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क्रेज़ी किया रे : AI के अतिक्रमण में मौलिकता का अस्तित्व

वह फ़रवरी का नौवाँ दिन था और विभाग में वैसी ही चहल-पहल थी, जैसी अन्य कार्यक्रमों के दिनों में होती है। विभाग में कथाकार रणेन्द्र आए हुए थे। ख़ैर, ऐसा तो अक्सर होता है; विभाग में कोई-न-कोई आता ही रहता है।

मैं आपको सीधे दुपहर के क़रीब तीन बजकर बीस मिनट पर, तिलक भवन के पास ले चलता हूँ। तिलक भवन पिछले कुछ सालों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अकादमिक मौजूदगी और सांस्कृतिक गतिविधि का गवाह रहा है। साढ़े तीन बजने वाला था और विद्यार्थी नाटक देखने के लिए तिलक भवन के आस-पास जमा होने लगे थे। आज का नाटक था—‘क्रेज़ी किया रे!’

यह अनुदित शीर्षक था विश्व प्रसिद्ध नाटककार मौलियर (Molière) के विश्वप्रसिद्ध व्यंग्य नाटक ‘द बुर्जुआ जेंटलमैन’ (The Bourgeois Gentleman) का। जिसका हिंदी रूपांतरण किया था जाने-माने रंग-निर्देशक रंजीत कपूर ने ‘कौवा चला हंस की चाल’ शीर्षक से। नाटक का मंचन हिंदी-विभाग (पूरा नाम हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय) की ओर से था। नाटक का निर्देशन विभाग के अध्यापक अमितेश कुमार ने किया।

नाटक करने वालों ने दर्शकों के लिए रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था की थी, दर्शकों से यह अपेक्षा थी कि नाटक देखने से पहले वह एक गूगल फ़ॉर्म भर कर दर्शक सूची में पंजीकृत हो जाएँ, जिससे दल को यह पता चले कि उनके पास कितने और कौन से दर्शक पहुँचे। इस व्यवस्था में पंजीकृत होना रील देखने से भी आसान था, लेकिन कहते हैं न कि यहाँ ‘केऑस में ही डिसिप्लिन’ है। अब, लाल पदमधर के वंशज (यह इलाहाबाद विश्वविद्यालय का अघोषित ध्येय वाक्य है) अगर किसी नियम के पालन में विश्वास करें तो काहे के क्रांतिकारी! एकाएक कारगिल फतह की हुंकार के साथ लगभग ‘हो-हो’ करते हुए विद्यार्थी अंदर घुसते गए और तिलक भवन देखते ही देखते भर गया।

यहाँ कुछ बुनियादी सूचनाएँ साझा करना चाहूँगा। नाटक करने वालों का यह दल शौक़िया विद्यार्थियों का एक समूह है, जिसे वे ‘यूनिवर्सिटी थिएटर’ कहते हैं और ख़ुद को ‘Utians’. यूनिवर्सिटी थिएटर विद्यार्थियों का समूह है जो सामूहिकता और करते हुए सीखने में विश्वास रखता है। विश्वविद्यालय के अलग-अलग संकायों, अलग-अलग विभागों, अलग-अलग कॉलेजों के विद्यार्थी इस समूह में जुड़ते हैं और ख़ुद को ‘यूनिवर्सिटी’ के ‘यूनिवर्सल नॉलेज’ का एक अंग बनाते हैं। इस प्रक्रिया में यूटी के साथी साथ बैठकर किताबें पढ़ते हैं, फ़िल्में देखते हैं, विभिन्न मुद्दों पर सहमति-असहमति के स्वर दर्ज कराते हैं, नाटक का चयन करते हैं, उसके मंचन का ख़ाका तैयार करते हैं और स्वराज विद्यापीठ में उस मंचन का अभ्यास करते हैं। लगातार हफ़्तों और कभी-कभी महीनों चलने वाले ये अभ्यास सत्र कभी-कभी असहज और उबाऊ भी होते हैं, लेकिन इन सब स्थितियों को व्यवस्था का एक अंग मानकर विद्यार्थी स्वयं को मानसिक रूप से अधिक मज़बूत बनाते हैं। नाटक करने से उनका लक्ष्य केवल मंचीय प्रस्तुति देना ही नहीं होता, बल्कि इसी के साथ-साथ सामूहिकता में कार्य करने का कौशल सीखना भी होता है और अपने संवेगी तंत्र को अपने वश में करने का अभ्यास करने का भी। प्रस्तुति की प्रक्रिया में वह तरह-तरह का प्रबंधन भी सीखते हैं। इन विद्यार्थियों के लिए नाटक साध्य नहीं, बल्कि साधन है—तरह-तरह के डिस्कोर्स तक अपनी पहुँच बनाने और उसे समझने का।

