अतीत के बिना कोई कला नहीं होती है, किंतु वर्तमान के बिना भी कोई कला जीवित नहीं रहती है, यह भी ठीक है।
हम जिन्हें छोड़ गए हैं उन हृदयों में जीवित रहना मृत्यु नहीं है।
एक बार जब बुराई व्यक्तिगत हो जाती है, रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाती है तो उसका विरोध करने का तरीक़ा भी व्यक्तिगत हो जाता है। आत्मा कैसे जीवित रहती है? यह आवश्यक प्रश्न है। और उत्तर यह है : प्रेम और कल्पना से।
हममें से हर किसी का कुछ न कुछ क़ीमती खो रहा है। खोए हुए अवसर, खोई हुई संभावनाएँ, भावनाएँ… जो हम फिर कभी वापस नहीं पा सकते। यह जीवित रहने के अर्थ का एक हिस्सा है।
जितना आप प्रकट होते हैं और जहाँ आप प्रकट होते हैं, अपने आप पर उतना ही और केवल वहीं विश्वास करें। जो देखा नहीं जा सकता, फिर भी अस्तित्व में है, सर्वत्र है और शाश्वत है। आख़िरकार हम वही हैं।
जो कोई भी मैकियावेली को ध्यान से पढ़ता है, वह जानता है कि दूरदर्शिता इसी बात में है कि कभी किसी को धमकी न दी जाए, बिना कहे कर गुज़रा जाए; दुश्मन को पीछे हटने के लिए बाध्य तो किया जाए पर कभी, जैसाकि कहते हैं, साँप की दुम पर क़दम न रखा जाए; और अपने से नीची हैसियत के किसी भी व्यक्ति के अभिमान को चोट पहुँचाने से हमेशा बचा जाए। किसी व्यक्ति के हित को, चाहे वह उस समय कितना भी बड़ा क्यों न हो, पहुँची चोट कालांतर में क्षमा की या भुलाई जा सकती है; लेकिन अभिमान और दंभ को लगा घाव कभी भरता नहीं है, कभी भुलाया नहीं जाता। आत्मिक व्यक्तित्व भौतिक व्यक्तित्व से ज़्यादा संवेदनशील, या यूँ कहें कि ज़्यादा सजीव होता है। संक्षेप में, हम चाहे जो भी करें, हमारा आंतरिक व्यक्तित्व ही हमें शासित करता है।
मैं जब तक जीवित रहूँगा, उनकी नक़ल नहीं करूँगा या उनसे अलग होने के लिए ख़ुद से नफ़रत नहीं करूँगा।
समाज ने स्त्री-मर्यादा का जो मूल्य निश्चित कर दिया है, केवल वही उसकी गुरुता का मापदंड नहीं। स्त्री की आत्मा में उसकी मर्यादा की जो सीमा अंकित रहती है, वह समाज के मूल्य से बहुत अधिक गुरु और निश्चित है, इसी से संसार भर का समर्थन पाकर जीवन का सौदा करने वाली नारी के हृदय में भी सतीत्व जीवित रह सकता है और समाज भर के निषेध से घिर कर धर्म का व्यवसाय करने वाली सती की साँसें भी तिल-तिल करके असती के निर्माण में लगी रह सकती हैं।
अगर तुम जीना चाहते हो तो तुम्हें पहले अपने अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहिए।
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संबंधित विषय : अंतिम संस्कार
यह सब संसार असार व क्षणिक है। पक्षी आँगन में दाना चुगने के लिए आते हैं और चुग कर उड़ जाते हैं।लड़कियाँ घरौंदे बनाती हैं, गुड्डों-गुड़ियों के विवाह करती हैं और फिर सब खिलौनों को तोड़ डालती हैं। यात्री आकर किसी वृक्ष के नीचे रात को विश्राम लेते हैं और प्रातःकाल होते ही उठकर चले जाते हैं। मार्ग में बहुत से लोगों से भेंट होती है परंतु इन लोगों से कोई मोह या संबंध नहीं जोड़ता। इसी प्रकार जब तक इस संसार में प्रारब्धानुसार जीवित रहता है तब तक उदासीन व अलिप्त रहना चाहिए।
