जब इंसान भूखा रहता है, जब मरता रहता है, तब संस्कृति और यहाँ तक कि ईश्वर के बारे में बात करना मूर्खता है।
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आधुनिक काल का ग़रीब, दया का पात्र नहीं समझा जाता; बल्कि उसे कचरे की तरह हटा दिया जाता है। बीसवीं सदी की उपभोक्ता अर्थव्यवस्था में पहली ऐसी संस्कृति की निर्मिति हुई, जिसके लिए भिखारी होना—कुछ नहीं होने का तक़ाज़ा है।
आदमी के चारों तरफ़ जो अज्ञात शक्ति है, मज़हब ने उसके रहस्य और अचंभे की आदमी को अहमियत जताई है। लेकिन साथ ही उसने न सिर्फ़ उस अज्ञात को समझने की कोशिश की, बल्कि सामाजिक प्रयत्न को समझने की कोशिश को रोका भी है। जिज्ञासा और विचार को बढ़ावा देने की जगह उसने प्रकृति के सामने, स्थापित संप्रदाय के सामने, और सारी मौजूदा व्यवस्था के सामने—सिर झुकाने के फ़लसफ़े का प्रचार किया है।
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आदमी की ज़िंदगी पर विचार और जाँच; बिना किसी स्थाई आत्मा के लिहाज़ के होती है, क्योंकि अगर किसी ऐसी आत्मा की सत्ता है भी, तो वह हमारी समझ से परे है; मन को शरीर का अंग, मानसिक शक्तियों की एक मिलावट समझा जाता था।
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सारे विज्ञापन लोगों की व्यग्रताओं पर टिके होते हैं।
सांसारिक मोर्चे पर जब देश पराजित हो गया, तो उसके बुद्धिवादी लोग आध्यात्मिक बन गए और औसत लोग रूढ़िवादी हो गए। चोर का ख़तरा होने पर हमने अपने सांस्कृतिक दरवाज़े कसकर बंद कर दिए, बच्चों को बाहर झाँकने से मना किया और दम साधकर बैठ गए। इससे हमारी रक्षा तो हो गई। लेकिन हज़ार साल तक साँस रोके बैठने से हम बदल चुके हैं। हम वे नहीं हैं, जो हम खुले दरवाज़ों के ज़माने में थे। चोर चले गए, लेकिन हमारे दरवाज़े बंद हैं। रोशनी से हमारी आँखें चौंधियाती हैं और खुली हवा में हमें ज़ुकाम होता है।
हम अपनी काल्पनिक सृष्टि से सत्य को ढकने की कोशिश करते हैं और असलियत से अपने को बचाकर, सपनों की दुनिया में विचरने का प्रयत्न करते हैं।
सब मज़हबों के नज़रियों और उपदेशों में इतनी समानता है कि यह देखकर हैरत होती है कि लोग छोटी-छोटी, और ग़ैर-ज़रूरी बातों के बारे में झगड़ा करने की बेवकूफ़ी क्यों करते हैं।
हमने आध्यात्मिकता को व्यक्तिगत भक्ति-साधना के बीच आबद्ध कर दिया है, उसके आह्वान से हम मानव-मात्र में ऐक्य स्थापित नहीं कर सके।
भय से बुराई, दुःख और पछतावा होता है।
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समाज हमारा हिमाचल की तरह अटल रहा, लेकिन राजा और राज्य समुद्र की लहरों की तरह क्षणभंगुर रहे। ऐसा क्यों हुआ? चक्रवर्ती राजा की अवधारणा होते हुए भी सच्चे चक्रवर्ती यहाँ एक हाथ की उंगलियों पर आसानी से क्यों गिने जा सकते हैं? चीन की तरह एक अखंड देश और अखंड समाज हम यहाँ क्यों नहीं बना सके?
जब हम दुःख से गुज़रते हैं तो हम अपने बिल्कुल शुरुआती बचपन में लौटते हैं, क्योंकि वही वह समय है जब हमने पहली बार ‘पूरी तरह खोने’ का अनुभव करना सीखा था, बल्कि यह समय उससे भी कहीं अधिक था। बचपन वह समय है, जब हम अपनी पूरे जीवन की तुलना में कहीं अधिक ‘पूरी तरह खो देने’ के अनुभवों से गुज़रते हैं।
भारत में जीवन ही मूल्य है, गया-बीता, घिघियाता जीवन ही मूल्य है; लेकिन ज़िंदादिली मूल्य नहीं है, अच्छा जीवन मूल्य नहीं है। मरने से तो गया-बीता जीवन ही अच्छा है, यह हमारा उद्देश्य वाक्य है। क्या कुरुक्षेत्र में कृष्ण ने यही उपदेश दिया था?
जो आदमी आज अपनी कलाई पर घड़ी पहनता है; वह उन पुराने युगों की कल्पना नहीं कर सकता, जब एक टिक-टिक करता कांटा, चेतावनी की तरह, चाबुक की तरह, हड़बड़ाने वाले यातना-यंत्र की तरह, क़यामत के पैग़ाम की तरह हमें हाँका नहीं करता था। घड़ी के काँटे ने मनुष्य की चेतना को कितना बदला है, यह आज कोई सोचता भी नहीं। लगभग इतना ही बड़ा परिवर्तन राष्ट्र-राज्य की नई अवधारणाओं ने मनुष्य की चेतना में किया है। राष्ट्र हमारी कलाई पर एक घड़ी की तरह बंधा है और वह चाबुक की तरह, चेतावनी की तरह, हड़बड़ाने वाले यातना-यंत्र की तरह हमें हाँक रहा है। पाँच सौ साल पहले यह घड़ी थी ही नहीं और यदि थी तो वह रेत के कण या सूरज की छाया का इस्तेमाल करने वाली अनगढ़ घड़ी थी।
कवित्व के कलंक को मैं स्वीकार करता हूँ, यह कालिमा की पृथ्वी पर उतरनेवाली रात्रि की तरह है। इसके सिरहाने विज्ञान का जगद्विजयी दीप है, लेकिन वह उसके शरीर पर हाथ नहीं उठाता—स्नेह से कहता है, "आहा, स्वप्न देखने दो इसे।"
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भारत में जब किसी की हमें उपेक्षा करनी होती है, तो हम उसकी पूजा शुरू कर देते हैं।
अपने दुःख, दारिद्रय और अपमान को धर्मनिष्ठा का पुरस्कार कहकर हम आध्यात्मिकता के क्षेत्र को विस्तृत नहीं बना सकते।
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संबंधित विषय : रवींद्रनाथ ठाकुर
जब भावनाएँ जड़ एवं भ्रष्ट हो जाती हैं, तब पूजा शुरू हो जाती है।