कहानी : पिस्तौल
आनंद बहादुर
06 जनवरी 2026
और इस तरह पिस्तौल का मेरे जीवन में पदार्पण हुआ...
लगा कि आँगन के उस सिरे से धड़ाम से कोई कूदा। देखा तो अपना नरेन था। यानी अपना नरेंद्र यानी नरेनिया। मेरा ‘जिगरी दोस्त’! उन दिनों जब भी कोई उसे मेरा जिगरी दोस्त कहता तो कहने वाले के चेहरे पर एक अजीब-सा भाव आ जाता। समझ गए ना। एक भाव जो सबकुछ बयान कर देता। फिर शब्दों की कोई ज़रूरत ही नहीं रहती। यह सबकुछ इस तरह होता—
मैं किसी घटना के बारे में बता रहा हूँ (मान लीजिए), इस क्रम में मैं कहता कि वहाँ नरेन भी मेरे साथ था। इस पर सामने वाला पूछता, “कौन नरेन?” फिर ख़ुद ही बात को पकड़ कर कहता—“ओ, अच्छा वो नरेनिया! तुम्हारा जिगरी दोस्त!” बस, इस तरह सारा गुड़-गोबर हो जाता।
बात यह है कि नरेन ने मुझे इस क़दर फाँस रखा था उन दिनों! मतलब कि क्या कहूँ। लंबी कहानी है, अगर इसी को कहता चला गया तो ‘पिस्तौल’ वाली बात धरी की धरी रह जाएगी। और महज़ पिस्तौल ही क्यों? साथ में एक अदद तलवार और एक गुप्ती भी तो थी!
नरेन और मेरा साथ भी कुछ ऐसा ही था। विधि ने हाय मिलाया कैसा है यह जोड़ा—कहाँ पिंडली और कहाँ काबुल का घोड़ा, वाली मिसाल थी। वह एकदम से मेरे जीवन में आ टपका था और उसने जबरन एक जगह बना ली थी। इस बात के बावजूद कि हम दोनों में कोई साम्य नहीं था।
वह था बेखटके मार-धाड़ में लगे रहने वाले लोगों के मुहल्ले का किशोर जिसने पढ़ाई की थी या नहीं, या की थी तो कैसी यह संदेहास्पद था। मैं था अँग्रेज़ी मीडियम में पढ़कर कॉलेज में आने वाला पढ़ाकू जिसकी पढ़ाई-लिखाई को लेकर उस छोटे से शहर में अपनी एक धाक थी। फिर मैं था एक गंभीर क्रिकेटर। वह था क्रिकेट के बारे में जीरो बटा शून्य, जानने वाला फ़ैन जो अपने जैसे फ़ालतूनंदनों के साथ देश-विदेश के क्रिकेट पर राय क़ायम करते हुए टोले-मुहल्ले छाप मैचों को भी उसी गंभीरता से लेता था। या शायद कहीं अधिक गंभीरता से, क्योंकि यहाँ प्रतिष्ठा का सवाल भी जुड़ा रहता। ऐसे हर फ़ैन की कोई फ़ेवरेट लोकल टीम होती, जिसके लिए वह लड़ने-झगड़ने और जान की बाज़ी तक लगाने को हमेशा तैयार रहता है।
नरेन और मैं... किसके बारे में पहले बात करूँ? पहले उसके ही बारे में। वही बताने लायक़ है। मैं तो एक एकदम से सामान्य-सा किशोर था। वह था—रंगदार। हाँ यही सही रहेगा। वैसे रंगदार से थोड़ा-सा कम था वह। मगर शानशौकत वही थी। कम से कम मेरी नज़र में। इसीलिए जब वह मेरे जीवन में आन टपका, तो मुझे अपने पर हल्क-सा रश्क हो आया था। थोड़ा-सा फूल-सा गया मन। जब कोई कहता, “अच्छा, तुम्हारा दोस्त नरेनिया!” तो सच मानिए, संकोच के साथ-साथ अंदर एक तरह के अभिमान की भावना भी गर्दन ऊँचा उठा लेती। एक तरफ़ एक दादा-टाइप के व्यक्ति से संबंध के उजागर होने की शर्मिंदगी थी, तो दूसरी तरफ़, एक ताक़तवर व्यक्ति के संग-साथ से सुशोभित होने का घमंड भी था। नरेन इस भावना को हवा देना भी ख़ूब जानता था। “मेरे होते हुए तुमको कोई आँख उठाकर नहीं देख सकता है लौली!” वह कहा करता था। और मैं इस बात पर फूल-फूल उठता और मानता कि नरेन का दोस्त होने के चलते वाक़ई लोग मुझसे इज़्ज़त से बात करते हैं और इस बात का ख़याल रखते हैं कि मैं उनसे नाराज़ न होऊँ।
पता नहीं यह मेरी ख़ाम-ख़याली थी या सच्चाई। मगर उन दिनों तो मैं इस बात पर आँख मूँदकर विश्वास करता था। एक तरह से यह मेरी एक कमज़ोरी थी, जिसका फ़ायदा उठाकर नरेन मेरे जीवन में सेंधमारी करने में सफल हो गया था। पता नहीं कितने समय तक मैं उसके प्रभाव में रहा और जाने अगर और अधिक दिनों तक रहता तो मेरा क्या हस्र होता। मगर वह तो बाद की बात है। उससे पहले अपनी एक और कमज़ोरी का खुलासा करना ज़रूरी है, जिसका, अब मैं सोचता हूँ, तो लगता है कि मेरे ऊपर नरेन के प्रभाव को गढ़ने में ज़्यादा हाथ रहा होगा।
सच तो यह है कि सबसे पहले-पहल हम दोनों की दोस्ती भी मेरी इसी कमज़ोरी के चलते हुई। क्रिकेट, आप तो जानते हैं, मैं बहुत अच्छा नहीं खेलता था। मगर अच्छा बैट्समैन कहलाने की एक छुपी हुई, पोशीदा चाहत मेरे अंदर थी। जैसी शायद निन्यानबे परसेंट क्रिकेटरों को होती है। नरेन क्रिकेट नहीं खेलता था, मगर उसकी उसमें वही रुचि थी जो अक्सर नहीं खेलने वालों में होती है जो ख़ुद को खिलाड़ियों से बड़ा तीसमार-ख़ाँ मानने लगते हैं। अब, हम लोग जैसा क्रिकेट खेलते थे और उसमें नरेन जैसे नहीं खेलने वाले फ़न्नेख़ाँ-टाइप लोगों की क्या भूमिका होती थी, इसको समझाए बिना आगे बढ़ने में कहानी का वो लुत्फ़ नहीं आएगा।
अपने टोले-मोहल्ले के आस-पास के मैदानों पर क़ब्ज़ा करके क्रिकेट (या कोई भी और खेल) खेलने के लिए हमें क्या पापड़ बेलने पड़ते थे, वह उस समय की देश की क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों को सपने में भी नहीं पता होगा। उस समय छोटे शहरों के लड़के देश की टीमों में भाग लेने का सपना भी नहीं देख पाते थे। कलकत्ता, दिल्ली, बंबई, मद्रास जैसे महानगरों के लोगों का वहाँ एक तरह का ज़बरदस्त कॉकस हुआ करता था। ख़ैर, छोड़िए इस बात को वर्ना कहानी धरी रह जाएगी। हाँ, तो टोले-मोहल्ले में खेलने के लिए उन दिनों उपलब्ध मैदानों को लूटना पड़ता था। कारण यह कि बहुत कम मैदान ही ऐसे होते थे जिनपर क्रिकेट की पिच बनाई जा सकती थी। बस, पिच बनाने भर सही ज़मीन मिल जाए, हमारी ख़्वाहिश रहती—बाक़ी मैदान तो, भगवान की दया से, कंकड़ीला पथरीला, झाड़-झंखाड़ वाला, जैसा भी हो। हम काम चला लेते थे।
तो चूँकि ऐसे मैदान बहुत कम थे, तो मैदानों को लूटना और फिर उसके बाद बादस्तूर अपने क़ब्ज़े में रखना—इसमें नरेन जैसे बाहुबलियों की ज़रूरत पड़ती थी। सच बात तो यह है कि नरेन को सबसे पहले मैंने इसी भूमिका में देखा था। उन दिनों नरेन से मेरा परिचय नहीं था। हालाँकि उसको मैं हमेशा उन जगहों पर बेमतलब मँडराते देखा करता था, जहाँ क्रिकेट मैच हो रहे होते थे। वह बेमतलब इधर-उधर करता रहता और अगड़म-बगड़म बोलता रहता, जिस पर सब हँसते रहते। कुल मिलाकर उसका कोई बढ़िया इम्प्रेशन मेरे मन पर नहीं था। मगर यही नरेन एक दिन ऐसी भूमिका में आया कि मैं मन ही मन उसका क़ायल होकर रह गया।