जीवित रहना और एक लेखक होना ही काफ़ी है।
घोर अंधकार में जिस प्रकार दीपक का प्रकाश सुशोभित होता है उसी प्रकार दुःख का अनुभव कर लेने पर सुख का आगमन आनंदप्रद होता है किंतु जो मनुष्य सुख भोग लेने के पश्चात् निर्धन होता है वह शरीर धारण करते हुए भी मृतक के समान जीवित रहता है।
जीवनकाल में वृद्धि के सामाजिक परिणाम बहुत गंभीर हैं। रिटायरमेंट के बाद के लिए, सरकारी सहायता वाले लगभग सभी कार्यक्रमों में यह माना जाता है कि लोग अधिकतम पैंसठ साल की उम्र में काम करना बंद कर देंगे। यह मानक तब तय किया गया था, जब लोग रिटायर होने के बाद कुछ ही साल जीवित रहते थे, लेकिन आज वे इसके बाद आमतौर पर दो दशक तक ज़िंदा रहते हैं।
अगर हम 'अस्वस्थता के संकुचन' के बिना जीवनकाल बढ़ा देंगे, तो इससे हमारी मौजूदा समस्याएँ और बढ़ जाएँगी, लेकिन अगर शोधकर्ता उम्र बढ़ने को मात देने और अस्वस्थता के संकुचन में सफल रहते हैं, तो हम यह दृश्य देख सकते हैं कि लोग आमतौर पर सौ साल से ऊपर भी स्वस्थ जीवन जी रहे हैं और संभवतः उम्र की लगभग एक सौ बीस साल की प्राकृतिक सीमा के पास पहुँच रहे हैं।
…सितारे सिर्फ़ सुंदर ही नहीं, वे जंगल के पेड़ों की तरह हैं। वे जीवित हैं और साँस ले रहे हैं और मुझे देख रहे हैं।
मैं, मृत्यु को ज़िंदा रहकर, दुःख सहकर, ग़लतियाँ करके, ज़ोखिम उठाकर, देकर, गँवाकर स्थगित करती हूँ।
मरेंगे हम सब। सवाल ज़िंदा रहने का नहीं है, सवाल वह रचने का है जो ज़िंदा रह सके।
दिन के पूर्व भाग में जो जीवित सूर्य दिखाई देता है, उसके अंतिम भाग में वही अंगारों का पुंजमात्र रह जाता है, जिसे लाखों श्रेष्ठ व्यक्ति प्रणाम करते हैं, वही स्वामी असमय में अकेला ही मर जाता है।
मृतकों पर दया मत करो… ज़िंदा लोगों पर तरस खाओ, और, सबसे ज़्यादा उन पर जो प्यार के बिना रहते हैं।
मैं उसी वक़्त ख़ुद को ज़िंदा पाता हूँ जिस वक़्त मैं चित्र बना रहा होता हूँ।
काव्य का अनुशीलन करने वाले मात्र जानते हैं कि काव्यदृष्टि सजीव सृष्टि तक ही बद्ध नहीं रहती। वह प्रकृति के उस भाग की ओर भी जाती है, जो निर्जीव या जड़ कहलाता है।
तुम्हें तब तक मुक्ति न मिले, जब तक मैं ज़िंदा हूँ।
अगर सब कुछ ख़त्म हो जाए और सिर्फ़ वही बचा रह जाए, तो मैं ज़िंदा रहूँगी : और अगर उसके सिवाय सब कुछ बचा रह जाता है, मेरी लिए दुनिया अजनबी हो जाएगी।
मृत न होना ज़िंदा होना नहीं है।
फिजिशियंस इस बात से हैरान हैं कि कितने ही लोग अपनी ज़िंदगी लंबी करने के लिए हर तरीका अपनाना चाहते हैं, भले ही कुछ हफ़्तों या कुछ दिनों की हो। इनमें वे लोग भी शामिल हैं, जो भयानक दर्द देने वाली घातक बीमारियों से पीड़ित हैं।
