चेख़व का पत्र निकोलाय के लिए : देखो, जीवन की अपनी शर्तें होती हैं...
एंतोन चेख़व
31 जनवरी 2026
मॉस्को, 1886
…तुम मुझसे अक्सर शिकायत करते रहे हो कि लोग तुम्हें “समझते” नहीं हैं! गेटे और न्यूटन ने कभी ऐसी शिकायत नहीं की थी... मसीह ने इसकी शिकायत की थी, लेकिन वह अपने सिद्धांत की बात कर रहे थे, स्वयं की नहीं... लोग तुम्हें बिल्कुल ठीक समझते हैं। और यदि तुम स्वयं को नहीं समझते तो यह उनकी ग़लती तो नहीं है।
मैं तुम्हें एक भाई और एक मित्र के रूप में आश्वस्त करता हूँ कि मैं तुम्हें समझता हूँ और पूरे हृदय से तुम्हारे लिए सहानुभूति रखता हूँ। मैं तुम्हारे गुणों को वैसे ही जानता हूँ, जैसे अपनी पाँचों उँगलियों को; मैं उनका मूल्य समझता हूँ और उनका गहरा सम्मान करता हूँ। यदि तुम चाहो, यह सिद्ध करने के लिए कि मैं तुम्हें समझता हूँ, मैं उन गुणों को गिना भी सकता हूँ। मुझे लगता है कि तुम कोमलता की हद तक दयालु हो, उदार हो, निस्वार्थ हो, अपनी आख़िरी कौड़ी तक बाँट देने को तैयार रहते हो; तुम्हारे भीतर न ईर्ष्या है न घृणा; तुम सरल-हृदय हो, मनुष्यों और पशुओं पर दया करते हो; तुम भरोसेमंद हो, बिना द्वेष और कपट के, और तुम बुराई को याद नहीं रखते... तुम्हें ऊपर से ऐसा वरदान मिला है जो दूसरों को नहीं मिला : तुम्हारे पास प्रतिभा है। यह प्रतिभा तुम्हें लाखों मनुष्यों से ऊपर रखती है, क्योंकि पृथ्वी पर प्रत्येक बीस लाख लोगों में से केवल कोई एक ही कलाकार होता है। तुम्हारी प्रतिभा तुम्हें भीड़ से अलग करती है : यदि तुम एक मेंढक या मकड़े भी होते, तब भी लोग तुम्हारा सम्मान करते, क्योंकि प्रतिभा के आगे सब कुछ क्षम्य होता है।
तुम्हारे भीतर केवल एक ही दोष है और तुम्हारी स्थिति की असत्यता, तुम्हारा दुःख और तुम्हारा आँतों का रोग—सब उसी के कारण हैं। वह है तुम्हारे भीतर संस्कृति का पूर्ण अभाव। मुझे क्षमा करना, लेकिन सत्य मित्रता से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है (veritas magis amicitiae)... देखो, जीवन की अपनी शर्तें होती हैं। शिक्षित लोगों के बीच सहज बने रहने के लिए, उनके साथ अपने घर जैसा अनुभव करने और प्रसन्न रहने के लिए, एक निश्चित सीमा तक सुसंस्कृत होना आवश्यक है। प्रतिभा तुम्हें ऐसे ही एक वृत्त में ले आई है, तुम उसी से संबंधित हो, लेकिन... तुम उससे दूर खिंच जाते हो और सुसंस्कृत लोगों और सामने रहने वाले साधारण किरायेदारों के बीच डोलते रहते हो।
मेरी राय में, सुसंस्कृत लोगों को निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना चाहिए :
• वे मानवीय व्यक्तित्व का सम्मान करते हैं, और इसलिए वे सदा दयालु, कोमल, विनम्र और दूसरों के समक्ष झुकने को तैयार रहते हैं। वे हथौड़े या भारतीय रबर के किसी खोए हुए टुकड़े के लिए झगड़ा नहीं करते; यदि वे किसी के साथ रहते हैं तो उसे उपकार नहीं मानते और जाते समय यह नहीं कहते कि “तुम्हारे साथ तो कोई रह ही नहीं सकता।” वे शोर-शराबे और ठंड और सूखे मांस और तंज़-मज़ाक़ और अपने घरों में अजनबियों की उपस्थिति जैसी बातों को भी सहज रूप से सह लेते हैं।
• उनमें सहानुभूति केवल भिखारियों और बिल्लियों के लिए नहीं होती। उनका हृदय उन बातों के लिए भी दुखता है जिसे आँखें नहीं देखतीं... वे रात-रात भर जागते हैं ताकि P... की सहायता कर सकें, भाइयों का विश्वविद्यालय शुल्क भर सकें और अपनी माँ के लिए कपड़े ख़रीद सकें।
• वे दूसरों की संपत्ति का सम्मान करते हैं और इसलिए अपने ऋण चुकाते हैं।
• वे ईमानदार होते हैं और झूठ से आग की तरह डरते हैं। वे छोटी-छोटी बातों में भी झूठ नहीं बोलते। झूठ श्रोता का अपमान करता है और वक्ता की दृष्टि में उसे नीचे गिरा देता है। वे दिखावा नहीं करते, वे बाहर भी वैसे ही रहते हैं जैसे घर में, अपने साधारण साथियों के सामने शेखी नहीं बघारते। वे बकबक करने और बिना माँगे दूसरों पर अपनी अंतरंग बातें थोपने के अभ्यस्त नहीं होते। दूसरों के कानों के प्रति सम्मान रखते हुए वे बोलने से अधिक चुप्पी रखते हैं।
• वे दया जगाने के लिए स्वयं को नीचा नहीं दिखाते। वे दूसरों के हृदय-तारों को इसलिए नहीं छेड़ते कि लोग आह भरें और उन्हें सराहें। वे यह नहीं कहते, “मुझे समझा नहीं गया,” या “मैं अब दूसरे दर्जे का हो गया हूँ,” क्योंकि यह सब सस्ते प्रभाव की कोशिश है, अश्लील है, बासी है, झूठा है...