हुआ यह कि एक दिन जब मैं ग्राउंड में कुछ देर से पहुँचा, तो वहाँ विचित्र नज़ारा था। मैं अपनी टीम का कप्तान था, मगर यह महान् उपलब्धि मुझे खेल की पारंगतता के चलते नहीं, बल्कि इसलिए मिली थी कि मैं सबसे पहले ग्राउंड पहुँच जाता था। फिर खेल की सारी तैयारी का ज़िम्मा भी मेरा था, जिसके अंतर्गत बग़ल के मकान से क्रिकेट का सारा सामान ढोकर लाना, ग्राउंड की साफ़-सफ़ाई कर पिच पर पानी छिड़कना, पिच के दोनों साइड विकेट्स गाड़कर खेल की सारी तैयार कर देना वगैरह आते थे। साथ ही चंदा करके बॉल-बैट ख़रीदना इत्यादि, मैं इन सब के लिए (अपने कुछ वफ़ादार दोस्तों के साथ जो मेरी ही तरह बोदे खिलाड़ी थे) हमेशा तैयार रहता था, इसलिए मुझसे ज़्यादा अच्छा खेलने वाले ज़्यादा चतुर साथी सहर्ष मुझे कप्तान बना देते थे। मैं यह सब इसलिए करता था कि टीम की कप्तानी में एक शान थी और उसे हासिल करने के लिए सबसे अच्छा खिलाड़ी होना ज़रूरी नहीं था।
देखिए, मैं फिर भटक रहा हूँ। हाँ, तो उस दिन जब मैं किसी कारण मैदान लेट पहुँचा तो देखा कि सारे खिलाड़ी एक साइड खड़े थे और पिच पर कुछ विचित्र टाइप के जीव खेल रहे थे। उनके पास एक बैट था और टूटे हुए तीन-चार विकेट जिन्हें उन्होंने अनुमान से दोनों ओर गाड़ दिया था। और एक बहुत पुरानी, फटी हुई गेंद से कुछ खेल रहे थे जो क्रिकेट और गुल्ली-डंडा का मिलाजुला रूप था। उनके कपड़े भी अजीब थे, ना जाने वे कहाँ से आ गए थे और हम लोगों से पहले पहुँचकर उन्होंने मैदान पर क़ब्ज़ा जमा लिया था। उनके खेलने के ढंग से पता चल रहा था कि वे क्रिकेट खेलना बिल्कुल नहीं जानते थे। मगर एक साजिश के तहत (जिसका हमें बाद में पता चला) उन्होंने हमारा मैदान हमसे छीन लिया था। वैसे वह मैदान एक स्कूल-ग्राउंड था, जहाँ हम लोग एक अर्से से खेल रहे थे, इसलिए उसे अपना मैदान कहते थे। और इस दिन से पहले किसी ने हमें इस तरह चुनौती देने की जुर्रत भी नहीं की थी।
इस मैदान को हम लोगों ने बहुत मेहनत करके खेल के लिए तैयार किया था। यहाँ आने से पहले हम आम्मा बग़ीचा और निमिया बग़ान नामक दो मैदानों से खदेड़कर भगाए गए थे। फिर यह स्कूल-ग्राउंड हमें दिखा जिसकी सारी ज़मीन ऊबड़-खाबड़ थी। हमने बड़ी मुश्किल से उस मैदान को खेलने लायक़ बनाया था। कई दिन तक तो केवल पिच बनाने के लिए बाइस गज़ की स्ट्रिप को ईंटे के टुकड़ों से रगड़-रगड़ कर बराबर किया, फिर उसपर गोबर से लिपाई करके उसे इस लायक़ बनाया था कि टप्पा खाने के बाद बॉल हमारी खोपड़ी न तोड़ दे। और अब, वे लफ़ंगे हमारा मज़ाक़ उड़ाते हुए इसी पिच पर बड़े बेढंगे तरीक़े से खेल रहे थे।
बज़ाहिर वे लफ़ंगे ख़ूब तल्लीन होकर खेल रहे थे। एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाते हुए, एक एक शॉट और बॉल पर तालियाँ पीटते। यह सब उन्होंने खेलने वालों को देखकर सीखा होगा और अब बज़ाहिर उनकी नक़्ल कर रहे होंगे। मगर मुख्य बात, उन्हें क्रिकेट खेलना नहीं आता था। उन्हें उस तरह खेलते देख रहे मेरे दोस्तों के मुँह पर अजीब विवशता के भाव थे। ज़ाहिर था वे उन गुंडों को जानते थे। फिर भी मैंने उनसे पूछा कि किसी ने उनसे बात करने की कोशिश की थी या नहीं? जब नहीं में जवाब मिला, तो मैं कुछ मित्रों के साथ आगे बढ़ा और उनमें से एक, जो उनका सरदार जैसा लग रहा था, उससे कहा, ‘‘यह मैदान हमारा है, हमलोग काफ़ी समय से यहाँ खेल रहे हैं। इस पिच को भी हम लोगों ने बहुत मेहनत करके बनाया है।’’
उस लफ़ंगे ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया, मगर जब मैंने पिच का ज़िक्र किया तो खेलने के बीच ही रुककर उसने मुँह से ढेर सारा बलगम—वह लगातार गुटखा चबा रहा था—बीच पिच पर थूक दिया। फिर उसी बलगम के ठीक आगे खड़ा होकर खेलने लगा। अगली गेंद फच्च से उसी बलगम पर गिरी और छींटे उड़ाती हुई उसके बल्ले से टकराई।
हमलोग, सच कहूँ तो, उसकी उस करतूत से एकदम ध्वस्त ही हो गए। हम अपना-सा मूँ लेकर मैदान के किनारे लौट आए। हम लोगों को लौटता देखकर उन लफ़ंगों ने जमकर हो-हल्ला मचाया और उनमें से एकाध ने हवा में उछल कर यूँ सेलिब्रेट भी किया मानो सेंचुरी ठोंकी हो। इधर हम लोगों को पता ही नहीं चल रहा था कि क्या करें। इसी बीच मुझे लगा किसी ने नरेनिया का नाम लिया। लेकिन मैंने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि जैसा मैने बताया, मैं उससे बिल्कुल ही प्रभावित नहीं था। मैं समझता था कि वह वैसे ही रंग जमाने के लिए इधर-उधर बक-बक करते हुए घूमने वाला बेकार का लड़का है।
मैं पसीने से लथपथ था और मुझे तेज़ प्यास लग रही थी सचमुच की, या क्या पता उस अपमानजनक व्यवहार के चलते। वैसे भी, मुझे लगता है कि मैं एक एस्केपिस्ट हूँ, क्रिटिकल समय पर मैदान छोड़कर भाग जाने वाला। जो भी समझिए, दूसरों को वहीं गुनताड़ा लगाते छोड़कर मैं बाहर की ओर चल पड़ा। बाहर एक चाय-पान की दुकान थी। हम अक्सर खेलने के बाद उस दुकान में जमा होकर चा-बिस्कुट खाया करते थे। हमारे कुछ ज़्यादा शरीफ़ दोस्त वहाँ सिगरेट पीने के अपने अभ्यास को तराशते। मैं वहीं पहुँचा और दुकानदार को पानी पिलाने को कहा। पानी पीने के बाद भी काफ़ी देर तक मेरा मन मैदान की ओर जाने का नहीं किया, मगर फिर कुछ-कुछ डरा-सा, कुछ अपने आप को कोसता हुआ कि हम लोग इतने कायर क्यों हैं, एक गुंडा सामने हमारे मुँह पर थूक दे और हम बर्दाश्त कर लें, यही सब सोचता हुआ ग्राउंड में पहुँचा। वहाँ पहुँचकर जो नज़ारा मैंने देखा वह दंग कर देने वाला था।
वहाँ सामने उसी पिच पर उसी बलगम के ठीक बग़ल में, नरेन उस सड़कछाप गुंडे को दबोचे हुए था। उसने एक हाथ से लफ़ंगे की दाहिनी बाँह को मरोड़कर पीठ से सटा दिया था और दूसरे हाथ से दनादन उसे मुक्के मारता जा रहा था। उस लफ़ंगे के बाक़ी साथी ऐसे ग़ायब थे जैसे गधे के सिर से सींग। मैंने पहली बार आदर के साथ नरेन की ओर ताका। वह क्रोध से मानो पागल हुआ जा रहा था। ग़ुस्से से उसका चेहरा एकदम टुहटुह लाल हो गया था, मानो वह चेहरा न होकर पका हुआ कंद हो। उसकी वह बेवक़ूफ़ों वाली बड़बड़ाती हुई मुद्रा जाने कहाँ बिला गई थी। यह एक दूसरा ही इंसान था। बेहद ख़ौफ़नाक और कुछ भी कर गुज़रने वाला। मैं नरेन की उस क्रोधित मुद्रा को जीवनभर नहीं भूल पाऊँगा। वह छवि मेरे मन की प्रस्तर गुफ़ाओं में भित्तिचित्र बनकर रह गई है।
हम लोग जड़ होकर उस दृश्य को देख रहे थे। वह लफ़ंगा नरेन के चंगुल में फँसा मुश्किल से गूँ-गूँ कर रहा था। कुछ देर बाद हममें से ही किसी को दया आ गई। उसने बढ़कर कहा, ‘‘अब जाने दो नरेन दा... मर जाएगा स्साला!’’
