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सामाजिक पर उद्धरण

कोई स्थायी तरक़्क़ी तब तक संभव नहीं है, जब तक हम ख़ुद शुद्धिकरण की त्रि-स्तरीय प्रक्रिया से नहीं गुज़रेंगे। हमें अपने आचरण का सामान्य स्वर सुधारना होगा, अपने उच्चारण को साधना होगा और अपने विचारों को पुनर्जीवित करना होगा।

भीमराव आंबेडकर

सत्ता ही सामाजिक प्रगति की कुंजी है।

भीमराव आंबेडकर

अपने यहाँ समकालीनता और आधुनिकता का सवाल उठाना, तो समसामयिक है और आधुनिक। क्योंकि यहाँ समकालीनता और आधुनिकता; सामाजिक स्तर पर सामूहिक जीवन के एक ही बिंदु पर, एक ही साथ और एक ही समय में अंकित होती है—उनके लिए अलग-अलग काल या व्यक्ति चुन पाना संभव नहीं हो सकता है।

धूमिल

सूरदासजी अपने भाव में मग्न रहनेवाले थे, अपने चारों ओर की परिस्थिति की आलोचना करनेवाले नहीं। संसार में क्या हो रहा है, लोक की प्रवृत्ति क्या है, समाज किस ओर जा रहा है—इन बातों की ओर उन्होंने अधिक ध्यान नहीं दिया है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल