शुद्ध बनने का अर्थ है मन से, वचन से और काया से निर्विकार बनना, राग-द्वेषादि से रहित होना।
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शमशेर का अकेलापन एक ईमानदार रचनाकार की अनिवार्य नियति का अकेलापन है।
गुणवान् व्यक्ति समाज में आदर का पात्र होता है। गुण विरूप व्यक्ति को भी सौभाग्यशाली बना देते हैं।
सत्य सच्चे साधकों के लिए है, व्यर्थ कुतूहल वालों के लिए नहीं।
एक सच्चा और आध्यात्मिक गुरु कभी नहीं चाहेगा कि आप ख़ुद को महिमामंडित करें या सम्मान दें। बल्कि, वह आपको ख़ुद को पसंद करने और ख़ुद का सम्मान करने की सलाह देगा। वे कांच की तरह पारदर्शी होते हैं। वे ईश्वर के प्रकाश को अपने से होकर गुज़रने देते हैं।
साधु न सजो, साधु बनने की चेष्टा करो।
अगर हम सच्चे हैं तो ईश्वर खाना देगा और अगर हम नालायक बने रहते हैं तो भूखा और नंगा रहना पड़ेगा।
अपने गाल पर थप्पड़ लगने पर यदि कह सको, कौन किसको मारता है? तभी दूसरे के समय बोलो—अच्छा ही है। ख़बरदार! स्वयं यदि ऐसा नहीं सोच सको, तो दूसरे के समय बोलने मत जाओ।
सच्चा बनने के लिए चाहिए कि हम एकमात्र ईश्वर के ही गुलाम बनें, और किसी के गुलाम न बनें।
अप्रियवचन से दरिद्र, प्रिय वचनों से संपन्न, अपनी ही स्त्री से संतुष्ट और पराई निंदा से रहित जो पुरुष हैं, उनसे कहीं-कहीं पृथ्वी शोभायमान है, अर्थात् ऐसे पुरुष सभी जगह नहीं मिलते।
सत्यशोधक, अधर्म का सर्वत्र विरोध करेगा पर उसी के साथ अधर्मी व्यक्ति और अधर्म के फ़र्क़ पर नज़र रखेगा।
तुम यदि सत् बनते हो, तुम्हें देखकर हज़ार-हज़ार लोग सत् हो जाएँगे। और यदि असत् बनते हो; तुम्हारी दुर्दशा में संवेदना प्रकाश करने वाला कोई भी नहीं रहेगा, क्योंकि असत् होकर तुमने अपने चतुर्दिक को असत् बना डाला है।
सरल व्यक्ति ऊर्ध्वदृष्टिसंपन्न चातक के समान होता है, कपटी निम्नदृष्टिसंपन्न गृद्ध के समान। छोटा रहो, किंतु लक्ष्य उच्च हो; बड़ा एवं उच्च होकर निम्नदृष्टिसंपन्न गृद्ध के समान होने से लाभ ही क्या है?
किसी के द्वारा दोषी बनाने के पहले ही, कातर भाव से अपना दोष स्वीकार करो। मुक्त-कलंक होगे, जगत् के स्नेह के पात्र बनोगे।
मैं कई स्मृतियों के प्रति ईमानदार नहीं रहा, लेकिन मैंने कोई अपराध नहीं किया।
स्थिरप्रतिज्ञ रहो, जिद्दी मत बनो।
बहुत लोगों की अपेक्षा थोड़े से ईमानदार लोग अधिक अच्छे हैं।
जिनको अपनी प्रतिष्ठा और गौरव का ख़याल है, वे न केवल नीचा काम करने से अपने को अलग रखते हैं, बल्कि 'आत्मोत्कर्ष विधान' अपनी तरक्की अपने निज बाहुबल से क्यों कर हो सकती है—इसे भी वे ही जानते हैं।