इसपर उस कायर ने गूँ-गूँ कर फिर कुछ कहा। जवाब में नरेन ने फिर उसकी बाँह को मरोड़ा, और बोला, ‘‘छूटना है तो चाट बे!’’ मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि नरेन क्या चाटने को कह रहा है, फिर तुरंत ही समझ में आ गया। नरेन उसे अपना ही थूका हुआ चाटने को कह रहा था। और उसने जो कहा था वह पूरा हुआ तभी उस कचरे की ढेर को छोड़ा गया।
छूटते ही वह लड़का तीर की तरह भागा। फिर कुछ दूर जाकर रुककर चिल्लाया, ‘‘कल सुब्हे आके पीच में पखाना नई किया तो मेरा नाम...’’
‘‘अबे तेरी माँ की... अब्ब इधर दिखा ना तो तेरी... पर लांगटे कूद जाऊँगा!’’ नरेन चिल्लाकर लपका।
उस दिन से नरेन को देखने का मेरा नज़रिया बदल गया। मुझे जाने क्यों बाद में कुछ-कुछ ऐसा एहसास होता रहा कि उस दिन का वह बढ़ा-चढ़ाकर किया गया तमाशा कुछ-कुछ नरेन ने मुझे इम्प्रेस करने के लिए ही किया था, क्योंकि वह चाहता तो बहुत आसानी से उस लफ़ंगे को बिना ज़्यादा मार-धाड़ किए भगा सकता था। साथ ही लड़के को छोड़ने के बाद उसने जिस निगाह से मेरी ओर ताका था, मैं उस दृष्टि को नहीं भूल पाया हूँ।
उसके बाद से नरेन एक तरह से हमारी टीम का संरक्षक बन गया। यह हमारे लिए काफ़ी फ़ायदे की बात थी, क्योंकि हमारे टोले-मोहल्ले छाप चैलेंज मैचों में अक्सर अंतिम फैसला एक बिल्कुल नायाब तरीक़े से पाया जाता था। होता यह था कि ज़्यादातर टीमें जिनसे हमारा चैलेंज मैच होता था, जब तक जीतती रहतीं तब तक तो ठीक से खेलती रहतीं, मगर जैसे ही वे हारने लगतीं, तो अंपायर पर बेईमानी का आरोप लगाकर हल्ला मचाने लगतीं। फिर अक्सर फैसला उलट दिया जाता और हारने वाली टीम जीत जाती। ऐसा नहीं होने पर उस टीम के खिलाड़ी खेल छोड़कर मारा-मारी पर उतारू हो जाते। ऐसी टीमों को हम लोग अपने कोड-लैग्वेज में ‘कुलकुली पार्टी’ कहते थे। अब हमारा नसीब कि अधिकतर टीमें कुलकुली पार्टी ही थीं। हमारी स्थिति यह थी कि हम लोग ज़रा गंभीर टाइप के खिलाड़ी थे और हमारा इन हथकंडों में विश्वास नहीं था। नतीजतन हम हमेशा घाटे में रहते थे। ऐसे में नरेन के हमारे पक्ष में आ खड़े होने से हम उस ज़िल्लत से छुटकारा पा गए। जब वह आकर चट्टान की तरह सामने डट जाता तो कुलकुलाने वाले वो खिलाड़ी सब हेंकड़ी भूल जाते थे।
इसके अलावे भी उसका होना कई तरह से टीम के लिए फ़ायदेमंद था। मिसाल के लिए, हमलोग अभ्यास के लिए आपस में कंट्रीब्यूट कर ड्यूज़ बॉल ख़रीदते थे, जो काफ़ी महँगा पड़ता था। नरेन की साठगाँठ एक मिशन स्कूल के गेटकीपर से थी जो स्कूल की थोड़ी-बहुत खेली हुई, या कई बार तो बिल्कुल ही नई गेंद, औने-पौने में दे देता था। हमारे तो मज़े हो गए थे।
उस घटना के बाद से धीरे-धीरे नरेन और मैं क़रीब आते गए। मैं अक्सर देखता कि वह बिना बोले किसी न किसी छोटे-मोटे मामले में मेरे पक्ष में खड़ा है या बिना मेरे जाने उसने ऐसा कुछ किया जो मेरे हित में था।
एक दिन मैंने बाज़ार में एक दीवार-घड़ी ख़रीदी। उसका डब्बा काफ़ी बड़ा व चैड़ा-सा था। अब वह डब्बा न मेरे स्कूटर की डिक्की में समा पा रहा था, न मेरे पास कोई ऐसा बड़ा-सा झोला वगैरह था जिसमें उसे डालकर स्कूटर की हैंडल से लटका लेता। घड़ी मुझे पसंद आ गई थी इसलिए मैंने बिना कुछ सोचे-समझे उसे तपाक से ख़रीद लिया था। और अब असमंजस में खड़ा-खड़ा डब्बे को कभी स्कूटर की बॉडी में इस जगह रखता कभी उस जगह। मगर कोई माकूल जगह मिल नहीं रही थी, जहाँ डब्बे को रखकर स्कूटर को स्टार्ट किया जा सके। जैसे-तैसे रखकर चलाने से रास्ते में स्लिप करके डब्बे के गिर जाने की संभावना ही काफ़ी अधिक थी। मैं परेशन-सा खड़ा कोई समाधान ढूँढ़ ही रहा था कि जाने कहाँ से पीछे से नरेन प्रकट हुआ, उसने पीछे से ही डब्बा मेरे हाथ से इस सफ़ाई से निकाला कि मैं चौंक गया। मैं कुछ कहता इससे पहले ही उसने बड़े आराम से उस चैड़े मगर पतले डब्बे को स्कूटर की बॉडी और फ़ुटरेस्ट पर रखे मेरे दाएँ पैर के जूते के बग़ल में फँसाकर इस तरह रख दिया कि वह बिल्कुल सुरक्षित तरीक़े से वहाँ टिक गया। फिर वह बिना कुछ कहे मुस्कुराता हुआ अपनी राह पर चला गया। डब्बा इतनी आसानी से स्कूटर और मेरे पाँव के बीच चिपक कर समाया हुआ था कि अब मैं आराम से बिना किसी परेशनी के गाड़ी ड्राइव कर सकता था।
इसी तरह एक बार मैं एक मैच में जब ग्राउंड में फ़िल्डिंग कर रहा था तो मैंने उसे किसी से ज़ोर-ज़ोर से बहस करते सुना। वह जिस टॉपिक पर बहस कर रहा था, उसका मुद्दा यह था कि ज़िले का सबसे अच्छा ओपनर बैट्समैन कौन है? आप अनुमान लगा सकते हैं वह किसका पक्ष ले रहा होगा।
मुझे याद नहीं है कि इसी बीच कैसे वह धीरे-धीरे मेरे घर आने लगा और घर का सदस्य जैसा बन गया। माँ-पापा, छोटी बहन—सब उसे अपना मानने लगे। पापा उससे अपने कई छोटे-मोटे काम करवाने लगे—ऐसे काम जिन्हें वह मुझसे नहीं करवा पाते थे, वे नरेन के हिस्से आने लगे। शहर भर के सारे जलेबी-चॉप और भजिए की दुकानों का ठिकाना उसे मालूम था, जहाँ से वह ये शानदार चीज़ें ला-लाकर हम लोगों को धन्य करता रहता। कहाँ-कहाँ बकरे का सही गोश्त मिलता है, कहाँ अनाज में मिलावट की जाती है, दूध किस डेयरी का उत्तम है, किस गुमटी पर बढ़िया पान लगता है, लस्सी कहाँ अच्छी मिलती है—इन बातों का वह विषय जानकार था, और अब वह जानकारी हमारे ख़ूब काम आ रही थी। साथ ही वह किन्हीं ‘आख्या बाबू’ नामक होम्योपैथी वाले का ज़बरदस्त फ़ैन था, जिनका गुनगान करते वह अघाता नहीं था, जो मात्र दो रुपये प्रति पुड़िया चार्ज करते थे और रोग को जड़ से ख़त्म कर देते थे। अब नरेन ने सारे परिवार को रोग-मुक्त करने का ठीका अपने हाथ में ले लिया था।
