बनारस की मसान होली : जीवन और मृत्यु का अद्वैत संगम
अखिलेश कुमार मौर्य
03 मार्च 2026
धार्मिक-ग्रंथों और पुराणों के अनुसार काशी जिसे स्वयं शिव के त्रिशूल पर टिकी नगरी माना जाता है, संसार के उन विरल स्थानों में से एक है जहाँ मृत्यु को शोक नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार माना जाता है। शास्त्रों में इसे ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा गया है, जिसका अर्थ है—वह स्थान जिसे ईश्वर ने कभी नहीं छोड़ा। इसी अवधारणा की सबसे जीवंत परिणति ‘मसान होली’ के रूप में देखने को मिलती है। जहाँ संपूर्ण विश्व रंगों, फूलों और गुलाल से होली खेलता है, वहीं वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर धधकती चिताओं के बीच भस्म (राख) से होली खेली जाती है। यह उत्सव केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन की नश्वरता और शिव के औघड़ स्वरूप के प्रति अनन्य भक्ति का प्रतीक है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी—जिसे ‘रंगभरी एकादशी’ कहा जाता है—के अगले दिन महाश्मशान पर मसान होली खेली जाती है।
मसान होली की जड़ें काशी की प्राचीन मान्यताओं और पुराणों में गहरी धंसी हुई हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रंगभरी एकादशी के दिन शिव, माता पार्वती का गौना कराकर काशी आए थे। उस दिन उन्होंने अपने गणों, भक्तों और देवताओं के साथ जमकर अबीर-गुलाल खेला था। लेकिन शिव के प्रिय भक्तों में शामिल भूत, प्रेत, पिशाच और वह अदृश्य आत्माएँ जिनका कोई लोक नहीं होता, इस उत्सव में शामिल नहीं हो पाए थे। अपने इन उपेक्षित भक्तों के प्रति करुणा और प्रेम भाव के कारण स्वयं महादेव अगले दिन ‘मसान’ (श्मशान) पहुँचते हैं। मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर ‘बाबा मसान नाथ’ के रूप में शिव स्वयं चिता भस्म से होली खेलते हैं। यह शिव के ‘समदर्शी’ होने का सर्वोच्च प्रमाण है। वह केवल सौम्य देवताओं के नहीं, बल्कि उन शक्तियों के भी शिव हैं जिन्हें समाज ने मुख्यधारा से बाहर कर दिया है।
मसान होली का केंद्र ‘मणिकर्णिका’ है, जिसे महाश्मशान कहा जाता है। यहाँ की अग्नि कभी शांत नहीं होती; यह अनादि काल से प्रज्वलित है। ऐतिहासिक रूप से, इस उत्सव का आरंभ मणिकर्णिका घाट के रक्षक ‘डोम राजा’ के परिवार की सहभागिता के बिना अधूरा माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा हरिश्चंद्र ने भी इसी श्मशान पर डोम राजा की सेवा की थी। आज भी मसान होली के प्रारंभ से पूर्व बाबा मसान नाथ का विशेष शृंगार किया जाता है। मध्याह्न काल में जब सूर्य आकाश के मध्य में होता है, तब डमरुओं की गूँज, शंखनाद और ‘हर-हर महादेव’ के गगनभेदी उद्घोष के साथ यह उत्सव शुरू होता है। यहाँ ‘रंग’ के रूप में प्रयुक्त होने वाली राख साधारण राख नहीं होती, बल्कि वह जलती चिताओं की ताज़ी भस्म होती है, जिसे भक्त साक्षात् शिव का प्रसाद मानते हैं।
इस दृश्य की विभीषिका और दिव्यता एक साथ महसूस की जा सकती है। एक तरफ़ शवदाह की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है, वहीं दूसरी तरफ़ उसी श्मशान की धूल और राख को हवा में उड़ाकर भक्त झूमते-गाते हैं। यह इस दार्शनिक सत्य को प्रतिपादित करता है कि शरीर मिट्टी है और अंततः उसे मिट्टी (राख) में ही मिलना है। अद्वैत वेदांत के अनुसार, आत्मा अजर-अमर है, और यह होली उसी अमरता का जश्न है।