ज़िंदा रहने की इच्छा हमारे भीतर गहराई तक बसी हुई है, भले ही हम अपने अधिक तार्किक पलों में आशावादी हों।
तुम आदि मानव की प्रिया हो। तुम संपूर्ण जगत की माता हो। संजीवनी अमृत पिलाकर तुम रूप देती हो। तुम प्रेरणा की अनुभूति को मधुर मातृत्व में ढालकर अपने प्राण न्योछावर कर जाति को जीवित रखती हो।
आज हम क़रीब एक सदी पहले की तुलना में लगभग दोगुने समय तक ज़िंदा रहते हैं, लेकिन हम उस अतिरिक्त जीवनकाल से संतुष्ट नहीं हैं। बल्कि हम मौत के बारे में और ज़्यादा सोचने लगे हैं। अगर हम एक सौ बीस या डेढ़ सौ साल तक ज़िएँगे, तब इस बात पर कुढ़ेंगे कि हम तीन साल तक क्यों नहीं जी सकते।
कम कैलोरी वाला भोजन खाने वाले चूहे; कितना भी खा लेने वाले चूहों की तुलना में, ज़्यादा लंबे समय तक जीवित और स्वस्थ रहे।
जब तक हम दुख उठाते हैं, हम ज़िंदा हैं।
असल में ज़िंदा मनुष्य तटस्थ नहीं रह सकता है।
प्रिय पाठक, निबंध जीवित है। निराश होने का कोई कारण नहीं है।
क्या कोई भी व्यक्ति धार्मिक निष्ठा के बिना जीवित रह सकता है, चाहे इसे कोई भी नाम दिया जाए?
शोभा, शासन, व राज्य, मिट्टी और धूल के अतिरिक्त क्या हैं? और हम चाहे जैसे जीवित रहें, अंत में मरना तो पड़ेगा ही।
मुहब्बत रूह की खुराक है। यह वह अमृत की बूँद है जो मरे हुए भावों को ज़िंदा कर देती है। मुहब्बत 'आत्मिक वरदान है। यह ज़िंदगी की सबसे पाक, सबसे ऊँची, सबसे मुबारक बरकत है।
जब हमें यक़ीन नहीं होता है, तब हम जीवित होते हैं।
संसार से प्रतिदिन प्राणी यमलोक में जा रहे हैं किंतु जो बचे हुए हैं, वे सर्वदा जीते रहने की इच्छा करते हैं। इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा?
महाभारत में पाँच प्रकार के व्यक्ति जीते हुए भी मरे के समान बताए गए हैं—दरिद्र, रोगी, मूर्ख प्रवासी तथा नित्य सेवा करने वाला।
क्या मैं अपने ही देश में ग़ुलामी करने के लिए ज़िंदा रहूँ? नहीं, ऐसी ज़िंदगी से मर जाना अच्छा। इससे अच्छी मौत मुमकिन नहीं।
जन्म के बाद से मनुष्य लगातार मृत्यु की तरफ बढ़ता रहता है। बीच के ये दो दिन ही उसके कर्म के होते हैं। यह कर्म वह किस तरह करता है, इसी पर उसका मूल्यांकन किया जाता है।
मनुष्यता के सौंदर्यपूर्ण और माधुर्यपूर्ण पक्ष को दिखा कर इन कृष्णोपासक वैष्णव कवियों ने जीवन के प्रति अनुराग जगाया, या कम से कम जीने की चाह बनी रहने दी।
यह खाद्य-विज्ञान का सिद्धांत है कि आदमी की अक़्ल तो घास खाकर ज़िंदा रह लेटी है, आदमी ख़ुद इस तरह नहीं रह सकता।
आश्चर्य है, वैद्य मरते हैं, डॉक्टर मरते हैं, उनके पीछे हम भटकते हैं। लेकिन राम जो मरता नहीं है, हमेशा ज़िंदा रहता है और अचूक वैद्य है, उसे हम भूल जाते हैं।
प्रेम और स्नेह की ज्योति स्त्री के कारण जीवित है।
हाय! कालरूप पाचक हर क्षण प्राणियों के शरीरों में अवस्था परिवर्तन करता रहता है फिर भी उनकी समझ में कुछ नहीं आता।
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