एक बार बिनोद को कुत्ता पालने का शौक चर्राया तो गेट कीपरों की नरेन की साठगाँठ ने अच्छा गुल खिलाया। एक दिन मैंने पाया कि बिनोद सुबह से ग़ायब है। जब वह लौटा तो उसके साथ नरेन था, जिसके हाथ में एक शानदार रिट्रीवर (यह मुझे उन्हीं दोनों ने बताया था) ‘डॉग’ की चेन थी। वह कलकत्ते के किसी बड़े धन्नासेठ का डॉगी था, जिसकी एक बहुत बड़ी हवेली हमारे शहर में थी जहाँ यह कुत्ता था। नरेन हवेली के गेटकीपर को खिला-पिलाकर बिनोद के लिए कुत्ता उठा लाया था। ऐसी बातें उसके लिए बाँए हाथ का खेल थीं। हम लोग अपने, वो क्या कहते हैं अँग्रेज़ी में—मॉरल कम्पंक्शन—उसमें डूबे हुए लोग हैं, जो ख़ुद ऐसी किसी घटना को अंजाम देने से झिझकते हैं, मगर वही काम अगर कोई दूसरा व्यक्ति हमारे लिए कर दे, तो हमें उसका फ़ायदा उठाने में कोई संकोच नहीं होता। वह कुत्ता बहुत दिनों तक हमारे यहाँ रहा। उस दिन के बाद बिनोद और नरेन एक-दूसरे के लिए पक्के चोर-चोर मौसेरे भाई हो गए।
मुझे मूलतः कुत्तों में कोई रुचि नहीं थी, मगर जब मैंने पाया कि ‘जॉनिया’ सचमुच अपनी नस्ल का नाम रोशन करते हुए झाड़ियों में खोई हमारी गेंदों को खोज लाता है तो मैं भी कहने लगा कि ‘जॉनिया है काम का!’ दरअस्ल कुत्तों का नाम जॉनी था, मगर आप तो जानते ही होंगे कि हम लोग नाम को बिगाड़ कर रख देने में कैसे माहिर होते हैं। जिस तरह हमने नरेन का नाम बिगाड़कर नरेनिया कर दिया और लोगों ने मेरा नाम बिगाड़कर लौलिया कर दिया था, उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए हमने जॉनी का नाम जॉनिया कर दिया था। कुछ शुरुआती लड़खड़ाहट के बाद बहुत जल्द, जॉनिया झाड़ियों में से हमारी गेंद निकाल लाने में एक्स्पर्ट हो गया था। यह हमारे लिए मुँह माँगे वरदान से कम नहीं था, क्योंकि हमारे घर का जो छोटा-सा आहाता था, उसके अंदर और चारों ओर रोड के किनारे भी, पुटुस आदि झाड़ियों की भरमार थी। जब हम घर पर ‘प्रैक्टिस’ करते, तो हमारी गेंदें जो नालों और गढ़ों के गंदे पानी, कचरे की ढेर और धूल-गर्द से सनाकर बहुत जल्द हरी, मटमैली या काली हो जाती थीं, पुटुस की झाड़ियों में इस तरह खो जाती थीं कि हमें उनको खोजने में घंटों लगते थे। हम बहुत देर तक उन झाड़ियों को अपनी बैट और विकेट से पीटते रहते तब कहीं जाकर गेंद कभी-कभी मिलती। जब जॉनिया हमारे साथ हो गया तो वह न सिर्फ़ अभी खोई गेंद को खोजकर लाने लगा, बल्कि वह बहुत बार उन प्राचीन गेंदों को भी लाने लगा, जिनपर कत्थी काई जमी हुई होती थी। यह हमारे लिए आम के आम गुठली के दाम वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली बात थी।
वैसे तो हम लोगों के साथ नरेन का बर्ताव काफ़ी अच्छा रहता था। मगर अपने आप में था तो वह एक शोहदा ही। उसकी भाषा हमेशा मार-धाड़ वाली होती थी। वह हमेशा किसी न किसी को ठिकाने लगा देने के बारे में बोलता रहता था। उसकी भाषा धीरे-धीरे, अनजाने ही में मेरे अंदर भी घर बना रही थी। उसी की तरह मैं भी कभी-कभार राह चलते किसी न किसी से उलझ पड़ने लगा था। ऐसे में ज़्यादातर लोग कतराकर निकल लेते और मुझे लगता कि मैंने कोई बड़ा तीर मार लिया है। हालाँकि यह उपलब्धि सरासर नरेन की थी। कुछ लोग मेरे इस परिवर्तन पर आश्चर्य करते। एकाध ने तो यहाँ तक कह डाला था कि एक जाने-माने शिक्षक का लड़का इतना अशिष्ट कैसे हो गया, फिर वह मेरी ओर देखकर इस तरह मुस्कुराते मानो बात की तह में पहुँच गए हैं। इस बात पर मैं और चिढ़ जाता।
उनमें से एकाध ऐसे भी थे जो नरेन और मुझे दोनों को बेहतर जानते-समझते थे। उनकी भी कुछ प्रतिक्रियाएँ समय-समय पर मिलतीं। मुझे सबसे रोचक प्रतिक्रिया वह लगी जब एक पुरानी जान-पहचान के व्यक्ति ने मुझसे कहा, ‘‘लौली, जब तुम्हारी और नरेनिया की दोस्ती हुई तो हम लोगों ने कहा था कि ‘देखना नरेनिया लौलिया को बिगाड़ कर रख देगा।’ मगर अब तो सब कहते हैं कि लौलिया ही नरेनिया को बिगाड़ कर रख दिया है। आजकल जहाँ मौक़ा मिलता है, सुलह-सफ़ाई की बात करने लगता है। कभी बोलता है जब ज़रूरत हो तभी लड़ना चाहिए, कभी बोलता है चलिए मिल-बैठ के समाधान निकाल लेते हैं, सब बात में लड़ना नहीं चाहिए।’’
‘‘नहीं-नहीं, बल्कि दोनों एक-दूसरे को बिगाड़ दिए हैं, देखते नहीं लौलिया आजकल कैसे बात करने लगा है!’’ सुनने वालों में से एक अन्य खुर्राट टाइप ने कहा। ‘‘जो भी हो इसमें लौली से ज़्यादा नरेनिया का नुक़सान है क्योंकि उसके लाइन में जैसे ही कोई ऐसा बात करने लगता है कि गया काम से, सब उसका साथ छोड़ने लगते हैं।’’ फिर सबने मिलकर ज़ोर का कहकहा लगाया था। वह कहकहा अब तक मेरे कान में गूँजता है। कुछ बातें होती ही ऐसी हैं, धीरे-धीरे अंदर खुलती हैं।
बाद में जब यह बात मैंने नरेन को बताई तो पहले तो वो छूटके हँसा, फिर जब उसका हँसना थमा, तो बोला सब को मिर्ची लग रही है और कोई बात नहीं है। फिर कुछ देर बाद बोला, जानते हो कुछ लोग मुझको कहते हैं कि नरेनिया भी लौली के जैसे शांत होता जा रहा है।
‘‘और मुझको कहते हैं कि लौलिया नरेनिया के जैसे गर्म दिमाग़ का होता जा रहा है!’’ फिर हम दोनों देर तक हँसते रहे।
‘‘देख अगर तेरे को तेरे लाइन में कोई दिक़्क़त आती है तो तू मेरे संग दोस्ती छोड़ दे।’’ मैंने गंभीर होते हुए कहा।
‘‘क्या बोलता है? तेरे-मेरे दोस्ती के बीच कोई आया तो कच्चा चबा जाऊँगा!’’
‘‘तो फिर दो-चार को जल्दी से उठा-पटक के दिखा, सही मैसेज भेज स्सालों को!’’