मसान होली के दौरान काशी की लोक-चेतना अपने पूरे वेग के साथ गीतों के माध्यम से प्रकट होती है। यहाँ का सबसे प्रतिष्ठित पद “खेलें मसाने में होरी दिगंबर...” काशी की आत्मा का गान है। इसमें शिव के उस स्वरूप का वर्णन है, जहाँ वह किसी रेशमी वस्त्र या आभूषण से नहीं, बल्कि केवल भस्म से सुशोभित हैं। इन गीतों में शिव के ‘अक्खड़पन’ का अद्भुत वर्णन मिलता है। भक्त गाते हैं—“भूत-पिशाच की टोली आई, संग में लाए भंग की कढ़ाई...”। ये पंक्तियाँ स्पष्ट करती हैं कि शिव की सभा में कोई भेदभाव नहीं है। यहाँ अछूत, ऊँच-नीच या शुचिता-अशुचिता का कोई स्थान नहीं है। वाद्य यंत्रों में शंख, डमरू और मृदंग का प्रयोग इसे एक तांत्रिक और सात्विक ऊर्जा का मिश्रण बना देता है। यहाँ की होली में जो ‘हुड़दंग’ है, वह अराजकता नहीं, बल्कि संसार के बंधनों से मुक्ति की चाहत है।
मसान होली को समझने के लिए अघोर दर्शन की गहराई में उतरना ज़रूरी है। अघोर पंथ का मूल मंत्र है—‘जो घोर न हो, वही अघोर है।’ यानी जिसके भीतर कोई भय, घृणा या संशय न बचा हो। अघोरी मानता है कि यदि ईश्वर कण-कण में है तो वह श्मशान में भी मौजूद है। मसान होली इसी अघोर चेतना की सार्वजनिक अभिव्यक्ति है। मसान की राख को शरीर पर मलना इस बात का प्रतीक है कि साधक ने अपनी कामवासना, क्रोध और अहंकार को जलाकर भस्म कर दिया है।
आधुनिक समाज में जहाँ जाति और वर्ग के नाम पर विभाजन है, मसान होली एक समतावादी समाज का चित्र पेश करती है। यहाँ राख के नीचे सबका रंग एक जैसा हो जाता है। एक धनी व्यवसायी, एक अघोरी साधु और एक सामान्य श्रमिक—सब एक-दूसरे को गले लगाते हैं और चिता भस्म लगाते हैं। यह उत्सव यह संदेश देता है कि मृत्यु के द्वार पर पहुँचने के बाद राजा और रंक के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है। श्मशान, जिसे लोग अशुभ मानकर वहाँ जाने से कतराते हैं, काशी में वह शिव का वास स्थान बन जाता है। यह मानसिक दृढ़ता प्रदान करने वाला उत्सव है, जो मनुष्य को जीवन की वास्तविकता से साक्षात्कार कराता है।
पिछले कुछ दशकों में, मसान होली ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान बनाई है। आज यह केवल स्थानीय परंपरा नहीं रह गई है। दुनिया भर के फ़ोटोग्राफर, सांस्कृतिक शोधकर्ता और विदेशी पर्यटक इस अकल्पनीय और डरावने लेकिन सुंदर दृश्य को देखने काशी पहुँचते हैं।
मसान होली केवल राख उड़ाने का खेल नहीं है, बल्कि यह काशी की उस जीवन-दृष्टि का प्रमाण है—जहाँ ‘शव’ और ‘शिव’ में भेद मिट जाता है। यह सिखाती है कि अंत ही आरंभ है। राख जो किसी के जीवन की अंतिम निशानी है, वह यहाँ उत्सव का माध्यम बनती है। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि जीवन एक अल्पकालिक मेला है, और वास्तविक शांति केवल सत्य को स्वीकार करने में है। जब तक संसार में जन्म और मृत्यु का चक्र विद्यमान है, तब तक महाश्मशान की यह होली महादेव और उनके गणों के अटूट प्रेम की साक्षी बनी रहेगी। काशी की गलियों में गूँजता ‘हर-हर महादेव’ का घोष और हवा में उड़ती चिता की राख हमेशा यह संदेश देती रहेगी कि—मृत्यु से मत डरो, क्योंकि वह तो महादेव का आलिंगन है।
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