फिर से लौटते हैं विद्यार्थियों से भरे हुए तिलक भवन के हॉल में, जहाँ मोबाइल चार बजने का संकेत दे चुका था और नाटक शुरू होने ही वाला था। विभाग के अध्यापक सुजीत सिंह ने नाटक के बारे में बताया और विभागाध्यक्ष प्रो. लालसा यादव को अधिकारिक स्वागत वक्तव्य के लिए आमंत्रित किया। इसके बाद दर्शकों से मोबाइल शांत रखने की अपील के साथ ही मंगलाचरण शुरू हुआ ‘नटनागर नटनागर नटनागर… हर तरफ़ हो जय जय तेरी नटनागर...’ प्रस्तुति प्रारंभ हुई।

नाटक का कथ्य कुछ इस प्रकार था कि एक धनवान किंतु बुद्धि से मंद व्यक्ति मिस्टर झुनझुन कुमार, ‘जेंटलमैन’ कहलवाने की धुन में हर तरह के क्षेत्र में ज्ञान पाना चाहता है। ज्ञान की यह चाहत जिज्ञासा से नहीं, बल्कि केवल ‘जेंटलमैन’ कहलवाने के लिए है, और इसी चाहत में वह अपनी हरकतों की बदौलत हास्यास्पद होता चला जाता है। कभी संगीत, कभी नृत्य, कभी दर्शन, कभी शारीरिक शिक्षा और फिर सब कुछ एक साथ सीखने के चक्कर में उसकी हालत दयनीय लगती है, लेकिन दर्शकों को हँसाती है। टेलर मास्टर से पतलून टाइट करवाना, अजीबोग़रीब कोट पहनना, अपनी नौकरानी से ‘ई’ बोलने का अभ्यास करवाना—ये सब उसकी मूर्खता के कुछ दर्शनीय और हास्यास्पद नमूने थे। उसके दोस्त, यार, मित्र सब उसे केवल ‘जेंटलमैन’ कहते हुए लगातार फ़ायदा उठाते रहते हैं।

नाटक में इस सनकी लेकिन कमअक्ल व्यक्ति के समानांतर डॉली-कुक्कू और मैरी-बिट्टू का प्रेम भी साथ आता है। कुक्कू उस बेचैन प्रेमी जैसा है जो अपनी प्रेमिका के प्रत्येक व्यवहार में दिलचस्पी रखता है और उसी के हिसाब से ख़ुश या दुखी होता है। कभी-कभी वह डॉली से नाराज़ होने की भी कोशिश करता है, लेकिन उसकी हर बार की कोशिश कैसे प्यार में बदल जाती है, यह बात शायद हॉल में बैठे कुक्कू के हमउम्र साथी अच्छी तरह समझ रहे थे। कुक्कू के प्रेम की पीड़ा हँसते हुए भी उन्हें अपनी लग रही थी। इन दोनों घटनाओं के साथ-साथ होने से नाटक में एक विरोधाभास उत्पन्न होता है, जो पूरे नाटक को गंभीर उपपाठ प्रदान करता है।

मिसेज कुमार इस पूरे हँसाने-गुदगुदाने वाले नाटक में एकमात्र सचमुच की परेशान पात्र दिखाई देती हैं। एक ओर वह अपने पति की ऊल-जलूल हरकतों से परेशान हैं, तो वहीं दूसरी ओर उन्हें अपना बसा-बसाया घर भी संकट में दिखाई पड़ता है, जब जेंटलमैन बनने के चक्कर में मिस्टर कुमार प्रिंसेस प्रतापगढ़ के आस-पास मंडराने लगते हैं। इसी बीच उनकी तीसरी परेशानी भी है—वह कुक्कू और डॉली की शादी करवाना चाहती हैं। नाटक की इन सारी समस्याओं को समाप्त करने का जो तरीक़ा नाटककार-निर्देशक ने ढूँढ़ा, वह नायब था। ‘नो व्हेयरलैंड’ के राजकुमार, ‘महाबंडलेश्वर’ (हाँ, हाँ, सही पढ़ा : महाबंडलेश्वर) की उपाधि, ‘महाबंडलेश्वर गुलगुला पद्मभूषण गुलगुला’ के नारे और ‘बीइंग जेंटलमैन’ मिस्टर कुमार को उनके स्वभाव के अनुरूप मूर्ख बनाकर उन्हीं से बनवाई गईं शादी की जोड़ियाँ! एक हँसी से भरपूर नाटक का देर तक सोचने वाला अंत…

नाटक समाप्त होने के बाद, एक कौतूहल और साथ ही साथ एक ख़ुशी भी दर्शकों के साथ हॉल से बाहर जाती है! ख़ुशी इस बात पर कि चलो अच्छा हुआ एक ख़ुशनुमा अंत देखने को मिला, साथ ही साथ यह कौतूहल भी क्या इतनी आसानी से किसी मसले को सुलझाया जा सकता है! नाटक अपने अंत के साथ यह दिखाने में सफल होता है कि कैसे प्रेम को सफल बनाने के लिए सदैव हथियार की ही ज़रूरत नहीं है, एक अच्छा स्वांग भी वैसा ही प्रभाव डाल सकता है बल्कि उससे भी ज़्यादा पूरे नाटक का बिना किसी शारीरिक हिंसा हुए पूर्ण होना इस नाटक को अहिंसा के उपपाठ के रूप में देखने का भी आग्रह करता है।