धीरे-धीरे मैं अपने घर के लोगों से भी उस तरह पेश आने लगा जैसे बाहरी लोगों से करता था, जिनको मैं अब अक्सर सरेआम बेइज़्ज़त करने लगा था। मगर घर की प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग क़िस्म की निकली। घर के लोग ऐसे समयों में मेरी तुलना नरेन से करने लगते जो उनकी नज़र में एक शोहदा होते हुए भी काफ़ी शिष्ट और विनम्र था। “तुमको तो नरेनिया से सीखना चाहिए”, मुझे याद है एक बार पापा ने कुछ ऐसा ही कहा था। ‘‘वो वैसा नहीं है, आप लोगों को इम्प्रेस करने के लिए नाटक करता है!” मैंने चिढ़कर जवाब दिया था। हम लोग नरेन को उसकी उपस्थिति में तो नरेन कहकर बुलाते थे, मगर उसके पीठ-पीछे उसका नाम नरेनिया ही था।
‘‘तो तुम भी कम से कम नाटक ही करना सीख लो!’’ माँ बोली थी।
ऐसे ही माहौल में एक दिन पिस्तौल हमारे घर आई। मगर नहीं, पिस्तौल से पहले गुप्ती और तलवार आईं।
हमारा घर ऐसा था कि अगर छोटा-मोटा साँप या कोई जीव दिख जाता तो उसे मारने के लिए हमें ढूँढ़ने पर भी लाठी या छड़ी नहीं मिलती थी। एकाध बार मैंने झाड़ू या हाथ-पंखे के हत्थे से साँप मारने का प्रयास किया जाता देखा है। ऐसे घर में सबसे पहले नरेन के सौजन्य से गुप्ती पहुँची।
बात यह है कि मैं रोज़ सुबह-सुबह टहलने जाया करता था। आवारा कुत्तों को भगाने के लिए मैं अक्सर पुटुस की झाड़ के एक टुकड़े को हाथ में ले लेता था। एक दिन नरेन ने अचानक एक हंटर जैसी चीज मेरे हाथ में रख दी, और बोला, ‘‘पुटुस का डंटा तुमको नहीं ठीक लगता है। तुम यह रखो, मेरा गिफ़्ट।’’
‘नहीं मुझको हंटरवाला नहीं बनना है।’ मैंने आनाकानी की।
‘‘यह हंटर नहीं है जनाब!’’ उसने हँसकर कहा। फिर खोलकर दिखाया। वह गुप्ती थी। मैंने गुप्ती का नाम तो सुना था, मगर पहली बार साक्षात् देख रहा था।
“बिल्कुल नहीं,” मैं बिदका, “मुझे लड़ाई-झगड़ा थोड़ी करना है।”
‘‘अरे रख लो!’’ नरेन बोला। ‘‘तुम मेरे दोस्त हो, यह बात सब जान गए हैं। और बहुत बार अकेले घूमते-फिरते हो, कहीं कोई हाथपाई ही करने लगे। तुम तो दो-चार खा लोगे, मगर इज़्ज़त मेरी जाएगी ना! फिर जाने कितना मार-काट मचेगा! तुम तो जानते हो जहाँ तुम्हारा पसीना गिरेगा वहाँ मेरा ख़ून गिरेगा!’’ वह अक्सर बातों में ऐसे जुमले फेंकता रहता था।
उसकी बात मुझे कुछ जँची और मैंने गुप्ती रख ली। अब वह मेरे सिरहाने में मेरे तकिए के नीचे, गद्दे के तले, पड़ी रहती और घर के लोग यही जानते कि नरेन ने मुझे टहलने के लिए हंटर दिया है।
फिर आई तलवार। उसकी कहानी कुछ अलग है। एक दिन नरेन और मैं घर की छत पर गए। वहाँ उसने हमारी सेकेंड-हैंड वैगन की बेकार स्प्रिंग-पत्ती पड़ी देखी। हाल ही में पापा ने किराए पर चलाने के लिए एक सिविलियन वैगन ख़रीदी थी, जिसके रिपेयर से वह बेकार स्प्रिंग-पत्ती निकली थी और छत पर बाक़ी बेकाम की चीज़ों के बीच डाल दी गई थी।
अरे! यह तो स्प्रिंग-पत्ती है! नरेन बोला। तुम जानते हो स्प्रिंग-पत्ती से कितनी अच्छी तलवार बनती है? इसका फ़ौलाद बहुत मजबूत होता है, उसमें ज़ंग भी नहीं लगता, इसलिए। इसको पापा से माँग लेता हूँ।’’
मुझे भला क्या ऐतराज हो सकता था? मगर जब उसने पापा से बाक़ायदा बात की तो वह बोले कि इसमें तो कई पत्तियाँ हैं। कई तलवारें बन जाएँगी। ऐसा करो एक तुम हम लोगों को भी दे देना। कोई ख़तरा आ जाए तो यहाँ एक भी हथियार नहीं है।’’ फिर वह नरेन पर रौब ज़माने के लिए उन हथियारों के बारे में विस्तार से बताने लगे जो हमारे गाँव वाले घर में हुआ करती थीं। नरेन आज्ञाकारी शिशु की तरह उनकी डींग सुनता रहा, मगर उसकी भंगिमा से पता चल रहा था कि हमारी ख़ानदानी वीरता के बारे में उसकी क्या राय थी। पापा को मगर अपनी गप्प से मतलब था।
तो इस तरह एक दिन एक तलवार भी हमारे यहाँ आ गई। तलवार आई तो नियमानुसार उसको भी मेरे सिरहाने में गुप्ती के बग़ल जगह दे दी गई। इस तरह मैं एक होनहार, पढ़ने लिखने वाला बालक, जिसकी गांधी और उनके आदर्शों में गहरी आस्था थी, अपने सिरहाने में दो-दो हथियार रखकर सोने लगा। मुझे पता नहीं कि उन हथियारों का मेरे ऊपर क्या प्रभाव पड़ा क्योंकि ऊपरी तौर पर मेरी ज़िंदगी उसी पुराने ढर्रे पर चलती गई।
वैसे मैं निश्चित तौर पर तो कह नहीं पाऊँगा, मगर अब सोचता हूँ तो लगता है कि एक छोटी बहन को छोड़कर, जो कि वैसे भी दुबली-पतली, मरियल और चिड़चिड़े स्वभाव की थी, घर के और लोग भी कुछ-कुछ आक्रामक हो गए थे। पापा अक्सर हम लोगों को कुछ ऊँची आवाज़ में डाँटने-फटकारने लगे थे। यही नहीं एकाध बार उन्होंने बाहर के कुछ लोगों से भी पंगा ले लिया था। इसमें शक नहीं कि इन मामलों में अगर नरेन साथ नहीं देता तो हम लोगों के लिए मुश्किल पैदा हो सकती थी। मगर एक बार बात कंट्रोल के बाहर चली ही गई।
हुआ यह कि उसी साल सरकार कॉलेज परीक्षाओं में नक़ल रोकने के लिए एक नया अध्यादेश लेकर आई थी, जिसके अंतर्गत नक़ल करते हुए पकड़े जाने वाले छात्रों को सीधे जेल हो जाती थी और उसे जमानत लेनी पड़ती थी। इस अध्यादेश के चलते विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच ख़ूब तनाव का माहौल था। मगर पापा पर इस तनाव का कोई असर नहीं था। वह पहले से ही कुख्यात परीक्षा-सम्राट थे। उनके रूम में नक़ल करके बच निकलना लगभग असंभव माना जाता था। मगर उस साल कुछ बहुत कुख्यात, अपराधी क़िस्म के लड़के परीक्षा दे रहे थे और एक दिन पापा ने उनमें से एक को नक़ल करते हुए पकड़ लिया। नए नियम के चलते जब उस लड़के को पुलिस पकड़ कर ले जा रही थी तो उसने पापा को चैलेंज करते हुए कहा, ‘‘आपको देख लूँगा!’’ इतना सुनना था कि पापा जो उन दिनों ख़ासे फ़ॉर्म में चल रहे थे, उछल कर उस लड़के की कॉलर पकड़ ली और बोले, ‘‘तुम क्या, तुम्हारा बाप भी कुछ नहीं कर पाएगा!’’
