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गाँव-देहात वाला घर-दुआर-खेत-खलिहान : हिस्सेदारी बनाम ज़िम्मेदारी

गाँव-देहात वाला घर-दुआर। यहाँ हिस्सा लेने-देने का मसला गंभीर होता है और बहुत जटिल भी। यह दोधारी तलवार है। तमाम लोग तो हैं कि बिना कुछ किए केवल पैतृक विरासत होने के नाते पाई-पाई का हिस्सेदार होना चाहते हैं और वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं कि लगभग हर गतिविधियों में अपने हिस्से की अधिकतम ज़िम्मेदारी उठाने के बावजूद अपने ही घर में उपेक्षित हो जाते हैं। धकिया दिए जाते हैं। भारी विवाद की स्थिति बन जाती है। बहुधा भाई ही भाई का विकट दुश्मन हो जाता है। वैसे यह तो कोई नई रीति नहीं है। लोक क़िस्सा ही है कि भाई ऐसा हित, न भाई ऐसा शत्रु।

प्रेमचंद ने अपनी कई कहानियों और उपन्यासों में इस बात की गंभीरता को उठाया है। भातृत्व संवेदना को जाग्रत किया है। ‘दो भाई’ कहानी में उन्होंने लिखा है—दोनों भाई जब लड़के थे, तब एक को रोते देख दूसरा भी रोने लगता था, तब वह नादान बेसमझ और भोले थे। आज एक को रोते हुए देख दूसरा हँसता और तालियाँ बजाता। अब वह समझदार और बुद्धिमान हो गए थे। जब उन्हें अपने-पराये की पहचान न थी, उस समय यदि कोई छेड़ने के लिए एक को अपने साथ ले जाने की धमकी देता, तो दूसरा ज़मीन पर लोट जाता और उस आदमी का कुर्ता पकड़ लेता। अब यदि एक भाई को मृत्यु भी धमकाती तो दूसरे के नेत्रों में आँसू न आते। अब उन्हें अपने-पराये की पहचान हो गई थी। 

गाँव-देहात में भाई-भाई के बीच बँटवारे को लेकर तारकेश्वर मिश्र राही का लिखा भोजपुरी का एक बड़ा मार्मिक गीत है—आदमी के सतावला से का फायेदा/ दिल प पत्थर चलवला से का फायेदा/ नेह अंगना गेड़ाईल बटाईल हिया/ त भीती अईसन उठवला से का फायेदा…/ खेत बारी बट जाई/ अरे अंगना दुवारवा, पाई पाई विरना/ हो कईसे भाई के सनेहिया बाटल जाई विरना।। [‘खेत बारी बट जाई’—पूरी कविता यहाँ पढ़ सकते हैं।] इस गीत को रवींद्र कुमार राजू ने बड़े ही भावपूर्ण ढंग से गाया है, जिसे यू-ट्यूब पर सुना जा सकता है :  ऐ बलम जी

इक्कीसवीं सदी के गाँव-देहात में हिस्सेदारी और वहाँ घटित हो रहे बेईमानी के सवाल पर शालिनी श्रीनेत ने अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में एक गंभीर समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट कराया है। वह पोस्ट पढ़ते ही मेरे भी सामने अपने गाँव-देहात का पूरा दृश्य सामने आ गया। ख़ैर, शालिनी श्रीनेत के पोस्ट पर उनसे सहमति और उनसे अलग राय रखने वाले भी उस पोस्ट में अपनी टिप्पणी दर्ज कर गए हैं। उनमें से कुछ टिप्पणियों का यहाँ उल्लेख करना ज़रूरी समझता हूँ।

पहले उनसे सहमति रखने वाले लोगों की टिप्पणी देखिए और पढ़िए। रुचि उनियाल बहुगुणा ने टिप्पणी के तौर पर लिखा है, “मेरा इस मामले में बड़ा कड़वा अनुभव है, जो जन सगे हैं यहाँ तक कि ख़ून के रिश्ते में हैं, वो तक बेईमानी करते हैं और अपने हक़ की बात करो तो बदतमीज़ी और लड़ाई-झगड़े से भी नहीं कतराते। आप अपना हक़ न छोड़ना चाहे कुछ भी हो।” ‘मंडी का महाजाल’ जैसी चर्चित कहानी लिखने वाले कथाकार रणविजय सत्यकेतु ने लिखा है, “इसी पीड़ा से मैं भी गुज़र रहा हूँ। वो हर संभव कोशिश भगाने की, बेइज़्ज़त करने की करेंगे। मगर भागना नहीं है। डटे रहना है।” डॉ. ब्रजमोहन सिंह ने भी अपनी तकलीफ़ व्यक्त करते हुए लिखा है, बाहर वाले के साथ यही हो रहा है। ये काम मेरी भाभी और विवाहिता बेटियाँ कर रही हैं। मेरे आधे हिस्से के घर में घुसने नहीं दे रहीं। एक बेटी पुलिस में भी है। प्रतिभा श्रीवास्तव ने तो बहुत डरावनी बात लिखी है, हमारे गाँव में इसी तरह के विवाद में एक स्मार्ट महिला की उसी के आँगन में पट्टीदारों ने हत्या कर दी थी। वह औरत अपने हक़ की लड़ाई के लिए अकेले गाँव आती। अकेले खेतों तक जाती। कोर्ट-कचहरी दौड़ रही थी। पट्टीदार आठ भाई थे। सबने मिलकर उसे मार डाला।