एआई के इस दौर में, जो दुनिया की हर बात जानता है, हर जगह, हर क्षेत्र की जानकारी रखता है, उसके मुक़ाबले मौलिकता के क्या मायने हैं, नाटक यही दिखाने का प्रयास करता है और नाटक के पात्र कुक्कू के एकालाप से यह प्रयास सफल प्रतीत होता है।

कुछ दिनों पहले यही नाटक स्वराज विद्यापीठ में भी ‘यूनिवर्सिटी थिएटर’ द्वारा प्रस्तुत किया गया था। प्रयागराज का नागरिक बोध उन्नत करने में स्वराज विद्यापीठ की विशेष भूमिका रही है। नाटक की पहली प्रस्तुति भी मैंने देखी थी और संयोग से यह प्रस्तुति भी देख ली और इसीलिए मैं विश्वासपूर्वक कहना चाहूँगा कि नाटक रात के समय में या अँधेरे मंच पर किया जाए तो बेहतर है। तिलक भवन के रोशनदानों से आने वाली रोशनी मंच के लिए आवश्यक अँधेरे को बाधित कर रही थी। मंचन के लिए ज़रूरत की चीज़ों (‘थिएटर’ की भाषा में ‘प्रॉप्स’) को लाने-ले जाने की प्रक्रिया जो देखने में ठीक नहीं होती, दिख जा रही थी और इसी कारण बैकस्टेज के सदस्य अपना काम सहज रूप से नहीं कर पा रहे थे। मिसेज कुमार का किरदार पिछली प्रस्तुति की तुलना में अधिक आत्मविश्वासी नज़र आ रहा था और मिसेज प्रतापगढ़ का किरदार भी मंच पर सामान्य, शांत और सहज था। हम दर्शकों ने गानों के चुनाव को ख़ासा पसंद किया; गाना शुरू होते ही जैसा उत्साह वे बढ़ा रहे थे, वह देखने लायक़ था। तेल के कुएँ, जॉर्ज पंचम, बेंजामिन ट्रंप जैसे शब्द नाटक को समकालीन बना रहे थे। ‘टाइम और स्पेस की यूनिटी’ का अतिक्रमण कर एआई के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया दृश्य इस पूरी समकालीनता का शीर्ष बिंदु था। अगर संगीत की बात करें तो कोरस ने तो बढ़िया काम किया, लेकिन ट्यून कंट्रोल और बैकग्राउंड म्यूजिक ने निराश किया; यह और बेहतर होने के लायक़ था।

यह रपट लिखने के दौरान, उत्तर मध्य सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज (NCZCC) में पाँच दिवसीय नाटक मंचन का आयोजन किया गया है। इस आयोजन को लेकर हम साथी आपस में उत्साहित हैं। कुछ दिन पहले हमने अँग्रेज़ी विभाग की ओर से गिरीश कर्नाड द्वारा लिखित नाटक ‘अग्नि और वर्षा’ की प्रस्तुति भी देखी। इन सब बातों के ज़िक्र का यही मतलब है कि पढ़ने-पढ़ाने और सुनने-सुनाने के इस घोर समय में धीरे-धीरे ही सही, लेकिन इलाहाबाद में देखने-दिखाने की एक नई पीढ़ी का पदार्पण हो रहा है, जो धैर्यपूर्वक नाटक देखना सीख रही है और फिर नाटक पर बात करना भी! ‘अटेंशन डेफ़िसिट’ के इस भयंकर दौर में लगातार डेढ़ घंटे तक केंद्रित होना भी कितने सुख की बात है। विश्वविद्यालय में होने वाले ऐसे नाटक विद्यार्थियों के जीवन से जुड़े होते हैं, वे मंच पर होने वाली घटनाओं को ख़ुद से जोड़ते हैं, उन पर अपना विचार बनाते हैं, नाटक देखने के बाद ये विचार वे आपस में साझा करते हैं। ऐसे मंचन छात्रों के बीच एक ओपिनियन स्पीयर बनाते हैं, जिससे विमर्श की परंपरा को बढ़ावा मिलता है। कुछ ऐसे विद्यार्थी जो नाटक करना चाहते हैं—एक कलाकार के तौर पर भाग लेना चाहते हैं—वे ऐसे नाटकों को देखकर उत्साहित भी होते हैं। कुल मिलाकर विश्वविद्यालय परिसर में नाट्य मंचन विद्यार्थियों को उनके कंफ़र्ट चैंबर से बाहर निकालने का प्रयत्न करता है, ऐसे में विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग और विभागाध्यक्ष को इस नई पीढ़ी के संरक्षण-संवर्धन का एक कारक मानते हुए बधाई देना तो बनता है कि ऐसे नाटकों का मंचन संभव करके उन्होंने इस परंपरा को प्रोत्साहित किया है।

हाँ, नाटक के बाद चाय नहीं थी! इस देश में, चाहे नमक के बराबर ही सही, लेकिन हर बात को चाय पर समाप्त होना चाहिए। नाटक के बाद चाय नहीं थी, नाटक के बाद चाय होनी चाहिए थी!

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