ज़ुबान की इस फिसलन का ही नतीजा था कि उसी रात नौ-साढ़े नौ के क़रीब उस लड़के ने अपने दर्जन भर साथियों के साथ हमारे घर आकर पापा पर उस समय हमला कर दिया, जब वह बेख़बर होकर किसी से मिलने दरवाज़े से निकल रहे थे। उस हमले में पापा को बहुत चोट आई। रॉड के हमले को हाथ से रोकने की कोशिश में हथेली बीचो-बीच चिरा गई थी। साथ ही चेन से किए गए एक वार से उनके चश्मे का शीशा बीचो-बीच चनक गया था। उनकी समूची पीठ लहूलहान थी। वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए हमला करने वालों का मुक़ाबला करते जा रहे थे। उस शोर को सुनकर जब तक मैं और मेरा छोटा भाई घर के अंदर से आकर मुकाबला करते, पापा काफ़ी मार खा चुके थे। मगर हम लोगों के आ जाने पर हमलावर लड़के पलट कर भाग खड़े हुए और पापा बच गए। मुझे याद है रॉड का एक प्रहार मैंने अपनी बाँह पर रोका था, जिससे मेरी बाँह टेढ़ी-सी हो गई थी और बहुत दिनों तक उसमें काफ़ी टीस होती रही थी।
यह इस हमले के वक़्त ही हुआ कि पहली बार मैंने तलवार का ज़िक्र किया। हुआ यह कि मेरे भाई ने हमला करने वालों में से एक को पकड़ लिया था और वह छूटने की पुरज़ोर कोशिश कर रहा था। जब बाक़ी सब बदमाश भाग खड़े हुए तो मेरा ध्यान उस ओर गया जहाँ मेरा भाई और वह बदमाश गुँथे हुए थे। अब मैंने भी उस लड़के को धर दबोचा, वह लड़का मगर काफ़ी बलिष्ठ था और हम दोनों के काबू में नहीं आ रहा था। तभी अचानक क्या हुआ कि मेरे मुँह से एक घुटी हुई चीख-सी निकली, ‘‘आज तो इसको काट ही डालना है, लाना तो तलवार!’’ यह बात मैंने अपने भाई से कही थी मगर इसका जादू जैसा प्रभाव उस लड़के पर पड़ा और वह लड़ना-भिड़ना भूलकर सीधे इस अंदाज़ में लेट गया मानो उसमें जान ही नहीं हो।
मेरे ख़याल से यह तलवार के ज़िक्र का ही कमाल था कि उस बदमाश ने उस तरह सरेंडर कर दिया था। मगर मेरे लिए आश्चर्य की बात यह थी कि मैंने कितनी आसानी से तलवार से उस लड़के को मारने की बात कर ली थी। मानो यह मेरे लिए बिल्कुल स्वाभाविक काम हो। उस दबी ज़ुबान कही गई बात में एक ठंडी सच्चाई रही होगी, पूरी तरह विश्वसनीय, जिसने उस गुंडे को बता दिया होगा कि एकदम सरेंडर करने में ही भलाई है। मैं आज भी उस पल के मानोवैज्ञानिक पहलू के बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि अगर वह लड़का हार नहीं मानता तो सचमुच मैंने उस छोकरे को मार ही डाला होता। मेरे जैसा शांत मिज़ाज का शख़्स ऐसी बातें करना कैसे सीख गया? मगर शायद यह भी सच है कि वह एक अलग प्रकार के मनोवैज्ञानिक दबाव का क्षण था भी, जब कोई सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी ऐसी ही हरकत कर बैठता।
चाहे जो हो उस घटना ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर विवश कर दिया था। मैं मन ही मन सोचने लगा कि मुझे किसी तरह इस बेमेल संबंध से पीछा छुड़ा लेना चाहिए। वर्ना कहीं किसी दिन लेने के देने न पड़ जाएँ? साथ ही मेरे हर मामले में नरेन के उस प्रकार शरीक हो जाने से मुझे एक प्रकार की घुटन भी महसूस होने लगी थी। मैं कभी, किसी जगह अकेला नहीं था, हर जगह नरेन साये की तरह मुझसे चिपका रहने लगा था। साथ ही वह हमेशा एक न एक तनावपूर्ण बात लेकर आता और हम सबको तनाव में डाल देता। फिर ख़ुद उस तनाव का समाधान करता और हम लोगों पर रौब गाँठता। ये कुछ नकारात्मक आदतें भी थीं जो अब, ज्यूँ-ज्यूँ समय बीतता जा रहा था, हम लोगों पर भारी पड़ रही थीं। मगर मैंने चाहे जितना दिमाग़ पर ज़ोर लगाया, उससे पीछा छुड़ाने का कोई उपाय मेरी समझ में नहीं आया। आप किसी से यूँ ही संबंध कैसे तोड़ सकते हैं? इसीलिए बड़े-बुज़ुर्ग कहते आए हैं कि पानी छानकर पीना चाहिए और संबंध जान कर बनाना चाहिए। मगर अब क्या उपाय था। मैं नरेन का दिल भी नहीं तोड़ना चाहता था और अंदर से कुछ-कुछ उसकी नाराज़गी से डरता भी था। साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे, क्या ऐसा हो सकता था?
काफ़ी सोचने के बाद मेरे दिमाग़ में बस इतना भर आया कि एक ही शहर में रहते हुए नरेन से संबंध तोड़ पाना असंभव था। साथ ही यह सोचकर तसल्ली हुई कि बी.ए. की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुझे अगले साल आगे पढ़ने के लिए बाहर, किसी बड़े शहर में चले जाना था। केवल इस एक साल तक उसे बर्दाश्त करने की ज़रूरत थी। लेकिन इतना भर भी मुझे एक बोझ जैसा लग रहा था, जैसे एक भरा हुआ बोरा सीने पर रखा हुआ हो जिसे मैं उतार नहीं पा रहा हूँ।
मैं किसी निष्कर्ष पर पहुँचता या नहीं पता नहीं है, मगर तभी, इसी बीच, पिस्तौल ने मेरे जीवन में धमाकेदार प्रवेश कर मेरी सोच की दिशा ही बदल दी।
जैसा मैं इस वाक़ये के शुरुआत में बता रहा था, सुबह-सुबह जब अभी हम लोग ठीक से दिनचर्या से फ़ारिग़ भी नहीं हुए थे, कि नरेन घर के आँगन की पीछे वाली दीवार, जो कुछ नीची थी, वहाँ से सीधे आँगन में धड़ाम से कूद पड़ा था और हमलोग एकदम से चौंककर डर गए थे। पापा, जो वॉशबेसिन के सामने खड़े ब्रश कर रहे थे, एकदम से चीख ही पड़े थे। माँ भनसाघर में चूल्हे को सुलगाकर उस पर चाय की केतली चढ़ा चुकी थी और महरी नीचे आँगन में बर्तन धोने की जगह पर राख से मल-मलकर बर्तन माँज रही थी—यानी कि उन दिनों का जो एक सामान्य-सा घरेलु दृश्य हुआ करता था।
नरेन के कूदते ही वह शांत, सामान्य, घरेलू दृश्य चकनाचूर होकर अशांत और असामान्य, किसी हारर फ़िल्म के दृश्य में तब्दील हो गया था। नरेन भी, हक़ीक़त में कूदा नहीं था, बल्कि वह जो जैसे दीवार के ऊपर से टपक पड़ा था, जैसे कोई बोरा किसी ऊँची जगह से लदबदा कर गिर जाए। उसे काफ़ी चोट भी आई थी। हम सभी “क्या हुआ! क्या हुआ!’’ कहते हुए उसकी ओर दौड़ पड़े थे।
‘‘आज हम पिट गए लौली!’’ नरेन ने उठने की कोशिश करते हुए लगभग रुआँसे स्वर में कहा। वह काफ़ी डरा हुआ लग रहा था, अगर हम उसे डरा हुआ कह सकें। वह थोड़ा बहुत घायल था, उसने लुँगी और गंजी पहन रखी थी और उसके केवल एक पाँव में हवाई चप्पल थी।
‘‘सबेरे मैदान (इधर हमारे साइड खेत में निवृत होने को मैदान जाना कहते है) के लिए निकले थे कि उन लोगों ने घेर लिया, बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भाग पाए नहीं तो आज खेल ख़तम था!’’ वह हल्की निराश हँसी हँसते हुए बोला। उसके बाद और भी बहुत सारी बेमतलब की बातें हुईं जो नरेन जैसे गैंगबाज़ आदमी के जीवन का सामान्य हिस्सा होती हैं। नरेन बहुत कुछ बताना चाहता था, आमतौर पर वह हमेशा हमारे बीच अपने वैसे जीवन ओर अपनी वैसी सोच को जस्टीफ़ाई करने के लिए कोई न कोई तर्क या कुतर्क गढ़ता रहता था। शायद हम पर उसके तर्कों का कोई असर नहीं पड़ता था, या शायद कुछ हद तक पड़ता भी हो।
ख़ैर उसकी बातें अभी चालू ही थीं। वह आँख में आँसू भरकर माँ को बता रहा था कि ‘‘अब हम बॉस नहीं रह गए माँ!’’ और माँ उसे सांत्वना दे रही थी कि “क्या हुआ? पापा से कहकर तुमको फिर से बॉस बनवा देंगे, अभी तुम हाथ-मुँह धोकर चाय नाश्ता कर लो।” माँ बेचारी समझ रही थी कि बॉस कॉलेज के छात्रसंघ का कोई पद वगैरह होता होगा। ख़ैर, माँ फिर रसोई में चली गई। पापा भी दाढ़ी बनाने बैठ चुके थे, लिहाज़ा हम लोग मेरे कमरे में आ गए। वहाँ आते ही नरेन ने अपनी लुँगी में से पिस्तौल निकाल कर मेरे हाथ में धर दिया। मुझे तो जैसे बिजली का करेंट ही लगा। एकदम से उछल पड़ा था मैं तो।
‘‘ये क-क्य-क्या है?’’ मैंने हकलाते हुए पूछा।
“मेरा सिक्सर... नरेन बोला। इमपोर्टेड है। बड़ी मुश्किल से बचाकर लाया हूँ। यही छीनने तो आए थे सब।’’
‘‘तो मुझे क्यों थमा रहे हो? यह तो देखने से ही ख़तरनाक लग रहा है!’’
