। आप अपने भीतर पाएँगे कि बदलती दुनिया के साथ दो चीज़ें बिल्कुल नहीं बदलीं—एक नवोदय और दूसरे आप। अपने आपको कुछ अधिक उदार पाएँगे। नवोदय जाकर बिल्कुल ऐसा ही लगेगा जैसे बचपन में गर्मियों की छुट्टियों में नानी के गाँव जाने पर लगता था।
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बेला पॉपुलर
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