वहीं इस पोस्ट के काउंटर में विजया श्री और अनिल करमेले ने जो लिखा है, वह कम महत्त्व की बात नहीं है। विजया श्री लिखती हैं, और उनका क्या जो माँ-बाप, नात-रिश्तेदार की ज़िम्मेदारियों को छोड़कर ख़ुद की ही ज़िंदगी जीने में लगे हैं। हर बाहर रहने वाले को यह भी याद रखना चाहिए कि गाँव-घर-परिवार में हिस्सेदारी ही नहीं ज़िम्मेदारी भी उनका हिस्सा है। यह क्या कि ज़िम्मेदारी के वक़्त नदारत रहिए और बाद में बरगलाइए कि खेत-बाग़-बग़ीचे में आपके भाई पाटीदार राज कर रहे हैं। आप जाइए खेती करिए, माँ-बाप को देखिए, भाई पाटीदार ख़ुद ही आपका हिस्सा न छुएँगे। ख़ाली अधिकार की बात करना बेमानी है। चार-चार साल गाँव-घर को न झाँकने वाले, मरने-जीने बीमार पड़ने पर ख़बर तक न लेने वाले इसी तरह बरगलाते हैं।

वहीं अनिल करमेले का कहना है, गाँव छोड़कर शहर में रहने वालों को लगता है कि ज़मीन जैसे लॉकर में रखा सोना है और वह वैसी ही रहेगी जैसे छोड़ आए थे। ज़मीन को खेती लायक़ बनाए रखने के लिए कितनी मेहनत करना पड़ती है, वह एक किसान ही जानता है। बहुत सारे लोग अपने माँ-बाप की ज़िम्मेदारी गाँव में रहने वाले भाई-भतीजों पर छोड़ आते हैं और फिर ज़मीन की फ़सल पर भी क़ब्ज़ा चाहते हैं। ऐसा कैसे चलेगा। जो मेहनत करता है, फ़सल उसकी है।

बहुत लोग शहर में शानदार ज़िंदगी जीते हैं, लेकिन गाँव में रहने वाले भाई के लिए वे चार बीघा ज़मीन तक नहीं छोड़ना चाहते। बहुत नाशुक्रे ऐसे भी हैं जो शहर में अपने आलीशान मकानों में रहते हुए भी पुश्तैनी मकान के आधे हिस्से पर क़ब्ज़ा किए रहते हैं। भले ही वहाँ दो-चार साल में एक बार जाएँ। कहने का अर्थ यही है कि पुश्तैनी ज़मीन हो या मकान, उसकी देख-रेख आसान नहीं है। जो यह सब करता है उसे उसका फल मिलना चाहिए।

इन सब बातों के बीच मेरा स्पष्ट मानना है कि बेशक हिस्सा सबको मिलना चाहिए। लेकिन, यह तो नहीं चलेगा कि मीठा-मीठा गप्प और तीता-तीता थू! पता लगता है कि एक भाई या चाचा देहात की माटी में लिथड़ रहे हैं और दूसरी ओर फ़ैक्ट्रियों में कार्यरत निम्न आय वर्ग के प्राइवेट नौकरी, छोटे-मोटे व्यवसाय को छोड़ भी दिया जाय तो शहर में सरकारी धन या व्यवसाय में रमे हुए भाई-भतीजे शहर में ही ठाठ से जी रहे हैं। वह गाँव-देहात के घर को वेडिंग सेरेमनी प्लेस समझते हैं। जाएँ तो सब हाथ बाँधे खड़े मिले। सब कुछ उनके आगे परोस दिया जाय। क्यों? आप खेती-बारी में कोई सहयोग करते नहीं। देहात के घर-दुआर को हिस्सा से ज़्यादा कुछ समझते नहीं। पाई-पाई का हिस्सा चाहिए तो घर की ज़िम्मेदारियों में भी हिस्सेदार होना होगा। देहात में बूढ़ी माँ का ख़याल भी रखना होगा। घर की साफ़-सफ़ाई और देख-रेख में भी कुछ श्रम, कुछ पैसे ख़र्च होते हैं, उनमें भी तो हिस्सेदार होना होगा। वैसे देखा जाय तो मीठा-मीठा गप्प और तीता-तीता थू! वाला सूत्र दोनों पक्षों के लिए है। गाँव-देहात में रहने वाले भाई-भतीजे-चाचा या अन्य पारिवारिक सदस्य यदि शहरी भाई-भतीजे या अन्य पारिवारिक सदस्यों से गाँव घर के काम में आर्थिक-प्रशासनिक मदद लेते रहें और उनके आने पर उनके प्रति दुराव का भाव रखें तो भी यह कहीं से उचित नहीं। यद्यपि कि ऐसा देखा ही जा रहा है।

शहर में रहने वाले तमाम परिवार वाले लोग अपने गाँव-देहात के घर में बहुत कुछ प्रत्यक्ष रूप से करते हैं, लेकिन उसे गाँव-देहात तो देखता नहीं, गाँव-देहात का समाज तो वही देखेगा जो वहाँ रहने वाला वहाँ के लोगों को सुनाएगा, दिखाएगा। गाँव में रहने वाले माता-पिता भी अपने समीप रहने वाले पुत्र को ही सब कुछ दे देना चाहते हैं। उन्हें और उनके समीप रहने वाले पुत्र एवं पुत्र परिवार को लगता है कि जो शहर में है, उसे क्या ही ज़रूरत? वह लोग तो मौज में हैं। उन्हें अपने शहरी संबंधियों के ख़र्चों की स्थिति और ज़रूरतों का ध्यान ही नहीं रहता। यह सब प्रवृति और स्थिति को समझते हुए संतुलित व्यवहार ही गाँव-देहात के घर-दुआर में पारिवारिक प्रेम को कायम रखेगा। त्याग और मूल्यों के चुनाव की प्राथमिकता भी बहुत कुछ तय करेगी।

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