‘‘अरे डरने की बात नहीं है, ख़ाली है। फ़ायर करते-करते भागा तभी तो बच पाया। अब इसमें एक भी छर्रा नहीं है। या क्या पता हो, देखूँ तो...’’ कहकर उसने खटाक से उसे जाने कैसे खोल दिया। फिर बोला, ‘‘नहीं है, मगर अब इसका मेरे पास रहना सुरक्षित नहीं है। पुलिस-फुलिस को भी पता चल सकता है। इसीलिए मैदान का चक्कर लगाकर पिछवाड़े वाली दीवार फाँदकर तुम्हारे आँगन में कूदा... बहुत चोट भी लगी। हड़बड़ी में एक चप्पल भी पीछे ही छूट गई।’’
‘‘तो फिर अब क्या करोगे?’’
‘‘कुछ नहीं, अब कुछ दिन यह तुम्हारे पास रहेगा। तुम पर तो किसी को शक हो ही नहीं सकता है और कुछ समय बाद मैं अपनी चीज़ वापस ले जाऊँगा—जब मामला ठंड़ा जाएगा।’’
हममें कुछ देर बहस जैसी हुई, आख़िर मैंने उसकी बात मान ली क्योंकि ऐसे दोस्त की मदद करना जो मेरे पसीने की जगह अपना ख़ून बहा सकता हो, मेरा फ़र्ज़ बनता था और वह पिस्तौल उसकी जान की हिफ़ाज़त करती थी।
इस तरह एक पिस्तौल भी आकर मेरे सिरहाने में आसीन हो गई। मैं रात को जब तकिए पर सर रखकर सोता तो मेरे सर के नीचे एक पिस्टल, एक तलवार और एक गुप्ती रहते। तलवार और गुप्ती तो अपना चमत्कार दिखा चुके थे। अब रह गई पिस्तौल।
मुझे अब लगता है पिस्तौल के मिलते ही मैं कुछ ज़्यादा ही आत्मविश्वास से भर उठा हूँगा। वैसे यह मामला धीरे-धीरे ही पनपा होगा, मगर अब जब मैं इतिहास की नज़र से उसे देख रहा हूँ तो समय का वह अंतराल सिमट कर महीन हो गया है, और अब सिर्फ़ इतना याद आ रहा है कि एक तरह का आत्मविश्वास मेरे अंदर सीप गया था। हाँ, उसे आत्मविश्वास कहना ही ठीक होगा क्योंकि उसको लेकर किसी तरह की आक्रामकता मेरे अंदर नहीं थी। कोई लड़ाई झगड़ा करने की बात दूर-दूर तक मेरी सोच में नहीं थी। हाँ, मुझे साफ़ और ठोस रूप से महसूस हुआ था कि अब मैं पहले की अपेक्षा कम भयभीत होता था। वैसे तो उस पिस्तौल में एक भी गोली नहीं थी और उसे चलाना भी मुझे नहीं आता था, मगर जाने क्यों मुझे लगता कि कभी अगर किसी से मेरी लड़ाई हुई तो मैं उसे गोली मार देने की धमकी ज़रूर दे सकता हूँ, और ज़रूरत पड़ने पर अपने पिस्तौल की एकाध झलक दिखला कर किसी को सचमुच भयभीत कर सकता हूँ। कि मैं बिना पिस्तौल का प्रदर्शन किए यह अफ़वाह फैला सकता हूँ कि मेरे पास पिस्तौल है और इसका मतलब मैं एक ख़तरनाक शख़्स हूँ, जिससे उलझने से पहले सामने वाले को सोच लेना चाहिए। मनोवैज्ञानिक रूप से मेरी समझ यह थी कि केवल वही लोग पिस्तौल जैसी चीज़ के बारे में धमकी देने का दुस्साहस कर सकते होंगे जिनके पास सचमुच में पिस्तौल होती होगी। जिनके पास पिस्तौल नहीं होती वे इतना बड़ा झूठ नहीं बोल सकते। मेरी इस सोच का आधार यह था कि मैंने ख़ुद कई बार लोगों को “तुझे गोली मार दूँगा” ऐसी धमकी देते देखा था। ख़ुद नरेन मेरे सामने ही अक्सर लोगों को यह धमकी देता रहता था। “गोली मार दूँगा, बम फेक दूँगा, कपार पर मूत दूँगा” ऐसे जुमले वह बात-बात पर फेंकता रहता था। जब उसके पास उसकी पिस्तौल नहीं भी होती तब भी वह बेधड़क धमकाता रहता, “गोली मार दूँगा।” इससे मेरे मन में यह ख़याल पनपा कि केवल वही लोग गोली मारने की धमकी देते हैं, जिनके पास पिस्तौल होती है। बाक़ी लोग “देख लूँगा, पटक दूँगा” ऐसी धमकियाँ देते हैं। अब चूँकि पिस्तौल सचमुच मेरे पास थी तो मेरा भी मन करता कि किसी से भिड़ जाऊँ और धमकी दूँ।
मेरे सामान्य से, दब्बू, मध्यवर्गीय व्यक्तित्व में यह एक अभूतपूर्व विकास था। मैं जब रास्ते पर यूँ भी कहीं आता-जाता रहता, तो एक आत्मविश्वास-सा मेरे अंदर रहता कि मैं एक ऐसा शख़्स हूँ जिसके पास पिस्तौल है। ना जाने कैसे-कैसे विचित्र-विचित्र ख़याल तब मुझे घेरा करते। राह चलते मैं अनेक युद्धों का नायक, शूरमा, वीर, योद्धा बन जाया करता। ख़ासकर वाल्टर मिटी की कहानी का वह हिस्सा मुझे बहुत पसंद है, जहाँ मिटी एक दीवाल से सटकर खड़ा है और उस पर बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें गिर रही हैं... और अचानक मिट्टी अपने हसीन सपनों के देश में पहुँच जाता है... उसे लगता है कि वह एक महान् क्रांतिकारी है और फ़ायरिंग स्क्वैड का सामना कर रहा है। उस पर तड़ातड़ गोली बरस रही है और वह मुस्कुराते हुए शहीदों का पसंदीदा गीत गा रहा है। वाल्टर मिटी के रहस्यमय जीवन की तरह मेरे सपने मगर तुरंत छिन्न-भिन्न नहीं होते, बल्कि अविराम मेरे मन की नदी में तैरते रहते, क्योंकि पिस्तौल कहीं ग़ायब नहीं होने वाली थी। वह तो हमेशा के लिए मेरी थी।
जी हाँ, उसके बाद एक समय ऐसा आया कि मैं सोचने लगा कि यह पिस्तौल सचमुच मेरी है। कि मैं इसे नरेनिया को नहीं लौटाऊँगा। वह जब माँगने आएगा तो साफ़ कह दूँगा कि अब यह मेरी है और वह चाहे तो मुझसे नई पिस्टल ख़रीदने के लिए चाहे जितने पैसे ले ले। मैं उससे कहूँगा कि उससे दोस्ती के चलते मुझे हमेशा किसी न किसी की दुश्मनी का डर रहता है, मैं सोचता रहता हूँ कि कभी भी कोई मुझ पर आक्रमण कर सकता है। इसलिए वह पिस्तौल को मेरे पास ही रहने दे और ख़ुद के लिए, दूसरी इससे भी अच्छी पिस्तौल ले आए।
पिस्तौल से मेरे प्यार का जुनून, वह जुनून था कि मैं सबकुछ भूलने लगा। अब मेरा मन खेल में नहीं लगता था और मैं कप्तानी का अपना दायित्व भी भूलने लगा था। इसके चलते बहुत अव्यवस्था फैल गई थी और खेल को सुचारू रूप से चलाने में परेशानी आ रही थी। इसके चलते कई लड़के मेरे ख़िलाफ़ हो गए थे और मुझे कप्तानी से हटाने की बात करने लगे थे। वह तो नरेनिया का डर था जो उनको खुलकर सामने आने नहीं देता था और मेरी कप्तानी बची रह जाती थी। मगर मुझे इस बात की चिंता नहीं थी। अपनी बला से, भाड़ में जाए कप्तानी। मैं तो अपने नए साथी के साथ ख़ुश हूँ!