• उनमें खोखला अहंकार नहीं होता। वे प्रसिद्ध लोगों से परिचय, नशे में धुत P. (संभवतः कवि पालमिन) से हाथ मिलाने, किसी चित्र-प्रदर्शन में भटके हुए दर्शक की प्रशंसा सुनने, शराबख़ानों में मशहूरी जैसे नक़ली हीरे (उपलब्धि!) की परवाह नहीं करते... यदि वे एक कौड़ी का काम करते हैं तो ऐसे इतराते नहीं जैसे सौ रूबल का कर दिया हो और इस बात का ढिंढोरा नहीं पीटते कि उन्हें वहाँ प्रवेश मिला जहाँ दूसरों को नहीं... सच्चे प्रतिभावान लोग भीड़ में भी गुमनाम बने रहते हैं, आत्म-प्रचार से यथासंभव दूर... क्रायलोव ने कहा भी है कि ख़ाली पीपा भरे हुए से पीपे से अधिक शोर करता है।
• यदि उनमें प्रतिभा है तो वे इसका सम्मान करते हैं। वे इसके लिए आराम, स्त्री, मदिरा, अहंकार—सब कुछ त्याग देते हैं... वे अपनी प्रतिभा पर गर्व करते हैं... इसके साथ ही, वे दुराराध्य भी होते हैं।
• वे अपने भीतर सौंदर्य-बोध का विकास करते हैं। वे कपड़े बदले बिना सो नहीं सकते, दीवारों की दरारों में खटमलों को बर्दाश्त नहीं कर सकते, दूषित हवा में साँस नहीं ले सकते, थूके गए फ़र्श पर पाँव नहीं रख सकते, ऑइल-स्टोव पर भोजन नहीं बना सकते। वे यथासंभव यौन-प्रवृत्ति को संयमित और उदात्त बनाने का प्रयास करते हैं... वे स्त्री में केवल बिस्तर की एक साथी नहीं चाहते … वे उस चतुराई की माँग नहीं करते जो निरंतर झूठ के रूप में प्रकट होती है। वे विशेष रूप से—यदि वे कलाकार हैं—नवीनता, शालीनता, मानवीयता, मातृत्व की क्षमता की चाह रखते हैं... वे दिन-रात कभी भी वोदका नहीं पीते रहते, अलमारियों में सूँघते नहीं फिरते, क्योंकि वे सूअर नहीं होते और जानते हैं कि वे सूअर नहीं हैं। वे तब पीते हैं जब ख़ाली होते हैं, अवसर विशेष पर... क्योंकि वे स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन (mens sana in corpore sano) की इच्छा रखते हैं।
ऐसी ही अन्य बातें। सुसंस्कृत लोग ऐसे ही होते हैं। सुसंस्कृत होने के लिए और अपने परिवेश के स्तर से नीचे न बने रहने के लिए केवल “द पिकविक पेपर्स” पढ़ लेना और “फ़ाउस्ट” से कोई एकालाप याद कर लेना ही पर्याप्त नहीं है…
इसके लिए निरंतर श्रम चाहिए, दिन-रात, निरंतर पठन, अध्ययन, संकल्प... हर घंटा इसके लिए अनमोल है... हमारे पास आओ, वोदका की बोतल तोड़ दो, लेट जाओ और पढ़ो... तुर्गेनेव को पढ़ो, यदि तुम चाहो, जिसे तुमने पढ़ा ही नहीं।
तुम्हें अपना अहंकार छोड़ना होगा, तुम अब बच्चे नहीं हो… तुम जल्द ही तीस के हो जाओगे। अब समय आ गया है!
मैं तुम्हारी राह देख रहा हूँ... हम सब तुमसे यही अपेक्षा कर रहे हैं।
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‘द प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग ई-बुक ऑफ़ लेटर्स ऑफ़ एंतोन चेख़व’ से चयनित एक पत्र | अनुवाद : कॉन्स्टेंस गार्नेट (अँग्रेज़ी), शायक आलोक (हिंदी)
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