शुद्ध बनने का अर्थ है मन से, वचन से और काया से निर्विकार बनना, राग-द्वेषादि से रहित होना।
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गुणवान् व्यक्ति समाज में आदर का पात्र होता है। गुण विरूप व्यक्ति को भी सौभाग्यशाली बना देते हैं।
एक सच्चा और आध्यात्मिक गुरु कभी नहीं चाहेगा कि आप ख़ुद को महिमामंडित करें या सम्मान दें। बल्कि, वह आपको ख़ुद को पसंद करने और ख़ुद का सम्मान करने की सलाह देगा। वे कांच की तरह पारदर्शी होते हैं। वे ईश्वर के प्रकाश को अपने से होकर गुज़रने देते हैं।
अगर हम सच्चे हैं तो ईश्वर खाना देगा और अगर हम नालायक बने रहते हैं तो भूखा और नंगा रहना पड़ेगा।
सच्चा बनने के लिए चाहिए कि हम एकमात्र ईश्वर के ही गुलाम बनें, और किसी के गुलाम न बनें।
अप्रियवचन से दरिद्र, प्रिय वचनों से संपन्न, अपनी ही स्त्री से संतुष्ट और पराई निंदा से रहित जो पुरुष हैं, उनसे कहीं-कहीं पृथ्वी शोभायमान है, अर्थात् ऐसे पुरुष सभी जगह नहीं मिलते।
सत्यशोधक, अधर्म का सर्वत्र विरोध करेगा पर उसी के साथ अधर्मी व्यक्ति और अधर्म के फ़र्क़ पर नज़र रखेगा।
मैं कई स्मृतियों के प्रति ईमानदार नहीं रहा, लेकिन मैंने कोई अपराध नहीं किया।
बहुत लोगों की अपेक्षा थोड़े से ईमानदार लोग अधिक अच्छे हैं।
जिनको अपनी प्रतिष्ठा और गौरव का ख़याल है, वे न केवल नीचा काम करने से अपने को अलग रखते हैं, बल्कि 'आत्मोत्कर्ष विधान' अपनी तरक्की अपने निज बाहुबल से क्यों कर हो सकती है—इसे भी वे ही जानते हैं।