अब तो मेरी ये हालत हो गई थी कि कभी-कभी अकेले में बैठा-बैठा यह सोचकर बेमतलब मुस्कुरा उठता कि किसी को संदेह भी नहीं है और मेरे पास एक बंदूक़ है। कि मैं एक हथियार-बंद शख़्स हूँ। कि मुझसे उलझना आसान काम नहीं है। कि मैं किसी को भी ‘देख ले सकता हूँ’। कभी-कभी मैं अकेले में अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लेता और पिस्तौल को निकाल के, उलट-पुलट के देखता। उसके ठंडे धातु को सहलाता। मुझे उसकी अकृति बेहद लुभावनी लगती। मैं अब उससे कुछ करना चाहता था। उसकी सोहबत को अब और आगे बढ़ाना चाहता था। अफ़सोस कि मुझे तो यह भी नहीं पता था कि पिस्तौल को लॉक कैसे करते हैं और कैसे अनलॉक करते हैं। मैं चाहता था कि कोई मुझे यह बताए और पिस्तौल के बारे में सबकुछ सिखाए। मगर मैं यह सब नरेनिया से नहीं कहना चाहता था। इसमें मुझे अपनी हेठी लगती थी। मेरा मन करता कि पिस्तौल के बारे में सबकुछ सीखकर एक दिन उसे आश्चर्यचकित करके रख दूँ। बल्कि कहीं से कुछ गोली-वोली भी ख़रीद लूँ और उनसे निशाना साधने का अभ्यास करूँ। और फिर एक दिन उसके सामने अचानक पिस्तौल निकाल, किसी चीज़ पर सटीक निशाना साधकर उसे हैरत में डाल दूँ। उसकी ऊपर की हवा ऊपर और नीचे की हवा नीचे रह जाय, जैसा वह ख़ुद कहा करता था।
यह बात धीरे-धीरे मेरे दिलो-दिमाग़ पर इस क़दर हावी हुई कि मैंने एक ख़तरनाक काम को अंजाम देना शुरू कर दिया। मैं इधर-उधर से पता लगाने की कोशिश करने लगा कि गोली कहाँ मिलेगी। मुझे नरेन से ही पता लग चुका था कि कौन लोग गोली बेचने का अवैध धंधा करते थे। हमारे आस-पास के इलाक़े के ज़्यादातर निचले स्तर के टोलों के युवक यह सब काम करते थे—जुआ खिलवाना, गाँजा बेचना, गोली स्मगल करना आदि। ये गोलियाँ वे पुलिस या मिलिट्री कैंपों के जवानों से साठ-गाँठ करके पार कर लाते थे, फिर उन्हें नरेन जैसे मवालियों को बेच देते थे। ख़ासकर फ़सल काटने के सीजन में तो उन बस्तियों का बच्चा-बच्चा इस धंधे में लग जाता था। बच्चे इस काम के लिए बहुत फ़िट माने जाते थे क्योंकि उनपर कोई शक नहीं करता था। वैसे यह भी मिथ ही है, क्योंकि यह सारा धंधा पुलिस की ही छत्रछाया में होता था। टोले-मोहल्ले के छोटे-छोटे दुधमुँहे बच्चे तक अपनी जेब में चॉकलेट की जगह गोली रखकर घूमते-फिरते और माकूल अवसर देखकर आपके पास आकर फुसफुसाते—सा‘ब गोली चाहिए का? उनको अच्छी तरह पता होता कि ऐसी बात किससे करनी है और किससे नहीं। इस मामले में वे पूरी तरह ट्रेंड होते। उनकी बातों को सुनकर आपका कलेजा मूँ को आ जाता और आप अपने मुल्क की तक़दीर पर माथा ठोंककर रह जाते।
तो—मैंने अपने ज्ञान का सदुपयोग करना शुरू कर दिया। मैं नाटकीय तरीक़े से उन इलाक़ों में घूमने-फिरने लगा। नरेन की सोहबत में सीखे लटकों-झटकों का प्रदर्शन करता हुआ मैं गोली बेचने वाले लड़कों को तलाशने लगा।
मैंने काफ़ी कोशिश की, मगर सही लोगों तक नहीं पहुँच पाया। नरेन के साथ रहते हुए जो लोग इतनी आसानी से दिख जाते थे, वे न जाने कहाँ बिला गए थे! जिन लोगों से मैंने पूछताछ की, उनमें से कुछ मुझे पहचाने-पहचाने से लगे भी, मगर वे कन्नी काटकर निकल गए, ऐसा ज़ाहिर करते हुए मानो वे मुझे नहीं पहचानते थे और इस तरह की बातों से उनका कोई लेना-देना नहीं था।
इधर नरेन उस घटना के बाद बिल्कुल ग़ायब ही हो गया था। वह कहीं नहीं दिख रहा था। शायद उसे पुलिस ढूँढ़ रही थी और वह कहीं चला गया था। शायद वह गैंगस्टरों के अंदाज़ में अंडरग्राउंड हो गया था। उसके गए लगभग चार-पाँच महीने बीत चुके थे। मैं उसके बारे में सोच-सोचकर थोड़ा-बहुत परेशान भी होने लगा था कि कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया? मगर ऐसा होता तो कोई न कोई मुझे खबर कर ही देता, यह सोचकर अपने मन को समझा लेता था। तभी एक दिन वह अचानक प्रकट हुआ।
वह काफ़ी हड़बड़ी में दिख रहा था। मुझे लगा कि अपनी ग़ैरहाज़िरी के दरमियान वह काफ़ी झटक गया था। ख़ासकर उसका मुखड़ा एकदम निस्तेज था। मैं उससे उसकी कैफ़ियत पूछने ही वाला था, मगर उसने मुझे कोई मौक़ा नहीं दिया।
‘‘लौली, चलो अपने कमरे में...’’ उसने कहा। उसका लहज़ा कुछ अजीब-सा था। मगर उसमें क्या विचित्रता थी मुझे पता नहीं चला। मेरे कुछ कहने के पहले ही वह कमरे की ओर बढ़ गया। मैं उसके पीछे-पीछे भागा।
कमरे में पहुँचकर उसने बिना कुछ कहे-सुने सिरहाने से सीधे अपनी पिस्तौल निकाली और जेब के हवाले कर ली। मैं भौंचक्क होकर यह नज़ारा देख रहा था। नरेन मुझे कुछ-कुछ बदला हुआ-सा लग रहा था। मुझे भीतर ही भीतर डर लगने लगा कि हो न हो उसे मेरी गतिविधियों की जानकारी मिल गई है और वह रुष्ट हो गया है। मगर न तो उसने ऐसा कुछ कहा न ही मैंने पूछा।
‘‘अरे... अरे!’’ मेरे मुँह से बस इतना भर निकल पाया। पिस्तौल जेब के हवाले कर लेने के बाद नरेन कुछ सामान्य दिखा। ‘‘एक ज़रूरी मामला आ गया है, जिसमें इसकी ज़रूरत पड़ सकती है,’’ वह बोला। ‘‘इसलिए थोड़ी जल्दीबाज़ी में हूँ।’’ वह जाने के लिए उठा।
नरेन के तेवर देखकर मैं सकते में था। उससे पिस्तौल हमेशा के लिए माँग लेने की मेरी सारी योजना धरी की धरी रह गई। साहस ही नहीं हो रहा था कि ऐसी कोई बात शुरू करूँ। लिहाज़ा—
‘‘उसके बाद फिर पिस्तौल यहीं रहेगी कि...’’ मैंने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।
‘‘नहीं, अब यहाँ नहीं रखूँगा। इसका तुम्हारे पास रहना ठीक नहीं है। सच कहूँ तो मैं इसे तुम्हारे पास छोड़कर कई बार पछताया हूँ। डर लगता था कि नाहक कुछ हो गया तो तुम फँस जाओगे।”
‘‘अरे! कुछ नहीं होगा!’’ मैंने घुमा-फिरा कर कहा, ‘‘तुम उसे आराम से यहाँ छोड़ सकते हो। किसी को कानोकान ख़बर नहीं होगी!’’
नरेन ठहाका लगाकर हँस पड़ा। पहली बार वह अपने पुराने रंग में दिखा। ‘‘तुम नहीं जानते पुलिस कितनी हरामी होती है। सूँघकर पता लगा लेती है। यह देसी पिस्टल नहीं है, स्मगल माल है। बिना लाइसेंस अवैध बंदूक़ रखना कितना बड़ा जुर्म है तुम नहीं जानते। संजय दत्त के साथ क्या हुआ था भूल गए?’’
मैं सचमुच सिहर उठा। मैंने पहले इन बातों को क्यों नहीं सोचा? मैंने अपने को कोसा। ‘‘ठीक है बाबा... तुम साथ-साथ अपनी वह तलवार और गुप्ती भी ले जाओ। बेकार घर में ढनढनाते रहते हैं।’’
‘‘अरे नहीं-नहीं बाबा... तलवार-गुप्ती में कोई जोख़िम नहीं है। फिर तलवार पापा को दी थी। वो पूछेंगे। गुप्ती तो कोई भी रखे रहता है।’’
‘‘नहीं, नहीं बाबा... तुम अपना सब लाटा-फांदा सम्हालो!’’ मैंने नाराज़गी जताते हुए कहा।
‘‘नाराज़ होने की ज़रूरत नहीं है लौली’’ अब वह बमका। ‘‘मुझे सब पता है जनाब क्या-क्या कर रहे थे। ज़बान मत खुलवाओ!’’
मैं चुप मार गया। मगर बात मुझे लग गई थी। उस दिन जो नरेन गया तो फिर लौटा नहीं। हम उसका इंतज़ार करते रहे। वैसे उसके बारे में पता चलता रहता था कि वह अपने उसी पुराने ढर्रे पर लौट आया था।
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट